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Monday, October 26, 2026

जल : आज और कल

 एक पुस्तक समीक्षा साभार: दैनिक ट्रिब्यून 



केवल तिवारी

समय की रेत पर जीवन चलायमान कैसे रह पाता अगर पानी की छीटें उस पर न पड़तीं। जल के प्रति मानवीय संवेदनाओं की जरूरत और वास्तविक स्थिति की विवेचना की गयी है पुस्तक 'एक बूंद सौ सवाल' में। प्रखर वक्ता, संवेदनशील लेखिका डॉ. शमीम शर्मा ने पानी के विविध आयामों की चर्चा करते हुए इसके समृद्ध अतीत और भविष्य की आशंका पर दृष्टि डाली है। पुस्तक लेखन में उनका साथ दिया है उनकी बहू डॉ. सरिता शर्मा ने। सात सर्गों में लिखी गयी यह किताब हर व्यक्ति को पानी के प्रति चेताती है, उत्साहित करती है और धिक्कारती भी है। किताब में कहीं लोक कथा 'प्यासा कौआ' और कहीं मुंशी प्रेमचंद की कहानी 'ठाकुर का कुआं' का जिक्र करते हुए पानी बचाने और बिना भेदभाव इसके बंटवारे की उपयोगिता को दर्शाया गया है। यूं तो पुस्तक का शीर्षक लेख 'एक बूंद सौ सवाल' (सर्ग एक अध्याय तीन) हम सबको सोचने पर विवश करता है, लेकिन जैसे-जैसे विभिन्न अध्यायों को पढ़ते हुए आगे बढ़ेंगे, लगेगा कि पानी की कहानी हमारी आंखें खोल रही है। हमसे संवाद कर रही हैं बूंदें। उसी तरह जैसे जाने-माने कवि अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध की कविता 'ज्यों निकलकर बादलों की गोद से अभी एक बूंद कुछ आगे बढ़ी...' में लिखा गया है। बूंद के जरिये ही बात शायद इसलिए भी कि कहा गया है, 'बिंदु-बिंदु से सिंधु बना है, बिंदु-बिंदु से ये बादल।' जल संरक्षण, जल प्रबंधन, हरियाणा की जल धरोहर जैसे तमाम विषयों को आंकड़ों के साथ देते हुए पानी से संबंधित मुहावरे, कवियों, शायरों की कुछ पंक्तियों और लोककथा ने इस किताब को और रोचक बना दिया है। भाषा-शैली सरल और जल की मानिंद प्रवाहमयी है। पुस्तक संग्रहणीय है और शोधार्थियों के भी काम आ सकने वाली है।

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