मनोहर सिंह रावत
(आकाशवाणी से सेवानिवृत्त अधिकारी)
# 🌹 श्रद्धेय श्री विपिन चन्द्र जोशी जी
### मुनस्यारी में शिक्षा की अलख जगाने वाले दूरदर्शी गुरु
**कुछ लोग केवल विद्यालय नहीं बनाते, वे पीढ़ियों का भविष्य सँवारते हैं।** श्रद्धेय श्री विपिन चन्द्र जोशी जी ऐसे ही दूरदर्शी शिक्षाविद् थे, जिन्होंने दुर्गम जोहार घाटी के मुनस्यारी में शिक्षा, अनुशासन, स्वच्छता, आत्मनिर्भरता और मानवीय मूल्यों की मजबूत नींव रखी।
## 1954: कठिन राहों से शिक्षा के नए युग तक
श्री ख्याली राम पंत जी के प्रकाशित संस्मरण *“मुनस्यारी व वहाँ के छात्रों को नहीं भुला सकता हूँ!”* के अनुसार, मार्च 1954 में मुनस्यारी में राजकीय हाईस्कूल खोलने का आदेश हुआ। श्री जोशी जी मूलतः अल्मोड़ा के निवासी थे। दुर्गम पहाड़ी रास्तों, पुलों के अभाव, भूस्खलन और गिरते पत्थरों के खतरों के बावजूद उन्होंने मुनस्यारी आने की चुनौती स्वीकार की।
उन्होंने **16 अगस्त 1954 को राजकीय हाईस्कूल, मुनस्यारी के प्रधानाचार्य का कार्यभार संभाला।** उनका उद्देश्य केवल विद्यालय चलाना नहीं, बल्कि सीमांत क्षेत्र के बच्चों को शिक्षा के माध्यम से आगे बढ़ने का अवसर देना था।
वे चाहते थे कि विद्यार्थियों को पुस्तकीय ज्ञान के साथ कृषि, बागवानी, कताई-बुनाई और पशुपालन जैसे व्यावहारिक कौशल भी मिलें, ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें।
## विद्यालय निर्माण: आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की नींव
स्थानीय लोगों की मौखिक स्मृतियों के अनुसार, जोशी जी ने वर्तमान राजकीय इंटर कॉलेज, मुनस्यारी के लिए भूमि उपलब्ध कराने, उसे स्वीकृत कराने और विद्यालय भवन के निर्माण की व्यवस्था में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका उद्देश्य था कि गरीब परिवारों के बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए अपना क्षेत्र छोड़ने की मजबूरी न हो।
बताया जाता है कि उन्होंने भूमि की उपयोगिता समझाकर स्वीकृति प्राप्त करने में प्रयास किए और भवन का नक्शा तैयार कराने से लेकर निर्माण की व्यवस्था तक सक्रिय भूमिका निभाई। अल्मोड़ा के एक ठेकेदार ने भवन निर्माण का कार्य किया, जिसमें संभावित आर्थिक घाटे के बावजूद काम पूरा करने की बात स्थानीय स्मृतियों में आती है।
विद्यालय की स्थापना और भवन निर्माण में उनके योगदान ने जोहार घाटी के बच्चों के लिए शिक्षा के नए द्वार खोले।
## संकट में समाजसेवा: अकाल के समय राहत की व्यवस्था
स्थानीय स्मृतियों के अनुसार, अकाल के कठिन समय में जब मुनस्यारी के लोगों के सामने राशन की समस्या उत्पन्न हुई, तब जोशी जी ने राहत पहुँचाने के प्रयास किए। बताया जाता है कि वर्तमान सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC), मुनस्यारी के स्थान पर हेलीकॉप्टर से राशन गिरवाने की व्यवस्था की गई थी।
यह प्रसंग उनके उस मानवीय दृष्टिकोण को सामने लाता है, जिसमें शिक्षक की भूमिका विद्यालय की चारदीवारी तक सीमित नहीं थी। वे शिक्षा के साथ-साथ समाज की कठिनाइयों के प्रति भी संवेदनशील थे।
स्थानीय स्मृतियों में बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने, बाल विवाह जैसी कुरीतियों के विरुद्ध जागरूकता फैलाने और जरूरतमंद लोगों की सहायता करने के उनके प्रयासों का भी उल्लेख मिलता है।
## स्तम्भों पर अंकित 24 जीवन-मूल्य
विद्यालय के स्तम्भों पर अंकित जीवन-मूल्य जोशी जी की शिक्षा-दृष्टि की याद दिलाते हैं। उपलब्ध तस्वीरों और विवरणों में उल्लिखित 24 मूल्यों का संदेश आज भी प्रासंगिक है:
**चरित्र, धैर्य, सफलता, ज्ञान, दया, उमंग, ध्यान, प्रेम, आशा, निष्ठा, सहयोग, उन्नति, प्रगति, शांति, सदाचार, विनय, उत्साह, परिश्रम, साहस, सत्य, अहिंसा, दर्शन, विवेक और करुणा।**
इन मूल्यों का सार है—ईमानदारी से जीना, कठिनाइयों में धैर्य रखना, निरंतर सीखना, दूसरों के प्रति संवेदनशील रहना, परिश्रम करना और विवेक के साथ सही मार्ग चुनना।
दरकोट निवासी श्री लक्ष्मण सिंह पांगती जी, जिन्हें ‘लज्बू’ के नाम से जाना जाता है, ने बताया कि सेवानिवृत्ति के बाद विद्यालय आने पर जोशी जी ने प्रार्थना सभा में विद्यार्थियों से स्तम्भों की संख्या, उन पर लिखे शब्दों और उनके अर्थ पूछे। विद्यार्थी उत्तर नहीं दे सके। जोशी जी ने कहा कि उन्हें आज भी वे सभी बातें याद हैं।
यह प्रसंग एक महत्त्वपूर्ण सीख देता है—**जीवन-मूल्यों को केवल पढ़ना पर्याप्त नहीं, उन्हें अपने आचरण में उतारना भी आवश्यक है।**
## अनुशासन, खेल और सांस्कृतिक गौरव
पूर्व BSF कमांडेंट एवं मल्ला जोहार विकास समिति के अध्यक्ष श्री राम सिंह धर्मशक्तू जी, जो 1961 में विद्यालय के विद्यार्थी थे, अपने संस्मरण में बताते हैं कि जोशी जी स्वयं कक्षाओं में जाते, विद्यार्थियों के नाम याद रखते और पढ़ाई की नियमितता पर ध्यान देते थे। वे नहीं चाहते थे कि शिक्षकों की कमी के कारण बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो।
विद्यालय में स्वच्छता, बागवानी, NCC, स्काउट, खेलकूद और सांस्कृतिक गतिविधियों को प्रोत्साहन मिलता था।
विद्यालय की ऐतिहासिक फोटो-पट्टिका के अनुसार, **1961 में राजकीय हाईस्कूल, मुनस्यारी ने उत्तर प्रदेश की राज्यस्तरीय खेल प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त किया।**
राम सिंह जी के संस्मरण के अनुसार, विद्यार्थियों को लखनऊ भी ले जाया गया, जहाँ उन्होंने पारंपरिक वेशभूषा में मार्च-पास्ट और लेज़िम प्रस्तुत किया। तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री चंद्रभानु गुप्ता ने विद्यालय के सांस्कृतिक कार्यक्रम की प्रशंसा की।
वापसी के दौरान भारी बर्फबारी के कारण विद्यार्थियों और शिक्षकों को कठिन पहाड़ी रास्तों से पैदल लौटना पड़ा। यह यात्रा साहस, अनुशासन, सामूहिकता और गुरु-शिष्य संबंधों की यादगार मिसाल बनी।
## 15 अक्टूबर 1974: गुरुजी की वापसी और श्रमदान की प्रेरक स्मृति
विद्यालय के अभिलेख के अनुसार, जोशी जी ने 16 अगस्त 1954 से 24 जुलाई 1964 तक प्रधानाचार्य के रूप में सेवा की। इसके बाद **15 अक्टूबर 1974 को उन्होंने पुनः कार्यभार संभाला और 30 जून 1976 को इसी विद्यालय से सेवानिवृत्त हुए।**
उनके दूसरे कार्यकाल की एक अविस्मरणीय स्मृति श्री पुरमल सिंह मर्तोलिया जी, अधीक्षण अभियंता (सेवानिवृत्त), लोक निर्माण विभाग, उत्तराखंड ने साझा की है। उस समय वे इंटर फाइनल के विद्यार्थी थे और जोशी जी के सानिध्य में बिताए पाँच-छह महीने आज भी उन्हें आत्मीयता और सम्मान के साथ याद हैं।
जोशी जी केवल हमारे प्रधानाचार्य नहीं, बल्कि अनुशासन, सादगी, संवेदनशीलता और कर्मठता के प्रेरणास्रोत थे। उनके लौटने से कॉलेज में अनुशासन और व्यवस्था बेहतर हुई। विद्यार्थियों, अभिभावकों और पूरी जोहार घाटी में उनके आगमन से प्रसन्नता का माहौल था। उनका स्नेह और मार्गदर्शन विद्यार्थियों को मेहनत, ईमानदारी और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देता था।
### श्रमदान की अविस्मरणीय स्मृति
उन दिनों कॉलेज की मुख्य इमारत से खेल मैदान (वर्तमान हेलीपैड) और विज्ञान प्रयोगशाला तक जाने वाला रास्ता बेहद खराब था। बरसात और बर्फबारी में वहाँ से गुजरना कठिन हो जाता था। विद्यार्थियों की परेशानी देखकर जोशी जी ने स्वयं पहल की। वे लोक निर्माण विभाग (PWD) के एसडीओ से मिले और सीमेंट के प्रीकास्ट स्लैब ट्रक में लादकर कॉलेज ले आए।
उनकी प्रेरणा से हम विद्यार्थियों ने श्रमदान किया और PWD कर्मचारियों के सहयोग से रास्ता तैयार हुआ। गुरुजी स्वयं कार्य की निगरानी करते और हमारा उत्साह बढ़ाते थे। उस दिन का अनुभव हमें सिखा गया कि सच्चा नेतृत्व केवल आदेश देने में नहीं, बल्कि स्वयं आगे बढ़कर उदाहरण प्रस्तुत करने में है।
**उस दिन हमने केवल रास्ता नहीं बनाया, बल्कि सहयोग, श्रम की गरिमा और सामूहिक जिम्मेदारी का पाठ भी सीखा।** आज भी उस प्रसंग को याद करता हूँ, तो लगता है कि गुरुजी ने हमारे लिए कॉलेज का रास्ता ही नहीं, जीवन में आगे बढ़ने का मार्ग भी प्रशस्त किया था।
### गुरुजी के संस्कार, जीवन की अमूल्य पूँजी
आज जीवन में मैंने जो कुछ भी हासिल किया है, उसमें जोशी जी के मार्गदर्शन और आशीर्वाद का महत्त्वपूर्ण योगदान है। उनके दिए संस्कारों ने मुझे अपने कर्तव्यों के प्रति ईमानदार रहने और समाज के लिए उपयोगी बनने की प्रेरणा दी।
**गुरुजी की सच्ची विरासत उनके द्वारा छोड़े गए संस्कार और जीवन-मूल्य हैं, जो पीढ़ियों तक हमारा मार्गदर्शन करते रहते हैं।**
श्री बिपिन चन्द्र जोशी जी को सादर नमन एवं श्रद्धापूर्ण स्मरण। 🙏🌹
## डॉ. मोहन सिंह लसपाल जी की आँखों देखी गवाही
डॉ. मोहन सिंह लसपाल जी बताते हैं कि वे जोशी जी के योगदान और उनके कार्यों के प्रत्यक्षदर्शी रहे हैं। उनका मानना है कि यदि उस समय श्रद्धेय श्री बिपिन चन्द्र जोशी जी मुनस्यारी नहीं आए होते, तो जोहार घाटी के बच्चे शायद आज जिस मुकाम तक पहुँचे हैं, वहाँ तक नहीं पहुँच पाते।
उनकी यह भावना उस पीढ़ी की कृतज्ञता को व्यक्त करती है, जिसके भविष्य को जोशी जी ने शिक्षा, अनुशासन और मार्गदर्शन से नई दिशा दी।
**डॉ. लसपाल जी के शब्दों में, “यदि जोशी जी जैसे शिक्षाविद् उस समय मुनस्यारी नहीं आते, तो हम आगे नहीं बढ़ पाते।”**
उनके अनुसार, जोशी जी का योगदान केवल विद्यालय तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने सीमांत क्षेत्र के बच्चों के लिए आगे बढ़ने के रास्ते खोले। शिक्षा के क्षेत्र में उनके अतुलनीय योगदान को देखते हुए डॉ. लसपाल जी ने कॉलेज में उनकी स्मृति में एक स्मारक स्थापित करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
### मुनस्यारी में कंप्यूटर लैब खोलने का अधूरा सपना
डॉ. मोहन सिंह लसपाल जी ने यह भी बताया कि उनकी इच्छा मुनस्यारी में एक कंप्यूटर लैब खोलने की थी। इस उद्देश्य से वे थल से नाचनी तक पैदल आए, लेकिन लगातार बारिश और रास्ता न होने के कारण उन्हें तीन दिन तक इंतजार करना पड़ा। दुर्भाग्यवश, उनका यह सपना पूरा नहीं हो सका।
उनका यह अनुभव उस समय के दुर्गम परिवहन मार्गों और सीमांत क्षेत्र में आधुनिक शैक्षिक सुविधाएँ पहुँचाने की कठिनाइयों को सामने लाता है। साथ ही, जोशी जी जैसे शिक्षाविदों के योगदान के प्रति उनकी गहरी कृतज्ञता को भी उजागर करता है।
## 1984: स्वच्छता, सादगी और श्रम का सम्मान
ग्राम सरमोली, मुनस्यारी निवासी डॉ. दिनेश मर्तोलिया जी ने बताया कि वर्ष 1984 में जोशी जी उनके घर भोजन करने आए थे। उस समय उनके बाल बहुत लंबे थे, साईं बाबा जैसे। जोशी जी ने सबसे पहले उनसे बाल कटवाने के लिए कहा।
अगले दिन उन्होंने सभी बच्चों से झाड़ू लाने को कहा और विद्यालय परिसर की सफाई करवाई। यह प्रसंग दर्शाता है कि उनके लिए स्वच्छता और श्रम का सम्मान केवल उपदेश नहीं, बल्कि दैनिक जीवन का हिस्सा था।
डॉ. मर्तोलिया जी के अनुसार, जोशी जी विद्यालय को अपने जीवन में बहुत महत्त्व देते थे। वे मानते थे कि मुनस्यारी में कार्य करने से उन्हें आगे बढ़ने का अवसर मिला, भले ही यहाँ आने को लेकर उनके परिवार और एक डॉक्टर ने चिंता जताई थी।
लगभग चार दशक बाद भी डॉ. मर्तोलिया जी को उनकी बातें याद हैं। यह उनके व्यक्तित्व की गहरी छाप का प्रमाण है।
## मुनस्यारी से आजीवन जुड़ाव
श्री ख्याली राम पंत जी के संस्मरण के अनुसार, वर्ष 1999 में 80 वर्ष से अधिक आयु में भी जोशी जी मुनस्यारी आए और यहाँ हुए बदलावों को देखा।
मेरे स्वर्गीय पिता श्री हयात सिंह रावत जी मुनस्यारी में **एक छोटा-सा रेस्टोरेंट** चलाते थे। उनकी स्मृतियों के अनुसार, जोशी जी लगभग रोज चाय पीने आते थे, कभी-कभी भोजन भी करते थे और कई बार आर्थिक सहायता भी करते थे। मेरे पिता और उनके बीच आत्मीय संबंध था।
ये पारिवारिक स्मृतियाँ उनके सरल, संवेदनशील और मददगार स्वभाव की झलक प्रस्तुत करती हैं।
उनके कार्यों में स्वच्छता, सादगी, श्रम की गरिमा, आत्मनिर्भरता और समाजसेवा जैसे आदर्श दिखाई देते हैं। विद्यार्थियों में श्रमदान, अनुशासन और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना जगाना उनकी शिक्षा-दृष्टि का महत्त्वपूर्ण हिस्सा था।
## गुरुजी को आत्मीय श्रद्धांजलि
पूर्व प्रधानाचार्य डॉ. दुर्गा सिंह कोटल जी ने जोशी जी के बारे में कहा:
**“वे श्लाघनीय थे हरेक क्षेत्र में। जब भी GIC मुनस्यारी के बारे में चर्चा होती है, उनको आत्मीयता से याद करते हैं।”** 🩷🙏
विद्यालय की स्मृति-पट्टिका के अनुसार, जोशी जी मूल रूप से अल्मोड़ा के निवासी थे। उसमें उनके ज्येष्ठ पुत्र स्वर्गीय श्री विभाश जोशी,ओ पुत्री श्रीमती बीनू जोशी और पुत्री श्रीमती रेनू जोशी पांडे का उल्लेख है। पट्टिका में उनके बच्चों, दामादों और पौत्र-पौत्रियों का विवरण भी दिया गया है।
उसी स्मृति-पट्टिका पर उनकी पुण्यतिथि **7 दिसंबर 2002** अंकित है।
## उनकी विरासत, हमारी जिम्मेदारी
श्रद्धेय श्री विपिन चन्द्र जोशी जी का जीवन सिखाता है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल अच्छे अंक प्राप्त करना नहीं, बल्कि अच्छा इंसान बनना भी है। उन्होंने मुनस्यारी में शिक्षा का विस्तार करने, अनुशासन स्थापित करने, व्यावहारिक कौशल को प्रोत्साहित करने और विद्यार्थियों में मानवीय मूल्यों का विकास करने के लिए महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
आज यदि विद्यार्थी सत्य बोलें, मेहनत करें, गुरुजनों का सम्मान करें, विद्यालय को स्वच्छ रखें, लड़के-लड़कियों को समान अवसर दें और जरूरतमंदों की सहायता करें, तो यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
डॉ. मोहन सिंह लसपाल जी और श्री पुरमल सिंह मर्तोलिया जी जैसे लोगों की स्मृतियाँ इस बात को रेखांकित करती हैं कि जोशी जी का प्रभाव केवल उनके कार्यकाल तक सीमित नहीं रहा। उनके संस्कार और प्रयास आज भी लोगों की स्मृतियों में जीवित हैं।
उनके योगदान को देखते हुए **राजकीय इंटर कॉलेज, मुनस्यारी में उनकी स्मृति में एक स्मारक स्थापित करने का प्रस्ताव** विचारणीय है। इससे आने वाली पीढ़ियाँ उनके जीवन, संघर्ष और शिक्षा के प्रति समर्पण से प्रेरणा ले सकेंगी।
श्रद्धेय श्री विपिन चन्द्र जोशी जी को शत-शत नमन। उनकी शिक्षा-ज्योति जोहार की आने वाली पीढ़ियों को सदैव राह दिखाती रहे।** 🙏🌹🇮🇳
*M. S. Rawat*
Retd. IBPS, All India Radio
मुनस्यारी, उत्तराखंड 🇮🇳







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