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Friday, April 24, 2020

विश्वास जगाना होगा बड़ी चुनौती

कोरोना का खौफनाक संक्रमण काल चल रहा है। जो जहां है, वहीं रह गया है। ऐसे में लॉकडाउन खुलने का सभी को इंतजार है। इस इंतजार में ही छिपा है एक प्रश्न? प्रश्न है विश्वास का। आपसी प्रेम का। अभी कई लोग एक शहर से दूसरे शहर जाते हैं। कोई मित्र या रिश्तेदार के यहां रुकता है तो कोई कहीं और। कोरोना काल से पहले लोग भी स्वागत को तैयार रहते थे, अब वैसी ही स्थिति आने में न जाने कितना वक्त लगेगा। कई लोगों को चिंता यही है कि अभी तक आ रहा हूं... जैसे सवाल के जवाब में कहा जाता था, 'स्वागत है।' खाना, सोना बिल्कुल अपने घर जैसा ही। अब संकोच भले ही बना रहे, लेकिन स्वागत की वह गर्माहट फिलहाल तो नहीं दिखेगी। ऐसा ही एक और सवाल है मुलाकात के दौरान हाथ मिलाने का। फिलहाल लोग मिल भी रहे हैं तो नमस्ते, सतश्री अकाल या सलाम करते हैं। तो क्या आने वाले समय में मुलाकात के दौरान यही सब चलता रहेगा या हाथ मिलाने की परंपरा फिर कायम होगी। फिलहाल तो दुनिया के तमाम देशों के बड़े-बड़े नेताओं ने भी हाथ मिलाना छोड़ दिया है। कोरोना के बाद के दौर के लिए कई चुनौतियां हैं, देखना होगा कि उन पर कैसे पार पाया जाये। फिलहाल तो बड़ी चुनौती कोरोना से पार पाने की है। 

Friday, April 17, 2020

एक सवाल और जवाब में समाधान ... जब जिक्र हुआ अवलीन मैडम का

केवल तिवारी
पड़ावों की भव्यता पर मत रख नजर, बस तू चलता रह अपने सफर पर
एक कविता की यह पंक्ति कई मायने छिपाए हुए है। उसी तरह जैसे एक पुराना फिल्मी गीत है, ‘छोटी-छोटी बातों की हैं यादें बड़ीं, भूलें नहीं बीती हुई एक छोटी घड़ी...।’ वाकई कई वाकये ऐसे होते हैं जो हमारे मन मस्तिष्क पर छाये रहते हैं। जरूरी नहीं सबके साथ ऐसा होता हो, लेकिन मेरे मामले में तो ऐसा है। कभी किसी सुगंध के कारण हमें पुरानी बात याद आती है, कई बार तो किसी शब्द को बोलते वक्त भी किसी की याद आ जाती है। मसलन, जब भी में आम या नींबू का ‘होम मेड’ अचार खाता हूं तो मुझे मेरी सबसे बड़ी दीदी याद आती हैं। पूजा-पाठ करते वक्त मां की याद आती है। कुछ शब्दों को लिखता हूं या बोलता हूं तो कई मित्रों की याद आती है। शायद ऐसा ही होता होगा। या नहीं भी। खैर...। अभी इसके लिखने का मौजूं था। असल में बच्चों का स्कूल बंद है। online क्लास चल रही हैं। इसी दौरान कई टीचर्स से संपर्क बना रहता है। कभी व्हाट्सएप (whatsapp) के जरिये तो कभी सीधे फोन कर। जब बच्चे घर पर ही हों तो जाहिर है गुस्सा, प्यार-दुलार और पढ़ाई के संबंध में चर्चा भी उन्हीं की होगी। इसी चर्चा के
श्रीमती अवलीन कौर 
दौरान ट्रिब्यून मॉडल स्कूल में काउंसलर रहीं अवलीन कौर मैडम का जिक्र हुआ।
इन दिनों ऑफिस से पहले के मुकाबले जल्दी पहुंच जाता हूं। सोशल डिस्टेंसिंग का पूरा ध्यान घर पर भी रखना पड़ता है। संवाद होता है, पूरी दूरी के साथ। कई बार बहसें भी होती हैं। कभी किसी मुद्दे पर और कभी बिना मुद्दे के। बातोंबातों में एक दिन में थोड़ा झल्लाया फिर पत्नी ने याद दिलायी अवलीन मैडम की। बोलीं-पता है एक बार हम बच्चे के बारे में कुछ पूछने गये थे तो उन्होंने क्या कहा था। फिर याद दिलाया गया कि उन्होंने कहा था, ‘पहले आप दोनों अपने लिए क्लैप करो।’ असल में बड़ा बेटा 10वीं पास कर स्कूल से निकला तो हम लोग छोटे बेटे के लिए पीटीएम PTM में जाते थे। एक छोटी सी समस्या छोटे को लेकर ही थी, हम उसी का जिक्र कर रहे थे। अवलीन मैडम ने पहले ताली बजवाई तो मैंने कारण पूछा। उन्होंने कहा, ‘आपके बेटे कार्तिक ने आपकी बड़ी तारीफ की।’ असल में स्कूल में कुछ टॉपर्स को बुलाया गया और 10वीं के नये बच्चों को टिप्स देने को कहा गया। इसी क्रम में मेरे बेटे ने मेरी तारीफ कर दी। उससे पहले भी अवलीन मैडम से बात होती थी तो वह कहती थीं कि आप दोनों पति-पत्नी हमेशा पीटीएम में आते हैं, यह अच्छा लगता है और बोलते भी संयमित होकर। एक के बाद एक हैं। मुझे याद आया अपने जीवन का वह दौर जब मैं लखनऊ में ट्यूशन पढ़ाया करता था। बच्चों के माता-पिता पढ़ाई से ज्यादा जिक्र उसकी आदतों को लेकर करते थे। कोई कहता, ‘यह सब्जी नहीं खाता।’ किसी की समस्या होती, ‘दूध पीने में आनाकानी करता है।’ कई बार तो बच्चों के माता-पिता मुझसे बात करते-करते लड़ने भी लगते। उन दिनों में भी तो ‘बच्चा’ ही था। लखनऊ क्रिश्चियन कॉलेज में बीए का छात्र। खैर उसके बाद धीरे-धीरे कई दौर आये। अब कहीं भी जाते हैं या घर पर भी अगर बहस होती है तो कम से कम मैं और मेरी पत्नी एक-दूसरे की बात काटते हुए नहीं लड़ते। बहुत आदर्श नहीं हैं हम लोग। लड़ते हैं। बोलचाल भी बंद होती है, लेकिन बच्चों पर इसका असर कम से कम पड़े, इसका खयाल रहता है। ऐसे ही स्कूल में जाते हैं तो कोशिश होती है कि दोनों साथ नहीं बोलें। खैर यह जीवन का सफर है। अवलीन मैडम की एक और बात याद आयी। जब समस्या उनको बतायी गयी तो उन्होंने तीन वाक्यों में हल निकाल दिया। उन्होंने हमारे सवाल पर एक सवाल पूछा और फिर कहा, ‘आपके जवाब में ही समस्या का समाधान है।’ जीवन की इन छोटी-छोटी बातों को याद करने से ही जीवन बढ़ता है। एक शायर ने कहा है-
 आए ठहरे और रवाना हो गए, ज़िंदगी क्या है, सफ़र की बात है।
एक और शेर पेश करता हूं, मेरा नहीं है-
बस यही दो मसले जिंदगी भर ना हल हुए, ना नींद पूरी हुई ना ख्वाब मुकम्मल हुए...।

संभवत: ऐसा ही होता है। सबकुछ पूरा नहीं होता। अवलीन कौर मैडम का धन्यवाद। बेशक वह अभी ट्रिब्यून स्कूल में नहीं हैं, लेकिन उनसे संवाद बना रहेगा, ऐसी कामना है। उन्होंने भी एक छोटे से वाक्य के लिए मुझे शुक्रिया कहा।

Friday, April 10, 2020

कोरोना संकट, रुटीन लाइफ, रामायण और इफेक्ट-विफेक्ट

केवल तिवारी
कोरोना वायरस के खौफ के बीच देश में चल रहे लॉकडाउन से चारों ओर सन्नाटा पसरा है। सन्नाटा पसरने से पहले ही हमारे समाज के ‘सयाने’ लोगों ने अफरातफरी सी मचा दी थी। जरूरत से पांच गुना सामान खरीद लिया। ऐसा कहा गया कि अब सब खत्म, अपन ध्यान रखो बस... बाकी कुछ नहीं। इसी माहौल में अनेक लोग ऐसे भी थे जिन्होंने मदद के लिए हाथ बढ़ाये। मेरी रुटीन लाइफ में बेशक ज्यादा फर्क नहीं पड़ा है, लेकिन अपने मोहल्ले में और आसपास का वातावरण देखकर लगता है वाकई कुछ लोगों को बहुत फर्क पड़ा है। कुछ लोग एक-दो दिन बाद ही हायतौबा करने लगे, लेकिन इसी दौरान देखा कि खाने-पीने के मामले में जैसी बातें फैलाई जा रही थीं, वैसा कुछ नहीं। मसलन, एक दिन बाद ही दुकानें खुल गयीं। दूध वाला कॉलोनी में ही आने लगा। सब्जी वाले भी आने लगे। इससे पहले भी अनेक मौके ऐसे आये जब यह अहसास हुआ कि कुछ अफवाह तंत्र और कुछ जमाखोरी का एक कीड़ा हमारी व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करता रहा है। 
फोटो : साभार इंटरनेट
खैर... इन्हीं दिनों नवरात्र भी चल रही थीं। सुबह ठीकठाक वक्त पूजा-पाठ में लगता है। इसके साथ रामानंद सागर द्वारा निर्मित टीवी धारावाहिक रामायण भी फिर से प्रसारित हो गया है। सुबह एक घंटा कब निकल गया पता ही नहीं चलता। मैंने शुरुआत में कोशिश की कि बच्चों को अपने साथ बिठाकर दिखाऊं। बच्चों ने हल्की रुचि दिखाई। एक बेटे की तो ऑन लाइन पढ़ाई तेजी से चालू है, इसलिए वह इसे नहीं ही देखता है, लेकिन छोटा वाला देखता है। देखते वक्त उसके तमाम बालसुलभ सवालों की बौछार भी होती है। सवालों के दौरान ही वह अचानक कह उठता है पापा इतने अजीब से इफेक्ट। मैं उसे समझाने की कोशिश करता कि भाव समझो। लेकिन कार्टून फिल्म, टीवी रियलिटी शो देखने वाले बच्चे के समझ में भाव ज्यादा नहीं समझ आये। उसने कुछ तकनीकी कमियां निकाल ही दीं। कुछ दिन बाद मैंने देखा कि वाकई उसे रामायण में दिलचस्पी आने लगी है। कई बार तो उसे आगे की कहानी जानने की लालसा रहती। रामायण की संक्षिप्त कहानी को तो सब जानते हैं, लेकिन धारावाहिक में विस्तार से दिखाया गया है। इसी दौरान राम के वनवास और निषाद राज द्वारा उन्हें छोड़ने का प्रसंग आया। इसी प्रसंग में भारद्वाज ऋषि के आश्रम में निषाद राज नीचे बैठ जाते हैं। मुनि भारद्वाज समझाते हैं कि कोई ऊंची-नीच नहीं होता। राम के मित्र होने के नाते तो आप उनके बराबरी में बैठने के हकदार हो। इसी दौरान बड़ा बेटा बोल बैठा, ‘पापा ये होती है अच्छी बात। एक सीरियल आजकल जो आ रहा है भीमराव। उसमें भीमराव और उनके परिवार के साथ ऊंची जाति के लोग कितना अत्याचार करते हैं।’ फिर पत्नी ने समझाया पहले ऐसा कोई भेदभाव नहीं था, बाद में जब धर्म के ठेकेदार बनने लगे तो ऐसा होने लगा। खैर अब लगातार रामायण देखी जा रही है। घरवाले दोनों समय देखते हैं। चूंकि शाम के वक्त मैं ऑफिस में होता हूं, इसलिए शाम के समय देख नहीं पाता। इस दौरान मुझे वे दिन भी याद आए जब लखनऊ में रामलीला में राम की भूमिका निभाता था। बीच-बीच में चौपाई आदि गाने लगता हूं तो बच्चे नाराज होते हैं। कहते हैं सीरियल खत्म होने दो, उसके बाद गा लेना। खैर जारी है जिंदगी...।

पलायन का वह खौफनाक मंजर
रोज शाम को ऑफिस में खबरों में ही खेलना होता है। खबरों में भी कोरोना के अलावा कुछ है नहीं। कुछ दिन अखबार नहीं आया तो बेचैनी हुई, लेकिन पहली अप्रैल से रुटीन में अखबार आने लगे। इस दौरान कोरोना के खौफ से पलायन संबंधी खबरें आईं। बेहद दुखद। दिल चीरने वाली। कुछ चैनल चलाते कि कोरोना पर भूख भारी। कई चैनल इसी तरह खबर चलाते कि ये सब भूखे-नंगे हैं। दुख हुआ। असल में इन्हें सही से समझाया नहीं गया। वे सिर्फ भूख के कारण नहीं, बल्कि इसलिए भी भाग रहे थे कि मानो कयामत आ गयी। कयामत आ गयी तो घरवालों के संग ही प्राण क्यों न निकले। इस दौरान दिल्ली सरकार के बारे में भी खबरें आईं कि उसका रुख बेहद अगंभीर रहा। खैर ये सब तो जांच का विषय है। फिलहाल इस परेशानी से सब ही जूझ रहे हैं।

पशुओं की स्थिति
इन दिनों पशु बेचैन हैं। आखिर ये दो पैरों वाला पशु चला कहां गया है। अक्सर रात के समय भौंकने वाले कुत्ते दिन में भी भौंकने लगते हैं। चंडीगढ़ की सड़कों पर सांभर, तेंदुए की कई वीडियो वायरल हुई हैं। चंडीगढ़ में हरा-भरा क्षेत्र काफी है। इन दिनों दोपहर तीन बजे मैं जब घर से निकलता हूं तो कई बार कुत्तों, गायों की बदली हुई सी हरकतों को देखता हूं। इक्का-दुक्का चल रही गाड़ियों के बीच वे भौंचक्के से दिखते हैं। हमेशा वाहनों की चिल्ल-पौं मची रहने के दौरान अचानक यह क्या हो गया।

क्या भगवान ने दिखावा न करने का दिया है संदेश
ब्लॉग लिखते-लिखते कई दिन बीत चुके हैं। आज 10 अप्रैल को इसे पूरा कर पा रहा हूं। दो दिन पहले कई लोगों से बात हो रही थी। एक-दो मित्रों ने कहा कि क्या भगवान दिखावे से नाराज हो गए हैं। उन्होंने कहा कि आज इबादत की किसी भी जगह चले जाओ, चाहे मंदिर हो या मस्जिद, चर्च हो या फिर गुरुद्वारा। हर जगह भयानक भीड़। कई जगह जबरन दान की मांग। अनेक जगह दिखावा। कतार में धक्का-मुक्की। क्या ऊपरवाले ने एक सबक दिया है सबको कि भक्ति में दिखावा न हो। मन चंगा तो कठौती में गंगा। घर पर भी इबादत हो सकती है। सही इबादत तो दीन-दुखियों की सेवा है। क्या जाने क्या है। पर इस वक्त सब ऊपर वाले के भरोसे पर हैं।
बीच-बीच में डराता मौसम
अप्रैल आने पर भी ऑफिस में कई लोगों को जैकेट या हाफ स्वेटर पहने देखता हूं तो यकीन नहीं होता कि अप्रैल का आधा माह निकलने को है। प्रदूषण में आई कमी इसका कारण है या कुदरत की कुछ और इच्छा कि बीच-बीच में पश्चिमी विक्षोभ यानी वेस्टर्न डिस्टर्बेंस सक्रिय हो जाता है और बारिश या तेज हवा मौसम के गर्म होते मिजाज को फिर ठंडा कर देता है। कुछ भी हो कुदरत के सामने सारी कायनात बौनी है।
ट्रिब्यून स्कूल की प्रिंसिपल के लेख पर प्रतिक्रिया
Vandana Saxena
Principal Tribune School
इसी दौरान ट्रिब्यून स्कूल की प्रिंसिपल वंदना सक्सेना जी से व्हाट्सएप के जरिये बात हुई। असल में उन्होंने पहली अप्रैल से ही सभी कक्षाओं के लिए व्हाट्सएप ग्रूप बनवा दिये और सभी टीचर्स बच्चों को हल्का-फुल्का काम देने लगे और उनका बच्चों से सीधा संवाद होने लगा। बच्चे इसे एंजॉय भी कर रहे हैं। इसी दौरान उन्होंने एक लेख लिखा और जीवन को नये नजरिए से देखने संबंधी बात उसमें कही। मैंने वह लेख पढ़ा और उनके अंग्रेजी लेख की प्रतिक्रिया हिंदी में दी। वर्ष 1996 से हिंदी आंदोलन से जो जुड़ा ठहरा। नीचे है मेरी प्रतिक्रिया-

नमस्कार मैडम। महज यह नहीं कहूंगा कि लेख बहुत अच्छा है। असल में आपने रिश्तों को फिर से परिभाषित करने की बात से लेकर डार्विन के सिद्धांत योग्यतम की उत्तरजीविता तक का जिक्र करते हुए अनिश्चितता भरे माहौल में उम्मीद की किरण जगाई है। बेशक मेरी रुटीन लाइफ में ज्यादा फर्क नहीं आया, लेकिन घर, परिवार, जानकार लोगों के अनुभव अद्भुत हैं। अनेक लोगों की बुरी लतें छूट गई हैं। भविष्य का पूर्वानुमान इन दिनों कल्पना से परे है, लेकिन आभासी दुनिया में पूरी तरह खो चुके इंसान के लिए यह आत्ममंथन का वक्त है। वशीर बद्र साहब ने बहुत पहले लिख दिया था- कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से, ये हादसों का शहर है जरा फासले से मिला करो। उनसे भी पहले कवि प्रदीप ऐसे गीत लिख गए थे। योग्यतम की उत्तरजीविता के सिद्धांत के साथ ही हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि परिवर्तन ही सृष्टि का नियम है। परिवर्तन हो रहा है और होगा। यह दौर भी निकल जाएगा। बुराई में भी कुछ अच्छाई छिपी होती है। आज प्रदूषण कम हो गया है, रिश्तों में दूरी के बावजूद नयी गर्माहट आई है। सोशल मीडिया के संदेशों में फर्क आ गया है, जो विदेश न जाने के कारण कुंठित रहते थे वे अब ऐसा नहीं सोचते। आपका लेख बहुत बेहतरीन है जो खूबसूरत नयी सुबह की उम्मीद जगाती है। वाकई जीवन प्रवाह में यह रुकावट आत्ममंथन के लिए वक्त मिलने जैसा है और ऐसे लेख उस दिशा में एक कदम के साथ ही मानवता के यज्ञ में एक आहूति सरीखा है। आपको साधुवाद। - केवल तिवारी, चंडीगढ़

Thursday, March 5, 2020

होली के पापड़ और त्योहार की रस्म अदायगी

पापड़ बनाती भावना।
मार्च (march) महीने का पहला सप्ताह चल रहा है। 4 दिन बाद होली (holi) है। होली। कैसी रहेगी, यही सवाल सबके जेहन में है। कोरोना (corona) का खौफ। लगातार होती बारिश और रस्म अदायगी तक सिमटते त्योहार। तीन दिन पहले भावना ने कहा कि आज थोड़ी धूप है, क्या पापड़ बना लें। आशंका थी कि कहीं मौसम फिर न बिगड़ जाए। मैंने कहा हां शगुन तो कर ही लो। असल में अब सब शगुन करने जैसा यानी रस्म अदायगी जैसा ही रह गया है। मुझे त्योहार के मौके पर लखनऊ बहुत याद आता है। वहां कितना कुछ होता है। महीने पहले से तैयारी। हालांकि अब वहां भी उतना उत्साह नहीं रहा। दो दिन पहले शीला दीदी से बात हुई, उसने याद किया कि जब सौरभ छोटा था तो भी वह तिमजिले मकान की छत पर जाकर घंटों पापड़, चिप्स और कचरी बनाती, कई बार नीचे आने तक सौरभ चोटिल दिखता। अब तो आने जाने वाले भी कम ही होते हैं। खैर त्योहार तो त्योहार (festival)  हैं। समय बदलता रहता है, यादें पुरानी हैं, नयी बन रही हैं। चार साल पहले होली पर लखनऊ (Lucknow) गया था। बहुत अच्छी यादें हैं। सबके स्वस्थ रहने की कामना करता हूं।

Wednesday, March 4, 2020

हरेश जी की सेवानिवृत्ति ... वही उमंग आज भी है

केवल तिवारी
दिनांक 31 जनवरी 2020, समय : दोपहर 2:30 बजे। स्थान : चंडीगढ़ प्रेस क्लब। दैनिक ट्रिब्यून (Tribune) के संपादक राजकुमार सिंह जी ने कहा, ‘आप बेहतरीन व्यक्ति हैं इसका एक बड़ा कारण आपके साथियों का भी बेहतरीन होना है।’ उन्होंने अपनी बात जारी रखते हुए वहां बैठे न्यूजरूम के सभी साथियों से कहा, ‘यकीन मानिए हरेश जी ने कभी व्यक्तिगत रूप से किसी की मुखालफत नहीं की। कोई गलती विशेष पर भी नहीं।’ फिर उन्होंने अन्य बातें भी कीं। उनसे पहले दैनिक ट्ब्यिून के संपादकीय विभाग के अनेक व्यक्ति अपनी-अपनी बातें रख चुके थे। मौका था समाचार संपादक हरेश वाशिष्ठ जी की सेवानिवृत्ति का।
प्रेस क्लब में ग्रुप फोटो।
मुझे दैनिक ट्ब्यिून में आए सात साल हो चुके हैं। बेहतरीन संयोग था कि वरिष्ठ साथी अरुण नैथानी जी के सौजन्य से घर भी हरेश जी के एकदम करीब मिल गया। संकोची स्वभाव का होने के कारण उनके साथ घनष्ठिता कुछ दिनों बाद बनी। यह भी सच है कि कई लोगों से अब तक नहीं बन पाई। हरेश जी के साथ काम करने के दौरान के अनेक लोगों ने किस्से सुनाए, लेकिन मेरे साथ किस्से कुछ ऐसे हैं कि मैंने उनसे सीखा बहुत कुछ। एक बड़ी बात तो उन्होंने सेवानिवृत्ति के दौरान ही अपने संबोधन में कही कि करीब 36 साल पहले जब उन्होंने ट्ब्यिून ज्वाइन करना था तो उससे एक रात पहले वह कैथल स्थित अपने घर की छत पर रात को टहल रहे थे और एक अलग तरह की उमंग थी। साथ ही इस 31 जनवरी से पहले भी वह चंडीगढ़ स्थिति अपने घर की छत पर टहल रहे थे तो उन्हें लेशमात्र भी दुख नहीं हो रहा था कि अब वह सेवानिवृत्त हो रहे हैं। यहां प्रसंगवश एक बात मुझे याद आ रही है कि ठीक एक साल पहले लखनऊ में मेरे भाई साहब भी सेवानिवृत्त हुए थे। वह भावुक थे। साथ ही खुश थे कि बेदाग निकल गए। क्योंकि जिस विभाग में वह थे वहां दाग लगना कोई आश्चर्य की बात नहीं थी। इस 31 जनवरी को भी लखनऊ में भाई साहब की सेवानिवृत्ति का सारा मंजर मेरे आंखों में चलचित्र की तरह चल रहा था। यहां कुछ ने अपने अनुभव बताए, कुछ ने कुछ भी नहीं कहा और कुछ ने कुछ-कुछ कह दिया। कहने-सुनने के इस मौके पर गीत-संगीत और शेर-ओ-शायरी का दौर भी चला।
मेरे कुछ यादगार पल
साल 2013 में चंडीगढ़ आए मुझे करीब 3 महीने हुए थे। एक दिन मै सुबह 11 बजे अपने घर (किराये पर जहां रहता हूं) पर ताला लगा रहा था। उन दिनों मेरे बच्चे गाजियाबाद में ही थे। मेरे साथ रह रहे नित्येंद्र कानपुर गए हुए थे। हरेश जी मेरे गेट के ठीक सामने बने सोसाइटी ऑफिस में एक मीटिंग में थे। उन्होंने मुझे निकलता देखा तो आवाज लगाकर रोका। फिर पूछा कहां ऑफिस चल दिए। मैंने कहा जी उससे पहले सेक्टर 31 जाकर एक मोबाइल सिम लेना है उसके बाद ऑफिस जाउंगा। हरेश जी ने कहा, थोड़ा रुकें आज लंच साथ करते हैं। मैं कुछ नहीं बोल पाया। न हां और न ही ना। मैं वापस लौटा, ताला खोला और कुछ मैले कपड़े निकालकर उन्हें धोने में जुट गया। करीब एक घंटे बाद हरेश जी आए और बुलाकर अपने घर ले गए। वहां भाभी जी और बच्चों कनु एवं जूजू से पहली औपचारिक मुलाकात हुई। बेहद आत्मीय लोग लगे। कनु मेरी भतीजी का नाम भी है जो इन दिनों एबीपी न्यूज में सीनियर प्रोड्यूसर है। इसके बाद अक्सर बातचीत होने लगी। इसके तीन-चार माह बाद स्कूल में छुट्टियों के दौरान बच्चों को मैं एक हफ्ते के लिए यहां ले आया। रूम मेट नित्येंद्र ने दूसरा घर किराये पर ले लिया था। एक हफ्ते बाद बच्चों को छोड़ने जाना था। मैंने हरेश जी से छुट्टी मांगी साथ ही पूछा कि क्या कोई ऑटो या टैक्सी वाला जानकार है, रात 11 बजे की ट्रेन है। हरेश जी ने कहा घर से कितने बजे निकलेंगे। मैंने कहा 10 बजे; वह बोले-हो जाएगा इंतजाम। मैं निश्चिंत। जिस दिन जाना था, मैने हरेश जी से एक घंटा पहले यानी 9 बजे ऑफिस से जाने की इजाजत मांगी। उन्होंने आज्ञा दे दी। लेकिन वह स्टेशन तक जाने की व्यवस्था के बारे में कुछ नहीं बोले। मैं घर आया और बच्चों से कहा कि जल्दी तैयार होकर चलो। हरेश जी पहले तो कह रहे थे कि व्यवस्था हो जाएगी, लेकिन आज एक शब्द नहीं बोले। तैयार होने में 10 बज गए। जैसे ही हम लोग निकलने को हुए, हरेश जी का फोन आया, पूछा, तैयार हो गए। मैंने कहा जी सर बस बाहर को ही निकल रहे हैं। वे बोले आ जाइये मैं कार लेकर बाहर खड़ा हूं। मैं अवाक रह गया। कितनी जल्दी धारणा बनाने लगता हूं किसी के बारे में। उसके बाद बहुत संयम से सोचने-विचारने लगा हूं। यही नहीं न्यूज रूम में अलग-अलग नेचर के लोगों को हैंडल करते हरेश जी से बहुत कुछ सीखा। इसके बाद तो कई मौके आए जब हरेश जी से अपनापन मिला।
भाभी का बच्चों को गाइडेंस और कनू-जूजू के साथ मेरी हिंदी-विंदी
चूंकि घर अगल-बगल था। अक्सर मिलना हो जाता। इस दौरान भाभी जी बच्चों को गाइड करती। बड़े बेटे से उन्होंने प्रतिदिन कम से कम आधा घंटा साइकिल चलाने को कहा और छोटे से कुछ खान-पान सुधारने को। उन्होंने आईटीबीपी के अपने किस्से भी कई बार सुनाए। मैंने सलाह भी दी कि वह अपने अनुभवों को एक किताब के रूप में लिखें। इस बीच कनु और जूजू तमाम परीक्षाओं के दौर से गुजरीं। हरेश जी और भाभी जी ने उन्हें थोड़ी हिंदी की प्रैक्टिस कराने की जिम्मेदारी मुझे दी। उनको तैयारी कराने के दौरान कई नयी चीजें मुझे भी सीखने को मिलीं। इस दौरान दोनों बच्चे मेरी सेहत के बारे में पूछते, जरूरी सलाह देते और सबसे बेहतरीन नित अलग-अलग तरह की चाय पिलाते। बच्चों की मेहनत है कि आज जूजू के नाम से ऊ की मात्रा हटा दी गयी है। यानी वह जज बन गयी है। कनु डॉक्टर साहिबा हो गयी हैं। ईश्वर उन्हें खूब तरक्की दे। बातोंबातों में पता चला कि हरेश जी के पिताजी का नाम दामोदर था। इत्तेफाक है कि मेरे पिताजी का नाम भी यही था।

आज हरेश जी बेशक ऑफिस के काम से निवृत्त हो गए हैं, लेकिन अभी काफी काम बचा है। संपादक राजकुमार सिंह जी के ही कथन से बात को पूरा करता हूं कि सेवा से निवृत्त हुए हैं, संबंधों से नहीं। अभी कई अनुभव और मिलेंगे और ब्लॉग लेखन का यह सिलसिला यूं ही जारी रहेगा।
ऑफिस से विदा हुए तो क्या, हम सबको तो साथ ही आप पाओगे
है शुभकामना हमारी, जीवन में हर कदम आप खुशियां ही पाओगे।
विदाई के तुरंत बाद की खुशी। अखबार में छपी खबर के जरिए-


बारिश पर हावी रिटायरमेंट का जश्न

केवल तिवारी
29 फरवरी की वह शाम थी। यादगार शाम। और ज्यादा यादगार होती, लेकिन बारिश का खलल पड़ गया। बारिश भी ऐसी कि थमने का नाम न ले। कुछ देर रुके, फिर शुरू हो जाये। बारिश के बावजूद उत्साह में कमी नहीं थी। वसुंधरा के सेक्टर 4 बी स्थित शिवगंगा अपार्टमेंट के गेट पर कुछ महिलाएं खड़ी थीं, पुरुषों की चहलकदमी जारी थी, बच्चों का उत्साह नये रंग में था। इन सबके बीच ढोल बजे रहे थे। पैर थिरकने को बेताब थे। तभी पता चला कि शर्मा जी पहुंचने वाले हैं। शर्मा जी यानी हरीशचंद्र शर्मा। जीना नंबर 10 के ‘लोकल गार्जन।’ 
शर्मा जी और भाभी जी का स्वागत करते लोग।
भाभी जी और बेटा नितिन गए थे शर्मा जी को लिवाने। असल में एलआईसी में शानदार नौकरी करने के बाद शनिवार, 29 फरवरी 2020 को शर्मा जी रिटायर हो गये। वाकई यह दौर एक नये तरह का होता है। आप नौकरी संबंधी रुटीन काम से निवृत्त होते हैं और सामाजिक दायित्वों में जुट जाते हैं। यह अच्छी बात है कि शर्मा जी ने दोनों बेटियों रुचि और सोनाली का विवाह कर दिया है, बेटे नितिन की शादी की तैयारी कर रहे हैं। दोनों बेटियां अपने-अपने परिवार में खुश हैं। उस दिन दोनों बच्चियों से मुलाकात हुई। धीरज जी ने दामादजी से परिचय कराया, बहुत अच्छा लगा। बेटे नितिन का उत्साह भी देखते ही बनता था। मुझे याद आया ठीक एक साल पहले लखनऊ में अपने भाई साहब के रिटायरमेंट का। वह तारीख 31 दिसंबर की थी। खैर उस शाम शर्मा जी जब गेट पर पहुंचे तो हम सभी ने उनका वार्म वेलकम किया। बारिश को लेकर कुछ बातें हुईं। शर्मा जी ने मजाक किया, ‘तिवारी जी चंडीगढ़ से बारिश साथ लेकर आए हैं।’ वाकई पहली रात चंडीगढ़ में खूब बारिश हुई थी। मैं रात को ही चलने वाला था, लेकिन भारी बारिश को देखते हुए मैंने कार्यक्रम टाल दिया। मैं अगले दिन यानी 29 फरवरी की ही सुबह 8 बजे चंडीगढ़ से चला। शाम 5 बजे के करीब शर्मा जी के घर पहुंच गया।
कृष्णाजी की भागदौड़ और सलाह मशिवरा
इस पूरे प्रकरण में कृष्णा जी की भागदौड़ देखने लायक और सीखने लायक थी। वह पैंट को समेटे, चप्पल में इधर से उधर भाग रहे थे। कभी खाने की टेबल गली में शिफ्ट कराने में तो कभी डीजे के साउंड बॉक्स को धीरज जी की बालकनी में रखने में। बीच-बीच में वह हम लोगों से भी सलाह-मशविरा कर लेते। इसी दौरान शर्मा जी के आने की सूचना मिली। फोटोग्राफर का इंतजार किया जाने लगा। 10 मिनट इंतजार के बाद कृष्णा जी ने कहा कि अब इंतजार नहीं चलिये। उनका यह फैसला सही रहा, क्योंकि थोड़ी देर में ही फिर भारी बारिश हो गयी।
बच्चा पार्टी का दिया खूबसूरत गिफ्ट।
बच्चों ने दिया सबसे प्यारा गिफ्ट
चंडीगढ़ लौटने के बाद शर्मा जी का फोन आया, ‘ठीक से पहुंच गये।’ फिर उन्होंने शिकायत की कि जाते वक्त मिले क्यों नहीं, बच्चों के लिए मिठाई भेजनी थी। मैंने माफी मांगते हुए कहा, ‘आशीर्वाद बनाए रखिए।’ बातों-बातों में शर्मा जी ने कहा कि उन्हें बच्चों का गिफ्ट बहुत अच्छा लगा। फिर उसकी फोटो उन्होंने भेजी। वाकई बच्चों की मासूम भावनाएं होती ही बहुत अच्छी हैं। बच्चों ने खूबसूरत फोटो लगाकर अपने दिल की बातों को इसमें लिख छोड़ा है। शर्मा जी को नये जीवन पथ पर चलने की अग्रिम बधाई। वह स्वस्थ रहें, खूब घूमें, फिरें। जल्दी ही हम लोगों की मुलाकात होगी। मैंने उन्हें चंडीगढ़ आने का निमंत्रण दिया है, देखते हैं योजना कब पूरी होती है। पेश है एक शेर-
ऑफिस से विदा हुए तो क्या, हम सबको तो साथ ही आप पाओगे

है शुभकामना हमारी, जीवन में हर कदम आप खुशियां ही पाओगे।

Tuesday, February 25, 2020

निकिता मैम ने कहा-‘आप अपने लिए भी जीयें’ ... बस पड़ गया फर्क

केवल तिवारी
इस बार वर्षों बाद वह घर आया है, अपने साथ खुद को भी लाया है।
अपने साथ खुद को लाने की एक शायर की यह बात है बहुत गंभीर। वाकई कई लोग आपाधापी में खुद को भूल चुके हैं। कोई बच्चों को समर्पित है। कोई पैसे के पीछे भाग रहा है। किसी को प्रतिष्ठा की चिंता है और कोई दो जून की रोटी के जुगाड़ में ही इतना व्यस्त है कि उसे अपने बारे में ही कुछ पता नहीं। लेकिन कई बार कुछ मोड़ ऐसे आते हैं कि आपको लगता है-
जीवन पथ पर आएंगे कई मोड़, पल वही अपने जो आपको खुद से दे जोड़।
Nikita Mam
कुछ मंजर ऐसा ही हुआ कुछ दिन पहले। चलिए इसकी शुरुआत करते हैं-कोई लाग-लपेट नहीं, कोई गिला-शिकवा नहीं। आमना-सामना हुआ। हाल-चाल पूछा फिर अचानक सवाल, ‘आज बहुत कमजोर क्यों लग रहे हैं। तनाव ज्यादा लेने लगे हैं।’ निकिता मैम पहले मुझसे मुखातिब थीं, फिर मेरी पत्नी भावना की तरफ हंसते हुए मजाकिया अंदाज में पूछा, ‘आप ध्यान नहीं रख रहीं इनका।’ कुछ पल हंसी मजाक। फिर उन्होंने गंभीर होकर कहा, ‘देखिए आप अपना कर्म कर रहे हैं। बच्चों पर पूरा ध्यान दे रहे हैं फिर तनाव पालकर क्या होगा।’ अमूमन मैं खूब बोलने वाला हूं, लेकिन उस दिन ज्यादा नहीं बोला। यह बात है नवंबर या दिसंबर की। सही तारीख याद नहीं। ट्रिब्यून मॉडल स्कूल (Tribune Model School) में बेटे धवल की पीटीएम (PTM) थी। मेरी और पत्नी की हमेशा कोशिश होती है कि पीटीएम में हम दोनों जाएं। उस दिन भी यही हुआ। हम दोनों पीटीएम से लौट रहे थे। सीढ़ियों के पास निकिता मैम मिल गयीं। उन्होंने यह भी कहा कि आपसे फिर विस्तार से बात करेंगे। विस्तार से बात करने की बात पर भावना कई दिनों तक इसलिए तनाव में रहीं कि कहीं धवल कोई शैतानी तो नहीं कर रहा। धवल अकसर दोस्तों की ऐसी बातें भी बताता कि मन सन्न रह जाता। इतनी छोटी उम्र में भी बच्चे ऐसी बातें। मैंने भावना को समझाया कि तुम भले ही परेशान हो, मैं तो रिलेक्स हूं। अगली बार मैडम से मिलेंगे तो सकारात्मक बातें होंगी।
भावना की चिंता भी वाजिब थी। इस पर एक कवि की चंद पंक्तियां याद आती हैं-
बारिश तो आती है पर क्या, सावन में सावन दिखता है। बच्चे तो दिखते हैं काफ़ी, कितनों में बचपन दिखता है।
बिल्डिंग में कमरे ही कमरे, गायब घर-आंगन दिखता है। अपनापन तो नहीं, पर इन दिनों परायापन खूब दिखता है।
खैर...मुझे याद है करीब चार साल पहले निकिता मैम मेरे बेटे धवल को पढ़ाती थीं। उसके बाद उन्होंने स्कूल छोड़ दिया। बेटा उन्हें बहुत मिस करने लगा। वक्त गुजरता गया, एक दिन पता चला कि निकिता मैम ने फिर ज्वाइन कर लिया है, इस बार स्पेशल एजुकेटर के तौर पर। उन्होंने इसके लिए बाकायदा कोर्स किया है। उनके आने के बाद एक बार सभी पैरेंट्स को एक साथ बिठाकर कुछ टिप्स दिये गये। खासतौर पर उन्हें जिनके बच्चे बोर्ड परीक्षा देने वाले थे। मेरे बड़े बेटे कार्तिक उस दौरान 10वीं की तैयारी कर रहा था। पढ़ने में ठीक ही था। थोड़ी सी किशोरावस्था वाली चीजें उसके मन-मस्तिष्क पर हावी हो रही थीं। थैंक्स ट्रिब्यून
स्कूल का, स्कूल की प्रिंसिपल का, क्लासटीचर बिनेश सर का, निकिता मैम का और अब स्कूल छोड़ चुकीं अवलीन कौर मैमम का। आगे बढ़ने से पहले किसी शायर की दो लाइनें पेश करना चाहता हूं-
अपनी हालत का ख़ुद एहसास नहीं है मुझ को, मैंने औरों से सुना है कि परेशान हूं मैं
तकलीफ़ मिट गई मगर एहसास रह गया, ख़ुश हूं कि कुछ न कुछ तो मिरे पास रह गया।
बहरहाल, वापस आते हैं निकिता मैम पर। एक दिन स्पेशल पैरेंट्स क्लास हुई। उसमें निकिता मैम ने जोर-जोर से ए फॉर एप्पल और वन टू थ्री सबसे बोलने को कहा। कुछ लोग ऐसा करने में संकोच भी कर रहे थे। लेकिन देखते ही देखते सबको मजा आने लगा। थोड़ी देर बाद निकिता मैम ने कहा, कैसा लगा, सब हंसने लगे और बोले-मजा आ गया। निकिता मैम ने कहा जब छोटी-छोटी बातों से आनंदित हुआ जा सकता है तो आप बच्चों के साथ कभी-कभी बच्चा क्यों नहीं बन जाते। सचमुच बात बहुत अच्छी और बहुत छोटी सी लगी। मैंने अब तक पैरेंटिंग पर 200 के करीब आर्टिकल विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और साइट्स पर लिखे होंगे, लेकिन बात जब अपने पर आती है तो उसी तरह हो जाता है कि जैसे डाॅक्टर खुद का इलाज नहीं कर पाता। ऐसे ही अनेक मौकों पर निकिता मैम से बातें होने लगीं। स्कूल से मेरा नाता एक अभिभावक के अलावा भी है। कई बार बच्चों को मोटिवेशनल लेक्चर दिया है। कहानी लिखने के टिप्स दिए हैं। चुपचाप अभिभावक की भूमिका में जाता हूं, कभी रिपोर्टर के तौर पर और कभी स्कूल की मीटिंग में। हर बार कुछ सीखने को मिलता है।
बत फिर वहीं से,  
जब निकिता मैम ने कहा कि आप अपने लिए भी जीना सीखें। चिंता न करें, कर्त्तव्य करें। मैंने मन ही मन ठान लिया कि अगली बार मैडम से मिलूंगा तो शायद शिकायत का मौका नहीं दूंगा। इस बार भी अभी 15 फरवरी को फिर पीटीएम में गया। इस बार निकिता मैम से स्पेशल मिलने जाने का मन बनाया, लेकिन इसी बीच कुछ टीचर्स के साथ लंबी बातचीत होने से समय ज्यादा निकल गया। भावना बोलीं, चलो निकिता मैम से मिलकर आते हैं। जब तक वहां पहुंचे मैडम का कमरा बाहर से बंद था। हम लोग लौटने लगे तो मैडम फिर सीढ़ियों के पास मिल गयीं। कुछ पैरेंट्स से बात करते हुए। हमने इंतजार किया फिर बातों का सिलसिला शुरू हुआ। सबसे पहले मैंने ही पूछा मैडम आज तो मैं ठीक लग रहा हूं ना। वो थोड़ा आगे बढ़ीं प्रिंसिपल मैम के कमरे के बाहर हेल्पडेस्क के टेबल को छुआ और कहा टचवुड। फिर हम लोग पास ही रखे सोफे पर बैठ गए। उन्होंने कुछ बातें तो बेटे धवल को समझाईं। फिर हमसे भी बातें होने लगीं। हम लोगों ने तय किया कि बच्चों और पैरेंट्स को लेकर हम लोग अक्सर मिलेंगे और बात करेंगे। शायद इनसे कुछ ऐसी बातें निकलें कि जो औरों के लिए भी आगे चलकर फायदेमंद हो सके;
हर तमन्ना जब दिल से रुखसत हो गई, यकीन मानिए फुर्सत ही फुर्सत हो गई।
नादान हैं जो बाजार में वक्त खरीदने चले हैं, वक्त उसी का है जो वक्त के साथ चले हैं।

कुछ टीचर्स का चले जाना, हर एक से कुछ सीखना

मुझे सात साल हो गये हैं चंडीगढ़ आए और बच्चों को छह साल। यानी ट्रिब्यून माॅडल स्कूल से नाता जुड़े भी छह साल ही हो गये हैं। मैं बड़े बेटे को लेकर कई टीचर्स से सवाल पूछता तो हर कोई कहते बहुत अच्छा बच्चा है। यकीनन मुझे अच्छा तब लगा जब एक बार एक मैडम ने कहा कि आपने उस पर उम्मीदों का पहाड़ लादा है। वह हंसता नहीं। इतना गंभीर क्यों। मैंने इस पर होमवर्क किया, लेकिन बड़ा बेटा कार्तिक आदतन ऐसा है। वैसे टीचर्स के सुझाव के बाद उसे बदलने की कोशिश की। आज वह ट्रिब्यून स्कूल से निकल चुका है, लेकिन यहां से बहुत कुछ सीखकर निकला। हिंदी की आशा भारद्वाज मैडम हों या रजनी मैडम, इन लोगों से अकसर बातें होती हैं। म्यूजिक के अतुल सर से लेकर वीआरएस ले चुकी अनुपमा मैम, सबसे बातचीत का सिलसिला जारी है। विनिमा मैम, नम्रता मैम, निधि मैम, स्वाति मैम और कुछ नये आए टीचर्स। मेरी कोशिश होती है कि मैं सबसे मिलकर बच्चे की पढ़ाई के अलावा उसकी हरकतों के बारे में भी बात करूं। इन सबके बीच प्रिंसिपल वंदना सक्सेना मैम का बेहतरीन सहयोग। एक बार प्रिंसिपल मैम को मैंने अपनी एक कहानी का लिंक भेजा, उन्होंने प्रतिक्रिया स्वरूप पूछा, इज इट धवल। वंदना मैम के साथ तो इतने अनुभव हैं कि उन पर एक लंबी कहानी लिखने का इरादा है।
केवल तिवारी

Sunday, February 23, 2020

नितिन की शादी और एक परिवार-नेक परिवार

केवल तिवारी

कुछ पल बचा लो अपनों के लिए, जो देखोगे पलट के, ये मिलेंगे कहां
वक़्त का तक़ाज़ा कहता है यही, जो बीत गये पल, फिर आएंगे कहां
आओ इस पल को यादगार बना लें, जो बातें होंगी अभी, फिर करेंगे कहां।
भाभी-भैया संग मिनी, दीपा
जी हां! एक कवि की उक्त पंक्तियां मानो उसी दौर के लिए लिखी थीं जो कुछ दिन पहले हमने सपरिवार महसूस कीं। मौका था नितिन की शादी का। एक-एक लम्हा (कई दिनों के कार्यक्रमों में तीन दिन मैं भी मौजूद रहा) यादगार रहा। यहां अपनापन था। सम्मान था। जान-पहचान वालों से मेल-मुलाकात का एक दुर्लभ अवसर था। बातों का संगम था, अपनों का समागम था। नितिन के मम्मी-पापा को साधुवाद कि उन्होंने बेहतरीन मौसम और बेहतरीन टाइमिंग पर सभी समारोहों को रखा। मैं विपिन से कई बार पूछता, ‘तन-मन से सहयोग को तैयार हूं, मेरे लायक सेवा बताना।’ विपिन का आग्रह होता, ‘चाचा जी आप समय पर पहुंच जाना। इतना ही बहुत है।’ रिश्ता हमारा बेशक चाचा-भतीजा वाला है, लेकिन संबंध दोस्ताना हैं। आइये चलते हैं उस यादगार लम्हों को फिर से समेटेते हुए।
स्थान : वसुंधरा (Vasundhara Ghaziabad Uttar Pradesh)में वोल्वो बस के अंदर, समय : सुबह के लगभग 8:30 बजे। दिनांक : 9 फरवरी। मौका : नितिन की बारात में जाने का। मुझे एक दिन पहले हुए कार्यक्रम की कुछ फोटो-वीडियो दिखाई गईं। तभी आवाज आई, ‘चाचाजी को उस प्रोग्राम की वीडियो और फोटो दिखाओ ताकि इन्हें पता चले कि इन्होंने क्या मिस किया है।’ आवाज दर्शन पांडे जी की थी। दर्शन जी मेरी भतीजी नीरा के पति। भतीजे हरीश, दीप और प्रकाश ने भी उनके साथ सहमति जताई। इसके बाद एक जोरदार ठहाका। मैंने माना, ‘हां मैंने इसे मिस किया।’ यह तो अभी अपने लोगों के बीच बातचीत और हंसी-मजाक की शुरुआत थी। विपिन से भतीजे का रिश्ता है तो जाहिर है नितिन पोता लगा। वह मुझे कहता भी बड़बाज्यू है। एक बार उसकी अम्मा यानी मेरी भाभी यानी विपिन की मांताजी ने नितिन को यह रिश्ता समझाया था उसने तब से इसे गांठ बांध ली। कभी पारिवारिक समारोहों में मिलते भी तो नितिन कहता, ‘आओ बड़बाज्यू डांस करते हैं।’ पूरी बात से पहले उस विवाह समारोह की जो खूबसूरत चीज थी उसे बयां करना चाहूंगा। इस कार्यक्रम में पूरा परिवार एक जगह था। विस्तृत परिवार। बारात जाने के दौरान महिला मंडली जिसमें मेरी भतीजियां, मेरी बहुएं, मेरी दीदी और नाती-नातिन, पोते-पोतियां भी शामिल थे, भी बस में बैठना चाहती थी। उन्होंने कहा बुजुर्ग इनोवा में चले जाएं हम यहां हुड़दंग करेंगे। कितना सुंदर था वह ‘हुड़दंग’ कहना। मैं, लखनऊ से आए दाज्यू भुवन चंद्र तिवारी, जीजा जी, एक मित्र उमेश पंत आगे की सीटों पर बैठे थे। मैंने कहा, ‘बुजुर्ग आगे बैठे हैं, उनके पीठ पीछे कुछ भी करो।’ जहां तक मेरा संबंध है, वह थोड़ा अजीब है। एक तो अपने घर यानी अपने माता-पिता की सबसे छोटी संतान हूं, लेकिन पूरे परिवार में रिश्ते में ‘सीनियर’ लोगों का भी चाचा लगता हूं। यानी छोटा सा बुजुर्ग हूं। इसीलिए परिवार में जिनसे अनौपचारिक बातें नहीं हुईं हैं, वे अभी तक ‘झिझकती हैं।’ बुजुर्ग मानें तो कैसे, ‘जमीन से जुड़ा व्यक्त लगता है, जमीन से ही जुड़ा रह गया।’ बराबर के हैं नहीं, छोटा मान नहीं सकते। वैसे बीना यानी नितिन की मम्मी से काफी बातें शेयर होती हैं, जहां मैं असहज होता हूं, वहां मेरी पत्नी भावना चीजों को संभाल लेती है, लेकिन यहां कुछ कारणों से वह समारोह में नहीं आ सकी। खैर... ये तो हुई हा हा हा वाली बात। आइये समेटते चलें उन यादगार लम्हों को।
 बस का वह खूबसूरत सफर (Travelling by Bus)
बस में सबसे पहले नितिन की बहन यानी बिपिन-बीना की बिटिया एक माइक लेकर मेरे पास आईं और बोलीं, ‘बड़बाज्यू कुछ अनाउंस कर दो।’ मैंने थोड़े जयकारे लगाये फिर काम सौंप दिया प्रकाश को। प्रकाश जो हर काम को निभाने में अग्रणी भूमिका निभाता है। हमारे परिवार में समारोहों का तारणहार। उसके बाद बस में शुरू हो गया अंताक्षरी का कार्यक्रम। विपिन भी हम लोगों के साथ ही चल दिया। वहां नितिन के दोनों मामाओं से मुलाकात हुई। ये लोग बहुत पुराने परिचित हैं और एक व्हाट्सएप ग्रूप के साथी। आगे की दो-चार सीटों पर हम लोग बातें करते रहे और पीछे चलते रहे गीत। बीच-बीच में हम लोग भी इसका आनंद ले रहे थे। एक जगह टोल नाके पर लंबा जाम मिला। विपिन और प्रकाश ने नीचे उतरकर किसी तरह हमारी बस को आगे करवाया। गजरौला से पहले एक बेहतरीन रेस्तरां में हम लोगों न नाश्ता किया। होते-करते करीब 3 बजे हम लोग हल्द्वानी स्थित देवाशीष होटल पहुंचे। वहां गांव से आए उमेशदा, दीप दा और जो लोग बस के बजाय इनोवा में आये थे जैसे नोएडा कैलाश चंद्र पांडेजी (उम्र 65 साल रिश्ते में मेरे भांजे), प्रयागदा (उम्र 72 साल रिश्ते में मेरे भतीजे), रानीखेत से आए सुनीलदा, कैलाश दा (विपिन के ममेरे भाई) मिले। सुनीलदा और उनकी पत्नी प्रणाम कहने लगे तो मैंने टोका, लेकिन वह बोल पड़े, ‘चाचाजी रिश्त ठुल हुनी हय’ यानी चाचाजी रिश्ता बड़ा होता है। इन लोगों के साथ बातचीत के बाद हम लोगों ने थोड़ा आराम किया। कुछ फोटो वगैरह खींचे और बारात के लिए तैयार होने लगे। बारात रामपुर रोड से शुरू हुई। वहां डांस करना, पार्टी में शामिल होना, हंसी मजाक करना, विपिन का खुद ही एक जगह बेहतरीन मंत्रोच्चारण करना सबकुछ याद आता है।
बड़बाज्यू चलो डांस करने (grandpa dance)
सोमवार दोपहर बाद बारात वसुंधरा पहुंच गयी। वापसी में लोगों की थकान साफ दिख रही थी। इस दौरान हरीश ने यूट्यूब पर बेहतरीन गाने लगा दिए। कभी गुलजार के तो कभी जावेद अख्तर के। बीच-बीच में बातें भी होती रहीं। दर्शनजी ने कई पुरानी बातें कीं। अगले दिन शाम को भव्य पार्टी थी। मिराया बैंकट में वसुंधरा के कई जानकार, गुलाबी बाग (Gulabi Bagh) से आए कुछ लोग मिले। जश्न मना और बातें हुईं। इसी दौरान बिटिया दीपू आई बोली, ‘बड़बाज्यू चलो डांस करने।’ मैं चला गया। वहां से भतीजी कनु साथ आई और कई लोगों से मेल मिलाप का दौर चला।
वे रिश्ते की दुश्वारियां और हंसी-मजाक के लम्हे
स्वागत में तैयार बिपिन और बीना।
रिश्तों की दुश्वारियों के बीच हंसी-मजाक भी तो जरूरी था। शुरुआत हुई बिना मजाक के मजाक की। हल्द्वानी में शादी कार्यक्रम (पूजा-पाठ) संपन्न होने के बाद विपिन ने अपनी समधन और अन्य लोगों से मुलाकात कराई। मैंने कहा, ‘थोड़ी देर पहले आपने हमसे कहा था कि सामान मैं अंदर कमरे में अभी रखवाती हूं, मुझे लगा आप दुल्हन की दीदी हैं।’ वह हंसी और बोलीं, ‘कंप्लीमेंट के लिए थैंक्स।’ फिर मैंने कहा आप यूं ही युवा बने रहें। उसके बाद गाजियाबाद में रिसेप्शन पार्टी में मैंने विपिन से धीरे से कहा, ‘बर ब्योली जस तुम लोग लागण छा।’ विपिन ने हंसते हुए कहा, ‘मुझसे ही कहोगे या अपनी बहू से भी।’ मैंने कहा, ‘रिश्तों की दुश्वारियां हैं।’ विपिन ने कहा, ‘कह डालो।’ फिर मैं बीना के पास गया और बोला, ‘नजर न लगे तुम दोनों को, बहुत जच रहे हो।’ बीना हंसते हुए बोली, ‘थैंक्यू चाचाजी।’ उसके बाद खाते-पीते, भैया-भाभी, दीदी-जीजाजी, भतीजे-भतीजी आदि से बात होती रही।
ऐसे मौकों के लिए एक शेर याद आ रहा है-
दर्द-ए-हिजरत के सताए हुए लोगों को कहीं, साया-ए-दर भी नज़र आए तो घर लगता है।
 पार्टी के इस मौके पर पता ही नहीं चला कि कब रात के 11 बज गये और याद आया कि अब कश्मीरी गेट (Kashmiri gate) बस अड्डे पहुंचकर चंडीगढ़ के लिए बस भी पकड़नी है। मन में उस समय एक फिल्मी गीत बार-बार याद आ रहा था और उसे गुनगुनाने का भी मन हो रहा था...

ऐ वक़्त रुक जा, थम जा, ठहर जा... वापस ज़रा दौड़ पीछे...

Sunday, February 2, 2020

कुफरी काॅल्स.... और चल पड़ी मित्रों की टोली (Kufri, the ideal vacation spot)

(Kufri Himachal Pradesh) यू ट्यूब पर दो भजन सुनने के बाद एक मित्र गुनगुनाने लगा, ‘ये दिल और उनकी निगाहों के साये।’ तभी दूसरा बोला, इस वक्त तो यही गाना बजना चाहिए, सफर भी तो अब पहाड़ का शुरू होने वाला है। तुरंत यूट्यूब पर सर्च कर गाना लगा दिया गया। पिंजौर आ चुका था और वाकई पहाड़ों का सफर शुरू हो चुका था। सफर था शिमला से थोड़ा आगे ढली का। यह विवरण है गत 26 जनवरी को चार मित्रों के एक छोटे से सफर का। सफर बर्फीली वादियों का। सफर शिमला का। सफर जाखू टैंपल का। नरेंद्र ने 10 जनवरी के आसपास प्रस्ताव रखा 27 को सोमवार है, अगर छुट्टी मिल जाती है तो चलते हैं शिमला। मैंने तुरंत हामी भर दी। दो दिन बाद मीनाक्षी मैडम से छुट्टी के बावत पूछा तो उसके लिए भी हां हो गयी। शुरुआत अच्छी थी तो चलने की तैयारी करनी थी। दो दिन बाद ही नरेंद्र का मैसेज आया कि टॉय ट्रेन में रिजर्वेशन करा लिया है, लेकिन वेटिंग है। मैंने कहा, वेटिंग लेने की जरूरत नहीं थी। खैर...एक-दो दिन यूं ही निकल गये। मैंने कहा टॉय ट्रेन से जाने का मतलब ज्यादा घूम नहीं पाएंगे। फिर ध्यान आया हमारे पेज डिजाइनर रवि भारद्वाज कई बार शिमला चलने की बात करते हैं। मैं उनसे पूछने गया तो उन्होंने हामी भर दी। अब हो गये तीन। तय हुआ कि कार से चलना है। एक साथी और चाहिए था। अच्छा लगता। हालांकि हम तैयारी कर चुके थे कि चार नहीं भी हुए तो तीन ही चलेंगे। खैर अचानक सलिल मौर्य ने हामी भरी तो बात बन गयी। एक व्यक्ति हमें ‘सलिल जी जैसा’ भी चाहिए था। 26 जनवरी को सुबह 8 बजे चलने का फैसला किया गया। कहां जाना है, कहां ठहरना है, कुछ नहीं मालूम। रवि साथ हैं तो फिर अंधेरा कहां रहना। पिंजौर पार करने के बाद पता चला कि हम लोग पहले ढली जाएंगे। ढली में रवि के जीजाजी योगराज शर्मा जी का घर है, रेस्तरां है। मैं थोड़ा सकुचाया कि घर में जाना ठीक रहेगा क्या। बेवजह दीदी-जीजा और बच्चों को डिस्टर्ब करेंगे। सभी बोले, चलते हैं, कुछ अटपटा लगेगा तो देख लेंगे। इस दौरान अलग-अलग पसंद के गीत चलते रहे। बीच में एक जगह किन्नू खरीदे। हम लोग करीब 12 बजे ढली पहुंच गये। वहां शर्मा जी पहले से इंतजार कर रहे थे। उन्होंने पहले रेस्तरां में ही चाय पिलाई फिर घर ले गये। उनके बच्चे इन दिनों कहीं गये थे। सिर्फ दीदी थीं और वे खुद। बेहद आलीशन घर। हम लोग कुछ मिनट वहां रुके फिर चल दिए कुफ्री को। ढली से निकलते ही चारों ओर बर्फीले नजारे ने मन मोह लिया। इस बीच नरेंद्र वीडियो बनाते रहे।
वो अंकल, वो सवाल-जवाब और सेब (Apple)
बर्फीले वादियों में हम लोग जगह-जगह रुके। एक जगह वीडियो बनाते-बनाते नरेंद्र एक सज्जन के घर चले गये। वह अपनी छत पर करीब 3 फुट जमी बर्फ को एक फावड़े से काट-काटकर निकाल रहे थे। नरेंद्र ने उनसे कुछ सवाल पूछे और वो सज्जन इन्हें अपने घर के अंदर ले गये। वहां उन्होंने इनको एक बड़ा से सेब दिया। नरेंद्र ने कहा, अंकल दो सेब दो क्योंकि हम चार लोग हैं और आधा-आधा खाएंगे। ‘धड़कते हैं दिल कितनी आजादियों से’ गीत की मानिंद उन्होंने तुरंत दो सेब दे दिए। शाम को ढली लौटे। दीदी ने लाजवाब व्यंजन बनाए थे। चार तरह की सब्जी (उनमें से एक हिमाचल स्पेशल), राजमा, चटनी, चावल और चपाती। खाना खाकर हम लोग उनके ऊपरी फ्लोर में आ गये। वहां बड़ा सा हीटर लगाकर कुछ हंसी मजाक चली। बात करते-करते सभी सो गये।
जाखू दर्शन, पूजा अर्चना और थोड़ी बेचैनी

अगले दिन सुबह करीब 8 बजे तक हम लोग स्नान ध्यान कर तैयार हो गये। दीदी ने आलू के पराठे बनाये। भरपेट पराठे खाकर पहले हम लोग जाखू मंदिर गये। वहां बंदरों की शरारतों और उनके मान जाने के नजारे देखे। भगवान हनुमान जी की गगनचुंबी प्रतिमा देखी। बाबा बालकनाथ के मंदिर गये। फिर पैदल ही रिज की तरफ लौट आये। इस रास्ते में जगह-जगह बोतलों, पन्नियों को देखकर
मन खट्टा हुआ। कई लोग अब भी ऐसे हैं जो पर्यावरण की चिंता नहीं कर रहे। रिज पर पहुंचे तो वहां रवि की बुआ के बेटे मिले। वह जिम ट्रेनर हैं। सरकारी जिम देखा। फिर शिमला प्रेस क्लब गये। वहां एक-एक चाय पी। और दोपहर होते-होते हमारा चंडीगढ़ का सफर शुरू हो गया। बेहद यादगार रहा वह ट्रिप और हमने नाम दिया ‘kufri calls’

Friday, December 6, 2019

फर्राटेदार सफर की यादगार बातें

रविवार की उस भोर में सूरज खिला-खिला था। सुबह करीब साढ़े आठ बजे चंडीगढ़-अंबाला हाईवे पर डॉक्टर चंद्र त्रिखा साहब की गाड़ी रुकी। पुराने एयरपोर्ट चौक के पास। स्वभाव से बेहद विनम्र त्रिखा साहब को पढ़ता बहुत पहले से रहा हूं, मुलाकात पिछले कुछ वर्षों से है। उनसे कई बार दवा (होम्योपैथ) भी ले चुका हूं। हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू भाषा के जानकार डॉ. त्रिखा फिलवक्त हरियाणा उर्दू अकादमी के उपाध्यक्ष हैं। उनसे कई बार हमारे अखबार में ‘अचानक’ कुछ लिखवाया गया। उनकी हस्तलिखित कॉपी को देखकर हैरान रहता था। एक तो कुछ ही मिनटों में उनका लेख आ जाता, दूसरे उसमें कहीं कोई कट नहीं होता। यानी धारा प्रवाह बोलने की कला की मानिंद उनमें लिखने का भी वैसा ही गुण। इन दिनों यूट्यूब पर समसामयिक और रोचक मुद्दों पर उनका एक चैनल भी चलता है, जहां बिना नागा रोज एक नया विषय फ्लैश करता है। खैर...
साहित्य सभा में अपनी बात रखते डाॅ त्रिखा
त्रिखा साहब (Dr. Chandra Trikha) के साथ बैठा। बैठते ही एक किताब की चर्चा कर डाली। उसकी समीक्षा जल्दी ही हमारे अखबार में छपेगी। थोड़ी दूर जाने पर हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक डॉ मुक्ता भी उसी गाड़ी में बैठीं। औपचारिक परिचय के बाद कुछ पलों की खामोशी रही, फिर बातों का सिलसिला शुरू हो गया। असल में हम लोग कैथल के लिए निकले थे। कैथल साहित्य सभा का सालाना कार्यक्रम था। डॉ. त्रिखा साहब दो पुरस्कारों को अपनी ओर से देते हैं। मैंने कुछ बातें कहीं। फिर त्रिखा साहब ने कुछ रोचक किस्से बताये। असल में एकदम ईमानदारी से कहूं तो मैं उन्हें सुनना ही चाह रहा था। एक तो उन्हें कई अखबारों में पढ़ता रहता हूं। दूसरे विभाजन के दर्द और उस समय की विभीषिका का उन्होंने देखा है। कई कार्यक्रमों में उनको सुन चुका हूं। उन्होंने अपने लाहौर यात्रा का जिक्र करते हुए एक बुजुर्ग महिला का जिक्र किया, जो एक होटल वाले से अक्स पूछतीं, उधर से कोई आया है क्या? उधर से उनका आशय भारत से होता था। पूरे किस्से का जिक्र करते हुए उन्होंने उस महिला की ‘गंगा तो हमारी संस्कृति’ है वाली बात को बताया तो हम लोग कुछ देर को चुप रहे। डॉ. मुक्ता ने कहा, ‘हिंदू-मुस्लिम तो सियासत कराती है, हम सब इंसान हैं।’ इसी दौरान मैंने उनकी किताब ‘सूफी लौट आए हैं’ का जिक्र किया। इसके अलावा उन्होंने उस कहानी को सुनाया जिसमें विभाजन के दौरान पाकिस्तान से एक परिवार भारत लौट आता है, लेकिन घर की बुजुर्ग महिला नहीं आती। उधर, वह मकान किसी को अलॉट हो जाता है। बुजुर्ग महिला उस परिवार को घर में घुसने नहीं देती और अंतत: धीरे-धीरे इंसानी जज्बातों और प्यार का ऐसा उमड़-घुमड़ होता है कि बुजुर्ग महिला सबकुछ उन्हें दे जाती है।
साहित्य सेवी उर्मि कृष्ण का सम्मान।

समय के साथ करें कदमताल
साहित्य सभा के कार्यक्रम में डॉ. त्रिखा साहब ने बेहद बेबाकी से कहा कि महज लिखने के लिए नहीं लिखें। उन्होंने कहा कि एक कार्यक्रम कर चंद लोगों के बीच फोटो खिंचाकर फिर तालियां बजाने से कुछ नहीं होता। उन्होंने कहा कि समय के साथ बदलें। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आयें। स्तरीय लिखें। वाकई कुछ बातें बेशक ‘चुभने’ वाली हो सकती हैं, लेकिन यह सत्य है कि समय के साथ नहीं बदले तो सब गड्डमड्ड हो जाएगा।
हास्य विनोद...मैं ऑटो से चला जाता हूं
कैथल से लौटते वक्त जीरकपुर के पास डॉक्टर मुक्ता ने कहा कि वह पटियाला चौक के पास उतर जाएंगी। यहां से ऑटो से चली जाएंगी। मैंने कहा अगर आपका रूट दूसरा हो तो मैं यहां उतर जाता हूं, आप पंचकूला के रास्ते चले जाइयेगा। यहां से मुझे सीधे ऑटो मिल जाएगा। डॉ त्रिखा हंसे.. बोले आप लोग गाड़ी में ही रहें, मैं ऑटो से चला जाता हूं। इस दौरान सभी लोग मुस्कुरा दिए।
उनका ड्राइवर को प्यार से समझाना
इस सफर में कई बार ऐसे मौके आए जब डॉक्टर साहब को ड्राइवर साहब को मनाना पड़ा। वह उन्हें प्यार से समझाते। एक बार वह फोन पर लंबी बात करने लगा तो डॉक्टर साहब ने ताकीद दी कि या तो रोकककर बात कर लो या फिर संक्षेप में बात करो। ऐसे ही एक-दो मौकों पर उसे समझाया, लेकिन विनम्रता से। वाकई ऐसे ही लोगों के बारे में कहा गया है, ‘फलों से लदा पेड़ झुका रहता है।’

डॉ मुक्ता का किताबों के प्रति स्नेह दिखाना
सफर के दौरान बातचीत के क्रम में डॉक्टर मुक्ता जी ने कई किताबों की बात की। अंत में उन्होंने समीक्षा के संबंध में भी अपनी रुचि दिखाई जिसे मैं अपने ऑफिस में दर्ज करा चुकुा हूं।
मीनाक्षी जी से अक्सर होती है चर्चा
डॉक्टर साहब की चर्चा अक्सर उनकी बेटी और ऑफिस में हमारी बॉस मीनाक्षी जी से होती रहती है। ट्रिब्यून में आने के बाद मीनाक्षी जी उन चंद लोगों में से हैं, जिन्होंने बहुत मदद की। ऑफिस के बाहर भी कई बार परिवार सहित मीनाक्षी जी और उनके पति सुनील जी से मिला तो बेहद अपनापन मिला। सुनील जी भी बहुत नेकदिल इंसान हैं।
और मेरा वह सम्मान...

कैथल में मुझे धीरज त्रिखा पत्रकारिता सम्मान से नवाजा गया। धीरज के बारे में बेहद मार्मिक कहानी है। इस बारे में फिर कभी जिक्र होगा। कार्यक्रम में कैथल के संवाददाता ललित शर्मा से मुलाकात हुई। साहित्य सभा में ढाई दशक से सक्रिय भूमिका निभाने वाले मदान साहब से मुलाकात हुई। भल्ला जी मिले। अनेक अन्य साहित्य अनुरागियों, पत्रकारों से मिला। हमारे समाचार संपादक हरेश जी के पिताजी दामोदर जी का अनेक लोगों ने जिक्र किया।
कार्यक्रम के बाद संस्कृत के अध्यापक एवे रेडियो पत्रकार दिनेश के साथ फल्गू तीर्थ भी जाने का मौका मिला। वह सफर मेरे लिए सचमुच यादगार है। इस याद और इस सम्मान से जुड़े सभी को साधुवाद।

Thursday, November 28, 2019

जूजू की शादी...

पापा की लाडली, पापा का प्यार।
मां ने छिपाए आंसू हजार।
विदाई बेला का वो मंजर अजब था
चेहरे पर मुस्कान, आंसुओं में अदब था।

23 नवंबर, 2019 की सुबह की बेला थी। हंसी-मजाक चल रही थी। साथ ही चल रहा था पूजा-पाठ का कार्यकम। एक दौर चाय का चल चुका था। जान-पहचान, परिचय-मुस्कुराहटों के औपचारिक क्रियाकलापों के बीच सब जान रहे थे कि एक कन्या अब ‘अपने घर’ के लिए विदा होने वाली है। बच्ची (हर संतान मां-बाप के लिए बच्चा या बच्ची ही होती है) के माता-पिता लोगों से बात कर रहे थे और भावुकता उनके चेहरे पर झलक रही थी। लग रहा था मानो कुछ भावनाओं को सप्रयास दबाया जा रहा है। यह पूरा वाकया है अपर्णा जिसे प्यार से घरवाले जूजू कहते हैं, की शादी का। कार्यक्रम तो पहले से चल रहे थे, लेकिन मुख्य समारोह 21 नवंबर से शुरू हुए। पिछले सात सालों से इस बच्ची को मैं भी अच्छे से जानता हूं। जहां मिलती है, पूरे अपनेपन के साथ पूछती है, ‘हैलो अंकल...हाउ आर यू?’ बच्ची के पिता हरेश वशिष्ठ। ऑफिस में मेरे बॉस और घर में लोकल गार्जन। जब से चंडीगढ़ आया, इत्तेफाक से इनके पड़ोस में ही किराये पर मकान मिल गया। मामला ऐसा जमा कि मैं उसी घर में अभी भी जमा हूं। बच्ची की मां यानी हरेश जी की पत्नी श्रीमती विनोद वशिष्ठ, आईटीबीपी से वीआरस लेकर बच्चों और घर परिवार को समर्पित महिला। मेरी पत्नी भावना और दोनों बच्चों को समय-समय पर जरूरी ताकीद देने वालीं।

वशिष्ठ परिवार से मिले अपनेपन का ही असर था कि मैं बिल्कुल परिवार की तरह पूछता, ‘जब भी काम हो बताइयेगा।‘ यह अलग बात है कि मुझे इसी दौरान एक और विवाह कार्यक्रम में गाजियाबाद जाना पड़ा। वहां भी एक बच्ची गीता की शादी थी। वह हमारे सामने बड़ी हुई। खैर...।
21 नवंबर को हरेश जी, दीपक जी के जरिये उनके परिवार के अन्य लोगों से मिला। इस बीच, दिल्ली से आईं उनकी बहन और बहनोई के साथ ही भांजे-भांजियों से मुलाकात हुई। कोटा से आए बड़े भाई साहब से मिला। उनके छोटे भाई जस्टिस चंद्रशेखर से भी मुलाकात हुई। कई बातें भी हुईं। दामाद शिव कुमार जी भी पढ़ने-लिखने वाले व्यक्ति हैं। उनके साथ भी कई घंटे की बातचीत हुई।
कुछ रस्मों को पूरा करने के दौरान जूजू से बात हुई। तभी खबर मिली कि उसने ज्यूडिशियरी के जिस एग्जाम को हाल के दिनों में दिया था, उसे क्लीयर कर लिया है। उसे बधाई दी। विवाह वाले दिन दामाद राहुल से मुलाकात हुई। जस्टिस राहुल। बेहद सरल और सहज। लगा ही नहीं कि हम पहली बार मिले हैं। इस बीच, उसी दिन अपने कई पुराने-नये जानकार मिले। पूरे प्रसंग में बेहतरीन फोटोग्राफर और पत्रकार आशा अर्पित का जिक्र जरूर करूंगा जो मुझे और मेरे परिवार को विवाह स्थल तक ले गयीं और वहां से लेकर आईं।
कनु की वह सक्रियता और बेहतरीन आइडिया
हमेशा पढ़ाई-लिखाई में तन्मयता से लगी रहने वाली जूजू की दीदी कनु यानी कनुप्रिया की सक्रियता मुझे बेहद भा गयी। बारातियों के स्वागत के समय तिलक लगाने की बात हो या फिर उन्हें बुके देने की। पगड़ी की याद दिलानी हो या फिर कोई और चीज, वह इधर से उधर भाग-भागकर चीजों की याद दिलाती। कभी-कभी मुझसे भी कहती, ‘अंकल आप यहीं रहना...।’ ऐसे मौकों पर ऐसी ही फुर्ती की जरूरत होती है।
कनु और जूजू से जब भी मिलता हूं, मुझे मेरी भतीजी याद आती है। इत्तेफाक से उसका नाम भी कनु है। सर्टिफिकेट वाला नाम भावना है। एबीपी न्यूज में सीनियर प्रोड्यूसर है। यह इत्तेफाक ही है कि हरेश जी के पिताजी और मेरे पिताजी का नाम भी समान है। दामोदर। माताजी के नाम का कभी जिक्र नहीं हुआ।
जूजू की विदाई बेला पर मैं और भावना थोड़ा भावुक हुए। घर आकर एक-एक चाय पी। अगले दिन भाभीजी मिलीं। उन्होंने कहा, ‘बार-बार कानों में गूंज रहा है मम्मी ब्लैक टी देना, मम्मी कॉफी बना दो। हरेश जी ने खुद को बड़ी मुश्किल से रोने से रोका है, वह तो पापा की बेहद लाडली है।’

गनीमत है कि आज संचार के इतने साधन हैं। यातायात के इतने साधन हैं। बेटी दूर जाती है, लेकिन नजदीक ही रहती है। फिर यहां तो बेटी हो बेटा, कौन टिकता है घर पर। किसी को करिअर ले जाता है और किसी को ससुराल जाना होता है। शादी का यह पूरा समारोह बेहद शानदार रहा। स्मृति पटल पर छप चुका है हर लम्हा। इस मौके पर रोना नहीं है, जूजू से बातें शेयर करते रहना है। राहुल-अपर्णा को बहुत-बहुत बधाइयां और आशीर्वाद।