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Sunday, July 12, 2020

बिजनेस में छा जाने का है इरादा गुलनार का

इरादे नेक हों तो सपने भी साकार होते हैं, अगर सच्ची लगन हो तो रास्ते आसां होते हैं। यह कहावत चरितार्थ की है चंडीगढ़ की छात्रा गुलनार ने। पूरा नाम है गुलनान जोसन। गुलनार चंडीगढ़ के सेक्टर 9 के निवासी और स्ट्रॉबेरी फील्ड्स की छात्रा हैं। गुलनार जोसन ने आईसीएसई में 12वीं में ह्यूमनिटीज स्ट्रीम में अव्वल अंक हासिल किए हैं। गुलनार के इतिहास में 100%, फिजियोलॉजी में 98% और अर्थशास्त्र में 97% अंक आए हैं। यानी कुल 96.75% के साथ स्कोर करने वाली इस छात्रा का उद्देश्य व्यवसाय प्रशासन में करिअर बनाने का है। गुलनार ने कहा कि नियमित अध्ययन ही सफलता की कुंजी है। उनके पिता अश्वनजीत सिंह जोसन एक व्यवसायी हैं और माता डिंपल जोसन गृहिणी हैं। गुलनार के लिए माता-पिता रोल मॉडल हैं। गुलनार का कहना है कि आपको चीजें अपने घर से ही सीखने को मिलती हैं। पिता की कड़ी मेहनत और मां का पूरे घर को संभालना देखकर ही उन्होंने अपनी पढ़ाई को एक गति दी। उन्होंने अपनी पढ़ाई के लिए एक टाइम टेबल बनाया। लगातार उसी पर चलीं और अध्ययन करती रहीं। गुलनार का कहना है कि व्यापार में वह एक मुकाम को छूना चाहती हैं। निश्चित रूप से सफलता मिलेगी। गुलनार अपने सफर पर चल पड़ेंगी। इस होनहार छात्रा के लिए पेश है एक शेर-
परिंदो को मिलेगी मंज़िल एक दिन
ये फैले हुए उनके पर बोलते है
और वही लोग रहते है खामोश अक्सर
ज़माने में जिनके हुनर बोलते है

GULNAR JOSON  WANTS TO  ESTABLISH HER  IMPRINTS  IN  BUSINESS  WORLD.

Resident  of  Sector  9,  Chandigarh  GulnarJoson  student  of  Humanities stream  in  Strawberry  Fields  High  School,  Chandigarh  has  scored  100% in  History,  98%  in  Physiology  with  97%  in  Economics  with  overall 96.75%.    Her  Career  aim:  To  pursue  Business  administration.  Her  success mantra:  She  planned  all  her  studies  before  hand  and  worked according  to it.  Regular study  is the key.   Parents:  Father,  Ashwanjit  Singh  Joson  is  a  businessman  and  mother Dimple Joson is a  homemaker.   Her Parents are her Role Models.



ये है विवरण
GulnarJoson
Age: 18

Stream: Humanities

Marks: 96.75%

School: Strawberry fields high school

Career aim: To pursue Business administration

Success mantra: I planned all my studies before hand and worked according to it. Regular study is the key.

Parents: Father, Ashwanjit Singh Joson is a businessman and mother Dimple Joson is a homemaker.

Role model: Parents

Saturday, July 11, 2020

आत्महत्या कोई विकल्प नहीं

केवल तिवारी
पिछले दिनों दो तरह की खबरें आईं। एक तो यह कि मध्य प्रदेश में सिविल इंजीनियरिंग की डिग्री लेने वाले एक युवक को मनरेगा के तहत मजदूरी करते देखा गया और दूसरे, बेरोजगारी से तंग एक युवक ने जान दे दी। इन दोनों खबरों पर कहीं कोई तवज्जो नहीं दी गयी, क्योंकि न तो इनमें से सुशांत सिंह राजपूत था और न ही कोई विकास दुबे। खैर मध्य प्रदेश के इंजीनियर की कहानी को थोड़ा स्पेस मिलना चाहिए था क्योंकि उसने आत्महत्या के बजाय मेहनत का रास्ता अख्तियार किया, दूसरे युवक को स्पेस नहीं भी मिला तो कोई बात नहीं क्योंकि आत्महत्या कोई विकल्प नहीं। इसी दौरान दिल्ली में एक पत्रकार द्वारा प्रतिष्ठित एम्स की बिल्डिंग से कूदकर आत्महत्या की खबर आई। हालांकि पत्रकार के तमाम मित्र कह रहे हैं कि यह आत्महत्या हो ही नहीं सकती। इसके कई कारण गिनाये गये जिनमें से प्रमुख हैं कि वह बहुत जीवट पत्रकार था। दूसरे उसके संस्थान ने उसे निकाला नहीं था। उसके खाते में जुलाई के शुरू में भी वेतन डाल दिया गया था। आत्महत्या की या नहीं, की तो क्यों? इन सब पर जांच चल रही है। उधर, सुशांत सिंह राजपूत का मामला भी जितनी तेजी से उठा था उतनी ही तेजी से वह ठंडा भी पड़ गया। फिलहाल कुछ दिनों से मीडिया की सुर्खियों में कानपुर वाला विकास दुबे छाया हुआ है। आत्महत्या की खबरों को बहुत ज्यादा तवज्जो नहीं दी जानी चाहिए, साथ ही हर किसी को समझना चाहिए कि परेशानी के कई दौर आते हैं, लेकिन उनसे हार नहीं माननी चाहिए। मौत को गले लगा लिया तो बचा ही क्या। थोड़ी सी परेशानी से रू-ब-रू होंगे तो जल्दी ही उससे उबरेंगे भी। हां कोई ऐसा काम न करें कि आप समाज से आंखें चुराते फिरें। नौकरी से परेशान होना, आर्थिक तंगी कोई नजरें चुराने वाली बात नहीं है। न ही ये भी कि आप कहीं बच्चे की फीस नहीं दे पा रहे हैं या विलासिता का जीवन नहीं जी पा रहे हैं।
लाइफ स्टाइल को बिल्कुल न उलटें
कोरोना महामारी के दौर में कई खबरें सुनने को मिलीं। अनेक लोगों की नौकरी चली गयी। कुछ ऐसे किस्से सुनने को मिले जिससे यह लगा कि अपनी लाइफ स्टाइल को हमने एकदम से बदल दिया और नौकरी गयी तो मौत के सिवा कोई दूसरा रास्ता नजर नहीं आया। एक युवक का किस्सा बताता हूं। करीब चार साल पहले उसकी बहुत अच्छी जॉब लग गयी। मल्टी नेशनल कंपनी में। बेंगलुरू में शिफ्ट हो गया। शादी हुई। मध्यम वर्ग के परिवार से निकले इस युवक ने पहले डेढ़ करोड़ का फ्लैट खरीदा, एक महंगी गाड़ी ली। ड्राइवर रख लिया। घर में दो मेड रख लिये। पत्नी के लिए भी गाड़ी ड्राइवर रख लिया। महीने में जो डेढ़ लाख के करीब सैलरी मिलती थी, वह सब यूं ही उड़ जाती। बहुत मस्त उसका जीवन चल रहा था कि कोरोना संकट आ गया। पहले तो कंपनी ने वेतन आधा किया फिर जून आते-आते नौकरी से चलता कर दिया। बंदा अचानक जमीन पर आ गया। 40 हजार रुपये महीना मकान की किस्त। कारों की किस्त अलग से। समाज में बना झूठा रुतबा भी चला गया। अब करे तो क्या? फ्लैट बिक नहीं सकता, खाने के लिए भी कोई सेविंग्स नहीं। गनीमत रही कि उसने आत्महत्या नहीं की और वह अपने मूल गांव चला गया। फिर से जीवन को संवारने की कोशिश कर रहा है। ऐसे कई मौके आते हैं जब हम अचानक अपनी लाइफ स्टाइल बदल लेते हैं। अगर उक्त युवक भी तत्काल फ्लैट नहीं खरीदता। या सस्ता फ्लैट ले लेता। एक ही कार से काम चला लेता। मेड नहीं रखता। तो संभवत: वह हर माह 50 हजार रुपये तक बचा लेता। चार साल की नौकरी के बाद उसके पास अच्छी खासी रकम होती, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। इसलिए अपनी लाइफ स्टाइल को एकदम उलटिए मत। 

Friday, July 3, 2020

... तो क्या पापा चिट्ठी वाली ऑनलाइन क्लास होती?

पिछले साल की एक तस्वीर
केवल तिवारी
आज सुबह छोटे बेटे धवल ने एक मजेदार सवाल पूछा, ‘पापा आपके जमाने में कोरोना जैसी बीमारी फैलती तो आपकी ऑनलाइन क्लासेज लेटर (चिट्ठी) से होती।’ मैं हंस दिया। फिर खुद ही बोला, ‘आज आप कोई सवाल पूछने के लिए अपने टीचर को चिट्ठी भेजते तो एक हफ्ते बाद जवाब आता।’ मुझे उसकी बातों में मजा आने लगा। मैंने उससे चिट्ठी को लेकर कई बातें साझा कीं। मैंने कहा, ‘हिंदी फिल्मों के कई गीत हैं जिनमें चिट्ठी का गुणगान किया गया है।’ मैंने फिर यह भी कहा कि कई कविताएं, शेर-ओ-शायरी भी चिट्ठी पर लिखी हैं। वह बोला, ‘आज हमारा देखो, सीधे टीचर से बात। सवाल पूछना हो तो चैट बॉक्स।’ यह कहते हुए वह दूसरे कमरे में चला गया। असल में उसके स्कूल की एक ऑनलाइन मीटिंग थी। गूगल एप पर। टीचर्स ने बच्चों को समझाना था। अब इसी पर क्लासेज चलेंगी। फिर मैं खो गया पुराने दिनों में जब लखनऊ से अपने घर रानीखेत में अपनी माताजी एवं दीदी के लिए चिट्ठी लिखा करता था। फिर मुझे वे शेर याद आने लगे जिनका मैं अक्सर जिक्र करता रहा हूं, जैसे-

फूल तुम्हें भेजा है ख़त में फूल नहीं मेरा दिल है प्रीयतम मेरे तुम भी लिखना क्या ये तुम्हारे क़ाबिल है।  

चिट्ठी आई है आई है, चिट्ठी आई है।

खत लिख दे सांवरिया के नाम बाबू, कैसे होती है सुबह से शाम बाबू

मैं रोया परदेस में, भीगा मां का प्यार। दिल ने दिल से बात की, बिन चिट्ठी बिन तार।

खैर... आज तो शायद कई लोग ऐसे होंगे जिन्हें यह पता ही नहीं होगा कि अंतर्देशीय पत्र क्या होता है। पोस्टकार्ड क्या होता है। तार क्या होता था। मुझे खत-ओ-खतूत से बड़ा प्यार है। कुछ नहीं तो एक खत लिखकर अपने पास ही रख लेता हूं। कभी-कबार घरवालों के नाम भी। भाई साहब-भाभी जी की विवाह की 25वीं सालगिरह पर उन्हें खत भेजा था। उसके बाद छोटी दीदी-जीजा जी की शादी की 25वीं सालगिरह पर। ऐसे ही गाहे-ब-गाहे खत लिखता रहता हूं। अजब इत्तेफाक है कि पिछले दिनों एक किताब समीक्षा के लिए मिली, ‘पत्र तुम्हारे लिए।’ यह एक प्रयोग था। अच्छा प्रयोग। मैंने जो समीक्षा में लिखा उसे नीचे दे रहा हूं-
सोशल मीडिया के इस दौर में चिट्ठियों का तो जैसे जमाना ही चला गया, लेकिन चिट्ठियों के जरिये संदेश पहुंचाने की इच्छा शायद हर व्यक्ति के मन में होती है। या कह सकते हैं कि ऐसा भाव होता है कि कोई भी व्यक्ति अपनी पूरी बात सामने वाले से कह सके। वह वार्तालाप ऐसा हो, जिसमें प्रतिवाद न हो। बात पूरी हो जाये। मां-बाप अपनी संतान से कुछ कहना चाहें या कोई लड़का-लड़की अपने माता-पिता से या फिर रिश्ता कोई भी, चिट्ठियां ही आज भी सशक्त माध्यम हैं संप्रेषण की। अपनी एक खास मुकाम रखने वाली इसी चिट्ठी विधा को सहेजने का अनूठा प्रयोग किया है डॉक्टर विमला भंडारी ने। उन्होंने एक पत्र लेखन प्रतियोगिता आयोजित करवाई। उनमें से बेहतरीन 37 पत्रों को किताब के रूप में सामने ले आईं। सचमुच पत्र इतने बेहतरीन लिखे गए हैं कि पढ़ने वाला भी भावुक हुए बिना नहीं रह सकता है। उन लोगों के लिए तो यह किताब खजाना सरीखा है जिन लोगों ने उस दौर को जिया है जब चिट्ठी ही संचार का एक सहज माध्यम था। यही नहीं आज भी चिट्ठी के माध्यम से अपनी बात कहने वालों को यह किताब बहुत पसंद आई होगी। कहीं एक मां अपनी बेटी को उसके 16वें बरस पर चिट्ठी लिख रही है कि बेटा थोड़ी सी शरारत कर लेना। कीचड़ में उछल लेना और हां, 18 बरस की हो जाओ फिर तुम्हारे सपनों के राजकुमार की भी तो बातें करनी होंगी। ऐसी ही कहीं एक पिता अपने बेटे को ताकीद करता है कि संघर्ष को समझो। कहीं एक बेटी अपनी सफलता की कहानी अपने घरवालों को लिख भेजती है और हां एक जगह एक बच्ची दादी से कहती है, इस बार तो आपके साथ बहुत सारा समय बिताना है। कहीं मां-बाप बच्चों की छुट्टियों का इंतजार करने की बात लिख रहे हैं तो कहीं दोस्तों की बातें चल रही हैं। वाकई अलग-अलग भावों से भरी चिट्ठियों को एक किताब की शक्ल देने का यह प्रयोग है बहुत सुंदर।

मेरा मानना है कि चिट्ठी लिखने की परंपरा कायम रहनी चाहिए। चाहे उसे व्हाट्सएप पर ही क्यों न लिखा जाये।



Wednesday, July 1, 2020

मुश्किल नहीं है कुछ भी गर ठान लीजिए...

मेहनतकश 
केवल तिवारी
एक पुरानी हिंदी फिल्म का गीत है, ‘हम मेहनत कर इस दुनिया से अपना हिस्सा मांगेंगे, एक बाग नहीं, एक खेत नहीं हम सारी दुनिया मांगेंगे।’ यहां हमने इस गीत से सिर्फ 'मेहनत' शब्द की बात उठाई है। मेहनत भी हंसते-खेलते। मेहनतकश भी 60 के पार वाले। असल में कुछ लोगों का एक समूह सुबह-सुबह पार्क में आता है। मेहनत करने। सिर्फ मेहनत। कुछ मांगने नहीं। कोई बाग नहीं। कोई खेत नहीं। मेहनत सबके लिए। सार्वजनिक पार्क है। पार्क में एक मंदिर है। मंदिर परिसर को साफ करने के लिए ‘कार सेवा’ यानी श्रमदान का अभियान चलाया गया। पार्क के लिए श्रमदान पूरा हुआ तो गलियों में सफाई का अभियान चल गया। इलाका है पंजाब सीमा से सटा चंडीगढ़ का प्रवेश द्वार रायपुर खुर्द। सोसायटी है ट्रिब्यून सोसायटी कांप्लेक्स। करीब आठ दिन पहले हरेश वशिष्ठ जी का फोन आया। श्रमदान के लिए आपकी सेवा भी अपेक्षित है। उसके बाद से मैं भी सुबह उठकर चला जाता हूं। जैसा कि मैंने पहले बताया पार्क में श्रमदान के लिए आने वाले ज्यादातर लोग 60 पार के हैं, लेकिन प्रत्येक का जज्बा एक नौजवान सरीखा है। चूंकि साफ-सफाई का काम है और सोसायटी के कुछ लोगों से पिछले सात सालों से आत्मीयता है तो मैं भी थोड़ा-बहुत काम कर लेता हूं। गणेश जी। जोगेंद्र लाल जी। राजीव जी। गर्ग साहब। केके सिंह साहब। चौधरी साहब। वालिया साहब। गुप्ता साहब। राजेंद्र मोहन शर्मा जी। अनेक लोग हैं जो रोज सुबह एक युवा की तरह वहां डट जाते हैं। नेक काम में जुटे ‘बुजुर्ग युवाओं’ को देखता हूं तो सहसा वह पंक्ति याद आती है जिसमें किसी ने लिखा था-
मंज़िल क्या है, रास्ता क्या है, हौसला हो तो फासला क्या है।
(यहां स्पष्ट कर दूं कि 60 पार शब्द को अन्यथा न लिया जाये। कुछ 60 से कम हैं और कुछ 70 के आसपास या इससे भी ऊपर, लेकिन जज्बा सबका समान)
वाकई कोई फासला नहीं। पूरे शिद्दत से 24 जून से जुटे लोगों ने पार्क को सुंदर बना दिया है। अब काम गलियों में शुरू हो चुका है। लोगों से अनुरोध भी किया जाता है कि यहां पर कचरा न फेंके। बेशक कुछ लोग नहीं मानते, लेकिन ज्यादातर मंदिर में पूजा-पाठ करने आते हैं और ‘सर्वे भवंतु सुखिन:’ की कामना करते हैं।

एक अकेला थक जाएगा तो मिलकर बोझ उठाना


एक से जुड़ा दूसरा
दिलीप कुमार साहब की फिल्म ‘नया दौर’ की मानिंद लोग एक-दूसरे का हाथ बंटाते हैं। कोई कस्सी चलाता है, कुछ देर मेहनत के बाद थकता है तो दूसरा उसे थाम लेता है। सोशल डिस्टेंसिंग का पूरा खयाल, मन से आत्मीयता। बिना कहे कोई घास को एक जगह एकत्र करता है तो कोई अपील करता है कि कुत्तों को पॉटी कराने के लिए यहां न लाएं। इन ‘बुजुर्ग युवाओं’ में कोई फिट है तो किसी की हल्की तोंद निकली है, कोई दुबला-पतला है तो कोई हृष्ट-पुष्ट। इन सबकी मिली-जुली मेहनत देख एक शेर कहूंगा-

न मेरा एक होगा, न तेरा लाख होगा, तारीफ तेरी, न मेरा मजाक होगा। गुरूर न कर शाह-ए-शरीर का, मेरा भी खाक होगा, तेरा भी खाक होगा।


पूरी तल्लीनता
सावन से पहले श्रमदान का यह काम बेहतरीन कदम है। मुझे याद आया कि वसुंधरा-गाजियाबा में अपनी कॉलोनी में कैसे हम लोग हर छुट्टी के दिन घर-बार छोड़कर सोसायटी के काम में लगे रहते थे। ट्रिब्यून सोसायटी कांप्लेक्स, रायपुर खुर्द में, मैं बेशक किराएदार हूं, कुछ समय बाद यहां से चला भी जाऊंगा, लेकिन जिन लोगों से मन जुड़ा हूं, उनकी बातें तो प्रेरणा देती ही रहेंगी।

Saturday, June 6, 2020

धीरे-धीरे रे मना

केवल तिवारी
उनकी वाणी में तल्खी है। उनकी वाणी में सत्यता है। वह जीने की कला सिखाते हैं। वह जीवन का मतलब बताते हैं। आडंबरों के धुर विरोधी। निश्छल प्रेम के पक्के समर्थक। वह कबीर हैं। संत कबीर। कई सौ साल पहले ही कह गये कि मनुष्य को धैर्य बनाये रखना सीखना चाहिए। उनकी वह सीख वर्तमान दौर में एक बार फिर अनिवार्य बन गयी है, ‘धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय, माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय।’ समय पर ही सबकुछ होगा। महामारी के आज के दौर में मनुष्य व्याकुल है, लेकिन कबीर की शिक्षा की मानिंद हमें व्याकुलता छोड़ अपने कर्तव्य पथ पर बढ़ते रहना होगा।
असल में कबीर समाज में चैतन्यता लाने वाले थे। वह कहते हैं, अपने मन के भटकाव को रोको। यह मन तो न जाने क्या-क्या इच्छाएं करता है। इच्छाएं अनंत हैं। यदि मन की इच्छाएं ही पूर्ण हो जातीं, तो फिर मानव तो कर्म विहीन ही हो जाता। मेहनत के बल पर जो फल मिलता है, उसका स्वाद निराला होता है- ‘मन की मनोरथ छांड़ि दे, तेरा किया न होई। पानी में घिव निकसे, तो रूखा खाए न कोई।’ यही नहीं, कबीर संतोष बनाए रखने की सीख देते हैं। क्या होगा जो इसे, उसे समेटने में जुटे रहोगे। बस जरूरत भर के लिए मिल जाये और दूसरों के लिए भी कुछ कर पाएं, इससे बड़ा सुख और कहां। वह कहते हैं, ‘साईं इतना दीजिये, जा मे कुटुम समाय। मैं भी भूखा न रहूं, साधु ना भूखा जाय।’ सहृदय बने रहने की सीख देने वाले कबीर कहते हैं कि जिस व्यक्ति का हृदय औरों के दुख से दुखी होगा, जो भावुक होगा, निश्चित रूप से वही जीवन का असली रस ले सकने वाला होगा। अपने लिए तो पशु भी जीते हैं। अगर हम औरों के बारे में भी सोचने वाले बनेंगे तो इस कुदरत के सही ज्ञान को समझ पाएंगे। जिस प्रकार बारिश का आनंद या बारिश का प्रभाव एक हरे पेड़ पर ही पड़ सकता है, किसी ठूंठ या सूखे पेड़ पर नहीं, उसी प्रकार सहृदय व्यक्ति ही प्रेमभाव को समझ सकता है। जो निर्मम है, उसे तो निराशा या बुराई ही समझ में आएगी- ‘हरिया जांणे रूखड़ा, उस पाणी का नेह। सूका काठ न जानई, कबहूँ बरसा मेह।’
अहं को छोड़ना होगा
संत कबीरदास जी कहते हैं जीवन का असली सुख पाने के लिए ‘मैं’ यानी अहं को छोड़ना होगा। यूं तो यह शरीर कुछ नहीं, बस एक कच्चे घड़े की तरह है, बस जरा सी ठोकर लगी और टूट गया, लेकिन इसी तन-मन को अगर हम परोपकार में लगाएंगे तो राह कठिन दिखेगी, लेकिन आनंद असीम मिलेगा। उसके लिए सबसे पहले तो जरूरी है अपने अहं को मिटाना, ‘जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं।’ हरि को पाने यानी मन को प्रसन्नचित्त करने की राह थोड़ी कठिन लग सकती है, पर उस पर इसी कठिनाई के साथ ही चलना होगा, ‘लंबा मारग दूरि घर, बिकट पंथ बहु मार। कहौ संतों क्यूं पाइए, दुर्लभ हरि दीदार।’ अगर यह मार्ग दुर्गम लगे, यानी सिर्फ अपने तक सीमित रहना है या मन पर विजय पाने की इच्छाशक्ति न हो तो फिर तो यही हाल होगा, ‘यह तन काचा कुम्भ है, लिया फिरे था साथ। ढबका लागा फूटिगा, कछू न आया हाथ।’ अपने अलावा समाज, देश और आसपास के लिए आप जो करेंगे, असल में वही असली पूंजी है। आज महामारी के संकट में हर कोई परेशान है, इसी परेशानी के दौर में अनेक लोग औरों की सेवा में लगे हैं। अपने हिस्से की जिम्मेदारी सबको निभानी जरूरी है। समाज के लिए किया हुआ ही काम आएगा- ‘कबीर सो धन संचिए जो आगे कूं होइ। सीस चढ़ाए पोटली, ले जात न देख्या कोइ।’
मगहर में समाधि 
निर्गुण भक्ति शाखा के ज्ञानमार्गी संत कवि कबीरदास के जन्म को लेकर कई किंवदंतियां हैं। माना जाता है कि कबीर का जन्म काशी में लहरतारा ताल के पास हुआ था। जन्म वर्ष को लेकर भी अलग-अलग मत हैं। उन्होंने खुद ही अपने जन्म के बारे में लिखा है- ‘चौदह सौ पचपन साल गए, चन्द्रवार एक ठाठ ठए। जेठ सुदी बरसायत को पूरनमासी तिथि प्रगट भए।’ वह स्वामी रामानंद को गुरु मानते थे। उनके गुरु के मुख से निकले राम नाम को ही वह पहली दीक्षा मानते थे, ‘राम नाम के पटतरे देवै को कछु नाहिं, कह ले गुरु संतोषिए हौस रही मन माहिं।’ जन्म की भांति ही उनके निधन को लेकर भी अलग-अलग मत हैं। कहते हैं कि उनकी मृत्यु के बाद उनके हिंदू और मुस्लिम अनुयायी अपनी-अपनी विधि से अंतिम संस्कार कराना चाहते थे, लेकिन जहां उनका शव रखा था वहां कुछ फूल पड़े मिले जो दोनों ओर के अनुयायियों ने थोड़े-थोड़े रख लिए। मगहर में कबीर की समाधि है। नोट : यह लेख दैनिक ट्रिब्यून में छप चुका है। 

Wednesday, June 3, 2020

कोरोना काल और तेजश्वर का सराहनीय अभियान

कोरोना महामारी का दौर। लॉकडाउन के कई चरण। कुछ की चिंता घर में कैसे टाइम पास कैसे करें। कुछ पकवान बनाकर सोशल साइट्स पर डाल रहे हैं। कुछ चैटिंग में व्यस्त हैं। कोई बच्चों के स्कूल से मिले ऑनलाइन होमवर्क में मदद कर रहा है। इन सबसे एक वर्ग ऐसा है जिसके सामने घना अंधेरा है। रोज कुआं खोदते थे और रोज पानी पीते थे। अब क्या करें। निरंतर चल रहे हैं। भूखे प्यासे। मदद के लिए हाथ उठे भी तो स्थिति वैसी ही। अकेले दिल्ली-एनसीआर में ही हजारों लोग रोज सड़कों पर दिखते। ऐसे में एक सराहनीय अभियान सामने आया। तेजेश्वर का। तेजेश्वर सिंह दुग्गल। चंडीगढ़ के सेक्टर 38 स्थित विवेक हाईस्कूल का 12वीं का छात्र। महामारी के दौर में सबसे मुश्किल में पड़े वर्ग का दर्द तेजेश्वर को समझ आया। दिखा। महसूसा गया। दैनिक वेतन भोगी, प्रवासी श्रमिक और आर्थिक रूप से गरीब लोग कहां जायें। अचानक वे आय के किसी भी स्रोत के बिना हैं, और वे अपने परिवारों को भोजन या बुनियादी स्वच्छता सुविधाएं प्रदान करने में सक्षम नहीं हैं। उन्हें वायरस से ज्यादा भुखमरी का डर है। तेजेश्वर को लगा, इस मोड़ पर, हमें, समाज के अधिक विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग को इस कठिन समय में उनका समर्थन करने की आवश्यकता है। लॉकडाउन ने उन पर एक अतिरिक्त बोझ डाल दिया था। तेजेश्वर ने एक अभियान चलाकर करीब 60 हजार रुपये संस्था अक्षय पात्र को सौंपे। ताकि कुछ लोगों को खाना मुहैया कराया जा सके।
लॉकडाउन के दौरान जरूरतमंदों की सेवा के संबंध में कैसे आइडिया आया पूछने पर, तेजेश्वर ने कहा, 'मैंने फ्यूल अ ड्रीम डॉट कॉम पर फंडिंग अभियान शुरू किया। मैंने अपने परिजनों और उनके दोस्तों को अभियान में योगदान देने के लिए कहा। इसके साथ ही अपने मित्रों और उनके परिजनों से भी योगदान के लिए सोशल मीडिया पर अपील की और फोन कॉल किए। मैंने उन्हें समझाया कि अभियान का उद्देश्य एनसीआर और यूपी भर में पका हुआ भोजन उपलब्ध कराना है जो संस्था अक्षय पात्र के जरिये किया जा रहा है। मैंने अपनी पॉकेट मनी और दोस्तों से मिली करीब 60 हजार राशि का योगदान किया।' तेजेश्वर के मुताबिक अब तक जुटाई गई धनराशि उन 2400 लोगों के चेहरे पर मुस्कुराहट लाएगी, जिन्हें भोजन मिलेगा। दान देने वालों को भी इससे सुकून मिलेगा। बेशक सरकार अब लॉकडाउन के पांचवे चरण को अनलॉक-1 की संज्ञा देने लगी है, लेकिन दिक्कतें अभी भी कम नहीं हुई हैं। तेजेश्वर के बारे में पिछले दिनों ट्रिब्यून स्कूल की प्रिंसिपल वंदना सक्सेना से हुई। कई बातों की तरह उन्होंने इसे भी मुझसे साझा किया। मुझे लगा वाकई यह अभियान तो सराहनीय है। आखिर उन्होंने गरीबों की मदद के लिए कदम उठाया है। वंदना जी से चर्चा के बाद मैंने तेजेश्वर के संबंध में कुछ पंक्तियां और उनके अभियान को कई लोगों से साझा किया है। वाकई ऐसे बच्चों से हमें प्रेरणा लेनी चाहिए। वेलडन तेजेश्वर, अब धीरे-धीरे कॅरिअर की दहलीज पर बढ़ोगे, परोपकार की इस भावना को बनाये रखना। कहा भी तो गया है-'अष्टादस पुराणेसु व्यासस्य वचनं द्वयम। परोपकाराया पुण्याय, पापाय परपीडनम।' अर्थात 18 पुराणों में व्यासजी ने दो ही बातें कहीं हैं एक तो परोपकार के समान कोई पुण्य नहीं और दूसरों को कष्ट देने जैसा कोई पाप नहीं। 

Saturday, May 16, 2020

फिलहाल तो बचाव ही उपाय lockdown

लॉकडाउन-4 (lockdown-4) की भी भूमिका बन चुकी है। सवाल वहीं कि आगे क्या? वैसे इशारे इसी तरह के आ रहे हैं कि अब हमें कोरोना जैसी स्थितियों में जीने की आदत बना लेनी चाहिए। बेशक इस बीच एक खबर आई है कि भारत वैक्सीन बनाने में युद्धस्तर पर लगा है, लेकिन वैक्सीन या दवा के आने और उसके कारगर होने में अभी बहुत समय है। इस बीच, अन्य चीजों के अलावा किताबों की दुकानें भी खुन गयी हैं। अभी तक ऑनलाइन बिना किताबों के पढ़ाई कर रहे बच्चों के स्कूलों से भी किताबों की सूची आ गयी है। बाहर माहौल कभी डरावना सा लगता है तो कभी सामान्य सा। आज सेक्टर 27 गया, भावना की दवा लेने। वापसी में देखा कि 30 के पास बने सड़क किनारे मकानों के बाहर बल्लियां लगाकर इलाके को सील किया गया है और एक तरफ की सड़क पर दोनों ओर से आवाजाही चल रही है। बाहर कुछ नजारे वाकई डरावने से होते हैं। जैसे कि एक बाइक पर तीन लोग बैठे हैं और इन दिनों जैसे खाली सड़कें उनकी आवारागर्दी के लिए ही हैं। मुझे ऑफिस आते वक्त कई बार रोका गया, मैंने आराम से अपनी बात बताई, लेकिन इन आवारागर्दों के लिए पता नहीं कई बार पुलिस भी नहीं होती। खैर...
इस दौरान बच्चों से कई बातें होती हैं। कभी मजाकिया और कभी गंभीर। बड़े बेटे ने कहा, पापा इस वक्त निवेश का अच्छा समय है। मैंने कहा निवेश की बात वे करते हैं जिनके पास अतिरिक्त पैसा होता है। कोचिंग की फीस अभी भरी नहीं, निवेश कहां करें। वैसे उसकी राय से मैंने इत्तेफाक जताया। फिर बात हुई आगे के हालात की। दो दिन पहले ही वे लोग शिवखेड़ा का मोटीवेशनल भाषण सुन चुके थे। उन्होंने अपनी बातें बताईं थी, जैसे कि उन्होंने गाड़ियों की सफाई से लेकर क्या-क्या काम नहीं किये। आज वह सफलता का गुरु मंत्र देते हैं। वैसे उनकी किताब करीब डेढ़ दशक पहले मैंने पढ़ी थी जिसका शीर्षक था, ‘जीत आपकी।’ शिव खेड़ा के अलावा अनेक मोटिवेशनल भाषण बच्चे सुनते हैं। भाषण में अनेक ऐसे उदाहरण दिए जाते हैं जिनमें बताया जाता है कि कैसे शुरुआत में पढ़ाई में कमजोर व्यक्ति ने भी कैसे बुलंदियों को छुआ। मतलब बच्चों को यह बताया जाना चाहिए कि जब कमजोर व्यक्ति कोई मुकाम हासिल कर सकता है तो औसत दर्जे का या कुशाग्र बुद्धि वाला कोई व्यक्ति क्यों नहीं? खैर...

आज विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ से जुड़ी दो खबरें आईं। एक तो यह है कि हो सकता है कि कोरोना कभी खत्म ही न हो और दूसरा करोड़ों बच्चों की जान भी इस महामारी में जा सकती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने खसरा, पोलियो जैसी बीमारियों का हवाला दिया, जिनका टीका आने के बावजूद ये बीमारियां जड़ से खत्म नहीं हो पाई हैं। उधर, बच्चों के संबंध में कहा जा रहा है कि उन्हें संक्रमित होने से बचाया जाना बहुत जरूरी है। यह तो पहले से ही कहा जा रहा है कि बच्चों और बूढ़ों को संक्रमण का खतरा ज्यादा है। अब यह हम सबकी जिम्मेदारी बनती है कि हम कोरोना महामारी के इस दौर में खुद बचायें और दूसरों को भी बचाये रखने में सहयोग करें।

Friday, May 15, 2020

भयावह तकलीफदेह स्थिति : कौन लेगा इनकी सुध

केवल तिवारी
उनके दर्द को महसूस करने के लिए भावुक (emotional) दिल (heart) जरूरी है। यह कहना बहुत सहज है कि वे निकल ही क्यों पड़े हैं। पैरों में छाले, कंधे पर बोझ, कांख में गृहस्थी का कुछ सामान समेटे कोई यूं ही नहीं निकलता। भूखे प्यासे। रात को जब घर की ओर जा रहा होता हूं तो छोटे-छोटे बच्चों का हाथ थामे मां-बाप और उनके साथ चल रही एक भीड़ दिखती है। कितना चलेंगे। कभी खबर आती है कि एक मजदूर ने 800 किलोमीटर तक हाथ गाड़ी में अपनी पत्नी और बेटी को घसीटा। कितना सुकून मिला होगा जब वह अपनी देहरी पर पहुंच गया हो। 
भावुक तस्वीर : साभार : इंटरनेट
जीवित रहने के लिए कुछ कमाना ही है, यही सोच उन्हें घर से हजारों किलोमीटर दूर ले गयी और अब जीवित रहना है तो घर चलो की सोच उन्हें पैदल चलने को मजबूर कर रही है। इस तकलीफदेह की स्थिति के लिए कौन जिम्मेदार है। जिम्मेदारी तय करने से पहले यह तो हो कि इनकी सुध लेगा कौन? राज्य सरकारें दावा करती हैं कि उन्होंने अपने लोगों को वापस बुला लिया है। केंद्र सरकार का दावा है कि ट्रेनें चलवाई हैं। ऐसे में ये परेशान भीड़ कहां से निकल रही है। क्या वाकई इनसे हजारों रुपया किराया मांगा जा रहा है? सचमुच हृदय विदारक दृश्य हैं। इनको कोई तो भरोसा दिलाये कि आप जहां हो, वहीं रुको, आपको पहुंचाया जाएगा, जहां आप जाना चाहते हैं। रास्ते में खाना बांटने वाले कई शिविरों की बात की जाती है, लेकिन अनेक शिविर ऐसे हैं जो बस फोटो खिंचवाने तक रहते हैं फिर उनका तंबू उखड़ जाता है। कोरोना ने हर किसी को तकलीफ दी है। चिंताएं भविष्य को लेकर भी हैं। महज भोजन और निवास की ही नहीं, सामाजिक दायरे की भी। क्या मेलजोल का पुराना दायरा लौट पाएगा। क्या शादी-व्याह जैसे तमाम रीति-रिवाज पहले की तरह निभ पाएंगे। क्या मित्र-यारों से उसी बेतकल्लुफी से मिला जा सकेगा। क्या ट्रेनों का वैसा ही सफर होगा। पता नहीं क्या होगा, लेकिन अपनी देहरी पर जा रही इस भीड़ को संभालना जरूरी है। अगर सब जगह से ये कामगार चले ही जाएंगे, तो भविष्य की आर्थिक स्थिति कैसी होगी। उम्मीद तो करनी चाहिए कि सब अच्छा होगा, सब अच्छे के लिए कदम भी उठाने जरूरी हैं। तो चलिए इसी अच्छाई की उम्मीद में आगे बढ़ें। 

Friday, April 24, 2020

विश्वास जगाना होगा बड़ी चुनौती

कोरोना का खौफनाक संक्रमण काल चल रहा है। जो जहां है, वहीं रह गया है। ऐसे में लॉकडाउन खुलने का सभी को इंतजार है। इस इंतजार में ही छिपा है एक प्रश्न? प्रश्न है विश्वास का। आपसी प्रेम का। अभी कई लोग एक शहर से दूसरे शहर जाते हैं। कोई मित्र या रिश्तेदार के यहां रुकता है तो कोई कहीं और। कोरोना काल से पहले लोग भी स्वागत को तैयार रहते थे, अब वैसी ही स्थिति आने में न जाने कितना वक्त लगेगा। कई लोगों को चिंता यही है कि अभी तक आ रहा हूं... जैसे सवाल के जवाब में कहा जाता था, 'स्वागत है।' खाना, सोना बिल्कुल अपने घर जैसा ही। अब संकोच भले ही बना रहे, लेकिन स्वागत की वह गर्माहट फिलहाल तो नहीं दिखेगी। ऐसा ही एक और सवाल है मुलाकात के दौरान हाथ मिलाने का। फिलहाल लोग मिल भी रहे हैं तो नमस्ते, सतश्री अकाल या सलाम करते हैं। तो क्या आने वाले समय में मुलाकात के दौरान यही सब चलता रहेगा या हाथ मिलाने की परंपरा फिर कायम होगी। फिलहाल तो दुनिया के तमाम देशों के बड़े-बड़े नेताओं ने भी हाथ मिलाना छोड़ दिया है। कोरोना के बाद के दौर के लिए कई चुनौतियां हैं, देखना होगा कि उन पर कैसे पार पाया जाये। फिलहाल तो बड़ी चुनौती कोरोना से पार पाने की है। 

Friday, April 17, 2020

एक सवाल और जवाब में समाधान ... जब जिक्र हुआ अवलीन मैडम का

केवल तिवारी
पड़ावों की भव्यता पर मत रख नजर, बस तू चलता रह अपने सफर पर
एक कविता की यह पंक्ति कई मायने छिपाए हुए है। उसी तरह जैसे एक पुराना फिल्मी गीत है, ‘छोटी-छोटी बातों की हैं यादें बड़ीं, भूलें नहीं बीती हुई एक छोटी घड़ी...।’ वाकई कई वाकये ऐसे होते हैं जो हमारे मन मस्तिष्क पर छाये रहते हैं। जरूरी नहीं सबके साथ ऐसा होता हो, लेकिन मेरे मामले में तो ऐसा है। कभी किसी सुगंध के कारण हमें पुरानी बात याद आती है, कई बार तो किसी शब्द को बोलते वक्त भी किसी की याद आ जाती है। मसलन, जब भी में आम या नींबू का ‘होम मेड’ अचार खाता हूं तो मुझे मेरी सबसे बड़ी दीदी याद आती हैं। पूजा-पाठ करते वक्त मां की याद आती है। कुछ शब्दों को लिखता हूं या बोलता हूं तो कई मित्रों की याद आती है। शायद ऐसा ही होता होगा। या नहीं भी। खैर...। अभी इसके लिखने का मौजूं था। असल में बच्चों का स्कूल बंद है। online क्लास चल रही हैं। इसी दौरान कई टीचर्स से संपर्क बना रहता है। कभी व्हाट्सएप (whatsapp) के जरिये तो कभी सीधे फोन कर। जब बच्चे घर पर ही हों तो जाहिर है गुस्सा, प्यार-दुलार और पढ़ाई के संबंध में चर्चा भी उन्हीं की होगी। इसी चर्चा के
श्रीमती अवलीन कौर 
दौरान ट्रिब्यून मॉडल स्कूल में काउंसलर रहीं अवलीन कौर मैडम का जिक्र हुआ।
इन दिनों ऑफिस से पहले के मुकाबले जल्दी पहुंच जाता हूं। सोशल डिस्टेंसिंग का पूरा ध्यान घर पर भी रखना पड़ता है। संवाद होता है, पूरी दूरी के साथ। कई बार बहसें भी होती हैं। कभी किसी मुद्दे पर और कभी बिना मुद्दे के। बातोंबातों में एक दिन में थोड़ा झल्लाया फिर पत्नी ने याद दिलायी अवलीन मैडम की। बोलीं-पता है एक बार हम बच्चे के बारे में कुछ पूछने गये थे तो उन्होंने क्या कहा था। फिर याद दिलाया गया कि उन्होंने कहा था, ‘पहले आप दोनों अपने लिए क्लैप करो।’ असल में बड़ा बेटा 10वीं पास कर स्कूल से निकला तो हम लोग छोटे बेटे के लिए पीटीएम PTM में जाते थे। एक छोटी सी समस्या छोटे को लेकर ही थी, हम उसी का जिक्र कर रहे थे। अवलीन मैडम ने पहले ताली बजवाई तो मैंने कारण पूछा। उन्होंने कहा, ‘आपके बेटे कार्तिक ने आपकी बड़ी तारीफ की।’ असल में स्कूल में कुछ टॉपर्स को बुलाया गया और 10वीं के नये बच्चों को टिप्स देने को कहा गया। इसी क्रम में मेरे बेटे ने मेरी तारीफ कर दी। उससे पहले भी अवलीन मैडम से बात होती थी तो वह कहती थीं कि आप दोनों पति-पत्नी हमेशा पीटीएम में आते हैं, यह अच्छा लगता है और बोलते भी संयमित होकर। एक के बाद एक हैं। मुझे याद आया अपने जीवन का वह दौर जब मैं लखनऊ में ट्यूशन पढ़ाया करता था। बच्चों के माता-पिता पढ़ाई से ज्यादा जिक्र उसकी आदतों को लेकर करते थे। कोई कहता, ‘यह सब्जी नहीं खाता।’ किसी की समस्या होती, ‘दूध पीने में आनाकानी करता है।’ कई बार तो बच्चों के माता-पिता मुझसे बात करते-करते लड़ने भी लगते। उन दिनों में भी तो ‘बच्चा’ ही था। लखनऊ क्रिश्चियन कॉलेज में बीए का छात्र। खैर उसके बाद धीरे-धीरे कई दौर आये। अब कहीं भी जाते हैं या घर पर भी अगर बहस होती है तो कम से कम मैं और मेरी पत्नी एक-दूसरे की बात काटते हुए नहीं लड़ते। बहुत आदर्श नहीं हैं हम लोग। लड़ते हैं। बोलचाल भी बंद होती है, लेकिन बच्चों पर इसका असर कम से कम पड़े, इसका खयाल रहता है। ऐसे ही स्कूल में जाते हैं तो कोशिश होती है कि दोनों साथ नहीं बोलें। खैर यह जीवन का सफर है। अवलीन मैडम की एक और बात याद आयी। जब समस्या उनको बतायी गयी तो उन्होंने तीन वाक्यों में हल निकाल दिया। उन्होंने हमारे सवाल पर एक सवाल पूछा और फिर कहा, ‘आपके जवाब में ही समस्या का समाधान है।’ जीवन की इन छोटी-छोटी बातों को याद करने से ही जीवन बढ़ता है। एक शायर ने कहा है-
 आए ठहरे और रवाना हो गए, ज़िंदगी क्या है, सफ़र की बात है।
एक और शेर पेश करता हूं, मेरा नहीं है-
बस यही दो मसले जिंदगी भर ना हल हुए, ना नींद पूरी हुई ना ख्वाब मुकम्मल हुए...।

संभवत: ऐसा ही होता है। सबकुछ पूरा नहीं होता। अवलीन कौर मैडम का धन्यवाद। बेशक वह अभी ट्रिब्यून स्कूल में नहीं हैं, लेकिन उनसे संवाद बना रहेगा, ऐसी कामना है। उन्होंने भी एक छोटे से वाक्य के लिए मुझे शुक्रिया कहा।

Friday, April 10, 2020

कोरोना संकट, रुटीन लाइफ, रामायण और इफेक्ट-विफेक्ट

केवल तिवारी
कोरोना वायरस के खौफ के बीच देश में चल रहे लॉकडाउन से चारों ओर सन्नाटा पसरा है। सन्नाटा पसरने से पहले ही हमारे समाज के ‘सयाने’ लोगों ने अफरातफरी सी मचा दी थी। जरूरत से पांच गुना सामान खरीद लिया। ऐसा कहा गया कि अब सब खत्म, अपन ध्यान रखो बस... बाकी कुछ नहीं। इसी माहौल में अनेक लोग ऐसे भी थे जिन्होंने मदद के लिए हाथ बढ़ाये। मेरी रुटीन लाइफ में बेशक ज्यादा फर्क नहीं पड़ा है, लेकिन अपने मोहल्ले में और आसपास का वातावरण देखकर लगता है वाकई कुछ लोगों को बहुत फर्क पड़ा है। कुछ लोग एक-दो दिन बाद ही हायतौबा करने लगे, लेकिन इसी दौरान देखा कि खाने-पीने के मामले में जैसी बातें फैलाई जा रही थीं, वैसा कुछ नहीं। मसलन, एक दिन बाद ही दुकानें खुल गयीं। दूध वाला कॉलोनी में ही आने लगा। सब्जी वाले भी आने लगे। इससे पहले भी अनेक मौके ऐसे आये जब यह अहसास हुआ कि कुछ अफवाह तंत्र और कुछ जमाखोरी का एक कीड़ा हमारी व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करता रहा है। 
फोटो : साभार इंटरनेट
खैर... इन्हीं दिनों नवरात्र भी चल रही थीं। सुबह ठीकठाक वक्त पूजा-पाठ में लगता है। इसके साथ रामानंद सागर द्वारा निर्मित टीवी धारावाहिक रामायण भी फिर से प्रसारित हो गया है। सुबह एक घंटा कब निकल गया पता ही नहीं चलता। मैंने शुरुआत में कोशिश की कि बच्चों को अपने साथ बिठाकर दिखाऊं। बच्चों ने हल्की रुचि दिखाई। एक बेटे की तो ऑन लाइन पढ़ाई तेजी से चालू है, इसलिए वह इसे नहीं ही देखता है, लेकिन छोटा वाला देखता है। देखते वक्त उसके तमाम बालसुलभ सवालों की बौछार भी होती है। सवालों के दौरान ही वह अचानक कह उठता है पापा इतने अजीब से इफेक्ट। मैं उसे समझाने की कोशिश करता कि भाव समझो। लेकिन कार्टून फिल्म, टीवी रियलिटी शो देखने वाले बच्चे के समझ में भाव ज्यादा नहीं समझ आये। उसने कुछ तकनीकी कमियां निकाल ही दीं। कुछ दिन बाद मैंने देखा कि वाकई उसे रामायण में दिलचस्पी आने लगी है। कई बार तो उसे आगे की कहानी जानने की लालसा रहती। रामायण की संक्षिप्त कहानी को तो सब जानते हैं, लेकिन धारावाहिक में विस्तार से दिखाया गया है। इसी दौरान राम के वनवास और निषाद राज द्वारा उन्हें छोड़ने का प्रसंग आया। इसी प्रसंग में भारद्वाज ऋषि के आश्रम में निषाद राज नीचे बैठ जाते हैं। मुनि भारद्वाज समझाते हैं कि कोई ऊंची-नीच नहीं होता। राम के मित्र होने के नाते तो आप उनके बराबरी में बैठने के हकदार हो। इसी दौरान बड़ा बेटा बोल बैठा, ‘पापा ये होती है अच्छी बात। एक सीरियल आजकल जो आ रहा है भीमराव। उसमें भीमराव और उनके परिवार के साथ ऊंची जाति के लोग कितना अत्याचार करते हैं।’ फिर पत्नी ने समझाया पहले ऐसा कोई भेदभाव नहीं था, बाद में जब धर्म के ठेकेदार बनने लगे तो ऐसा होने लगा। खैर अब लगातार रामायण देखी जा रही है। घरवाले दोनों समय देखते हैं। चूंकि शाम के वक्त मैं ऑफिस में होता हूं, इसलिए शाम के समय देख नहीं पाता। इस दौरान मुझे वे दिन भी याद आए जब लखनऊ में रामलीला में राम की भूमिका निभाता था। बीच-बीच में चौपाई आदि गाने लगता हूं तो बच्चे नाराज होते हैं। कहते हैं सीरियल खत्म होने दो, उसके बाद गा लेना। खैर जारी है जिंदगी...।

पलायन का वह खौफनाक मंजर
रोज शाम को ऑफिस में खबरों में ही खेलना होता है। खबरों में भी कोरोना के अलावा कुछ है नहीं। कुछ दिन अखबार नहीं आया तो बेचैनी हुई, लेकिन पहली अप्रैल से रुटीन में अखबार आने लगे। इस दौरान कोरोना के खौफ से पलायन संबंधी खबरें आईं। बेहद दुखद। दिल चीरने वाली। कुछ चैनल चलाते कि कोरोना पर भूख भारी। कई चैनल इसी तरह खबर चलाते कि ये सब भूखे-नंगे हैं। दुख हुआ। असल में इन्हें सही से समझाया नहीं गया। वे सिर्फ भूख के कारण नहीं, बल्कि इसलिए भी भाग रहे थे कि मानो कयामत आ गयी। कयामत आ गयी तो घरवालों के संग ही प्राण क्यों न निकले। इस दौरान दिल्ली सरकार के बारे में भी खबरें आईं कि उसका रुख बेहद अगंभीर रहा। खैर ये सब तो जांच का विषय है। फिलहाल इस परेशानी से सब ही जूझ रहे हैं।

पशुओं की स्थिति
इन दिनों पशु बेचैन हैं। आखिर ये दो पैरों वाला पशु चला कहां गया है। अक्सर रात के समय भौंकने वाले कुत्ते दिन में भी भौंकने लगते हैं। चंडीगढ़ की सड़कों पर सांभर, तेंदुए की कई वीडियो वायरल हुई हैं। चंडीगढ़ में हरा-भरा क्षेत्र काफी है। इन दिनों दोपहर तीन बजे मैं जब घर से निकलता हूं तो कई बार कुत्तों, गायों की बदली हुई सी हरकतों को देखता हूं। इक्का-दुक्का चल रही गाड़ियों के बीच वे भौंचक्के से दिखते हैं। हमेशा वाहनों की चिल्ल-पौं मची रहने के दौरान अचानक यह क्या हो गया।

क्या भगवान ने दिखावा न करने का दिया है संदेश
ब्लॉग लिखते-लिखते कई दिन बीत चुके हैं। आज 10 अप्रैल को इसे पूरा कर पा रहा हूं। दो दिन पहले कई लोगों से बात हो रही थी। एक-दो मित्रों ने कहा कि क्या भगवान दिखावे से नाराज हो गए हैं। उन्होंने कहा कि आज इबादत की किसी भी जगह चले जाओ, चाहे मंदिर हो या मस्जिद, चर्च हो या फिर गुरुद्वारा। हर जगह भयानक भीड़। कई जगह जबरन दान की मांग। अनेक जगह दिखावा। कतार में धक्का-मुक्की। क्या ऊपरवाले ने एक सबक दिया है सबको कि भक्ति में दिखावा न हो। मन चंगा तो कठौती में गंगा। घर पर भी इबादत हो सकती है। सही इबादत तो दीन-दुखियों की सेवा है। क्या जाने क्या है। पर इस वक्त सब ऊपर वाले के भरोसे पर हैं।
बीच-बीच में डराता मौसम
अप्रैल आने पर भी ऑफिस में कई लोगों को जैकेट या हाफ स्वेटर पहने देखता हूं तो यकीन नहीं होता कि अप्रैल का आधा माह निकलने को है। प्रदूषण में आई कमी इसका कारण है या कुदरत की कुछ और इच्छा कि बीच-बीच में पश्चिमी विक्षोभ यानी वेस्टर्न डिस्टर्बेंस सक्रिय हो जाता है और बारिश या तेज हवा मौसम के गर्म होते मिजाज को फिर ठंडा कर देता है। कुछ भी हो कुदरत के सामने सारी कायनात बौनी है।
ट्रिब्यून स्कूल की प्रिंसिपल के लेख पर प्रतिक्रिया
Vandana Saxena
Principal Tribune School
इसी दौरान ट्रिब्यून स्कूल की प्रिंसिपल वंदना सक्सेना जी से व्हाट्सएप के जरिये बात हुई। असल में उन्होंने पहली अप्रैल से ही सभी कक्षाओं के लिए व्हाट्सएप ग्रूप बनवा दिये और सभी टीचर्स बच्चों को हल्का-फुल्का काम देने लगे और उनका बच्चों से सीधा संवाद होने लगा। बच्चे इसे एंजॉय भी कर रहे हैं। इसी दौरान उन्होंने एक लेख लिखा और जीवन को नये नजरिए से देखने संबंधी बात उसमें कही। मैंने वह लेख पढ़ा और उनके अंग्रेजी लेख की प्रतिक्रिया हिंदी में दी। वर्ष 1996 से हिंदी आंदोलन से जो जुड़ा ठहरा। नीचे है मेरी प्रतिक्रिया-

नमस्कार मैडम। महज यह नहीं कहूंगा कि लेख बहुत अच्छा है। असल में आपने रिश्तों को फिर से परिभाषित करने की बात से लेकर डार्विन के सिद्धांत योग्यतम की उत्तरजीविता तक का जिक्र करते हुए अनिश्चितता भरे माहौल में उम्मीद की किरण जगाई है। बेशक मेरी रुटीन लाइफ में ज्यादा फर्क नहीं आया, लेकिन घर, परिवार, जानकार लोगों के अनुभव अद्भुत हैं। अनेक लोगों की बुरी लतें छूट गई हैं। भविष्य का पूर्वानुमान इन दिनों कल्पना से परे है, लेकिन आभासी दुनिया में पूरी तरह खो चुके इंसान के लिए यह आत्ममंथन का वक्त है। वशीर बद्र साहब ने बहुत पहले लिख दिया था- कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से, ये हादसों का शहर है जरा फासले से मिला करो। उनसे भी पहले कवि प्रदीप ऐसे गीत लिख गए थे। योग्यतम की उत्तरजीविता के सिद्धांत के साथ ही हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि परिवर्तन ही सृष्टि का नियम है। परिवर्तन हो रहा है और होगा। यह दौर भी निकल जाएगा। बुराई में भी कुछ अच्छाई छिपी होती है। आज प्रदूषण कम हो गया है, रिश्तों में दूरी के बावजूद नयी गर्माहट आई है। सोशल मीडिया के संदेशों में फर्क आ गया है, जो विदेश न जाने के कारण कुंठित रहते थे वे अब ऐसा नहीं सोचते। आपका लेख बहुत बेहतरीन है जो खूबसूरत नयी सुबह की उम्मीद जगाती है। वाकई जीवन प्रवाह में यह रुकावट आत्ममंथन के लिए वक्त मिलने जैसा है और ऐसे लेख उस दिशा में एक कदम के साथ ही मानवता के यज्ञ में एक आहूति सरीखा है। आपको साधुवाद। - केवल तिवारी, चंडीगढ़