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Saturday, June 6, 2020

धीरे-धीरे रे मना

केवल तिवारी
उनकी वाणी में तल्खी है। उनकी वाणी में सत्यता है। वह जीने की कला सिखाते हैं। वह जीवन का मतलब बताते हैं। आडंबरों के धुर विरोधी। निश्छल प्रेम के पक्के समर्थक। वह कबीर हैं। संत कबीर। कई सौ साल पहले ही कह गये कि मनुष्य को धैर्य बनाये रखना सीखना चाहिए। उनकी वह सीख वर्तमान दौर में एक बार फिर अनिवार्य बन गयी है, ‘धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय, माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय।’ समय पर ही सबकुछ होगा। महामारी के आज के दौर में मनुष्य व्याकुल है, लेकिन कबीर की शिक्षा की मानिंद हमें व्याकुलता छोड़ अपने कर्तव्य पथ पर बढ़ते रहना होगा।
असल में कबीर समाज में चैतन्यता लाने वाले थे। वह कहते हैं, अपने मन के भटकाव को रोको। यह मन तो न जाने क्या-क्या इच्छाएं करता है। इच्छाएं अनंत हैं। यदि मन की इच्छाएं ही पूर्ण हो जातीं, तो फिर मानव तो कर्म विहीन ही हो जाता। मेहनत के बल पर जो फल मिलता है, उसका स्वाद निराला होता है- ‘मन की मनोरथ छांड़ि दे, तेरा किया न होई। पानी में घिव निकसे, तो रूखा खाए न कोई।’ यही नहीं, कबीर संतोष बनाए रखने की सीख देते हैं। क्या होगा जो इसे, उसे समेटने में जुटे रहोगे। बस जरूरत भर के लिए मिल जाये और दूसरों के लिए भी कुछ कर पाएं, इससे बड़ा सुख और कहां। वह कहते हैं, ‘साईं इतना दीजिये, जा मे कुटुम समाय। मैं भी भूखा न रहूं, साधु ना भूखा जाय।’ सहृदय बने रहने की सीख देने वाले कबीर कहते हैं कि जिस व्यक्ति का हृदय औरों के दुख से दुखी होगा, जो भावुक होगा, निश्चित रूप से वही जीवन का असली रस ले सकने वाला होगा। अपने लिए तो पशु भी जीते हैं। अगर हम औरों के बारे में भी सोचने वाले बनेंगे तो इस कुदरत के सही ज्ञान को समझ पाएंगे। जिस प्रकार बारिश का आनंद या बारिश का प्रभाव एक हरे पेड़ पर ही पड़ सकता है, किसी ठूंठ या सूखे पेड़ पर नहीं, उसी प्रकार सहृदय व्यक्ति ही प्रेमभाव को समझ सकता है। जो निर्मम है, उसे तो निराशा या बुराई ही समझ में आएगी- ‘हरिया जांणे रूखड़ा, उस पाणी का नेह। सूका काठ न जानई, कबहूँ बरसा मेह।’
अहं को छोड़ना होगा
संत कबीरदास जी कहते हैं जीवन का असली सुख पाने के लिए ‘मैं’ यानी अहं को छोड़ना होगा। यूं तो यह शरीर कुछ नहीं, बस एक कच्चे घड़े की तरह है, बस जरा सी ठोकर लगी और टूट गया, लेकिन इसी तन-मन को अगर हम परोपकार में लगाएंगे तो राह कठिन दिखेगी, लेकिन आनंद असीम मिलेगा। उसके लिए सबसे पहले तो जरूरी है अपने अहं को मिटाना, ‘जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं।’ हरि को पाने यानी मन को प्रसन्नचित्त करने की राह थोड़ी कठिन लग सकती है, पर उस पर इसी कठिनाई के साथ ही चलना होगा, ‘लंबा मारग दूरि घर, बिकट पंथ बहु मार। कहौ संतों क्यूं पाइए, दुर्लभ हरि दीदार।’ अगर यह मार्ग दुर्गम लगे, यानी सिर्फ अपने तक सीमित रहना है या मन पर विजय पाने की इच्छाशक्ति न हो तो फिर तो यही हाल होगा, ‘यह तन काचा कुम्भ है, लिया फिरे था साथ। ढबका लागा फूटिगा, कछू न आया हाथ।’ अपने अलावा समाज, देश और आसपास के लिए आप जो करेंगे, असल में वही असली पूंजी है। आज महामारी के संकट में हर कोई परेशान है, इसी परेशानी के दौर में अनेक लोग औरों की सेवा में लगे हैं। अपने हिस्से की जिम्मेदारी सबको निभानी जरूरी है। समाज के लिए किया हुआ ही काम आएगा- ‘कबीर सो धन संचिए जो आगे कूं होइ। सीस चढ़ाए पोटली, ले जात न देख्या कोइ।’
मगहर में समाधि 
निर्गुण भक्ति शाखा के ज्ञानमार्गी संत कवि कबीरदास के जन्म को लेकर कई किंवदंतियां हैं। माना जाता है कि कबीर का जन्म काशी में लहरतारा ताल के पास हुआ था। जन्म वर्ष को लेकर भी अलग-अलग मत हैं। उन्होंने खुद ही अपने जन्म के बारे में लिखा है- ‘चौदह सौ पचपन साल गए, चन्द्रवार एक ठाठ ठए। जेठ सुदी बरसायत को पूरनमासी तिथि प्रगट भए।’ वह स्वामी रामानंद को गुरु मानते थे। उनके गुरु के मुख से निकले राम नाम को ही वह पहली दीक्षा मानते थे, ‘राम नाम के पटतरे देवै को कछु नाहिं, कह ले गुरु संतोषिए हौस रही मन माहिं।’ जन्म की भांति ही उनके निधन को लेकर भी अलग-अलग मत हैं। कहते हैं कि उनकी मृत्यु के बाद उनके हिंदू और मुस्लिम अनुयायी अपनी-अपनी विधि से अंतिम संस्कार कराना चाहते थे, लेकिन जहां उनका शव रखा था वहां कुछ फूल पड़े मिले जो दोनों ओर के अनुयायियों ने थोड़े-थोड़े रख लिए। मगहर में कबीर की समाधि है। नोट : यह लेख दैनिक ट्रिब्यून में छप चुका है। 

Wednesday, June 3, 2020

कोरोना काल और तेजश्वर का सराहनीय अभियान

कोरोना महामारी का दौर। लॉकडाउन के कई चरण। कुछ की चिंता घर में कैसे टाइम पास कैसे करें। कुछ पकवान बनाकर सोशल साइट्स पर डाल रहे हैं। कुछ चैटिंग में व्यस्त हैं। कोई बच्चों के स्कूल से मिले ऑनलाइन होमवर्क में मदद कर रहा है। इन सबसे एक वर्ग ऐसा है जिसके सामने घना अंधेरा है। रोज कुआं खोदते थे और रोज पानी पीते थे। अब क्या करें। निरंतर चल रहे हैं। भूखे प्यासे। मदद के लिए हाथ उठे भी तो स्थिति वैसी ही। अकेले दिल्ली-एनसीआर में ही हजारों लोग रोज सड़कों पर दिखते। ऐसे में एक सराहनीय अभियान सामने आया। तेजेश्वर का। तेजेश्वर सिंह दुग्गल। चंडीगढ़ के सेक्टर 38 स्थित विवेक हाईस्कूल का 12वीं का छात्र। महामारी के दौर में सबसे मुश्किल में पड़े वर्ग का दर्द तेजेश्वर को समझ आया। दिखा। महसूसा गया। दैनिक वेतन भोगी, प्रवासी श्रमिक और आर्थिक रूप से गरीब लोग कहां जायें। अचानक वे आय के किसी भी स्रोत के बिना हैं, और वे अपने परिवारों को भोजन या बुनियादी स्वच्छता सुविधाएं प्रदान करने में सक्षम नहीं हैं। उन्हें वायरस से ज्यादा भुखमरी का डर है। तेजेश्वर को लगा, इस मोड़ पर, हमें, समाज के अधिक विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग को इस कठिन समय में उनका समर्थन करने की आवश्यकता है। लॉकडाउन ने उन पर एक अतिरिक्त बोझ डाल दिया था। तेजेश्वर ने एक अभियान चलाकर करीब 60 हजार रुपये संस्था अक्षय पात्र को सौंपे। ताकि कुछ लोगों को खाना मुहैया कराया जा सके।
लॉकडाउन के दौरान जरूरतमंदों की सेवा के संबंध में कैसे आइडिया आया पूछने पर, तेजेश्वर ने कहा, 'मैंने फ्यूल अ ड्रीम डॉट कॉम पर फंडिंग अभियान शुरू किया। मैंने अपने परिजनों और उनके दोस्तों को अभियान में योगदान देने के लिए कहा। इसके साथ ही अपने मित्रों और उनके परिजनों से भी योगदान के लिए सोशल मीडिया पर अपील की और फोन कॉल किए। मैंने उन्हें समझाया कि अभियान का उद्देश्य एनसीआर और यूपी भर में पका हुआ भोजन उपलब्ध कराना है जो संस्था अक्षय पात्र के जरिये किया जा रहा है। मैंने अपनी पॉकेट मनी और दोस्तों से मिली करीब 60 हजार राशि का योगदान किया।' तेजेश्वर के मुताबिक अब तक जुटाई गई धनराशि उन 2400 लोगों के चेहरे पर मुस्कुराहट लाएगी, जिन्हें भोजन मिलेगा। दान देने वालों को भी इससे सुकून मिलेगा। बेशक सरकार अब लॉकडाउन के पांचवे चरण को अनलॉक-1 की संज्ञा देने लगी है, लेकिन दिक्कतें अभी भी कम नहीं हुई हैं। तेजेश्वर के बारे में पिछले दिनों ट्रिब्यून स्कूल की प्रिंसिपल वंदना सक्सेना से हुई। कई बातों की तरह उन्होंने इसे भी मुझसे साझा किया। मुझे लगा वाकई यह अभियान तो सराहनीय है। आखिर उन्होंने गरीबों की मदद के लिए कदम उठाया है। वंदना जी से चर्चा के बाद मैंने तेजेश्वर के संबंध में कुछ पंक्तियां और उनके अभियान को कई लोगों से साझा किया है। वाकई ऐसे बच्चों से हमें प्रेरणा लेनी चाहिए। वेलडन तेजेश्वर, अब धीरे-धीरे कॅरिअर की दहलीज पर बढ़ोगे, परोपकार की इस भावना को बनाये रखना। कहा भी तो गया है-'अष्टादस पुराणेसु व्यासस्य वचनं द्वयम। परोपकाराया पुण्याय, पापाय परपीडनम।' अर्थात 18 पुराणों में व्यासजी ने दो ही बातें कहीं हैं एक तो परोपकार के समान कोई पुण्य नहीं और दूसरों को कष्ट देने जैसा कोई पाप नहीं। 

Saturday, May 16, 2020

फिलहाल तो बचाव ही उपाय lockdown

लॉकडाउन-4 (lockdown-4) की भी भूमिका बन चुकी है। सवाल वहीं कि आगे क्या? वैसे इशारे इसी तरह के आ रहे हैं कि अब हमें कोरोना जैसी स्थितियों में जीने की आदत बना लेनी चाहिए। बेशक इस बीच एक खबर आई है कि भारत वैक्सीन बनाने में युद्धस्तर पर लगा है, लेकिन वैक्सीन या दवा के आने और उसके कारगर होने में अभी बहुत समय है। इस बीच, अन्य चीजों के अलावा किताबों की दुकानें भी खुन गयी हैं। अभी तक ऑनलाइन बिना किताबों के पढ़ाई कर रहे बच्चों के स्कूलों से भी किताबों की सूची आ गयी है। बाहर माहौल कभी डरावना सा लगता है तो कभी सामान्य सा। आज सेक्टर 27 गया, भावना की दवा लेने। वापसी में देखा कि 30 के पास बने सड़क किनारे मकानों के बाहर बल्लियां लगाकर इलाके को सील किया गया है और एक तरफ की सड़क पर दोनों ओर से आवाजाही चल रही है। बाहर कुछ नजारे वाकई डरावने से होते हैं। जैसे कि एक बाइक पर तीन लोग बैठे हैं और इन दिनों जैसे खाली सड़कें उनकी आवारागर्दी के लिए ही हैं। मुझे ऑफिस आते वक्त कई बार रोका गया, मैंने आराम से अपनी बात बताई, लेकिन इन आवारागर्दों के लिए पता नहीं कई बार पुलिस भी नहीं होती। खैर...
इस दौरान बच्चों से कई बातें होती हैं। कभी मजाकिया और कभी गंभीर। बड़े बेटे ने कहा, पापा इस वक्त निवेश का अच्छा समय है। मैंने कहा निवेश की बात वे करते हैं जिनके पास अतिरिक्त पैसा होता है। कोचिंग की फीस अभी भरी नहीं, निवेश कहां करें। वैसे उसकी राय से मैंने इत्तेफाक जताया। फिर बात हुई आगे के हालात की। दो दिन पहले ही वे लोग शिवखेड़ा का मोटीवेशनल भाषण सुन चुके थे। उन्होंने अपनी बातें बताईं थी, जैसे कि उन्होंने गाड़ियों की सफाई से लेकर क्या-क्या काम नहीं किये। आज वह सफलता का गुरु मंत्र देते हैं। वैसे उनकी किताब करीब डेढ़ दशक पहले मैंने पढ़ी थी जिसका शीर्षक था, ‘जीत आपकी।’ शिव खेड़ा के अलावा अनेक मोटिवेशनल भाषण बच्चे सुनते हैं। भाषण में अनेक ऐसे उदाहरण दिए जाते हैं जिनमें बताया जाता है कि कैसे शुरुआत में पढ़ाई में कमजोर व्यक्ति ने भी कैसे बुलंदियों को छुआ। मतलब बच्चों को यह बताया जाना चाहिए कि जब कमजोर व्यक्ति कोई मुकाम हासिल कर सकता है तो औसत दर्जे का या कुशाग्र बुद्धि वाला कोई व्यक्ति क्यों नहीं? खैर...

आज विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ से जुड़ी दो खबरें आईं। एक तो यह है कि हो सकता है कि कोरोना कभी खत्म ही न हो और दूसरा करोड़ों बच्चों की जान भी इस महामारी में जा सकती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने खसरा, पोलियो जैसी बीमारियों का हवाला दिया, जिनका टीका आने के बावजूद ये बीमारियां जड़ से खत्म नहीं हो पाई हैं। उधर, बच्चों के संबंध में कहा जा रहा है कि उन्हें संक्रमित होने से बचाया जाना बहुत जरूरी है। यह तो पहले से ही कहा जा रहा है कि बच्चों और बूढ़ों को संक्रमण का खतरा ज्यादा है। अब यह हम सबकी जिम्मेदारी बनती है कि हम कोरोना महामारी के इस दौर में खुद बचायें और दूसरों को भी बचाये रखने में सहयोग करें।

Friday, May 15, 2020

भयावह तकलीफदेह स्थिति : कौन लेगा इनकी सुध

केवल तिवारी
उनके दर्द को महसूस करने के लिए भावुक (emotional) दिल (heart) जरूरी है। यह कहना बहुत सहज है कि वे निकल ही क्यों पड़े हैं। पैरों में छाले, कंधे पर बोझ, कांख में गृहस्थी का कुछ सामान समेटे कोई यूं ही नहीं निकलता। भूखे प्यासे। रात को जब घर की ओर जा रहा होता हूं तो छोटे-छोटे बच्चों का हाथ थामे मां-बाप और उनके साथ चल रही एक भीड़ दिखती है। कितना चलेंगे। कभी खबर आती है कि एक मजदूर ने 800 किलोमीटर तक हाथ गाड़ी में अपनी पत्नी और बेटी को घसीटा। कितना सुकून मिला होगा जब वह अपनी देहरी पर पहुंच गया हो। 
भावुक तस्वीर : साभार : इंटरनेट
जीवित रहने के लिए कुछ कमाना ही है, यही सोच उन्हें घर से हजारों किलोमीटर दूर ले गयी और अब जीवित रहना है तो घर चलो की सोच उन्हें पैदल चलने को मजबूर कर रही है। इस तकलीफदेह की स्थिति के लिए कौन जिम्मेदार है। जिम्मेदारी तय करने से पहले यह तो हो कि इनकी सुध लेगा कौन? राज्य सरकारें दावा करती हैं कि उन्होंने अपने लोगों को वापस बुला लिया है। केंद्र सरकार का दावा है कि ट्रेनें चलवाई हैं। ऐसे में ये परेशान भीड़ कहां से निकल रही है। क्या वाकई इनसे हजारों रुपया किराया मांगा जा रहा है? सचमुच हृदय विदारक दृश्य हैं। इनको कोई तो भरोसा दिलाये कि आप जहां हो, वहीं रुको, आपको पहुंचाया जाएगा, जहां आप जाना चाहते हैं। रास्ते में खाना बांटने वाले कई शिविरों की बात की जाती है, लेकिन अनेक शिविर ऐसे हैं जो बस फोटो खिंचवाने तक रहते हैं फिर उनका तंबू उखड़ जाता है। कोरोना ने हर किसी को तकलीफ दी है। चिंताएं भविष्य को लेकर भी हैं। महज भोजन और निवास की ही नहीं, सामाजिक दायरे की भी। क्या मेलजोल का पुराना दायरा लौट पाएगा। क्या शादी-व्याह जैसे तमाम रीति-रिवाज पहले की तरह निभ पाएंगे। क्या मित्र-यारों से उसी बेतकल्लुफी से मिला जा सकेगा। क्या ट्रेनों का वैसा ही सफर होगा। पता नहीं क्या होगा, लेकिन अपनी देहरी पर जा रही इस भीड़ को संभालना जरूरी है। अगर सब जगह से ये कामगार चले ही जाएंगे, तो भविष्य की आर्थिक स्थिति कैसी होगी। उम्मीद तो करनी चाहिए कि सब अच्छा होगा, सब अच्छे के लिए कदम भी उठाने जरूरी हैं। तो चलिए इसी अच्छाई की उम्मीद में आगे बढ़ें। 

Friday, April 24, 2020

विश्वास जगाना होगा बड़ी चुनौती

कोरोना का खौफनाक संक्रमण काल चल रहा है। जो जहां है, वहीं रह गया है। ऐसे में लॉकडाउन खुलने का सभी को इंतजार है। इस इंतजार में ही छिपा है एक प्रश्न? प्रश्न है विश्वास का। आपसी प्रेम का। अभी कई लोग एक शहर से दूसरे शहर जाते हैं। कोई मित्र या रिश्तेदार के यहां रुकता है तो कोई कहीं और। कोरोना काल से पहले लोग भी स्वागत को तैयार रहते थे, अब वैसी ही स्थिति आने में न जाने कितना वक्त लगेगा। कई लोगों को चिंता यही है कि अभी तक आ रहा हूं... जैसे सवाल के जवाब में कहा जाता था, 'स्वागत है।' खाना, सोना बिल्कुल अपने घर जैसा ही। अब संकोच भले ही बना रहे, लेकिन स्वागत की वह गर्माहट फिलहाल तो नहीं दिखेगी। ऐसा ही एक और सवाल है मुलाकात के दौरान हाथ मिलाने का। फिलहाल लोग मिल भी रहे हैं तो नमस्ते, सतश्री अकाल या सलाम करते हैं। तो क्या आने वाले समय में मुलाकात के दौरान यही सब चलता रहेगा या हाथ मिलाने की परंपरा फिर कायम होगी। फिलहाल तो दुनिया के तमाम देशों के बड़े-बड़े नेताओं ने भी हाथ मिलाना छोड़ दिया है। कोरोना के बाद के दौर के लिए कई चुनौतियां हैं, देखना होगा कि उन पर कैसे पार पाया जाये। फिलहाल तो बड़ी चुनौती कोरोना से पार पाने की है। 

Friday, April 17, 2020

एक सवाल और जवाब में समाधान ... जब जिक्र हुआ अवलीन मैडम का

केवल तिवारी
पड़ावों की भव्यता पर मत रख नजर, बस तू चलता रह अपने सफर पर
एक कविता की यह पंक्ति कई मायने छिपाए हुए है। उसी तरह जैसे एक पुराना फिल्मी गीत है, ‘छोटी-छोटी बातों की हैं यादें बड़ीं, भूलें नहीं बीती हुई एक छोटी घड़ी...।’ वाकई कई वाकये ऐसे होते हैं जो हमारे मन मस्तिष्क पर छाये रहते हैं। जरूरी नहीं सबके साथ ऐसा होता हो, लेकिन मेरे मामले में तो ऐसा है। कभी किसी सुगंध के कारण हमें पुरानी बात याद आती है, कई बार तो किसी शब्द को बोलते वक्त भी किसी की याद आ जाती है। मसलन, जब भी में आम या नींबू का ‘होम मेड’ अचार खाता हूं तो मुझे मेरी सबसे बड़ी दीदी याद आती हैं। पूजा-पाठ करते वक्त मां की याद आती है। कुछ शब्दों को लिखता हूं या बोलता हूं तो कई मित्रों की याद आती है। शायद ऐसा ही होता होगा। या नहीं भी। खैर...। अभी इसके लिखने का मौजूं था। असल में बच्चों का स्कूल बंद है। online क्लास चल रही हैं। इसी दौरान कई टीचर्स से संपर्क बना रहता है। कभी व्हाट्सएप (whatsapp) के जरिये तो कभी सीधे फोन कर। जब बच्चे घर पर ही हों तो जाहिर है गुस्सा, प्यार-दुलार और पढ़ाई के संबंध में चर्चा भी उन्हीं की होगी। इसी चर्चा के
श्रीमती अवलीन कौर 
दौरान ट्रिब्यून मॉडल स्कूल में काउंसलर रहीं अवलीन कौर मैडम का जिक्र हुआ।
इन दिनों ऑफिस से पहले के मुकाबले जल्दी पहुंच जाता हूं। सोशल डिस्टेंसिंग का पूरा ध्यान घर पर भी रखना पड़ता है। संवाद होता है, पूरी दूरी के साथ। कई बार बहसें भी होती हैं। कभी किसी मुद्दे पर और कभी बिना मुद्दे के। बातोंबातों में एक दिन में थोड़ा झल्लाया फिर पत्नी ने याद दिलायी अवलीन मैडम की। बोलीं-पता है एक बार हम बच्चे के बारे में कुछ पूछने गये थे तो उन्होंने क्या कहा था। फिर याद दिलाया गया कि उन्होंने कहा था, ‘पहले आप दोनों अपने लिए क्लैप करो।’ असल में बड़ा बेटा 10वीं पास कर स्कूल से निकला तो हम लोग छोटे बेटे के लिए पीटीएम PTM में जाते थे। एक छोटी सी समस्या छोटे को लेकर ही थी, हम उसी का जिक्र कर रहे थे। अवलीन मैडम ने पहले ताली बजवाई तो मैंने कारण पूछा। उन्होंने कहा, ‘आपके बेटे कार्तिक ने आपकी बड़ी तारीफ की।’ असल में स्कूल में कुछ टॉपर्स को बुलाया गया और 10वीं के नये बच्चों को टिप्स देने को कहा गया। इसी क्रम में मेरे बेटे ने मेरी तारीफ कर दी। उससे पहले भी अवलीन मैडम से बात होती थी तो वह कहती थीं कि आप दोनों पति-पत्नी हमेशा पीटीएम में आते हैं, यह अच्छा लगता है और बोलते भी संयमित होकर। एक के बाद एक हैं। मुझे याद आया अपने जीवन का वह दौर जब मैं लखनऊ में ट्यूशन पढ़ाया करता था। बच्चों के माता-पिता पढ़ाई से ज्यादा जिक्र उसकी आदतों को लेकर करते थे। कोई कहता, ‘यह सब्जी नहीं खाता।’ किसी की समस्या होती, ‘दूध पीने में आनाकानी करता है।’ कई बार तो बच्चों के माता-पिता मुझसे बात करते-करते लड़ने भी लगते। उन दिनों में भी तो ‘बच्चा’ ही था। लखनऊ क्रिश्चियन कॉलेज में बीए का छात्र। खैर उसके बाद धीरे-धीरे कई दौर आये। अब कहीं भी जाते हैं या घर पर भी अगर बहस होती है तो कम से कम मैं और मेरी पत्नी एक-दूसरे की बात काटते हुए नहीं लड़ते। बहुत आदर्श नहीं हैं हम लोग। लड़ते हैं। बोलचाल भी बंद होती है, लेकिन बच्चों पर इसका असर कम से कम पड़े, इसका खयाल रहता है। ऐसे ही स्कूल में जाते हैं तो कोशिश होती है कि दोनों साथ नहीं बोलें। खैर यह जीवन का सफर है। अवलीन मैडम की एक और बात याद आयी। जब समस्या उनको बतायी गयी तो उन्होंने तीन वाक्यों में हल निकाल दिया। उन्होंने हमारे सवाल पर एक सवाल पूछा और फिर कहा, ‘आपके जवाब में ही समस्या का समाधान है।’ जीवन की इन छोटी-छोटी बातों को याद करने से ही जीवन बढ़ता है। एक शायर ने कहा है-
 आए ठहरे और रवाना हो गए, ज़िंदगी क्या है, सफ़र की बात है।
एक और शेर पेश करता हूं, मेरा नहीं है-
बस यही दो मसले जिंदगी भर ना हल हुए, ना नींद पूरी हुई ना ख्वाब मुकम्मल हुए...।

संभवत: ऐसा ही होता है। सबकुछ पूरा नहीं होता। अवलीन कौर मैडम का धन्यवाद। बेशक वह अभी ट्रिब्यून स्कूल में नहीं हैं, लेकिन उनसे संवाद बना रहेगा, ऐसी कामना है। उन्होंने भी एक छोटे से वाक्य के लिए मुझे शुक्रिया कहा।

Friday, April 10, 2020

कोरोना संकट, रुटीन लाइफ, रामायण और इफेक्ट-विफेक्ट

केवल तिवारी
कोरोना वायरस के खौफ के बीच देश में चल रहे लॉकडाउन से चारों ओर सन्नाटा पसरा है। सन्नाटा पसरने से पहले ही हमारे समाज के ‘सयाने’ लोगों ने अफरातफरी सी मचा दी थी। जरूरत से पांच गुना सामान खरीद लिया। ऐसा कहा गया कि अब सब खत्म, अपन ध्यान रखो बस... बाकी कुछ नहीं। इसी माहौल में अनेक लोग ऐसे भी थे जिन्होंने मदद के लिए हाथ बढ़ाये। मेरी रुटीन लाइफ में बेशक ज्यादा फर्क नहीं पड़ा है, लेकिन अपने मोहल्ले में और आसपास का वातावरण देखकर लगता है वाकई कुछ लोगों को बहुत फर्क पड़ा है। कुछ लोग एक-दो दिन बाद ही हायतौबा करने लगे, लेकिन इसी दौरान देखा कि खाने-पीने के मामले में जैसी बातें फैलाई जा रही थीं, वैसा कुछ नहीं। मसलन, एक दिन बाद ही दुकानें खुल गयीं। दूध वाला कॉलोनी में ही आने लगा। सब्जी वाले भी आने लगे। इससे पहले भी अनेक मौके ऐसे आये जब यह अहसास हुआ कि कुछ अफवाह तंत्र और कुछ जमाखोरी का एक कीड़ा हमारी व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करता रहा है। 
फोटो : साभार इंटरनेट
खैर... इन्हीं दिनों नवरात्र भी चल रही थीं। सुबह ठीकठाक वक्त पूजा-पाठ में लगता है। इसके साथ रामानंद सागर द्वारा निर्मित टीवी धारावाहिक रामायण भी फिर से प्रसारित हो गया है। सुबह एक घंटा कब निकल गया पता ही नहीं चलता। मैंने शुरुआत में कोशिश की कि बच्चों को अपने साथ बिठाकर दिखाऊं। बच्चों ने हल्की रुचि दिखाई। एक बेटे की तो ऑन लाइन पढ़ाई तेजी से चालू है, इसलिए वह इसे नहीं ही देखता है, लेकिन छोटा वाला देखता है। देखते वक्त उसके तमाम बालसुलभ सवालों की बौछार भी होती है। सवालों के दौरान ही वह अचानक कह उठता है पापा इतने अजीब से इफेक्ट। मैं उसे समझाने की कोशिश करता कि भाव समझो। लेकिन कार्टून फिल्म, टीवी रियलिटी शो देखने वाले बच्चे के समझ में भाव ज्यादा नहीं समझ आये। उसने कुछ तकनीकी कमियां निकाल ही दीं। कुछ दिन बाद मैंने देखा कि वाकई उसे रामायण में दिलचस्पी आने लगी है। कई बार तो उसे आगे की कहानी जानने की लालसा रहती। रामायण की संक्षिप्त कहानी को तो सब जानते हैं, लेकिन धारावाहिक में विस्तार से दिखाया गया है। इसी दौरान राम के वनवास और निषाद राज द्वारा उन्हें छोड़ने का प्रसंग आया। इसी प्रसंग में भारद्वाज ऋषि के आश्रम में निषाद राज नीचे बैठ जाते हैं। मुनि भारद्वाज समझाते हैं कि कोई ऊंची-नीच नहीं होता। राम के मित्र होने के नाते तो आप उनके बराबरी में बैठने के हकदार हो। इसी दौरान बड़ा बेटा बोल बैठा, ‘पापा ये होती है अच्छी बात। एक सीरियल आजकल जो आ रहा है भीमराव। उसमें भीमराव और उनके परिवार के साथ ऊंची जाति के लोग कितना अत्याचार करते हैं।’ फिर पत्नी ने समझाया पहले ऐसा कोई भेदभाव नहीं था, बाद में जब धर्म के ठेकेदार बनने लगे तो ऐसा होने लगा। खैर अब लगातार रामायण देखी जा रही है। घरवाले दोनों समय देखते हैं। चूंकि शाम के वक्त मैं ऑफिस में होता हूं, इसलिए शाम के समय देख नहीं पाता। इस दौरान मुझे वे दिन भी याद आए जब लखनऊ में रामलीला में राम की भूमिका निभाता था। बीच-बीच में चौपाई आदि गाने लगता हूं तो बच्चे नाराज होते हैं। कहते हैं सीरियल खत्म होने दो, उसके बाद गा लेना। खैर जारी है जिंदगी...।

पलायन का वह खौफनाक मंजर
रोज शाम को ऑफिस में खबरों में ही खेलना होता है। खबरों में भी कोरोना के अलावा कुछ है नहीं। कुछ दिन अखबार नहीं आया तो बेचैनी हुई, लेकिन पहली अप्रैल से रुटीन में अखबार आने लगे। इस दौरान कोरोना के खौफ से पलायन संबंधी खबरें आईं। बेहद दुखद। दिल चीरने वाली। कुछ चैनल चलाते कि कोरोना पर भूख भारी। कई चैनल इसी तरह खबर चलाते कि ये सब भूखे-नंगे हैं। दुख हुआ। असल में इन्हें सही से समझाया नहीं गया। वे सिर्फ भूख के कारण नहीं, बल्कि इसलिए भी भाग रहे थे कि मानो कयामत आ गयी। कयामत आ गयी तो घरवालों के संग ही प्राण क्यों न निकले। इस दौरान दिल्ली सरकार के बारे में भी खबरें आईं कि उसका रुख बेहद अगंभीर रहा। खैर ये सब तो जांच का विषय है। फिलहाल इस परेशानी से सब ही जूझ रहे हैं।

पशुओं की स्थिति
इन दिनों पशु बेचैन हैं। आखिर ये दो पैरों वाला पशु चला कहां गया है। अक्सर रात के समय भौंकने वाले कुत्ते दिन में भी भौंकने लगते हैं। चंडीगढ़ की सड़कों पर सांभर, तेंदुए की कई वीडियो वायरल हुई हैं। चंडीगढ़ में हरा-भरा क्षेत्र काफी है। इन दिनों दोपहर तीन बजे मैं जब घर से निकलता हूं तो कई बार कुत्तों, गायों की बदली हुई सी हरकतों को देखता हूं। इक्का-दुक्का चल रही गाड़ियों के बीच वे भौंचक्के से दिखते हैं। हमेशा वाहनों की चिल्ल-पौं मची रहने के दौरान अचानक यह क्या हो गया।

क्या भगवान ने दिखावा न करने का दिया है संदेश
ब्लॉग लिखते-लिखते कई दिन बीत चुके हैं। आज 10 अप्रैल को इसे पूरा कर पा रहा हूं। दो दिन पहले कई लोगों से बात हो रही थी। एक-दो मित्रों ने कहा कि क्या भगवान दिखावे से नाराज हो गए हैं। उन्होंने कहा कि आज इबादत की किसी भी जगह चले जाओ, चाहे मंदिर हो या मस्जिद, चर्च हो या फिर गुरुद्वारा। हर जगह भयानक भीड़। कई जगह जबरन दान की मांग। अनेक जगह दिखावा। कतार में धक्का-मुक्की। क्या ऊपरवाले ने एक सबक दिया है सबको कि भक्ति में दिखावा न हो। मन चंगा तो कठौती में गंगा। घर पर भी इबादत हो सकती है। सही इबादत तो दीन-दुखियों की सेवा है। क्या जाने क्या है। पर इस वक्त सब ऊपर वाले के भरोसे पर हैं।
बीच-बीच में डराता मौसम
अप्रैल आने पर भी ऑफिस में कई लोगों को जैकेट या हाफ स्वेटर पहने देखता हूं तो यकीन नहीं होता कि अप्रैल का आधा माह निकलने को है। प्रदूषण में आई कमी इसका कारण है या कुदरत की कुछ और इच्छा कि बीच-बीच में पश्चिमी विक्षोभ यानी वेस्टर्न डिस्टर्बेंस सक्रिय हो जाता है और बारिश या तेज हवा मौसम के गर्म होते मिजाज को फिर ठंडा कर देता है। कुछ भी हो कुदरत के सामने सारी कायनात बौनी है।
ट्रिब्यून स्कूल की प्रिंसिपल के लेख पर प्रतिक्रिया
Vandana Saxena
Principal Tribune School
इसी दौरान ट्रिब्यून स्कूल की प्रिंसिपल वंदना सक्सेना जी से व्हाट्सएप के जरिये बात हुई। असल में उन्होंने पहली अप्रैल से ही सभी कक्षाओं के लिए व्हाट्सएप ग्रूप बनवा दिये और सभी टीचर्स बच्चों को हल्का-फुल्का काम देने लगे और उनका बच्चों से सीधा संवाद होने लगा। बच्चे इसे एंजॉय भी कर रहे हैं। इसी दौरान उन्होंने एक लेख लिखा और जीवन को नये नजरिए से देखने संबंधी बात उसमें कही। मैंने वह लेख पढ़ा और उनके अंग्रेजी लेख की प्रतिक्रिया हिंदी में दी। वर्ष 1996 से हिंदी आंदोलन से जो जुड़ा ठहरा। नीचे है मेरी प्रतिक्रिया-

नमस्कार मैडम। महज यह नहीं कहूंगा कि लेख बहुत अच्छा है। असल में आपने रिश्तों को फिर से परिभाषित करने की बात से लेकर डार्विन के सिद्धांत योग्यतम की उत्तरजीविता तक का जिक्र करते हुए अनिश्चितता भरे माहौल में उम्मीद की किरण जगाई है। बेशक मेरी रुटीन लाइफ में ज्यादा फर्क नहीं आया, लेकिन घर, परिवार, जानकार लोगों के अनुभव अद्भुत हैं। अनेक लोगों की बुरी लतें छूट गई हैं। भविष्य का पूर्वानुमान इन दिनों कल्पना से परे है, लेकिन आभासी दुनिया में पूरी तरह खो चुके इंसान के लिए यह आत्ममंथन का वक्त है। वशीर बद्र साहब ने बहुत पहले लिख दिया था- कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से, ये हादसों का शहर है जरा फासले से मिला करो। उनसे भी पहले कवि प्रदीप ऐसे गीत लिख गए थे। योग्यतम की उत्तरजीविता के सिद्धांत के साथ ही हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि परिवर्तन ही सृष्टि का नियम है। परिवर्तन हो रहा है और होगा। यह दौर भी निकल जाएगा। बुराई में भी कुछ अच्छाई छिपी होती है। आज प्रदूषण कम हो गया है, रिश्तों में दूरी के बावजूद नयी गर्माहट आई है। सोशल मीडिया के संदेशों में फर्क आ गया है, जो विदेश न जाने के कारण कुंठित रहते थे वे अब ऐसा नहीं सोचते। आपका लेख बहुत बेहतरीन है जो खूबसूरत नयी सुबह की उम्मीद जगाती है। वाकई जीवन प्रवाह में यह रुकावट आत्ममंथन के लिए वक्त मिलने जैसा है और ऐसे लेख उस दिशा में एक कदम के साथ ही मानवता के यज्ञ में एक आहूति सरीखा है। आपको साधुवाद। - केवल तिवारी, चंडीगढ़

Thursday, March 5, 2020

होली के पापड़ और त्योहार की रस्म अदायगी

पापड़ बनाती भावना।
मार्च (march) महीने का पहला सप्ताह चल रहा है। 4 दिन बाद होली (holi) है। होली। कैसी रहेगी, यही सवाल सबके जेहन में है। कोरोना (corona) का खौफ। लगातार होती बारिश और रस्म अदायगी तक सिमटते त्योहार। तीन दिन पहले भावना ने कहा कि आज थोड़ी धूप है, क्या पापड़ बना लें। आशंका थी कि कहीं मौसम फिर न बिगड़ जाए। मैंने कहा हां शगुन तो कर ही लो। असल में अब सब शगुन करने जैसा यानी रस्म अदायगी जैसा ही रह गया है। मुझे त्योहार के मौके पर लखनऊ बहुत याद आता है। वहां कितना कुछ होता है। महीने पहले से तैयारी। हालांकि अब वहां भी उतना उत्साह नहीं रहा। दो दिन पहले शीला दीदी से बात हुई, उसने याद किया कि जब सौरभ छोटा था तो भी वह तिमजिले मकान की छत पर जाकर घंटों पापड़, चिप्स और कचरी बनाती, कई बार नीचे आने तक सौरभ चोटिल दिखता। अब तो आने जाने वाले भी कम ही होते हैं। खैर त्योहार तो त्योहार (festival)  हैं। समय बदलता रहता है, यादें पुरानी हैं, नयी बन रही हैं। चार साल पहले होली पर लखनऊ (Lucknow) गया था। बहुत अच्छी यादें हैं। सबके स्वस्थ रहने की कामना करता हूं।

Wednesday, March 4, 2020

हरेश जी की सेवानिवृत्ति ... वही उमंग आज भी है

केवल तिवारी
दिनांक 31 जनवरी 2020, समय : दोपहर 2:30 बजे। स्थान : चंडीगढ़ प्रेस क्लब। दैनिक ट्रिब्यून (Tribune) के संपादक राजकुमार सिंह जी ने कहा, ‘आप बेहतरीन व्यक्ति हैं इसका एक बड़ा कारण आपके साथियों का भी बेहतरीन होना है।’ उन्होंने अपनी बात जारी रखते हुए वहां बैठे न्यूजरूम के सभी साथियों से कहा, ‘यकीन मानिए हरेश जी ने कभी व्यक्तिगत रूप से किसी की मुखालफत नहीं की। कोई गलती विशेष पर भी नहीं।’ फिर उन्होंने अन्य बातें भी कीं। उनसे पहले दैनिक ट्ब्यिून के संपादकीय विभाग के अनेक व्यक्ति अपनी-अपनी बातें रख चुके थे। मौका था समाचार संपादक हरेश वाशिष्ठ जी की सेवानिवृत्ति का।
प्रेस क्लब में ग्रुप फोटो।
मुझे दैनिक ट्ब्यिून में आए सात साल हो चुके हैं। बेहतरीन संयोग था कि वरिष्ठ साथी अरुण नैथानी जी के सौजन्य से घर भी हरेश जी के एकदम करीब मिल गया। संकोची स्वभाव का होने के कारण उनके साथ घनष्ठिता कुछ दिनों बाद बनी। यह भी सच है कि कई लोगों से अब तक नहीं बन पाई। हरेश जी के साथ काम करने के दौरान के अनेक लोगों ने किस्से सुनाए, लेकिन मेरे साथ किस्से कुछ ऐसे हैं कि मैंने उनसे सीखा बहुत कुछ। एक बड़ी बात तो उन्होंने सेवानिवृत्ति के दौरान ही अपने संबोधन में कही कि करीब 36 साल पहले जब उन्होंने ट्ब्यिून ज्वाइन करना था तो उससे एक रात पहले वह कैथल स्थित अपने घर की छत पर रात को टहल रहे थे और एक अलग तरह की उमंग थी। साथ ही इस 31 जनवरी से पहले भी वह चंडीगढ़ स्थिति अपने घर की छत पर टहल रहे थे तो उन्हें लेशमात्र भी दुख नहीं हो रहा था कि अब वह सेवानिवृत्त हो रहे हैं। यहां प्रसंगवश एक बात मुझे याद आ रही है कि ठीक एक साल पहले लखनऊ में मेरे भाई साहब भी सेवानिवृत्त हुए थे। वह भावुक थे। साथ ही खुश थे कि बेदाग निकल गए। क्योंकि जिस विभाग में वह थे वहां दाग लगना कोई आश्चर्य की बात नहीं थी। इस 31 जनवरी को भी लखनऊ में भाई साहब की सेवानिवृत्ति का सारा मंजर मेरे आंखों में चलचित्र की तरह चल रहा था। यहां कुछ ने अपने अनुभव बताए, कुछ ने कुछ भी नहीं कहा और कुछ ने कुछ-कुछ कह दिया। कहने-सुनने के इस मौके पर गीत-संगीत और शेर-ओ-शायरी का दौर भी चला।
मेरे कुछ यादगार पल
साल 2013 में चंडीगढ़ आए मुझे करीब 3 महीने हुए थे। एक दिन मै सुबह 11 बजे अपने घर (किराये पर जहां रहता हूं) पर ताला लगा रहा था। उन दिनों मेरे बच्चे गाजियाबाद में ही थे। मेरे साथ रह रहे नित्येंद्र कानपुर गए हुए थे। हरेश जी मेरे गेट के ठीक सामने बने सोसाइटी ऑफिस में एक मीटिंग में थे। उन्होंने मुझे निकलता देखा तो आवाज लगाकर रोका। फिर पूछा कहां ऑफिस चल दिए। मैंने कहा जी उससे पहले सेक्टर 31 जाकर एक मोबाइल सिम लेना है उसके बाद ऑफिस जाउंगा। हरेश जी ने कहा, थोड़ा रुकें आज लंच साथ करते हैं। मैं कुछ नहीं बोल पाया। न हां और न ही ना। मैं वापस लौटा, ताला खोला और कुछ मैले कपड़े निकालकर उन्हें धोने में जुट गया। करीब एक घंटे बाद हरेश जी आए और बुलाकर अपने घर ले गए। वहां भाभी जी और बच्चों कनु एवं जूजू से पहली औपचारिक मुलाकात हुई। बेहद आत्मीय लोग लगे। कनु मेरी भतीजी का नाम भी है जो इन दिनों एबीपी न्यूज में सीनियर प्रोड्यूसर है। इसके बाद अक्सर बातचीत होने लगी। इसके तीन-चार माह बाद स्कूल में छुट्टियों के दौरान बच्चों को मैं एक हफ्ते के लिए यहां ले आया। रूम मेट नित्येंद्र ने दूसरा घर किराये पर ले लिया था। एक हफ्ते बाद बच्चों को छोड़ने जाना था। मैंने हरेश जी से छुट्टी मांगी साथ ही पूछा कि क्या कोई ऑटो या टैक्सी वाला जानकार है, रात 11 बजे की ट्रेन है। हरेश जी ने कहा घर से कितने बजे निकलेंगे। मैंने कहा 10 बजे; वह बोले-हो जाएगा इंतजाम। मैं निश्चिंत। जिस दिन जाना था, मैने हरेश जी से एक घंटा पहले यानी 9 बजे ऑफिस से जाने की इजाजत मांगी। उन्होंने आज्ञा दे दी। लेकिन वह स्टेशन तक जाने की व्यवस्था के बारे में कुछ नहीं बोले। मैं घर आया और बच्चों से कहा कि जल्दी तैयार होकर चलो। हरेश जी पहले तो कह रहे थे कि व्यवस्था हो जाएगी, लेकिन आज एक शब्द नहीं बोले। तैयार होने में 10 बज गए। जैसे ही हम लोग निकलने को हुए, हरेश जी का फोन आया, पूछा, तैयार हो गए। मैंने कहा जी सर बस बाहर को ही निकल रहे हैं। वे बोले आ जाइये मैं कार लेकर बाहर खड़ा हूं। मैं अवाक रह गया। कितनी जल्दी धारणा बनाने लगता हूं किसी के बारे में। उसके बाद बहुत संयम से सोचने-विचारने लगा हूं। यही नहीं न्यूज रूम में अलग-अलग नेचर के लोगों को हैंडल करते हरेश जी से बहुत कुछ सीखा। इसके बाद तो कई मौके आए जब हरेश जी से अपनापन मिला।
भाभी का बच्चों को गाइडेंस और कनू-जूजू के साथ मेरी हिंदी-विंदी
चूंकि घर अगल-बगल था। अक्सर मिलना हो जाता। इस दौरान भाभी जी बच्चों को गाइड करती। बड़े बेटे से उन्होंने प्रतिदिन कम से कम आधा घंटा साइकिल चलाने को कहा और छोटे से कुछ खान-पान सुधारने को। उन्होंने आईटीबीपी के अपने किस्से भी कई बार सुनाए। मैंने सलाह भी दी कि वह अपने अनुभवों को एक किताब के रूप में लिखें। इस बीच कनु और जूजू तमाम परीक्षाओं के दौर से गुजरीं। हरेश जी और भाभी जी ने उन्हें थोड़ी हिंदी की प्रैक्टिस कराने की जिम्मेदारी मुझे दी। उनको तैयारी कराने के दौरान कई नयी चीजें मुझे भी सीखने को मिलीं। इस दौरान दोनों बच्चे मेरी सेहत के बारे में पूछते, जरूरी सलाह देते और सबसे बेहतरीन नित अलग-अलग तरह की चाय पिलाते। बच्चों की मेहनत है कि आज जूजू के नाम से ऊ की मात्रा हटा दी गयी है। यानी वह जज बन गयी है। कनु डॉक्टर साहिबा हो गयी हैं। ईश्वर उन्हें खूब तरक्की दे। बातोंबातों में पता चला कि हरेश जी के पिताजी का नाम दामोदर था। इत्तेफाक है कि मेरे पिताजी का नाम भी यही था।

आज हरेश जी बेशक ऑफिस के काम से निवृत्त हो गए हैं, लेकिन अभी काफी काम बचा है। संपादक राजकुमार सिंह जी के ही कथन से बात को पूरा करता हूं कि सेवा से निवृत्त हुए हैं, संबंधों से नहीं। अभी कई अनुभव और मिलेंगे और ब्लॉग लेखन का यह सिलसिला यूं ही जारी रहेगा।
ऑफिस से विदा हुए तो क्या, हम सबको तो साथ ही आप पाओगे
है शुभकामना हमारी, जीवन में हर कदम आप खुशियां ही पाओगे।
विदाई के तुरंत बाद की खुशी। अखबार में छपी खबर के जरिए-


बारिश पर हावी रिटायरमेंट का जश्न

केवल तिवारी
29 फरवरी की वह शाम थी। यादगार शाम। और ज्यादा यादगार होती, लेकिन बारिश का खलल पड़ गया। बारिश भी ऐसी कि थमने का नाम न ले। कुछ देर रुके, फिर शुरू हो जाये। बारिश के बावजूद उत्साह में कमी नहीं थी। वसुंधरा के सेक्टर 4 बी स्थित शिवगंगा अपार्टमेंट के गेट पर कुछ महिलाएं खड़ी थीं, पुरुषों की चहलकदमी जारी थी, बच्चों का उत्साह नये रंग में था। इन सबके बीच ढोल बजे रहे थे। पैर थिरकने को बेताब थे। तभी पता चला कि शर्मा जी पहुंचने वाले हैं। शर्मा जी यानी हरीशचंद्र शर्मा। जीना नंबर 10 के ‘लोकल गार्जन।’ 
शर्मा जी और भाभी जी का स्वागत करते लोग।
भाभी जी और बेटा नितिन गए थे शर्मा जी को लिवाने। असल में एलआईसी में शानदार नौकरी करने के बाद शनिवार, 29 फरवरी 2020 को शर्मा जी रिटायर हो गये। वाकई यह दौर एक नये तरह का होता है। आप नौकरी संबंधी रुटीन काम से निवृत्त होते हैं और सामाजिक दायित्वों में जुट जाते हैं। यह अच्छी बात है कि शर्मा जी ने दोनों बेटियों रुचि और सोनाली का विवाह कर दिया है, बेटे नितिन की शादी की तैयारी कर रहे हैं। दोनों बेटियां अपने-अपने परिवार में खुश हैं। उस दिन दोनों बच्चियों से मुलाकात हुई। धीरज जी ने दामादजी से परिचय कराया, बहुत अच्छा लगा। बेटे नितिन का उत्साह भी देखते ही बनता था। मुझे याद आया ठीक एक साल पहले लखनऊ में अपने भाई साहब के रिटायरमेंट का। वह तारीख 31 दिसंबर की थी। खैर उस शाम शर्मा जी जब गेट पर पहुंचे तो हम सभी ने उनका वार्म वेलकम किया। बारिश को लेकर कुछ बातें हुईं। शर्मा जी ने मजाक किया, ‘तिवारी जी चंडीगढ़ से बारिश साथ लेकर आए हैं।’ वाकई पहली रात चंडीगढ़ में खूब बारिश हुई थी। मैं रात को ही चलने वाला था, लेकिन भारी बारिश को देखते हुए मैंने कार्यक्रम टाल दिया। मैं अगले दिन यानी 29 फरवरी की ही सुबह 8 बजे चंडीगढ़ से चला। शाम 5 बजे के करीब शर्मा जी के घर पहुंच गया।
कृष्णाजी की भागदौड़ और सलाह मशिवरा
इस पूरे प्रकरण में कृष्णा जी की भागदौड़ देखने लायक और सीखने लायक थी। वह पैंट को समेटे, चप्पल में इधर से उधर भाग रहे थे। कभी खाने की टेबल गली में शिफ्ट कराने में तो कभी डीजे के साउंड बॉक्स को धीरज जी की बालकनी में रखने में। बीच-बीच में वह हम लोगों से भी सलाह-मशविरा कर लेते। इसी दौरान शर्मा जी के आने की सूचना मिली। फोटोग्राफर का इंतजार किया जाने लगा। 10 मिनट इंतजार के बाद कृष्णा जी ने कहा कि अब इंतजार नहीं चलिये। उनका यह फैसला सही रहा, क्योंकि थोड़ी देर में ही फिर भारी बारिश हो गयी।
बच्चा पार्टी का दिया खूबसूरत गिफ्ट।
बच्चों ने दिया सबसे प्यारा गिफ्ट
चंडीगढ़ लौटने के बाद शर्मा जी का फोन आया, ‘ठीक से पहुंच गये।’ फिर उन्होंने शिकायत की कि जाते वक्त मिले क्यों नहीं, बच्चों के लिए मिठाई भेजनी थी। मैंने माफी मांगते हुए कहा, ‘आशीर्वाद बनाए रखिए।’ बातों-बातों में शर्मा जी ने कहा कि उन्हें बच्चों का गिफ्ट बहुत अच्छा लगा। फिर उसकी फोटो उन्होंने भेजी। वाकई बच्चों की मासूम भावनाएं होती ही बहुत अच्छी हैं। बच्चों ने खूबसूरत फोटो लगाकर अपने दिल की बातों को इसमें लिख छोड़ा है। शर्मा जी को नये जीवन पथ पर चलने की अग्रिम बधाई। वह स्वस्थ रहें, खूब घूमें, फिरें। जल्दी ही हम लोगों की मुलाकात होगी। मैंने उन्हें चंडीगढ़ आने का निमंत्रण दिया है, देखते हैं योजना कब पूरी होती है। पेश है एक शेर-
ऑफिस से विदा हुए तो क्या, हम सबको तो साथ ही आप पाओगे

है शुभकामना हमारी, जीवन में हर कदम आप खुशियां ही पाओगे।

Tuesday, February 25, 2020

निकिता मैम ने कहा-‘आप अपने लिए भी जीयें’ ... बस पड़ गया फर्क

केवल तिवारी
इस बार वर्षों बाद वह घर आया है, अपने साथ खुद को भी लाया है।
अपने साथ खुद को लाने की एक शायर की यह बात है बहुत गंभीर। वाकई कई लोग आपाधापी में खुद को भूल चुके हैं। कोई बच्चों को समर्पित है। कोई पैसे के पीछे भाग रहा है। किसी को प्रतिष्ठा की चिंता है और कोई दो जून की रोटी के जुगाड़ में ही इतना व्यस्त है कि उसे अपने बारे में ही कुछ पता नहीं। लेकिन कई बार कुछ मोड़ ऐसे आते हैं कि आपको लगता है-
जीवन पथ पर आएंगे कई मोड़, पल वही अपने जो आपको खुद से दे जोड़।
Nikita Mam
कुछ मंजर ऐसा ही हुआ कुछ दिन पहले। चलिए इसकी शुरुआत करते हैं-कोई लाग-लपेट नहीं, कोई गिला-शिकवा नहीं। आमना-सामना हुआ। हाल-चाल पूछा फिर अचानक सवाल, ‘आज बहुत कमजोर क्यों लग रहे हैं। तनाव ज्यादा लेने लगे हैं।’ निकिता मैम पहले मुझसे मुखातिब थीं, फिर मेरी पत्नी भावना की तरफ हंसते हुए मजाकिया अंदाज में पूछा, ‘आप ध्यान नहीं रख रहीं इनका।’ कुछ पल हंसी मजाक। फिर उन्होंने गंभीर होकर कहा, ‘देखिए आप अपना कर्म कर रहे हैं। बच्चों पर पूरा ध्यान दे रहे हैं फिर तनाव पालकर क्या होगा।’ अमूमन मैं खूब बोलने वाला हूं, लेकिन उस दिन ज्यादा नहीं बोला। यह बात है नवंबर या दिसंबर की। सही तारीख याद नहीं। ट्रिब्यून मॉडल स्कूल (Tribune Model School) में बेटे धवल की पीटीएम (PTM) थी। मेरी और पत्नी की हमेशा कोशिश होती है कि पीटीएम में हम दोनों जाएं। उस दिन भी यही हुआ। हम दोनों पीटीएम से लौट रहे थे। सीढ़ियों के पास निकिता मैम मिल गयीं। उन्होंने यह भी कहा कि आपसे फिर विस्तार से बात करेंगे। विस्तार से बात करने की बात पर भावना कई दिनों तक इसलिए तनाव में रहीं कि कहीं धवल कोई शैतानी तो नहीं कर रहा। धवल अकसर दोस्तों की ऐसी बातें भी बताता कि मन सन्न रह जाता। इतनी छोटी उम्र में भी बच्चे ऐसी बातें। मैंने भावना को समझाया कि तुम भले ही परेशान हो, मैं तो रिलेक्स हूं। अगली बार मैडम से मिलेंगे तो सकारात्मक बातें होंगी।
भावना की चिंता भी वाजिब थी। इस पर एक कवि की चंद पंक्तियां याद आती हैं-
बारिश तो आती है पर क्या, सावन में सावन दिखता है। बच्चे तो दिखते हैं काफ़ी, कितनों में बचपन दिखता है।
बिल्डिंग में कमरे ही कमरे, गायब घर-आंगन दिखता है। अपनापन तो नहीं, पर इन दिनों परायापन खूब दिखता है।
खैर...मुझे याद है करीब चार साल पहले निकिता मैम मेरे बेटे धवल को पढ़ाती थीं। उसके बाद उन्होंने स्कूल छोड़ दिया। बेटा उन्हें बहुत मिस करने लगा। वक्त गुजरता गया, एक दिन पता चला कि निकिता मैम ने फिर ज्वाइन कर लिया है, इस बार स्पेशल एजुकेटर के तौर पर। उन्होंने इसके लिए बाकायदा कोर्स किया है। उनके आने के बाद एक बार सभी पैरेंट्स को एक साथ बिठाकर कुछ टिप्स दिये गये। खासतौर पर उन्हें जिनके बच्चे बोर्ड परीक्षा देने वाले थे। मेरे बड़े बेटे कार्तिक उस दौरान 10वीं की तैयारी कर रहा था। पढ़ने में ठीक ही था। थोड़ी सी किशोरावस्था वाली चीजें उसके मन-मस्तिष्क पर हावी हो रही थीं। थैंक्स ट्रिब्यून
स्कूल का, स्कूल की प्रिंसिपल का, क्लासटीचर बिनेश सर का, निकिता मैम का और अब स्कूल छोड़ चुकीं अवलीन कौर मैमम का। आगे बढ़ने से पहले किसी शायर की दो लाइनें पेश करना चाहता हूं-
अपनी हालत का ख़ुद एहसास नहीं है मुझ को, मैंने औरों से सुना है कि परेशान हूं मैं
तकलीफ़ मिट गई मगर एहसास रह गया, ख़ुश हूं कि कुछ न कुछ तो मिरे पास रह गया।
बहरहाल, वापस आते हैं निकिता मैम पर। एक दिन स्पेशल पैरेंट्स क्लास हुई। उसमें निकिता मैम ने जोर-जोर से ए फॉर एप्पल और वन टू थ्री सबसे बोलने को कहा। कुछ लोग ऐसा करने में संकोच भी कर रहे थे। लेकिन देखते ही देखते सबको मजा आने लगा। थोड़ी देर बाद निकिता मैम ने कहा, कैसा लगा, सब हंसने लगे और बोले-मजा आ गया। निकिता मैम ने कहा जब छोटी-छोटी बातों से आनंदित हुआ जा सकता है तो आप बच्चों के साथ कभी-कभी बच्चा क्यों नहीं बन जाते। सचमुच बात बहुत अच्छी और बहुत छोटी सी लगी। मैंने अब तक पैरेंटिंग पर 200 के करीब आर्टिकल विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और साइट्स पर लिखे होंगे, लेकिन बात जब अपने पर आती है तो उसी तरह हो जाता है कि जैसे डाॅक्टर खुद का इलाज नहीं कर पाता। ऐसे ही अनेक मौकों पर निकिता मैम से बातें होने लगीं। स्कूल से मेरा नाता एक अभिभावक के अलावा भी है। कई बार बच्चों को मोटिवेशनल लेक्चर दिया है। कहानी लिखने के टिप्स दिए हैं। चुपचाप अभिभावक की भूमिका में जाता हूं, कभी रिपोर्टर के तौर पर और कभी स्कूल की मीटिंग में। हर बार कुछ सीखने को मिलता है।
बत फिर वहीं से,  
जब निकिता मैम ने कहा कि आप अपने लिए भी जीना सीखें। चिंता न करें, कर्त्तव्य करें। मैंने मन ही मन ठान लिया कि अगली बार मैडम से मिलूंगा तो शायद शिकायत का मौका नहीं दूंगा। इस बार भी अभी 15 फरवरी को फिर पीटीएम में गया। इस बार निकिता मैम से स्पेशल मिलने जाने का मन बनाया, लेकिन इसी बीच कुछ टीचर्स के साथ लंबी बातचीत होने से समय ज्यादा निकल गया। भावना बोलीं, चलो निकिता मैम से मिलकर आते हैं। जब तक वहां पहुंचे मैडम का कमरा बाहर से बंद था। हम लोग लौटने लगे तो मैडम फिर सीढ़ियों के पास मिल गयीं। कुछ पैरेंट्स से बात करते हुए। हमने इंतजार किया फिर बातों का सिलसिला शुरू हुआ। सबसे पहले मैंने ही पूछा मैडम आज तो मैं ठीक लग रहा हूं ना। वो थोड़ा आगे बढ़ीं प्रिंसिपल मैम के कमरे के बाहर हेल्पडेस्क के टेबल को छुआ और कहा टचवुड। फिर हम लोग पास ही रखे सोफे पर बैठ गए। उन्होंने कुछ बातें तो बेटे धवल को समझाईं। फिर हमसे भी बातें होने लगीं। हम लोगों ने तय किया कि बच्चों और पैरेंट्स को लेकर हम लोग अक्सर मिलेंगे और बात करेंगे। शायद इनसे कुछ ऐसी बातें निकलें कि जो औरों के लिए भी आगे चलकर फायदेमंद हो सके;
हर तमन्ना जब दिल से रुखसत हो गई, यकीन मानिए फुर्सत ही फुर्सत हो गई।
नादान हैं जो बाजार में वक्त खरीदने चले हैं, वक्त उसी का है जो वक्त के साथ चले हैं।

कुछ टीचर्स का चले जाना, हर एक से कुछ सीखना

मुझे सात साल हो गये हैं चंडीगढ़ आए और बच्चों को छह साल। यानी ट्रिब्यून माॅडल स्कूल से नाता जुड़े भी छह साल ही हो गये हैं। मैं बड़े बेटे को लेकर कई टीचर्स से सवाल पूछता तो हर कोई कहते बहुत अच्छा बच्चा है। यकीनन मुझे अच्छा तब लगा जब एक बार एक मैडम ने कहा कि आपने उस पर उम्मीदों का पहाड़ लादा है। वह हंसता नहीं। इतना गंभीर क्यों। मैंने इस पर होमवर्क किया, लेकिन बड़ा बेटा कार्तिक आदतन ऐसा है। वैसे टीचर्स के सुझाव के बाद उसे बदलने की कोशिश की। आज वह ट्रिब्यून स्कूल से निकल चुका है, लेकिन यहां से बहुत कुछ सीखकर निकला। हिंदी की आशा भारद्वाज मैडम हों या रजनी मैडम, इन लोगों से अकसर बातें होती हैं। म्यूजिक के अतुल सर से लेकर वीआरएस ले चुकी अनुपमा मैम, सबसे बातचीत का सिलसिला जारी है। विनिमा मैम, नम्रता मैम, निधि मैम, स्वाति मैम और कुछ नये आए टीचर्स। मेरी कोशिश होती है कि मैं सबसे मिलकर बच्चे की पढ़ाई के अलावा उसकी हरकतों के बारे में भी बात करूं। इन सबके बीच प्रिंसिपल वंदना सक्सेना मैम का बेहतरीन सहयोग। एक बार प्रिंसिपल मैम को मैंने अपनी एक कहानी का लिंक भेजा, उन्होंने प्रतिक्रिया स्वरूप पूछा, इज इट धवल। वंदना मैम के साथ तो इतने अनुभव हैं कि उन पर एक लंबी कहानी लिखने का इरादा है।
केवल तिवारी