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Saturday, October 24, 2026

भरोसे की नींव को दरकने से रोकना होगा

 


साभार: दैनिक ट्रिब्यून 

केवल तिवारी

कदम-कदम पर टूटते भरोसे के इस दौर में जाने-माने कथाकार सुदर्शन की एक कहानी 'हार की जीत' याद आती है। कहानी का सार इस तरह से है- डाकू खड़क सिंह को बाबा भारती का घोड़ा (सुल्तान) बहुत भा जाता है। पहले वह घोड़ा उसे दे देने की विनती करता है फिर धमकी देता है, जब किसी तरह से बाबा भारती नहीं मानते तो बीमार अपाहिज भेष रखकर मदद मांगता है और बाबा भारती के घोड़े को लेकर भाग जाता है। बाबा भारती उसे रोकते हैं और कहते हैं कि बेशक घोड़ा ले जा, लेकिन धोखा देने की इस कहानी को किसी को बताना मत, नहीं तो कोई किसी पर भरोसा नहीं करेगा। इस कहानी के नायक को दुख इस बात का है कि भरोसा टूटेगा तो अनर्थ हो जाएगा। कहानी के अंत में डाकू उस घोड़े को चुपचाप बाबा भारती के अस्तबल में बांध आता है, यानी उस पर बाबा की सीख का असर पड़ जाता है, लेकिन आज के दौर में एक के बाद एक भरोसा तोड़ने की खबरें सुर्खियां बन रही हैं। ‘हार की जीत’ कहानी एक सीख देती थी, लेकिन अब तो आयेदिन भरोसा टूटने की खबरें आती हैं। किसी सीख का असर नहीं, धोखेबाज लोगों पर कानून का भी खौफ नहीं।

असल में आज के ई-युग में हमारा दायरा जितना बड़ा होता जा रहा है, भरोसे की दीवार में उतने ही छेद बढ़ते जा रहे हैं। एक ओर जहां सोशल मीडिया पर 'दावों' के साथ अनेक बेबुनियाद चीजें परोसी जा रही हैं, वहीं दूसरी ओर कहां और किस स्तर पर किसी के साथ कितना बड़ा धोखा हो जाये कहा नहीं जा सकता। उधर, साइबर ठग हैं जो हर समय इसी पर मंथन करते रहते हैं कि अब कौन सा जाल बिछाया जाये, इधर, ऐसे भी मामले सामने आए हैं कि जिन पर विश्वास का एक लेबल चस्पां था, वे ही अविश्वास का जाल बुनते रहे। हरियाणा के आईडीएफसी, एयू बैंक फ्रॉड मामला हो या फिर चंडीगढ़ में सरकारी पैसे का इधर से उधर होना, आखिर क्या है? भरोसे का खून ही तो है। जांच चल रही है, कई अधिकारी निलंबित किए जा चुके हैं, लेकिन भरोसा तो तोड़ा ही गया। शुरुआती जांच में यही सामने आ रहा है कि मौज-मस्ती के लिए सारे नियम-कानून और अपने ओहदे तक को ताक पर रख दिया गया। यह तो एक बानगीभर है। आयेदिन ऐसी खबरें आती हैं कि जिन पर भरोसा था, उन्होंने ही इसे तोड़ा। कुछ दिन पूर्व एक खबर आई कि डाक विभाग की एक महिला अधिकारी ने लोगों के बचत के पैसों में ही गोलमाल कर दिया। जब जांच हुई तो उस अधिकारी को निकाल दिया गया। भरोसे की दीवार पर चारों ओर से चोट हो रही है। अनेक जगह डॉक्टरों पर आरोप लगते हैं कि उन्होंने मिलीभगत से किसी के इलाज में उन दवाओं और उपकरणों के प्रयोग को भी शामिल किया जिनकी वहां जरूरत ही नहीं थी। सवाल यही कि ‘किस पर करें यकीन।’ सोशल मीडिया मंचों पर 'लाइक्स' और 'व्यूज' के चक्कर में कोई आयुर्वेद का जानकार बना फिर रहा है तो कोई चुटकियों में बीमारी को खत्म करने का दावा कर रहा है। इसे इस तरीके से परोसा जा रहा है कि अच्छा-खासा समझदार भी उनके झांसे में आ जाये। पिछले दिनों पंजाब के अमृतसर, बिहार-झारखंड के कुछ इलाकों और उत्तराखंड से खबरें आईं कि कुछ लोग एंबुलेंस के जरिये नशे का काला कारोबार कर रहे थे। एक एंबुलेंस में तो एक महिला को फर्जी बीमार बनाकर लिटाया गया था। शक के आधार पर एंबुलेंस को रोका गया तो पूरा खुलासा हुआ। ड्रग्स का यह खेल पूरे देश को खोखला करने की अंतर्राष्ट्रीय साजिश है, यह बात किसी से छिपी नहीं है। नशे के इस काले धंधे का और भी दुखद पहलू यह भी है कि अक्सर इसमें उनकी संलिप्तता सामने आती है जिन पर इस बात की जिम्मेदारी है कि नशा अपने पांव न पसार सके। पिछले दिनों पंजाब में एक पुलिसकर्मी करोड़ों की हेरोईन के साथ पकड़ा गया। कैसी विडंबना है कि वह कर्मी एंटी ड्रोन स्क्वॉड में तैनात था। यानी जिसका काम नशे के सौदागरों की धरपकड़ था, वह उनका मददगार बना हुआ था। उसी तरह मानसा में मेडिकल स्टोर में नशा बिकने की बात सामने आई। हर जगह भरोसे का खून। इस खेल में कभी वर्दी का दुरुपयोग और कभी रुतबे का। युवा पीढ़ी का नाश हो रहा है और सियासत के गलियारों में सिर्फ कीचड़ उछलता दिखता है। 

वैसे चारों तरफ अविश्वास और धोखे के आज के माहौल में भी तस्वीर बिल्कुल स्याह नहीं है। अनेक डॉक्टर हैं जो अस्पतालों में अपनी ड्यूटी से ज्यादा समय लगा रहे हैं। अनेक अधिकारी हैं जो नि:शुल्क सेवा भी कर रहे हैं। अनेक समाज सुधारक हैं जो समाज के लिए काम कर रहे हैं। जरूरत है इस बात की कि आज का मीडिया भी धोखे, अविश्वास की खबरों का महिमामंडन करने के बजाय प्रेरक कहानियों को ज्यादा स्थान दे। साथ ही जरूरत है इस बात की भी कि हर जिम्मेदार नागरिक अपना कर्तव्य सही से निभाये। यह कर्तव्य निर्वहन अपनी नौकरी, घर-परिवार और समाज से शुरू होनी चाहिए। क्योंकि भरोसा तो कायम करना होगा। विश्वासबहाली तो बेहद जरूरी है। उसी शेर की तरह जिसमें कहा गया है, 'हर-चंद एतबार में धोखे भी हैं मगर, ये तो नहीं किसी पे भरोसा किया न जाए।' हम सबको भरोसा बहाली में अपने-अपने स्तर पर प्रयास करने चाहिए तभी दिखेगी बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर।

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