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Wednesday, March 4, 2020

हरेश जी की सेवानिवृत्ति ... वही उमंग आज भी है

केवल तिवारी
दिनांक 31 जनवरी 2020, समय : दोपहर 2:30 बजे। स्थान : चंडीगढ़ प्रेस क्लब। दैनिक ट्रिब्यून (Tribune) के संपादक राजकुमार सिंह जी ने कहा, ‘आप बेहतरीन व्यक्ति हैं इसका एक बड़ा कारण आपके साथियों का भी बेहतरीन होना है।’ उन्होंने अपनी बात जारी रखते हुए वहां बैठे न्यूजरूम के सभी साथियों से कहा, ‘यकीन मानिए हरेश जी ने कभी व्यक्तिगत रूप से किसी की मुखालफत नहीं की। कोई गलती विशेष पर भी नहीं।’ फिर उन्होंने अन्य बातें भी कीं। उनसे पहले दैनिक ट्ब्यिून के संपादकीय विभाग के अनेक व्यक्ति अपनी-अपनी बातें रख चुके थे। मौका था समाचार संपादक हरेश वाशिष्ठ जी की सेवानिवृत्ति का।
प्रेस क्लब में ग्रुप फोटो।
मुझे दैनिक ट्ब्यिून में आए सात साल हो चुके हैं। बेहतरीन संयोग था कि वरिष्ठ साथी अरुण नैथानी जी के सौजन्य से घर भी हरेश जी के एकदम करीब मिल गया। संकोची स्वभाव का होने के कारण उनके साथ घनष्ठिता कुछ दिनों बाद बनी। यह भी सच है कि कई लोगों से अब तक नहीं बन पाई। हरेश जी के साथ काम करने के दौरान के अनेक लोगों ने किस्से सुनाए, लेकिन मेरे साथ किस्से कुछ ऐसे हैं कि मैंने उनसे सीखा बहुत कुछ। एक बड़ी बात तो उन्होंने सेवानिवृत्ति के दौरान ही अपने संबोधन में कही कि करीब 36 साल पहले जब उन्होंने ट्ब्यिून ज्वाइन करना था तो उससे एक रात पहले वह कैथल स्थित अपने घर की छत पर रात को टहल रहे थे और एक अलग तरह की उमंग थी। साथ ही इस 31 जनवरी से पहले भी वह चंडीगढ़ स्थिति अपने घर की छत पर टहल रहे थे तो उन्हें लेशमात्र भी दुख नहीं हो रहा था कि अब वह सेवानिवृत्त हो रहे हैं। यहां प्रसंगवश एक बात मुझे याद आ रही है कि ठीक एक साल पहले लखनऊ में मेरे भाई साहब भी सेवानिवृत्त हुए थे। वह भावुक थे। साथ ही खुश थे कि बेदाग निकल गए। क्योंकि जिस विभाग में वह थे वहां दाग लगना कोई आश्चर्य की बात नहीं थी। इस 31 जनवरी को भी लखनऊ में भाई साहब की सेवानिवृत्ति का सारा मंजर मेरे आंखों में चलचित्र की तरह चल रहा था। यहां कुछ ने अपने अनुभव बताए, कुछ ने कुछ भी नहीं कहा और कुछ ने कुछ-कुछ कह दिया। कहने-सुनने के इस मौके पर गीत-संगीत और शेर-ओ-शायरी का दौर भी चला।
मेरे कुछ यादगार पल
साल 2013 में चंडीगढ़ आए मुझे करीब 3 महीने हुए थे। एक दिन मै सुबह 11 बजे अपने घर (किराये पर जहां रहता हूं) पर ताला लगा रहा था। उन दिनों मेरे बच्चे गाजियाबाद में ही थे। मेरे साथ रह रहे नित्येंद्र कानपुर गए हुए थे। हरेश जी मेरे गेट के ठीक सामने बने सोसाइटी ऑफिस में एक मीटिंग में थे। उन्होंने मुझे निकलता देखा तो आवाज लगाकर रोका। फिर पूछा कहां ऑफिस चल दिए। मैंने कहा जी उससे पहले सेक्टर 31 जाकर एक मोबाइल सिम लेना है उसके बाद ऑफिस जाउंगा। हरेश जी ने कहा, थोड़ा रुकें आज लंच साथ करते हैं। मैं कुछ नहीं बोल पाया। न हां और न ही ना। मैं वापस लौटा, ताला खोला और कुछ मैले कपड़े निकालकर उन्हें धोने में जुट गया। करीब एक घंटे बाद हरेश जी आए और बुलाकर अपने घर ले गए। वहां भाभी जी और बच्चों कनु एवं जूजू से पहली औपचारिक मुलाकात हुई। बेहद आत्मीय लोग लगे। कनु मेरी भतीजी का नाम भी है जो इन दिनों एबीपी न्यूज में सीनियर प्रोड्यूसर है। इसके बाद अक्सर बातचीत होने लगी। इसके तीन-चार माह बाद स्कूल में छुट्टियों के दौरान बच्चों को मैं एक हफ्ते के लिए यहां ले आया। रूम मेट नित्येंद्र ने दूसरा घर किराये पर ले लिया था। एक हफ्ते बाद बच्चों को छोड़ने जाना था। मैंने हरेश जी से छुट्टी मांगी साथ ही पूछा कि क्या कोई ऑटो या टैक्सी वाला जानकार है, रात 11 बजे की ट्रेन है। हरेश जी ने कहा घर से कितने बजे निकलेंगे। मैंने कहा 10 बजे; वह बोले-हो जाएगा इंतजाम। मैं निश्चिंत। जिस दिन जाना था, मैने हरेश जी से एक घंटा पहले यानी 9 बजे ऑफिस से जाने की इजाजत मांगी। उन्होंने आज्ञा दे दी। लेकिन वह स्टेशन तक जाने की व्यवस्था के बारे में कुछ नहीं बोले। मैं घर आया और बच्चों से कहा कि जल्दी तैयार होकर चलो। हरेश जी पहले तो कह रहे थे कि व्यवस्था हो जाएगी, लेकिन आज एक शब्द नहीं बोले। तैयार होने में 10 बज गए। जैसे ही हम लोग निकलने को हुए, हरेश जी का फोन आया, पूछा, तैयार हो गए। मैंने कहा जी सर बस बाहर को ही निकल रहे हैं। वे बोले आ जाइये मैं कार लेकर बाहर खड़ा हूं। मैं अवाक रह गया। कितनी जल्दी धारणा बनाने लगता हूं किसी के बारे में। उसके बाद बहुत संयम से सोचने-विचारने लगा हूं। यही नहीं न्यूज रूम में अलग-अलग नेचर के लोगों को हैंडल करते हरेश जी से बहुत कुछ सीखा। इसके बाद तो कई मौके आए जब हरेश जी से अपनापन मिला।
भाभी का बच्चों को गाइडेंस और कनू-जूजू के साथ मेरी हिंदी-विंदी
चूंकि घर अगल-बगल था। अक्सर मिलना हो जाता। इस दौरान भाभी जी बच्चों को गाइड करती। बड़े बेटे से उन्होंने प्रतिदिन कम से कम आधा घंटा साइकिल चलाने को कहा और छोटे से कुछ खान-पान सुधारने को। उन्होंने आईटीबीपी के अपने किस्से भी कई बार सुनाए। मैंने सलाह भी दी कि वह अपने अनुभवों को एक किताब के रूप में लिखें। इस बीच कनु और जूजू तमाम परीक्षाओं के दौर से गुजरीं। हरेश जी और भाभी जी ने उन्हें थोड़ी हिंदी की प्रैक्टिस कराने की जिम्मेदारी मुझे दी। उनको तैयारी कराने के दौरान कई नयी चीजें मुझे भी सीखने को मिलीं। इस दौरान दोनों बच्चे मेरी सेहत के बारे में पूछते, जरूरी सलाह देते और सबसे बेहतरीन नित अलग-अलग तरह की चाय पिलाते। बच्चों की मेहनत है कि आज जूजू के नाम से ऊ की मात्रा हटा दी गयी है। यानी वह जज बन गयी है। कनु डॉक्टर साहिबा हो गयी हैं। ईश्वर उन्हें खूब तरक्की दे। बातोंबातों में पता चला कि हरेश जी के पिताजी का नाम दामोदर था। इत्तेफाक है कि मेरे पिताजी का नाम भी यही था।

आज हरेश जी बेशक ऑफिस के काम से निवृत्त हो गए हैं, लेकिन अभी काफी काम बचा है। संपादक राजकुमार सिंह जी के ही कथन से बात को पूरा करता हूं कि सेवा से निवृत्त हुए हैं, संबंधों से नहीं। अभी कई अनुभव और मिलेंगे और ब्लॉग लेखन का यह सिलसिला यूं ही जारी रहेगा।
ऑफिस से विदा हुए तो क्या, हम सबको तो साथ ही आप पाओगे
है शुभकामना हमारी, जीवन में हर कदम आप खुशियां ही पाओगे।
विदाई के तुरंत बाद की खुशी। अखबार में छपी खबर के जरिए-


बारिश पर हावी रिटायरमेंट का जश्न

केवल तिवारी
29 फरवरी की वह शाम थी। यादगार शाम। और ज्यादा यादगार होती, लेकिन बारिश का खलल पड़ गया। बारिश भी ऐसी कि थमने का नाम न ले। कुछ देर रुके, फिर शुरू हो जाये। बारिश के बावजूद उत्साह में कमी नहीं थी। वसुंधरा के सेक्टर 4 बी स्थित शिवगंगा अपार्टमेंट के गेट पर कुछ महिलाएं खड़ी थीं, पुरुषों की चहलकदमी जारी थी, बच्चों का उत्साह नये रंग में था। इन सबके बीच ढोल बजे रहे थे। पैर थिरकने को बेताब थे। तभी पता चला कि शर्मा जी पहुंचने वाले हैं। शर्मा जी यानी हरीशचंद्र शर्मा। जीना नंबर 10 के ‘लोकल गार्जन।’ 
शर्मा जी और भाभी जी का स्वागत करते लोग।
भाभी जी और बेटा नितिन गए थे शर्मा जी को लिवाने। असल में एलआईसी में शानदार नौकरी करने के बाद शनिवार, 29 फरवरी 2020 को शर्मा जी रिटायर हो गये। वाकई यह दौर एक नये तरह का होता है। आप नौकरी संबंधी रुटीन काम से निवृत्त होते हैं और सामाजिक दायित्वों में जुट जाते हैं। यह अच्छी बात है कि शर्मा जी ने दोनों बेटियों रुचि और सोनाली का विवाह कर दिया है, बेटे नितिन की शादी की तैयारी कर रहे हैं। दोनों बेटियां अपने-अपने परिवार में खुश हैं। उस दिन दोनों बच्चियों से मुलाकात हुई। धीरज जी ने दामादजी से परिचय कराया, बहुत अच्छा लगा। बेटे नितिन का उत्साह भी देखते ही बनता था। मुझे याद आया ठीक एक साल पहले लखनऊ में अपने भाई साहब के रिटायरमेंट का। वह तारीख 31 दिसंबर की थी। खैर उस शाम शर्मा जी जब गेट पर पहुंचे तो हम सभी ने उनका वार्म वेलकम किया। बारिश को लेकर कुछ बातें हुईं। शर्मा जी ने मजाक किया, ‘तिवारी जी चंडीगढ़ से बारिश साथ लेकर आए हैं।’ वाकई पहली रात चंडीगढ़ में खूब बारिश हुई थी। मैं रात को ही चलने वाला था, लेकिन भारी बारिश को देखते हुए मैंने कार्यक्रम टाल दिया। मैं अगले दिन यानी 29 फरवरी की ही सुबह 8 बजे चंडीगढ़ से चला। शाम 5 बजे के करीब शर्मा जी के घर पहुंच गया।
कृष्णाजी की भागदौड़ और सलाह मशिवरा
इस पूरे प्रकरण में कृष्णा जी की भागदौड़ देखने लायक और सीखने लायक थी। वह पैंट को समेटे, चप्पल में इधर से उधर भाग रहे थे। कभी खाने की टेबल गली में शिफ्ट कराने में तो कभी डीजे के साउंड बॉक्स को धीरज जी की बालकनी में रखने में। बीच-बीच में वह हम लोगों से भी सलाह-मशविरा कर लेते। इसी दौरान शर्मा जी के आने की सूचना मिली। फोटोग्राफर का इंतजार किया जाने लगा। 10 मिनट इंतजार के बाद कृष्णा जी ने कहा कि अब इंतजार नहीं चलिये। उनका यह फैसला सही रहा, क्योंकि थोड़ी देर में ही फिर भारी बारिश हो गयी।
बच्चा पार्टी का दिया खूबसूरत गिफ्ट।
बच्चों ने दिया सबसे प्यारा गिफ्ट
चंडीगढ़ लौटने के बाद शर्मा जी का फोन आया, ‘ठीक से पहुंच गये।’ फिर उन्होंने शिकायत की कि जाते वक्त मिले क्यों नहीं, बच्चों के लिए मिठाई भेजनी थी। मैंने माफी मांगते हुए कहा, ‘आशीर्वाद बनाए रखिए।’ बातों-बातों में शर्मा जी ने कहा कि उन्हें बच्चों का गिफ्ट बहुत अच्छा लगा। फिर उसकी फोटो उन्होंने भेजी। वाकई बच्चों की मासूम भावनाएं होती ही बहुत अच्छी हैं। बच्चों ने खूबसूरत फोटो लगाकर अपने दिल की बातों को इसमें लिख छोड़ा है। शर्मा जी को नये जीवन पथ पर चलने की अग्रिम बधाई। वह स्वस्थ रहें, खूब घूमें, फिरें। जल्दी ही हम लोगों की मुलाकात होगी। मैंने उन्हें चंडीगढ़ आने का निमंत्रण दिया है, देखते हैं योजना कब पूरी होती है। पेश है एक शेर-
ऑफिस से विदा हुए तो क्या, हम सबको तो साथ ही आप पाओगे

है शुभकामना हमारी, जीवन में हर कदम आप खुशियां ही पाओगे।

Tuesday, February 25, 2020

निकिता मैम ने कहा-‘आप अपने लिए भी जीयें’ ... बस पड़ गया फर्क

केवल तिवारी
इस बार वर्षों बाद वह घर आया है, अपने साथ खुद को भी लाया है।
अपने साथ खुद को लाने की एक शायर की यह बात है बहुत गंभीर। वाकई कई लोग आपाधापी में खुद को भूल चुके हैं। कोई बच्चों को समर्पित है। कोई पैसे के पीछे भाग रहा है। किसी को प्रतिष्ठा की चिंता है और कोई दो जून की रोटी के जुगाड़ में ही इतना व्यस्त है कि उसे अपने बारे में ही कुछ पता नहीं। लेकिन कई बार कुछ मोड़ ऐसे आते हैं कि आपको लगता है-
जीवन पथ पर आएंगे कई मोड़, पल वही अपने जो आपको खुद से दे जोड़।
Nikita Mam
कुछ मंजर ऐसा ही हुआ कुछ दिन पहले। चलिए इसकी शुरुआत करते हैं-कोई लाग-लपेट नहीं, कोई गिला-शिकवा नहीं। आमना-सामना हुआ। हाल-चाल पूछा फिर अचानक सवाल, ‘आज बहुत कमजोर क्यों लग रहे हैं। तनाव ज्यादा लेने लगे हैं।’ निकिता मैम पहले मुझसे मुखातिब थीं, फिर मेरी पत्नी भावना की तरफ हंसते हुए मजाकिया अंदाज में पूछा, ‘आप ध्यान नहीं रख रहीं इनका।’ कुछ पल हंसी मजाक। फिर उन्होंने गंभीर होकर कहा, ‘देखिए आप अपना कर्म कर रहे हैं। बच्चों पर पूरा ध्यान दे रहे हैं फिर तनाव पालकर क्या होगा।’ अमूमन मैं खूब बोलने वाला हूं, लेकिन उस दिन ज्यादा नहीं बोला। यह बात है नवंबर या दिसंबर की। सही तारीख याद नहीं। ट्रिब्यून मॉडल स्कूल (Tribune Model School) में बेटे धवल की पीटीएम (PTM) थी। मेरी और पत्नी की हमेशा कोशिश होती है कि पीटीएम में हम दोनों जाएं। उस दिन भी यही हुआ। हम दोनों पीटीएम से लौट रहे थे। सीढ़ियों के पास निकिता मैम मिल गयीं। उन्होंने यह भी कहा कि आपसे फिर विस्तार से बात करेंगे। विस्तार से बात करने की बात पर भावना कई दिनों तक इसलिए तनाव में रहीं कि कहीं धवल कोई शैतानी तो नहीं कर रहा। धवल अकसर दोस्तों की ऐसी बातें भी बताता कि मन सन्न रह जाता। इतनी छोटी उम्र में भी बच्चे ऐसी बातें। मैंने भावना को समझाया कि तुम भले ही परेशान हो, मैं तो रिलेक्स हूं। अगली बार मैडम से मिलेंगे तो सकारात्मक बातें होंगी।
भावना की चिंता भी वाजिब थी। इस पर एक कवि की चंद पंक्तियां याद आती हैं-
बारिश तो आती है पर क्या, सावन में सावन दिखता है। बच्चे तो दिखते हैं काफ़ी, कितनों में बचपन दिखता है।
बिल्डिंग में कमरे ही कमरे, गायब घर-आंगन दिखता है। अपनापन तो नहीं, पर इन दिनों परायापन खूब दिखता है।
खैर...मुझे याद है करीब चार साल पहले निकिता मैम मेरे बेटे धवल को पढ़ाती थीं। उसके बाद उन्होंने स्कूल छोड़ दिया। बेटा उन्हें बहुत मिस करने लगा। वक्त गुजरता गया, एक दिन पता चला कि निकिता मैम ने फिर ज्वाइन कर लिया है, इस बार स्पेशल एजुकेटर के तौर पर। उन्होंने इसके लिए बाकायदा कोर्स किया है। उनके आने के बाद एक बार सभी पैरेंट्स को एक साथ बिठाकर कुछ टिप्स दिये गये। खासतौर पर उन्हें जिनके बच्चे बोर्ड परीक्षा देने वाले थे। मेरे बड़े बेटे कार्तिक उस दौरान 10वीं की तैयारी कर रहा था। पढ़ने में ठीक ही था। थोड़ी सी किशोरावस्था वाली चीजें उसके मन-मस्तिष्क पर हावी हो रही थीं। थैंक्स ट्रिब्यून
स्कूल का, स्कूल की प्रिंसिपल का, क्लासटीचर बिनेश सर का, निकिता मैम का और अब स्कूल छोड़ चुकीं अवलीन कौर मैमम का। आगे बढ़ने से पहले किसी शायर की दो लाइनें पेश करना चाहता हूं-
अपनी हालत का ख़ुद एहसास नहीं है मुझ को, मैंने औरों से सुना है कि परेशान हूं मैं
तकलीफ़ मिट गई मगर एहसास रह गया, ख़ुश हूं कि कुछ न कुछ तो मिरे पास रह गया।
बहरहाल, वापस आते हैं निकिता मैम पर। एक दिन स्पेशल पैरेंट्स क्लास हुई। उसमें निकिता मैम ने जोर-जोर से ए फॉर एप्पल और वन टू थ्री सबसे बोलने को कहा। कुछ लोग ऐसा करने में संकोच भी कर रहे थे। लेकिन देखते ही देखते सबको मजा आने लगा। थोड़ी देर बाद निकिता मैम ने कहा, कैसा लगा, सब हंसने लगे और बोले-मजा आ गया। निकिता मैम ने कहा जब छोटी-छोटी बातों से आनंदित हुआ जा सकता है तो आप बच्चों के साथ कभी-कभी बच्चा क्यों नहीं बन जाते। सचमुच बात बहुत अच्छी और बहुत छोटी सी लगी। मैंने अब तक पैरेंटिंग पर 200 के करीब आर्टिकल विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और साइट्स पर लिखे होंगे, लेकिन बात जब अपने पर आती है तो उसी तरह हो जाता है कि जैसे डाॅक्टर खुद का इलाज नहीं कर पाता। ऐसे ही अनेक मौकों पर निकिता मैम से बातें होने लगीं। स्कूल से मेरा नाता एक अभिभावक के अलावा भी है। कई बार बच्चों को मोटिवेशनल लेक्चर दिया है। कहानी लिखने के टिप्स दिए हैं। चुपचाप अभिभावक की भूमिका में जाता हूं, कभी रिपोर्टर के तौर पर और कभी स्कूल की मीटिंग में। हर बार कुछ सीखने को मिलता है।
बत फिर वहीं से,  
जब निकिता मैम ने कहा कि आप अपने लिए भी जीना सीखें। चिंता न करें, कर्त्तव्य करें। मैंने मन ही मन ठान लिया कि अगली बार मैडम से मिलूंगा तो शायद शिकायत का मौका नहीं दूंगा। इस बार भी अभी 15 फरवरी को फिर पीटीएम में गया। इस बार निकिता मैम से स्पेशल मिलने जाने का मन बनाया, लेकिन इसी बीच कुछ टीचर्स के साथ लंबी बातचीत होने से समय ज्यादा निकल गया। भावना बोलीं, चलो निकिता मैम से मिलकर आते हैं। जब तक वहां पहुंचे मैडम का कमरा बाहर से बंद था। हम लोग लौटने लगे तो मैडम फिर सीढ़ियों के पास मिल गयीं। कुछ पैरेंट्स से बात करते हुए। हमने इंतजार किया फिर बातों का सिलसिला शुरू हुआ। सबसे पहले मैंने ही पूछा मैडम आज तो मैं ठीक लग रहा हूं ना। वो थोड़ा आगे बढ़ीं प्रिंसिपल मैम के कमरे के बाहर हेल्पडेस्क के टेबल को छुआ और कहा टचवुड। फिर हम लोग पास ही रखे सोफे पर बैठ गए। उन्होंने कुछ बातें तो बेटे धवल को समझाईं। फिर हमसे भी बातें होने लगीं। हम लोगों ने तय किया कि बच्चों और पैरेंट्स को लेकर हम लोग अक्सर मिलेंगे और बात करेंगे। शायद इनसे कुछ ऐसी बातें निकलें कि जो औरों के लिए भी आगे चलकर फायदेमंद हो सके;
हर तमन्ना जब दिल से रुखसत हो गई, यकीन मानिए फुर्सत ही फुर्सत हो गई।
नादान हैं जो बाजार में वक्त खरीदने चले हैं, वक्त उसी का है जो वक्त के साथ चले हैं।

कुछ टीचर्स का चले जाना, हर एक से कुछ सीखना

मुझे सात साल हो गये हैं चंडीगढ़ आए और बच्चों को छह साल। यानी ट्रिब्यून माॅडल स्कूल से नाता जुड़े भी छह साल ही हो गये हैं। मैं बड़े बेटे को लेकर कई टीचर्स से सवाल पूछता तो हर कोई कहते बहुत अच्छा बच्चा है। यकीनन मुझे अच्छा तब लगा जब एक बार एक मैडम ने कहा कि आपने उस पर उम्मीदों का पहाड़ लादा है। वह हंसता नहीं। इतना गंभीर क्यों। मैंने इस पर होमवर्क किया, लेकिन बड़ा बेटा कार्तिक आदतन ऐसा है। वैसे टीचर्स के सुझाव के बाद उसे बदलने की कोशिश की। आज वह ट्रिब्यून स्कूल से निकल चुका है, लेकिन यहां से बहुत कुछ सीखकर निकला। हिंदी की आशा भारद्वाज मैडम हों या रजनी मैडम, इन लोगों से अकसर बातें होती हैं। म्यूजिक के अतुल सर से लेकर वीआरएस ले चुकी अनुपमा मैम, सबसे बातचीत का सिलसिला जारी है। विनिमा मैम, नम्रता मैम, निधि मैम, स्वाति मैम और कुछ नये आए टीचर्स। मेरी कोशिश होती है कि मैं सबसे मिलकर बच्चे की पढ़ाई के अलावा उसकी हरकतों के बारे में भी बात करूं। इन सबके बीच प्रिंसिपल वंदना सक्सेना मैम का बेहतरीन सहयोग। एक बार प्रिंसिपल मैम को मैंने अपनी एक कहानी का लिंक भेजा, उन्होंने प्रतिक्रिया स्वरूप पूछा, इज इट धवल। वंदना मैम के साथ तो इतने अनुभव हैं कि उन पर एक लंबी कहानी लिखने का इरादा है।
केवल तिवारी

Sunday, February 23, 2020

नितिन की शादी और एक परिवार-नेक परिवार

केवल तिवारी

कुछ पल बचा लो अपनों के लिए, जो देखोगे पलट के, ये मिलेंगे कहां
वक़्त का तक़ाज़ा कहता है यही, जो बीत गये पल, फिर आएंगे कहां
आओ इस पल को यादगार बना लें, जो बातें होंगी अभी, फिर करेंगे कहां।
भाभी-भैया संग मिनी, दीपा
जी हां! एक कवि की उक्त पंक्तियां मानो उसी दौर के लिए लिखी थीं जो कुछ दिन पहले हमने सपरिवार महसूस कीं। मौका था नितिन की शादी का। एक-एक लम्हा (कई दिनों के कार्यक्रमों में तीन दिन मैं भी मौजूद रहा) यादगार रहा। यहां अपनापन था। सम्मान था। जान-पहचान वालों से मेल-मुलाकात का एक दुर्लभ अवसर था। बातों का संगम था, अपनों का समागम था। नितिन के मम्मी-पापा को साधुवाद कि उन्होंने बेहतरीन मौसम और बेहतरीन टाइमिंग पर सभी समारोहों को रखा। मैं विपिन से कई बार पूछता, ‘तन-मन से सहयोग को तैयार हूं, मेरे लायक सेवा बताना।’ विपिन का आग्रह होता, ‘चाचा जी आप समय पर पहुंच जाना। इतना ही बहुत है।’ रिश्ता हमारा बेशक चाचा-भतीजा वाला है, लेकिन संबंध दोस्ताना हैं। आइये चलते हैं उस यादगार लम्हों को फिर से समेटेते हुए।
स्थान : वसुंधरा (Vasundhara Ghaziabad Uttar Pradesh)में वोल्वो बस के अंदर, समय : सुबह के लगभग 8:30 बजे। दिनांक : 9 फरवरी। मौका : नितिन की बारात में जाने का। मुझे एक दिन पहले हुए कार्यक्रम की कुछ फोटो-वीडियो दिखाई गईं। तभी आवाज आई, ‘चाचाजी को उस प्रोग्राम की वीडियो और फोटो दिखाओ ताकि इन्हें पता चले कि इन्होंने क्या मिस किया है।’ आवाज दर्शन पांडे जी की थी। दर्शन जी मेरी भतीजी नीरा के पति। भतीजे हरीश, दीप और प्रकाश ने भी उनके साथ सहमति जताई। इसके बाद एक जोरदार ठहाका। मैंने माना, ‘हां मैंने इसे मिस किया।’ यह तो अभी अपने लोगों के बीच बातचीत और हंसी-मजाक की शुरुआत थी। विपिन से भतीजे का रिश्ता है तो जाहिर है नितिन पोता लगा। वह मुझे कहता भी बड़बाज्यू है। एक बार उसकी अम्मा यानी मेरी भाभी यानी विपिन की मांताजी ने नितिन को यह रिश्ता समझाया था उसने तब से इसे गांठ बांध ली। कभी पारिवारिक समारोहों में मिलते भी तो नितिन कहता, ‘आओ बड़बाज्यू डांस करते हैं।’ पूरी बात से पहले उस विवाह समारोह की जो खूबसूरत चीज थी उसे बयां करना चाहूंगा। इस कार्यक्रम में पूरा परिवार एक जगह था। विस्तृत परिवार। बारात जाने के दौरान महिला मंडली जिसमें मेरी भतीजियां, मेरी बहुएं, मेरी दीदी और नाती-नातिन, पोते-पोतियां भी शामिल थे, भी बस में बैठना चाहती थी। उन्होंने कहा बुजुर्ग इनोवा में चले जाएं हम यहां हुड़दंग करेंगे। कितना सुंदर था वह ‘हुड़दंग’ कहना। मैं, लखनऊ से आए दाज्यू भुवन चंद्र तिवारी, जीजा जी, एक मित्र उमेश पंत आगे की सीटों पर बैठे थे। मैंने कहा, ‘बुजुर्ग आगे बैठे हैं, उनके पीठ पीछे कुछ भी करो।’ जहां तक मेरा संबंध है, वह थोड़ा अजीब है। एक तो अपने घर यानी अपने माता-पिता की सबसे छोटी संतान हूं, लेकिन पूरे परिवार में रिश्ते में ‘सीनियर’ लोगों का भी चाचा लगता हूं। यानी छोटा सा बुजुर्ग हूं। इसीलिए परिवार में जिनसे अनौपचारिक बातें नहीं हुईं हैं, वे अभी तक ‘झिझकती हैं।’ बुजुर्ग मानें तो कैसे, ‘जमीन से जुड़ा व्यक्त लगता है, जमीन से ही जुड़ा रह गया।’ बराबर के हैं नहीं, छोटा मान नहीं सकते। वैसे बीना यानी नितिन की मम्मी से काफी बातें शेयर होती हैं, जहां मैं असहज होता हूं, वहां मेरी पत्नी भावना चीजों को संभाल लेती है, लेकिन यहां कुछ कारणों से वह समारोह में नहीं आ सकी। खैर... ये तो हुई हा हा हा वाली बात। आइये समेटते चलें उन यादगार लम्हों को।
 बस का वह खूबसूरत सफर (Travelling by Bus)
बस में सबसे पहले नितिन की बहन यानी बिपिन-बीना की बिटिया एक माइक लेकर मेरे पास आईं और बोलीं, ‘बड़बाज्यू कुछ अनाउंस कर दो।’ मैंने थोड़े जयकारे लगाये फिर काम सौंप दिया प्रकाश को। प्रकाश जो हर काम को निभाने में अग्रणी भूमिका निभाता है। हमारे परिवार में समारोहों का तारणहार। उसके बाद बस में शुरू हो गया अंताक्षरी का कार्यक्रम। विपिन भी हम लोगों के साथ ही चल दिया। वहां नितिन के दोनों मामाओं से मुलाकात हुई। ये लोग बहुत पुराने परिचित हैं और एक व्हाट्सएप ग्रूप के साथी। आगे की दो-चार सीटों पर हम लोग बातें करते रहे और पीछे चलते रहे गीत। बीच-बीच में हम लोग भी इसका आनंद ले रहे थे। एक जगह टोल नाके पर लंबा जाम मिला। विपिन और प्रकाश ने नीचे उतरकर किसी तरह हमारी बस को आगे करवाया। गजरौला से पहले एक बेहतरीन रेस्तरां में हम लोगों न नाश्ता किया। होते-करते करीब 3 बजे हम लोग हल्द्वानी स्थित देवाशीष होटल पहुंचे। वहां गांव से आए उमेशदा, दीप दा और जो लोग बस के बजाय इनोवा में आये थे जैसे नोएडा कैलाश चंद्र पांडेजी (उम्र 65 साल रिश्ते में मेरे भांजे), प्रयागदा (उम्र 72 साल रिश्ते में मेरे भतीजे), रानीखेत से आए सुनीलदा, कैलाश दा (विपिन के ममेरे भाई) मिले। सुनीलदा और उनकी पत्नी प्रणाम कहने लगे तो मैंने टोका, लेकिन वह बोल पड़े, ‘चाचाजी रिश्त ठुल हुनी हय’ यानी चाचाजी रिश्ता बड़ा होता है। इन लोगों के साथ बातचीत के बाद हम लोगों ने थोड़ा आराम किया। कुछ फोटो वगैरह खींचे और बारात के लिए तैयार होने लगे। बारात रामपुर रोड से शुरू हुई। वहां डांस करना, पार्टी में शामिल होना, हंसी मजाक करना, विपिन का खुद ही एक जगह बेहतरीन मंत्रोच्चारण करना सबकुछ याद आता है।
बड़बाज्यू चलो डांस करने (grandpa dance)
सोमवार दोपहर बाद बारात वसुंधरा पहुंच गयी। वापसी में लोगों की थकान साफ दिख रही थी। इस दौरान हरीश ने यूट्यूब पर बेहतरीन गाने लगा दिए। कभी गुलजार के तो कभी जावेद अख्तर के। बीच-बीच में बातें भी होती रहीं। दर्शनजी ने कई पुरानी बातें कीं। अगले दिन शाम को भव्य पार्टी थी। मिराया बैंकट में वसुंधरा के कई जानकार, गुलाबी बाग (Gulabi Bagh) से आए कुछ लोग मिले। जश्न मना और बातें हुईं। इसी दौरान बिटिया दीपू आई बोली, ‘बड़बाज्यू चलो डांस करने।’ मैं चला गया। वहां से भतीजी कनु साथ आई और कई लोगों से मेल मिलाप का दौर चला।
वे रिश्ते की दुश्वारियां और हंसी-मजाक के लम्हे
स्वागत में तैयार बिपिन और बीना।
रिश्तों की दुश्वारियों के बीच हंसी-मजाक भी तो जरूरी था। शुरुआत हुई बिना मजाक के मजाक की। हल्द्वानी में शादी कार्यक्रम (पूजा-पाठ) संपन्न होने के बाद विपिन ने अपनी समधन और अन्य लोगों से मुलाकात कराई। मैंने कहा, ‘थोड़ी देर पहले आपने हमसे कहा था कि सामान मैं अंदर कमरे में अभी रखवाती हूं, मुझे लगा आप दुल्हन की दीदी हैं।’ वह हंसी और बोलीं, ‘कंप्लीमेंट के लिए थैंक्स।’ फिर मैंने कहा आप यूं ही युवा बने रहें। उसके बाद गाजियाबाद में रिसेप्शन पार्टी में मैंने विपिन से धीरे से कहा, ‘बर ब्योली जस तुम लोग लागण छा।’ विपिन ने हंसते हुए कहा, ‘मुझसे ही कहोगे या अपनी बहू से भी।’ मैंने कहा, ‘रिश्तों की दुश्वारियां हैं।’ विपिन ने कहा, ‘कह डालो।’ फिर मैं बीना के पास गया और बोला, ‘नजर न लगे तुम दोनों को, बहुत जच रहे हो।’ बीना हंसते हुए बोली, ‘थैंक्यू चाचाजी।’ उसके बाद खाते-पीते, भैया-भाभी, दीदी-जीजाजी, भतीजे-भतीजी आदि से बात होती रही।
ऐसे मौकों के लिए एक शेर याद आ रहा है-
दर्द-ए-हिजरत के सताए हुए लोगों को कहीं, साया-ए-दर भी नज़र आए तो घर लगता है।
 पार्टी के इस मौके पर पता ही नहीं चला कि कब रात के 11 बज गये और याद आया कि अब कश्मीरी गेट (Kashmiri gate) बस अड्डे पहुंचकर चंडीगढ़ के लिए बस भी पकड़नी है। मन में उस समय एक फिल्मी गीत बार-बार याद आ रहा था और उसे गुनगुनाने का भी मन हो रहा था...

ऐ वक़्त रुक जा, थम जा, ठहर जा... वापस ज़रा दौड़ पीछे...

Sunday, February 2, 2020

कुफरी काॅल्स.... और चल पड़ी मित्रों की टोली (Kufri, the ideal vacation spot)

(Kufri Himachal Pradesh) यू ट्यूब पर दो भजन सुनने के बाद एक मित्र गुनगुनाने लगा, ‘ये दिल और उनकी निगाहों के साये।’ तभी दूसरा बोला, इस वक्त तो यही गाना बजना चाहिए, सफर भी तो अब पहाड़ का शुरू होने वाला है। तुरंत यूट्यूब पर सर्च कर गाना लगा दिया गया। पिंजौर आ चुका था और वाकई पहाड़ों का सफर शुरू हो चुका था। सफर था शिमला से थोड़ा आगे ढली का। यह विवरण है गत 26 जनवरी को चार मित्रों के एक छोटे से सफर का। सफर बर्फीली वादियों का। सफर शिमला का। सफर जाखू टैंपल का। नरेंद्र ने 10 जनवरी के आसपास प्रस्ताव रखा 27 को सोमवार है, अगर छुट्टी मिल जाती है तो चलते हैं शिमला। मैंने तुरंत हामी भर दी। दो दिन बाद मीनाक्षी मैडम से छुट्टी के बावत पूछा तो उसके लिए भी हां हो गयी। शुरुआत अच्छी थी तो चलने की तैयारी करनी थी। दो दिन बाद ही नरेंद्र का मैसेज आया कि टॉय ट्रेन में रिजर्वेशन करा लिया है, लेकिन वेटिंग है। मैंने कहा, वेटिंग लेने की जरूरत नहीं थी। खैर...एक-दो दिन यूं ही निकल गये। मैंने कहा टॉय ट्रेन से जाने का मतलब ज्यादा घूम नहीं पाएंगे। फिर ध्यान आया हमारे पेज डिजाइनर रवि भारद्वाज कई बार शिमला चलने की बात करते हैं। मैं उनसे पूछने गया तो उन्होंने हामी भर दी। अब हो गये तीन। तय हुआ कि कार से चलना है। एक साथी और चाहिए था। अच्छा लगता। हालांकि हम तैयारी कर चुके थे कि चार नहीं भी हुए तो तीन ही चलेंगे। खैर अचानक सलिल मौर्य ने हामी भरी तो बात बन गयी। एक व्यक्ति हमें ‘सलिल जी जैसा’ भी चाहिए था। 26 जनवरी को सुबह 8 बजे चलने का फैसला किया गया। कहां जाना है, कहां ठहरना है, कुछ नहीं मालूम। रवि साथ हैं तो फिर अंधेरा कहां रहना। पिंजौर पार करने के बाद पता चला कि हम लोग पहले ढली जाएंगे। ढली में रवि के जीजाजी योगराज शर्मा जी का घर है, रेस्तरां है। मैं थोड़ा सकुचाया कि घर में जाना ठीक रहेगा क्या। बेवजह दीदी-जीजा और बच्चों को डिस्टर्ब करेंगे। सभी बोले, चलते हैं, कुछ अटपटा लगेगा तो देख लेंगे। इस दौरान अलग-अलग पसंद के गीत चलते रहे। बीच में एक जगह किन्नू खरीदे। हम लोग करीब 12 बजे ढली पहुंच गये। वहां शर्मा जी पहले से इंतजार कर रहे थे। उन्होंने पहले रेस्तरां में ही चाय पिलाई फिर घर ले गये। उनके बच्चे इन दिनों कहीं गये थे। सिर्फ दीदी थीं और वे खुद। बेहद आलीशन घर। हम लोग कुछ मिनट वहां रुके फिर चल दिए कुफ्री को। ढली से निकलते ही चारों ओर बर्फीले नजारे ने मन मोह लिया। इस बीच नरेंद्र वीडियो बनाते रहे।
वो अंकल, वो सवाल-जवाब और सेब (Apple)
बर्फीले वादियों में हम लोग जगह-जगह रुके। एक जगह वीडियो बनाते-बनाते नरेंद्र एक सज्जन के घर चले गये। वह अपनी छत पर करीब 3 फुट जमी बर्फ को एक फावड़े से काट-काटकर निकाल रहे थे। नरेंद्र ने उनसे कुछ सवाल पूछे और वो सज्जन इन्हें अपने घर के अंदर ले गये। वहां उन्होंने इनको एक बड़ा से सेब दिया। नरेंद्र ने कहा, अंकल दो सेब दो क्योंकि हम चार लोग हैं और आधा-आधा खाएंगे। ‘धड़कते हैं दिल कितनी आजादियों से’ गीत की मानिंद उन्होंने तुरंत दो सेब दे दिए। शाम को ढली लौटे। दीदी ने लाजवाब व्यंजन बनाए थे। चार तरह की सब्जी (उनमें से एक हिमाचल स्पेशल), राजमा, चटनी, चावल और चपाती। खाना खाकर हम लोग उनके ऊपरी फ्लोर में आ गये। वहां बड़ा सा हीटर लगाकर कुछ हंसी मजाक चली। बात करते-करते सभी सो गये।
जाखू दर्शन, पूजा अर्चना और थोड़ी बेचैनी

अगले दिन सुबह करीब 8 बजे तक हम लोग स्नान ध्यान कर तैयार हो गये। दीदी ने आलू के पराठे बनाये। भरपेट पराठे खाकर पहले हम लोग जाखू मंदिर गये। वहां बंदरों की शरारतों और उनके मान जाने के नजारे देखे। भगवान हनुमान जी की गगनचुंबी प्रतिमा देखी। बाबा बालकनाथ के मंदिर गये। फिर पैदल ही रिज की तरफ लौट आये। इस रास्ते में जगह-जगह बोतलों, पन्नियों को देखकर
मन खट्टा हुआ। कई लोग अब भी ऐसे हैं जो पर्यावरण की चिंता नहीं कर रहे। रिज पर पहुंचे तो वहां रवि की बुआ के बेटे मिले। वह जिम ट्रेनर हैं। सरकारी जिम देखा। फिर शिमला प्रेस क्लब गये। वहां एक-एक चाय पी। और दोपहर होते-होते हमारा चंडीगढ़ का सफर शुरू हो गया। बेहद यादगार रहा वह ट्रिप और हमने नाम दिया ‘kufri calls’

Friday, December 6, 2019

फर्राटेदार सफर की यादगार बातें

रविवार की उस भोर में सूरज खिला-खिला था। सुबह करीब साढ़े आठ बजे चंडीगढ़-अंबाला हाईवे पर डॉक्टर चंद्र त्रिखा साहब की गाड़ी रुकी। पुराने एयरपोर्ट चौक के पास। स्वभाव से बेहद विनम्र त्रिखा साहब को पढ़ता बहुत पहले से रहा हूं, मुलाकात पिछले कुछ वर्षों से है। उनसे कई बार दवा (होम्योपैथ) भी ले चुका हूं। हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू भाषा के जानकार डॉ. त्रिखा फिलवक्त हरियाणा उर्दू अकादमी के उपाध्यक्ष हैं। उनसे कई बार हमारे अखबार में ‘अचानक’ कुछ लिखवाया गया। उनकी हस्तलिखित कॉपी को देखकर हैरान रहता था। एक तो कुछ ही मिनटों में उनका लेख आ जाता, दूसरे उसमें कहीं कोई कट नहीं होता। यानी धारा प्रवाह बोलने की कला की मानिंद उनमें लिखने का भी वैसा ही गुण। इन दिनों यूट्यूब पर समसामयिक और रोचक मुद्दों पर उनका एक चैनल भी चलता है, जहां बिना नागा रोज एक नया विषय फ्लैश करता है। खैर...
साहित्य सभा में अपनी बात रखते डाॅ त्रिखा
त्रिखा साहब (Dr. Chandra Trikha) के साथ बैठा। बैठते ही एक किताब की चर्चा कर डाली। उसकी समीक्षा जल्दी ही हमारे अखबार में छपेगी। थोड़ी दूर जाने पर हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक डॉ मुक्ता भी उसी गाड़ी में बैठीं। औपचारिक परिचय के बाद कुछ पलों की खामोशी रही, फिर बातों का सिलसिला शुरू हो गया। असल में हम लोग कैथल के लिए निकले थे। कैथल साहित्य सभा का सालाना कार्यक्रम था। डॉ. त्रिखा साहब दो पुरस्कारों को अपनी ओर से देते हैं। मैंने कुछ बातें कहीं। फिर त्रिखा साहब ने कुछ रोचक किस्से बताये। असल में एकदम ईमानदारी से कहूं तो मैं उन्हें सुनना ही चाह रहा था। एक तो उन्हें कई अखबारों में पढ़ता रहता हूं। दूसरे विभाजन के दर्द और उस समय की विभीषिका का उन्होंने देखा है। कई कार्यक्रमों में उनको सुन चुका हूं। उन्होंने अपने लाहौर यात्रा का जिक्र करते हुए एक बुजुर्ग महिला का जिक्र किया, जो एक होटल वाले से अक्स पूछतीं, उधर से कोई आया है क्या? उधर से उनका आशय भारत से होता था। पूरे किस्से का जिक्र करते हुए उन्होंने उस महिला की ‘गंगा तो हमारी संस्कृति’ है वाली बात को बताया तो हम लोग कुछ देर को चुप रहे। डॉ. मुक्ता ने कहा, ‘हिंदू-मुस्लिम तो सियासत कराती है, हम सब इंसान हैं।’ इसी दौरान मैंने उनकी किताब ‘सूफी लौट आए हैं’ का जिक्र किया। इसके अलावा उन्होंने उस कहानी को सुनाया जिसमें विभाजन के दौरान पाकिस्तान से एक परिवार भारत लौट आता है, लेकिन घर की बुजुर्ग महिला नहीं आती। उधर, वह मकान किसी को अलॉट हो जाता है। बुजुर्ग महिला उस परिवार को घर में घुसने नहीं देती और अंतत: धीरे-धीरे इंसानी जज्बातों और प्यार का ऐसा उमड़-घुमड़ होता है कि बुजुर्ग महिला सबकुछ उन्हें दे जाती है।
साहित्य सेवी उर्मि कृष्ण का सम्मान।

समय के साथ करें कदमताल
साहित्य सभा के कार्यक्रम में डॉ. त्रिखा साहब ने बेहद बेबाकी से कहा कि महज लिखने के लिए नहीं लिखें। उन्होंने कहा कि एक कार्यक्रम कर चंद लोगों के बीच फोटो खिंचाकर फिर तालियां बजाने से कुछ नहीं होता। उन्होंने कहा कि समय के साथ बदलें। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आयें। स्तरीय लिखें। वाकई कुछ बातें बेशक ‘चुभने’ वाली हो सकती हैं, लेकिन यह सत्य है कि समय के साथ नहीं बदले तो सब गड्डमड्ड हो जाएगा।
हास्य विनोद...मैं ऑटो से चला जाता हूं
कैथल से लौटते वक्त जीरकपुर के पास डॉक्टर मुक्ता ने कहा कि वह पटियाला चौक के पास उतर जाएंगी। यहां से ऑटो से चली जाएंगी। मैंने कहा अगर आपका रूट दूसरा हो तो मैं यहां उतर जाता हूं, आप पंचकूला के रास्ते चले जाइयेगा। यहां से मुझे सीधे ऑटो मिल जाएगा। डॉ त्रिखा हंसे.. बोले आप लोग गाड़ी में ही रहें, मैं ऑटो से चला जाता हूं। इस दौरान सभी लोग मुस्कुरा दिए।
उनका ड्राइवर को प्यार से समझाना
इस सफर में कई बार ऐसे मौके आए जब डॉक्टर साहब को ड्राइवर साहब को मनाना पड़ा। वह उन्हें प्यार से समझाते। एक बार वह फोन पर लंबी बात करने लगा तो डॉक्टर साहब ने ताकीद दी कि या तो रोकककर बात कर लो या फिर संक्षेप में बात करो। ऐसे ही एक-दो मौकों पर उसे समझाया, लेकिन विनम्रता से। वाकई ऐसे ही लोगों के बारे में कहा गया है, ‘फलों से लदा पेड़ झुका रहता है।’

डॉ मुक्ता का किताबों के प्रति स्नेह दिखाना
सफर के दौरान बातचीत के क्रम में डॉक्टर मुक्ता जी ने कई किताबों की बात की। अंत में उन्होंने समीक्षा के संबंध में भी अपनी रुचि दिखाई जिसे मैं अपने ऑफिस में दर्ज करा चुकुा हूं।
मीनाक्षी जी से अक्सर होती है चर्चा
डॉक्टर साहब की चर्चा अक्सर उनकी बेटी और ऑफिस में हमारी बॉस मीनाक्षी जी से होती रहती है। ट्रिब्यून में आने के बाद मीनाक्षी जी उन चंद लोगों में से हैं, जिन्होंने बहुत मदद की। ऑफिस के बाहर भी कई बार परिवार सहित मीनाक्षी जी और उनके पति सुनील जी से मिला तो बेहद अपनापन मिला। सुनील जी भी बहुत नेकदिल इंसान हैं।
और मेरा वह सम्मान...

कैथल में मुझे धीरज त्रिखा पत्रकारिता सम्मान से नवाजा गया। धीरज के बारे में बेहद मार्मिक कहानी है। इस बारे में फिर कभी जिक्र होगा। कार्यक्रम में कैथल के संवाददाता ललित शर्मा से मुलाकात हुई। साहित्य सभा में ढाई दशक से सक्रिय भूमिका निभाने वाले मदान साहब से मुलाकात हुई। भल्ला जी मिले। अनेक अन्य साहित्य अनुरागियों, पत्रकारों से मिला। हमारे समाचार संपादक हरेश जी के पिताजी दामोदर जी का अनेक लोगों ने जिक्र किया।
कार्यक्रम के बाद संस्कृत के अध्यापक एवे रेडियो पत्रकार दिनेश के साथ फल्गू तीर्थ भी जाने का मौका मिला। वह सफर मेरे लिए सचमुच यादगार है। इस याद और इस सम्मान से जुड़े सभी को साधुवाद।

Thursday, November 28, 2019

जूजू की शादी...

पापा की लाडली, पापा का प्यार।
मां ने छिपाए आंसू हजार।
विदाई बेला का वो मंजर अजब था
चेहरे पर मुस्कान, आंसुओं में अदब था।

23 नवंबर, 2019 की सुबह की बेला थी। हंसी-मजाक चल रही थी। साथ ही चल रहा था पूजा-पाठ का कार्यकम। एक दौर चाय का चल चुका था। जान-पहचान, परिचय-मुस्कुराहटों के औपचारिक क्रियाकलापों के बीच सब जान रहे थे कि एक कन्या अब ‘अपने घर’ के लिए विदा होने वाली है। बच्ची (हर संतान मां-बाप के लिए बच्चा या बच्ची ही होती है) के माता-पिता लोगों से बात कर रहे थे और भावुकता उनके चेहरे पर झलक रही थी। लग रहा था मानो कुछ भावनाओं को सप्रयास दबाया जा रहा है। यह पूरा वाकया है अपर्णा जिसे प्यार से घरवाले जूजू कहते हैं, की शादी का। कार्यक्रम तो पहले से चल रहे थे, लेकिन मुख्य समारोह 21 नवंबर से शुरू हुए। पिछले सात सालों से इस बच्ची को मैं भी अच्छे से जानता हूं। जहां मिलती है, पूरे अपनेपन के साथ पूछती है, ‘हैलो अंकल...हाउ आर यू?’ बच्ची के पिता हरेश वशिष्ठ। ऑफिस में मेरे बॉस और घर में लोकल गार्जन। जब से चंडीगढ़ आया, इत्तेफाक से इनके पड़ोस में ही किराये पर मकान मिल गया। मामला ऐसा जमा कि मैं उसी घर में अभी भी जमा हूं। बच्ची की मां यानी हरेश जी की पत्नी श्रीमती विनोद वशिष्ठ, आईटीबीपी से वीआरस लेकर बच्चों और घर परिवार को समर्पित महिला। मेरी पत्नी भावना और दोनों बच्चों को समय-समय पर जरूरी ताकीद देने वालीं।

वशिष्ठ परिवार से मिले अपनेपन का ही असर था कि मैं बिल्कुल परिवार की तरह पूछता, ‘जब भी काम हो बताइयेगा।‘ यह अलग बात है कि मुझे इसी दौरान एक और विवाह कार्यक्रम में गाजियाबाद जाना पड़ा। वहां भी एक बच्ची गीता की शादी थी। वह हमारे सामने बड़ी हुई। खैर...।
21 नवंबर को हरेश जी, दीपक जी के जरिये उनके परिवार के अन्य लोगों से मिला। इस बीच, दिल्ली से आईं उनकी बहन और बहनोई के साथ ही भांजे-भांजियों से मुलाकात हुई। कोटा से आए बड़े भाई साहब से मिला। उनके छोटे भाई जस्टिस चंद्रशेखर से भी मुलाकात हुई। कई बातें भी हुईं। दामाद शिव कुमार जी भी पढ़ने-लिखने वाले व्यक्ति हैं। उनके साथ भी कई घंटे की बातचीत हुई।
कुछ रस्मों को पूरा करने के दौरान जूजू से बात हुई। तभी खबर मिली कि उसने ज्यूडिशियरी के जिस एग्जाम को हाल के दिनों में दिया था, उसे क्लीयर कर लिया है। उसे बधाई दी। विवाह वाले दिन दामाद राहुल से मुलाकात हुई। जस्टिस राहुल। बेहद सरल और सहज। लगा ही नहीं कि हम पहली बार मिले हैं। इस बीच, उसी दिन अपने कई पुराने-नये जानकार मिले। पूरे प्रसंग में बेहतरीन फोटोग्राफर और पत्रकार आशा अर्पित का जिक्र जरूर करूंगा जो मुझे और मेरे परिवार को विवाह स्थल तक ले गयीं और वहां से लेकर आईं।
कनु की वह सक्रियता और बेहतरीन आइडिया
हमेशा पढ़ाई-लिखाई में तन्मयता से लगी रहने वाली जूजू की दीदी कनु यानी कनुप्रिया की सक्रियता मुझे बेहद भा गयी। बारातियों के स्वागत के समय तिलक लगाने की बात हो या फिर उन्हें बुके देने की। पगड़ी की याद दिलानी हो या फिर कोई और चीज, वह इधर से उधर भाग-भागकर चीजों की याद दिलाती। कभी-कभी मुझसे भी कहती, ‘अंकल आप यहीं रहना...।’ ऐसे मौकों पर ऐसी ही फुर्ती की जरूरत होती है।
कनु और जूजू से जब भी मिलता हूं, मुझे मेरी भतीजी याद आती है। इत्तेफाक से उसका नाम भी कनु है। सर्टिफिकेट वाला नाम भावना है। एबीपी न्यूज में सीनियर प्रोड्यूसर है। यह इत्तेफाक ही है कि हरेश जी के पिताजी और मेरे पिताजी का नाम भी समान है। दामोदर। माताजी के नाम का कभी जिक्र नहीं हुआ।
जूजू की विदाई बेला पर मैं और भावना थोड़ा भावुक हुए। घर आकर एक-एक चाय पी। अगले दिन भाभीजी मिलीं। उन्होंने कहा, ‘बार-बार कानों में गूंज रहा है मम्मी ब्लैक टी देना, मम्मी कॉफी बना दो। हरेश जी ने खुद को बड़ी मुश्किल से रोने से रोका है, वह तो पापा की बेहद लाडली है।’

गनीमत है कि आज संचार के इतने साधन हैं। यातायात के इतने साधन हैं। बेटी दूर जाती है, लेकिन नजदीक ही रहती है। फिर यहां तो बेटी हो बेटा, कौन टिकता है घर पर। किसी को करिअर ले जाता है और किसी को ससुराल जाना होता है। शादी का यह पूरा समारोह बेहद शानदार रहा। स्मृति पटल पर छप चुका है हर लम्हा। इस मौके पर रोना नहीं है, जूजू से बातें शेयर करते रहना है। राहुल-अपर्णा को बहुत-बहुत बधाइयां और आशीर्वाद।

Sunday, November 10, 2019

पापा नहीं है धानी सी दीदी

केवल तिवारी
(Haldwani Uttarakhand)
सारे के सारे गामा को लेकर गाते चले... पापा नहीं है धानी सी दीदी, दीदी के साथ हैं सारे।
80 के दशक में लखनऊ में दीदी।

बचपन में जब इस गीत को सुनता था तो लगता था कि इसे क्या हमारे लिए ही लिखा गया है। कक्षा 6 में था जब लखनऊ पुष्पा दीदी के पास आ गया था। तब से लेकर अब तक की तमाम यादें इन दिनों दिमाग में किसी फिल्म की तरह चल रही हैं। उस चलचित्र में एक ही किरदार है पुष्पा दीदी। हमारी मां जैसी। कभी अचार बनाती दीदी। आम, नींबू, गाजर, गोभी का अचार। कभी गाय को बांधती दीदी। कभी मेरे लिए स्कूल की ड्रेस खरीदती दीदी। कभी मुझे डांटती दीदी, कभी नियम-कानून सिखाती दीदी। कभी इस रूप में याद आती दीदी तो कभी उस रूप में। अब उसे यादों में ही तो आना है। वह चली गयी दुनिया से। दिवाली के दिन। एक दिन बाद मुझे उससे मिलने जाना था। सोचा था भाईदूज पर बेहद बीमार दीदी के दर्शन कर आऊंगा। उसका बचना मुश्किल लग रहा था, लेकिन दर्शन नहीं हुए। ऐसा ही होता है मेरे साथ। मां के साथ भी अंतिम समय नहीं रह पाया। भाई
दूज के दिन हल्द्वानी पहुंचा। दीदी का भतीजा अपनी चाची का अंतिम संस्कार कर कोने में बैठा था। भानजी रुचि सुबक रही थी, लोगों से मिल भी रही थी। दामाद दीपेश से भी बातों को शेयर कर रहे थे। इन लोगों ने दीदी की भरपूर सेवा की। लगभग आठ साल से वह बिस्तर पर थी। भाई दूज के दिन ही लखनऊ से बड़े भाई साहब, भाभीजी और विमला दीदी भी पहुंचे। चूंकि दीदी लंबे समय से अस्वस्थ थी, इसलिए उसके जाने जैसी खबर के लिए मानसिक तौर पर सब तैयार थे, लेकिन किसी का जाना होता तो दुखद ही है। प्रेमा दीदी जब वहां पहुंची तो एक बार फिर माहौल गमगीन हो गया। आंसू सभी के छलक आए। प्रेमा दीदी अक्सर बड़ी दीदी से मिलने के लिए आ जाया करती थी। लखनऊ से शीला दीदी लोग कुछ दिन बाद वहां गये और जब फोन पर पीपलपानी यानी तेरहवीं होने की बात बताई तो मैं थोड़ा रो पड़ा। इस बीच, मन में घूम रहे चलचित्रों में मुझे याद आ रहा है कि बड़े भाई साहब एक बार दीदी को ‘नदिया के पार’ फिल्म दिखाने ले गये थे। दीदी उन दिनों चलती साइकिल में कूदकर बैठ जाती थी। बहुत एक्टिव थी दीदी। दीदी फिल्मों की बहुत शौकीन भी थी। वह बताती हैं कि जीजाजी के साथ उसने कई दर्जन फिल्में देखी थीं। उसी से हम धर्मेंद्र, हेमा मालिनी, रेखा, बलराज साहनी, राजकपूर जैसे कई हस्तियों के नाम सुनते थे जिनकी फिल्में आगे चलकर हम लोगों ने भी देखीं।
मां (एकदम बाएं) और दीदी के साथ मैं।

मन में कभी बैर नहीं पालती थी
पुष्पा दीदी की सबसे बड़ी तारीफ वाली बात थी कि वह मन में बैर नहीं पालती थी। वह किसी भी मुद्दे पर जब डांटती थी तो ठीकठाक डांटती थी। डांट खाने वाला उसे कई दिन तक भले ही याद रखे, लेकिन वह कुछ घंटों या कुछ पलों में ही उसे भूल जाती थी। वह सामान्य हो जाती थी। उसके मन में बैर नहीं था। इसके अलावा अपनी सामर्थ्य के अनुसार वह सबका भला करती थी। आर्थिक रूप से या फिर सांत्वना के तौर पर। यह अलग बात है कि उसे दो मीठे बोल सुनने में ही बड़ा अर्सा लग जाता था।
शादी से पहले मुझे दी बड़ी सीख
दीदी के माध्यम से ही मेरी शादी की बात चली। मैं उन दिनों शादी नहीं करने के लिए अड़ा रहता था। आखिरकार मैंने मन से मान लिया कि शादी तो करनी ही पड़ेगी। दीदी ने जब रिश्ते की बात आगे बढ़ाई तो मुझे आदेश दिया कि हल्द्वानी आ जाओ और लड़की को देखना है। मैंने साफ कर दिया कि मुझे नहीं देखना आप लोग तारीख पक्की कर लो, बस तत्काल कोई तारीख मत निकालना। दीदी ने मुझे डांटते हुए कहा, ‘तू अपनेआप को आमिर खान समझता है। तुझे भी लड़की देखेगी।’ मुझे उसका यह डांटना बेहद भाया। क्योंकि लड़की को देखने का रिवाज मुझे हमेशा से खराब लगा। बंदा शाही अंदाज में बैठा है। लड़की चाय या फल लेकर आती है। तमाम लोग उसे देखते हैं। यह परंपरा गलत है।

खैर दीदी को लेकर तो यादें, बातें इतनी ज्यादा हैं कि एक पूरा उपन्यास लिखा जा सकता है। उनमें से कुछ अच्छी यादों को सहेजे रखना होगा। दीदी तुम जहां भी चली गयी हो अपना आशीर्वाद पूरे परिवार पर बनाये रखना। सारे के सारे गामा को लेकर गाते चले गीत की अंतिम पंक्ति के साथ ही कहूंगा... सरगम हो गयी पूरी अब क्या होगा आगे...।

Wednesday, September 11, 2019

खबर से इतर कोटा यात्रा (Trip to Rawat Bhata Nuclear Plant, Kota, Rajasthan)

(Rawat Bhata Nuclear Plant, Kota Rajasthan)
यह खबर नहीं। यह यात्रा वृतांत नहीं। पर यह यादगार है। कोटा के सफर की यादें। बोलने में कोटा, लेकिन भौगोलिक दृष्टि से राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले में पड़ने वाले रावतभाटा का ट्रिप। कोटा से कोई 70 किलोमीटर दूर। एक हफ्ते का टूर। नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट (आई) के तहत नेशनल स्कूल ऑफ जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन और परमाणु ऊर्जा विभाग के साझा कार्यक्रम में जाने का अवसर मिला। वहां जाकर वैज्ञानिकों से जो जानकारी मिली और जितना मैं समझ पाया, उन्हें तो अलग शेप में अखबार में जगह मिल गयी या पत्रकार बंधुओं के साथ साझा कर लिया, लेकिन यात्रा के दौरान खबरों इतर भी बहुत कुछ हुआ। अनेक नये लोग मिले, रावतभाटा का खूबसूरत नजारा देखा। खिलजी वंश के दौरान तोड़-फोड़ वाले मंदिर और मूर्तियों के अवशेष देखे। परमाणु ऊर्जा केंद्र देखा, हैवी वाटर प्लांट देखा, वैज्ञानिकों के विचार जाने, वैज्ञानिक के साथ वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति का ज्ञान रखने वाले जानकार से मिले। डीएई के बेहद को-ऑपरेटिव स्टाफ से मिलने का मौका मिला। बच्चों की दुनिया देखी, कड़ा जीवन देखा, कुछ सुनने-सुनने का भी वक्त मिला। नये मित्र मिले। साहित्यिक चर्चा हुई। कथा-कहानियों और फिल्मों पर भी बौद्धिक जुगाली हुई। विजय क्रांति जी, अशोक मलिक जी, रविशंकर जी, सिल्वेरी जी, डीीजीऔर एचडब्ल्यूबी के स्टाफ से कई मुद्दों पर चर्चा हुई। कुछ सुनने-सुनाने का दौर चला। सिलसिलेर करता हूं चर्चा-
पश्चिम एक्सप्रेस का एकाकी सफर और रेल मित्र
4 अगस्त को मुझे चंडीगढ़ से निकलना था। पहले एनयूजे अध्यक्ष अशोक मलिक जी से पूछा कि और कौन-कौन हैं? उन्होंने कुछ नाम बताये, लेकिन उनमें जानकार सिर्फ अवतार सिंह थे। पंजाबी ट्रिब्यून के वह हमारे साथी रहे हैं। लेकिन पता चला कि वह विजयवाड़ा से वहां सीधे पहुंचेंगे। खैर मैंने पश्चिम एक्सप्रेस में रिजर्वेशन कराया और 11:30 पर ट्रेन में बैठ गया। कुछ देर सन्नाटा रहा। थोड़ी देर में ओडिशा के रहने वाले एक व्यक्ति से बातचीत होने लगी। वह अपनी दो बेटियों के साथ मुंबई जा रहे थे। काफी देर तक अच्छी बातें होती रहीं, लेकिन पता नहीं क्यों वह अचानक बोल पड़े कि लोगों को सुविधाएं मिल गयी हैं न इसलिए बिगड़ गये हैं। उन्होंने बड़ी हिकारत से कहा कि स्लीपर में चलने वाले भी अब एसी क्लास में चलने लगे हैं। मैं उनसे इस मुद्दे पर कतई सहमत नहीं था। मैंने कहा, हर किसी को आगे बढ़ने और तरक्की करने का अधिकार है। खैर इसी बीच टीटी महोदय से भी दोस्ती हो गयी। उनके किस्सों में कब सफर कट गया पता नहीं चला। रात करीब 11 बजे मैं कोटा पहुंचा। वहां डीएई के विनय मीणा पहुंचे हुए थे। वह एक गाड़ी में ड्राइवर के साथ मौजूद थे। हल्की बारिश के दौरान घनघोर जंगलों से होकर गुजरना बेहद रोमांचक रहा। रात करीब डेढ़ बजे हम लोग रावतभाटा पहुंचे।
विशेष बच्चों से भावुक मुलाकात
रावतभाटा में रहने के दौरान हैवी वाटर बोर्ड और डिपार्टमेंट ऑफ एटोमिक एनर्जी के लोग हमें कुछ स्कूलों में ले गये, जिनका निर्माण इन्हीं की ओर से कराया गया था और कुछ ऐसे केंद्र पर भी ले गये जहां विशेष बच्चों की शिक्षा पर ध्यान दिया जाता है। सचमुच वहां पहुंचकर बेहद भावुक हुआ। पहले तो एक सरकारी स्कूल में गये। वहां बच्चों को सिखाया गया था कि योग मुद्रा में बैठे रहेंगे। मैंने यूं ही पूछा, ‘बच्चो इतनी भीड़ देखकर परेशान तो नहीं हुए, मालूम है हम लोग क्यों आए हैं (असल में हमल लोग करीब 25 पत्रकार, कुछ अधिकारी और अन्य लोग थे)’ एक बच्ची बोली, ‘चेक करने वाले।’ मैंने इस पर ज्यादा नहीं कुरेदा। फिर कुछ अध्यापकों से बात हुई। फिर हम लोग गए विशेष बच्चों के केंद्र में। यहां बच्चों ने इशारों में राष्ट्रगान पेश किया। डांस पेश किया। ऐसे बच्चों ने डांस किया जो सुन और बोल नहीं सकते। उनके अभिभावकों से बात हुई। ज्यादातर ने कहा कि जब से यहां बच्चे आए हैं उनमें बहुत सुधार है।
... और हमारी अग्रणी का मासूम सवाल
वापसी वाले दिन भानजे पंकज के यहां भी गया। वह दो माह पहले ही कोटा शिफ्ट हुआ है। शाम करीब पांच बजे पंकज के घर बारा रोड पर पहुंचा। वह ऑफिस से चल चुका था। घर में मनीषा और बेटी अग्रणी थी। अग्रणी पहली में पढ़ती है, घर में उसे तनी कहते हैं। बेहद प्यारी बच्ची। सबसे पहले हाथ पकड़कर बालकनी में ले गयी और वहां से अपने स्कूल को दिखाया। फिर थोड़ी देर में वह कागज के दो पंखे बनाकर ले आयी। थोड़ी देर में पंकज भी आ गया। इस दौरान मनीषा-पंकज और अग्रणी से बातें होती रहीं। बच्ची बार-बार अपनी कुछ बात बताती। वह चाहती थी कि मैं वहीं रुक जाऊं। ऐसी बच्ची जो मेहमानों के आने से खुश होती है। रात में पंकज, मनीषा और अग्रणी मुझे छोड़ने स्टेशन आये। स्टेशन पर बच्ची बोली, ‘आप कल फिर आना और हम फिर स्टेशन आएंगे।’ मैं बच्ची की बात पर मुस्कुरा दिया। घर आकर कई दिनों तक बच्ची की ही चर्चा होती रही।
कई वैज्ञानिकों से बातचीत और चार यार
इस सफर में कई वैज्ञानिकों से बातचीत हुई। एमएल परिहार साहब ने वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति के बारे में बताया। वेंकटेश साहब ने कई बातें बताईं। उनके साथ रोज नाश्ते की टेबल पर भी बात होती। इस बीच, अजमेर से आए तरुण जैन, हरियाणा से आए जग्गा जी एवं पराशर जी से खासी दोस्ती हो गयी। साथ में रहे हमारे पंजाबी ट्रिब्यून के पुराने साथी अवतार जी। यादें तो इस सफर की बहुत सारी हैं। वहां के कई लोकल पत्रकारों से भी अच्छी बात होती रही। एक तो समय एक माह से ज्यादा हो गया, दूसरे अब कुछ बातें पुरानी ही लगने लगी हैं।
पत्रकार पिता और पुत्री

इस सफर में शिव सिंह चौहान और उनकी बेटी से भी मुलाकात हुई। चौहान साहब रोज अखबारों में कवरेज की फोटो व्हाट्सएप ग्रूप में डालते। आते वक्त दोनों की एक फोटो ली। बहुत अच्छा लगा। बेटी अभी करिअर के मुकाम पर हैं। चौहान साहब से व्हाट्सएप पर बातें होती रहती हैं।

Friday, August 23, 2019

मेरे जेहन में हंसी दीदी

हंसी दीदी के बारे में कुछ यादें साझा करने से पहले गालिब साहब के एक शेर की दो पंक्तियां लिख रहा हूं जिसके बोल हैं-न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता
डुबोया मुझको होने ने, न होता मैं तो क्या होता! ऐसा क्यों लिखा, यह आगे संदर्भ में आ जाएगा। अब शुरू करता हूं श्रद्धांजलि स्वरूप अपनी बातें-
हंसी दीदी। अब स्वर्गीय हंसी दीदी। कुछ दिन पहले तक हम उन्हें अपने ताईजी-ताऊजी की अंतिम जीवित संतान के तौर पर जानते थे, चर्चा करते थे। दीदी के निधन की खबर आई तो ऑफिस में चर्चा की। लोगों ने सांत्वना दी साथ ही कई की नजरों में मुझे सवाल तैरते नजर आए। कुछ घनिष्ठ मित्रों ने पूछ लिया, ताऊजी की बेटी इतनी बुजुर्ग थी। मेरा सवाल था ज्यादा बुजुर्ग तो नहीं थी, हां शायद 70 के आसपास की होंगी। लोगों को फिर भी बात समझ में नहीं आयी। तब मैंने अपनी निजी बातें जिन्हें शेयर करने का मन नहीं करता, बता दीं। मैंने कहा कि मैं जब इस दुनिया में आया तो मेरे पिताजी की उम्र 65 वर्ष थी। बाकी क्या कहें, जब दुनिया में आते हैं तो समय तय होता है। खैर... अब बात हंंसी दीदी की
हंसी दीदी से आमने-सामने मुलाकात की याद मुझे तब से है जब मैं दसवीं की परीक्षा देकर गांव गया था। जाहिर है उम्र का इतना अंतर है कि मेरे पैदा होने से पहले उनकी शादी हो गयी होगी। फिर वह कभी-कबार आती भी होंगी तो मुझे याद नहीं। उसके बाद पांचवी पास करने के बाद मैं लखनऊ आ गया। खैर वर्ष 1987 में वह भी उसी दिन पहुंचीं। हम लोग डाबर घट्टी में मिले। उसने सिर पर हाथ फेरा। अन्य लोगों से बातचीत हुई। मुझसे ज्यादा नहीं हुई। गांव में जाने के बाद अगले दिन दीदी ने कहा, 'केवल के पैर बिल्कुल चाचा जैसे हैं।' पहली बार मैंने अपनी तुलना अपने पिताजी से होते हुए सुनी। उसके बाद तो दीदी से लगातार मिलना हुआ। मेरी शादी में तो वह खूब नाचीं। अभी भी वही चेहरा याद आता है। माथे तक घूंघट। फिर मिलने का यह सिलसिला चलता रहा। कभी पारिवारिक समारोहों में, कभी गांव में। मेरी हालिया मुलाकात मेरे भानजे मनोज की शादी में हुई। मैं हंसी दीदी को संस्कारों की प्रतिमूर्ति कहता था। वह हम लोगों से कहती अपने जीजाजी से कुछ कहो। उसका तात्पर्य चुहलबाजी से होता। जीजाजी भी खूब मजाक करते। हंसी दीदी का मुस्कुराता चेहरा याद आ रहा है। उसे नमन। श्रद्धांजलि। दीदी के निधन के बाद मेरी अभी जीजाजी से मुलाकात नहीं हुई है, लेकिन जब मिलूंगा तो न जाने कैसे एक-दूसरे से हम रिएक्ट करेंगे।