दीपक डोबरियाल अभिनीत फिल्म दायें या बायें को नैनीताल फिल्म समारोह में भी प्रदर्शित किया जाएगा।
एजेंसी वार्ता से जारी फिल्म के प्रदर्शन और अन्य जानकारियों के बारे में खबर
प्रतिरोध के सिनेमा का नैनीताल फिल्म समारोह 29 से
नई दिल्ली . 24 अक्टूबर . वार्ता . । प्रतिरोध के सिनेमा को परदा
मुहैया कराने वाला दूसरा नैनीताल फिल्म समारोह 29 से 3। अक्टूबर
तक आयोजित किया जाएगा ।
आयोजकों ने आज यहाँ बताया कि नैनीताल क्लब के शैले हाल में
आयोजित इस तीन दिवसीय समारोह में कुल तीन फीचर और लगभग
।5 डाक्यूमेंटरी फिल्में प्रदर्शित की जाएंगी । किसी प्रायोजक के
सहयोग के बिना आयोजित इस समारोह में हिस्सा लेने के लिए टिकट
या पास की जरूरत नहीं होगी ।
यह जन संस्कृति मंच के फिल्म समूह . द ग्रुप . प्रतिरोध के सिनेमा का
।5 वां समारोह होगा । इससे पहले ए समारोह गोरखपुर में पांच .
लखनऊ में तीन . भिलाई में दो और इलाहाबाद . पटना . बरेली और
नैनीताल में एक बार आयोजित किए जा चुके हैं ।
गिर्दा और निर्मल पांडे की याद में आयोजित इस समारोह में दिखाई
जाने वाली फीचर फिल्में बेला नेगी की दाएं या बाएं . परेश कामदार की
खरगोश और संकल्प मेश्राम की छुटकन की महाभारत होगी ।
समारोह में वसुधा जोशी की तीन डाक्यूमेंटरी फिल्मों अल्मोडियाना .
फार माया और वायसेस फ्राम बलियापाल का प्रदर्शन किया जाएगा ।
इसके अलावा गिर्दा और निर्मल पांडे पर प्रदीप पांडे . मोहन जोशी और
प्रदीप दास की लघु फिल्में भी दिखाई जाएंगी ।
इसमें दिखाई जाने वाली अन्य डाक्यूमेंटरी फिल्में होंगी संजय
काक की जश्ने आजादी . अजय भारद्वाज की कित्ते मिल वे माही .
देवरंजन सारंगी की हिन्दू टू हिंदुत्व . अनुपमा श्रीनिवासन की आई
वंडर और अजय टी जी की अंधेरे से पहले ।
फिल्मकारों के साथ सीधे संवाद के अलावा इस समारोह में उत्तराखंड
में हाल में हुई प्राकृतिक आपदा पर फोटो पत्रकार जयमित्र बिष्ट की
तस्वीरों की प्रदर्शनी भी लगाई
Sunday, October 24, 2010
Friday, October 22, 2010
फिल्म दाएं या बाएं से दीपक की जोरदार एंट्री

मित्र राजेश के मार्फत मित्र बने दीपक डोबरियाल की एक और फिल्म आ रही है दाएं या बाएं। वह इसमें मुख्य किरदार की भूमिका निभा रहे हैं। 29 अक्टूबर को रिलीज हो रही है। संभव हो तो देख लें
जनकवि एवं समाजसेवी स्व. गिरदा ने भी निभाया किरदार
छोटे बजट की सशक्त फिल्म साबित होने का दावा
अगले हफ्ते रिलीज होने वाली कम बजट की फिल्म दाएं या बाएं से कई लोगों की उम्मीदें जगी हैं। बेला नेगी निर्देशित इस फिल्म में मुख्य भूमिका निभाई है ओमकारा, 1971, दिल्ली-6, शौर्य, 13बी, गुलाल, मुंबई कटिंग, तनु वेड्स मनु जैसी फिल्मों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले दीपक डोबरियाल ने। फिल्म का निर्माण्ा और लेखन भी किया है बेला नेगी ने। इसमें जाने माने समाजसेवी एवं जनकवि गिरीश तिवारी उर्फ गिरदा ने एक स्कूल प्रधानाचार्य की भूमिका निभाई है।
नईदुनिया से फोन पर बातचीत करते हुए मुख्य किरदार निभा रहे दीपक डोबरियाल और बेला नेगी ने कहा कि फिल्म कम बजट की जरूर है लेकिन इसमें संदेश बहुत सशक्त है। फिल्म में दीपक शहरों में पढ़ा-लिखा एक युवक है। वह पहाड़ के अपने गांव में आकर वहां अध्यापक लगता है। उसकी दिली इच्छा है कई तरह के परिवर्तन की। उसके रास्ते में आने वाली अड़चनों और अंतत: उनसे पार पाने को बहुत ही अच्छे ढंग से फिल्माया गया है। हिंदी भाषा में बनी इस फिल्म के सभी दृश्य पहाड़ी इलाकों की है। फिल्म में वहां के जन-जीवन को और उनसे जुड़ी अन्य बातों को भी बहुत सशक्त तरीके से दिखाया गया है। दीपक और गिरदा के अलावा फिल्म में मानव कौल, बदरुल इस्लाम, भारती भट्ट, प्रत्यूष डोकलन आदि हैं। फिल्म से जुड़े लोगों का कहना है कि यह फिल्म अपने सशक्त पटकथा और पहाड़ों की पृष्ठभूमि को सशक्त माध्यम से उठाने के लिए तो चर्चित रहेगी ही महान आंदोलनकारी एवं कवि गिरीश तिवारी गिरदा, जिनका हाल ही में निधन हुआ था, को भी श्रद्धांजलि होगी।
केवल तिवारी
Tuesday, October 19, 2010
महाश्वेता देवी से बहुत प्रभावित हैं नुजहत हसन
करीब सालभर पूर्व नेश्ानल बुक ट्रस्ट की निदेशक नुजहत हसन (वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी) नईदुनिया दफ्तर में आईं थीं। उनके पति भी आईपीएस अफसर हैं। पुलिस प्रशासन में भी काम करने का उनका लंबा अनुभव है। उनसे नईदुनिया की मेट्रो टीम ने विस्तार से बातचीत की और मैंने बाद में उस बातचीत को खबर के रूप में लिखा। पेश है ब्लॉग पढ़ने वालों के लिए वह स्टोरी:
एनबीटी निदेशक नुजहत हसन से बातचीत
सारे मनुष्य बुनियादी तौर पर एक जैसे हैं
काम कोई भी हो रमने पर अच्छा लगता है
पुलिस की वर्दी और नए काम से कुछ सीखा ही है
किसी को भी कभी मुगालते में नहीं रहना चाहिए
पुलिस अफसर से किताबों की दुनिया में बैठने का काम तो एकदम अलग है, लेकिन इससे बहुत कुछ नया सीखने को मिला है। नेशनल बुक ट्रस्ट की निदेशक आईपीएस अधिकारी नुजहत हसन का मानना है कि चीजें बदलने से अनुभव ही मिलता है। नईदुनिया दफ्तर में आईं श्रीमती हसन ने अपने पुलिस सेवा के अनुभवों और निजी जीवन के बारे में विस्तार से बात की। पेश है बातचीत के कुछ अंश
कुछ मामले आर्थिक पहलुओं के चलते रुक जाते हैं और कुछ पर योजनाएं कारगर नहीं हो पाती। लेकिन आशाजनक यह है कि पुस्तक संस्कृति बेहतर तरीके से विकसित हो रही है। अच्छे विषयवस्तु के साथ तमाम भाषाओं में पुस्तकों के प्रकाशन से हमें बेहद खुशी है और एकदम बदले परिवेश में काम करने का अनुभव भी अच्छा मिल रहा है। नेशनल बुक ट्रस्ट की निदेशक नुजहत हसन का कहना है कि किताबों की दुनिया में आकर बहुत कुछ नया सीखने को मिला। यहां आकर ही मैं महाश्वेता देवी के करीब आई और उनसे बहुत प्रभावित हुई।
बातचीत के दौरान पुरानी यादों को कुरेदने का जब सिलसिला शुरू हुआ तो तमाम यादों को उन्होंने बांटा। कोई यादगार लम्हे के बारे में पूछने पर श्रीमती हसन ने बताया कि एक छोटी सी घटना है, लेकिन है बहुत रोचक। उन्होंने बताया कि घटना तब की है जब वह पूर्वी दिल्ली में पुलिस उपायुक्त थीं। किसी इलाके में चोरी हो गई। घटना का विस्तृत विवरण लिखा जा रहा था, तभी एक किशोर बोला कि मेरे नए जूते खो गए हैं। जूते बहुत अच्छे थे। उस समय पुलिस ने इसे बहुत सामान्य अंदाज में लिया। असली मकसद चोरों का भांडा फोड़ना था। लेकिन बाद में जब रिकवरी हुई तो वे जूते भी बरामद हो गए। सामान जब सौंपा गया तो उस बच्चे की खुशी देखने लायक थी। हमें तब बेहद सुकून मिला।
एनबीटी निदेशक नुजहत हसन ने कहा कि एक अजीब सा यह अनुभव भी रहा कि लोग पूरी जानकारी के बगैर आरोप लगाना शुरू कर देते हैं। उन्होंने कहा कि एक बार बच्चा खोने की एक घटना में लोग पुलिस पर आरोप लगा रहे थे कि जांच ठीक नहीं हो रही। मुझसे लोगों ने लिखित शिकायत की। मैंने जब अपने स्तर पर मामले को देखा तो जांच सही दिशा में चल रही थी। कुछ दिनों बाद बच्चे को मुक्त भी करा लिया गया।
फिलहाल वर्दी का रौब छूट गया है, अजीब नहीं लगता, पूछने पर उन्होंने कहा कि किसी को भी कभी मुगालते में नहीं रहना चाहिए। आज वर्दी है, कल नहीं भी हो सकती है। फिर एक जैसे काम से बोरियत भी तो हो जाती है। हां एनबीटी में आने पर शुरू में अजीब थोड़ा इसलिए लगा कि इस ढांचे को ठीक से जानती नहीं थी। लेकिन धीरे-धीरे सब सामान्य हो गया। उन्होंने कहा कि बुनियादी तौर पर मनुष्य एक जैसा होता है। श्रीमती हसन ने कहा कि वह कई बार खुद से ही सवाल करती हैं। यदि कोई अपने काम को ही ठीक से आंक ले तो सबकुछ ठीक हो जाता है।
खुद आईपीएस अधिकारी और जीवन साथी भी आईपीएस हैं, कैसे निभती है पूछने पर श्रीमती हसन बोलीं, मैं कुछ भी होती, लेकिन शादी पुलिस अफसर से ही करती। क्यों? नुजहत कहती हैं कि जो व्यक्ति इतने सारे पुलिसिया महकमे को देख रहा है, वह निश्चित रूप से पारिवारिक और सामाजिक जीवन में भी संतुलन बनाए रखेगा। पुलिस अधिकारियों का घर में भी समान रौब चलता है, पूछने पर श्रीमती हसन ने कहा कि दरवाजे तक पुलिस की वर्दी होती है, अंदर हर कोई आम इंसान होता है। बातों बातों में पुलिस और हिंदी फिल्मों की बात छिड़ गई। एक सवाल के जवाब में श्रीमती हसन ने कहा कि पुलिस की छवि का नुकसान जितना ज्यादा हिंदी ने किया है, उतना किसी ने नहीं। इसी संदर्भ में उन्होंने यह भी कहा कि उनकी रुचि खुद फिल्मों के निर्माण की है, लेकिन कई बार आदमी चीजों को सिर्फ सोच ही पाता है। पुलिस सेवा में फिर कब से लौट रही हैं, सवाल पर पहले श्रीमती हसन हंसती हैं फिर कहती हैं आना तो है ही। जब हुक्म आ जाए।
एनबीटी निदेशक नुजहत हसन से बातचीत
सारे मनुष्य बुनियादी तौर पर एक जैसे हैं
काम कोई भी हो रमने पर अच्छा लगता है
पुलिस की वर्दी और नए काम से कुछ सीखा ही है
किसी को भी कभी मुगालते में नहीं रहना चाहिए
पुलिस अफसर से किताबों की दुनिया में बैठने का काम तो एकदम अलग है, लेकिन इससे बहुत कुछ नया सीखने को मिला है। नेशनल बुक ट्रस्ट की निदेशक आईपीएस अधिकारी नुजहत हसन का मानना है कि चीजें बदलने से अनुभव ही मिलता है। नईदुनिया दफ्तर में आईं श्रीमती हसन ने अपने पुलिस सेवा के अनुभवों और निजी जीवन के बारे में विस्तार से बात की। पेश है बातचीत के कुछ अंश
कुछ मामले आर्थिक पहलुओं के चलते रुक जाते हैं और कुछ पर योजनाएं कारगर नहीं हो पाती। लेकिन आशाजनक यह है कि पुस्तक संस्कृति बेहतर तरीके से विकसित हो रही है। अच्छे विषयवस्तु के साथ तमाम भाषाओं में पुस्तकों के प्रकाशन से हमें बेहद खुशी है और एकदम बदले परिवेश में काम करने का अनुभव भी अच्छा मिल रहा है। नेशनल बुक ट्रस्ट की निदेशक नुजहत हसन का कहना है कि किताबों की दुनिया में आकर बहुत कुछ नया सीखने को मिला। यहां आकर ही मैं महाश्वेता देवी के करीब आई और उनसे बहुत प्रभावित हुई।
बातचीत के दौरान पुरानी यादों को कुरेदने का जब सिलसिला शुरू हुआ तो तमाम यादों को उन्होंने बांटा। कोई यादगार लम्हे के बारे में पूछने पर श्रीमती हसन ने बताया कि एक छोटी सी घटना है, लेकिन है बहुत रोचक। उन्होंने बताया कि घटना तब की है जब वह पूर्वी दिल्ली में पुलिस उपायुक्त थीं। किसी इलाके में चोरी हो गई। घटना का विस्तृत विवरण लिखा जा रहा था, तभी एक किशोर बोला कि मेरे नए जूते खो गए हैं। जूते बहुत अच्छे थे। उस समय पुलिस ने इसे बहुत सामान्य अंदाज में लिया। असली मकसद चोरों का भांडा फोड़ना था। लेकिन बाद में जब रिकवरी हुई तो वे जूते भी बरामद हो गए। सामान जब सौंपा गया तो उस बच्चे की खुशी देखने लायक थी। हमें तब बेहद सुकून मिला।
एनबीटी निदेशक नुजहत हसन ने कहा कि एक अजीब सा यह अनुभव भी रहा कि लोग पूरी जानकारी के बगैर आरोप लगाना शुरू कर देते हैं। उन्होंने कहा कि एक बार बच्चा खोने की एक घटना में लोग पुलिस पर आरोप लगा रहे थे कि जांच ठीक नहीं हो रही। मुझसे लोगों ने लिखित शिकायत की। मैंने जब अपने स्तर पर मामले को देखा तो जांच सही दिशा में चल रही थी। कुछ दिनों बाद बच्चे को मुक्त भी करा लिया गया।
फिलहाल वर्दी का रौब छूट गया है, अजीब नहीं लगता, पूछने पर उन्होंने कहा कि किसी को भी कभी मुगालते में नहीं रहना चाहिए। आज वर्दी है, कल नहीं भी हो सकती है। फिर एक जैसे काम से बोरियत भी तो हो जाती है। हां एनबीटी में आने पर शुरू में अजीब थोड़ा इसलिए लगा कि इस ढांचे को ठीक से जानती नहीं थी। लेकिन धीरे-धीरे सब सामान्य हो गया। उन्होंने कहा कि बुनियादी तौर पर मनुष्य एक जैसा होता है। श्रीमती हसन ने कहा कि वह कई बार खुद से ही सवाल करती हैं। यदि कोई अपने काम को ही ठीक से आंक ले तो सबकुछ ठीक हो जाता है।
खुद आईपीएस अधिकारी और जीवन साथी भी आईपीएस हैं, कैसे निभती है पूछने पर श्रीमती हसन बोलीं, मैं कुछ भी होती, लेकिन शादी पुलिस अफसर से ही करती। क्यों? नुजहत कहती हैं कि जो व्यक्ति इतने सारे पुलिसिया महकमे को देख रहा है, वह निश्चित रूप से पारिवारिक और सामाजिक जीवन में भी संतुलन बनाए रखेगा। पुलिस अधिकारियों का घर में भी समान रौब चलता है, पूछने पर श्रीमती हसन ने कहा कि दरवाजे तक पुलिस की वर्दी होती है, अंदर हर कोई आम इंसान होता है। बातों बातों में पुलिस और हिंदी फिल्मों की बात छिड़ गई। एक सवाल के जवाब में श्रीमती हसन ने कहा कि पुलिस की छवि का नुकसान जितना ज्यादा हिंदी ने किया है, उतना किसी ने नहीं। इसी संदर्भ में उन्होंने यह भी कहा कि उनकी रुचि खुद फिल्मों के निर्माण की है, लेकिन कई बार आदमी चीजों को सिर्फ सोच ही पाता है। पुलिस सेवा में फिर कब से लौट रही हैं, सवाल पर पहले श्रीमती हसन हंसती हैं फिर कहती हैं आना तो है ही। जब हुक्म आ जाए।
Sunday, October 17, 2010
फ्लैट संस्कृति में कन्या पूजन कार्यक्रम से गदगद हुआ
शहरी जीवन खासतौर पर फ्लैट संस्कृति में एकाध मौकों को देखकर लगता है जैसे चहल-पहल लौट आई। जैस नवरात्र का ही मौका। लोग अचानक भक्ति में लीन दिखते हैं। इस दौरान शराब नहीं पीते। यह अलग बात है कि विजयदशमी के दिन से ही फिर कई रावण जिंदा हो उठते हैं। मुझे भक्ति का प्रदर्शन तो बहुत खराब लगता है जैसे माइक लगाकर फुल स्पीड में जागरण करना, रामायण पाठ करवाना, वगैरह-वगैरह। लेकिन इस बार की नवरात्र में मैं कन्या पूजन कार्यक्रम देखकर बहुत गदगद हो गया। पत्नी के विशेष आग्रह पर मैंने भी कन्याओं को खिलाने के कार्यक्रम के लिए सहमति दी। वह बच्चियों के लिए कुछ उपहार खरीद लाई। तय हुआ कि सुबह जल्दी उठकर पकवान बनाए जाएंगे, पूजा की जाएगी और कन्याओं को खिलाया जाएगा। कन्याओं का हिसाब लगाया गया फ्लैट नंबर से। हमारी कालोनी में 30 ब्लॉक हैं। प्रत्येक ब्लॉक में 16 फ्लैट हैं। मेरे ब्लॉक में एक घर अब तक बंद पड़ा है, यानी वहां कोई नहीं रहता। इस तरह 15 घर हैं। एक घर में स्टूडेंट्स ही रहते हैं। यानी घर में बच्चों वाला माहौल नहीं है। चार-पांच फ्लैट ऐसे हैं जिनमें फ्लैट के मालिक नहीं रहते। किराएदार अक्सर बदलते रहते हैं। इस तरह फ्लैट नंबरों से कन्याओं का हिसाब लगाया गया। जैसे एक बच्ची 3108 में है। एक 2109 में है। एक बगल के ब्लाक में 2080 में है, वगैरह-वगैरह। मेरे गदगद होने की यही मुख्य वजह थी। अपने परिवार, मोहल्ले, रिश्तेदारी में पहले भी कन्या पूजन कार्यक्रम देखे थे। ज्यादातर जगह देखा कन्या पूजन में भी जात-पात का खास ख्याल रखा जाता था। कभी गांव गया तो वहां तो पूरा गांव ही ब्राह्मणों का था। कभी कन्याएं कम हुईं तो यह कभी न सुना और न देखा कि किसी ठाकुर साहब की बेटी को बुला लिया गया हो या फिर किसी शिल्पकार (अनुसूचित जाति) की बेटी को। पंडित की ही बेटी होनी चाहिए। कम हो गई तो एक हिस्सा ऐसे ही रखकर किसी पंडित को दान दे दिया गया।
इस बार नवरात्र में इस फ्लैट संस्कृति में पत्नी के आग्रह पर कन्या पूजन कार्यक्रम में मैंने जिज्ञासावश पूछ ही लिया। ये बच्चियां कौन-कौन हैं। उसने फ्लैट नंबर गिना दिए। मैंने कुरेदा अरे भई ये बताओ कि पांडेजी की बेटी है, शर्माजी की बेटी है, तिवारी जी की है या किसकी। पत्नी ने कहा, मुझे नहीं मालूम। यह बच्ची तान्या है, यह श्रद्धा है। यह तीसरी बगल वाले ब्लॉक से आई है। दो ये नीचे यादव जी की बेटियां हैं और वह त्यागी जी की। यादवजी को और त्यागीजी को मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूं क्योंकि कभी आरडब्लूए में सक्रियता के चलते और कभी जीना उतरते-चढ़ते नमस्कार हो जाती है। उनकी बच्चियां भी अंकल नमस्ते करती हैं। मुझे बहुत खुश्ाी हुई। यह जानकर कि पत्नी ने कन्याओं के इंतजाम में जाति का ब्रेकर नहीं लगाया है। काश! ऐसा ही हो हर मामले में। कन्या पूजन में जैसे किसी पांडेजी, तिवारी जी, शर्माजी को नहीं ढूंढ़ा गया, इसी तरह अन्य मसलों पर भी यह सब नहीं देखा जाता। नवरात्र पर ऐसी कन्या पूजन से मैं वाकई खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहा हूं।
उधर विजय दशमी की शाम को ही नौ दिन के सूफी लोगों को रावण जैसा बनते भी मैंने देखा। कुछ तो प्यालों पर ऐसे टूट पड़े जैसे जेलखाने से छूटा आदमी बाहर की दुनिया देखता है। उनकी इस भगवत भक्ति पर वही शेर याद आया
मस्जिद में बैठकर पीने दे मुझे, नहीं तो वह जगह बता जहां खुदा नहीं।
केवल तिवारी
इस बार नवरात्र में इस फ्लैट संस्कृति में पत्नी के आग्रह पर कन्या पूजन कार्यक्रम में मैंने जिज्ञासावश पूछ ही लिया। ये बच्चियां कौन-कौन हैं। उसने फ्लैट नंबर गिना दिए। मैंने कुरेदा अरे भई ये बताओ कि पांडेजी की बेटी है, शर्माजी की बेटी है, तिवारी जी की है या किसकी। पत्नी ने कहा, मुझे नहीं मालूम। यह बच्ची तान्या है, यह श्रद्धा है। यह तीसरी बगल वाले ब्लॉक से आई है। दो ये नीचे यादव जी की बेटियां हैं और वह त्यागी जी की। यादवजी को और त्यागीजी को मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूं क्योंकि कभी आरडब्लूए में सक्रियता के चलते और कभी जीना उतरते-चढ़ते नमस्कार हो जाती है। उनकी बच्चियां भी अंकल नमस्ते करती हैं। मुझे बहुत खुश्ाी हुई। यह जानकर कि पत्नी ने कन्याओं के इंतजाम में जाति का ब्रेकर नहीं लगाया है। काश! ऐसा ही हो हर मामले में। कन्या पूजन में जैसे किसी पांडेजी, तिवारी जी, शर्माजी को नहीं ढूंढ़ा गया, इसी तरह अन्य मसलों पर भी यह सब नहीं देखा जाता। नवरात्र पर ऐसी कन्या पूजन से मैं वाकई खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहा हूं।
उधर विजय दशमी की शाम को ही नौ दिन के सूफी लोगों को रावण जैसा बनते भी मैंने देखा। कुछ तो प्यालों पर ऐसे टूट पड़े जैसे जेलखाने से छूटा आदमी बाहर की दुनिया देखता है। उनकी इस भगवत भक्ति पर वही शेर याद आया
मस्जिद में बैठकर पीने दे मुझे, नहीं तो वह जगह बता जहां खुदा नहीं।
केवल तिवारी
मित्र के ब्लॉग सोत्डू पर एक पीस अच्छा लगा हूँ ब हूँ यहाँ दे रहा hoon
बॉसत्व एक भाव है.... स्थिति नहीं, पद नहीं.... भाव। कुछ लोग इसी भाव के साथ पैदा होते हैं (प्रोफेशन में)..... कुछ लोग उम्र गुज़ारने के बाद भी- पद पाने के बाद भी इस भाव को प्राप्त नहीं हो पाते.... कुछ जो ज़्यादा स्मार्ट होते हैं, मौका मिलते ही भाव को प्राप्त हो जाते हैं.... लेकिन ऐसे विरले ही होंगे जो पद न रहने पर इस भाव से मुक्ति पा जाएं.....
पहले भी सोचता रहा हूं- पिछले कुछ वक्त से ज़्यादा साफ़ दिख रहा है कि - अपन बॉस मटीरियल नहीं हैं। बॉसत्व प्राप्त लोगों से अपनी कभी अच्छी पटी भी नहीं.... कुछ मित्र भी बॉसत्व को प्राप्त हो गए हैं लेकिन वो तभी तक मित्र हैं जब तक उनके साथ काम न करना पड़े (एक के साथ करना पड़ा तो अब वो मित्र नहीं है)।
वैसे बॉसत्व की एक स्थिति को मैं भी प्राप्त हो गया हूं (करीब साल भर से) लेकिन भाव को प्राप्त नहीं हो पाया। अब भी मैं एक टीम लीडर ही हूं। वही टीम लीडर जो अमर उजाला में था (चाहे टीम दो-तीन आदमियों की क्यों न हो)। निश्चित काम, काम की निश्चित शर्तें और उसे डिलीवर करने का निश्चित समय। इन चीज़ों के साथ अपन ठीक रहे..... थोड़ी-बहुत जॉब सेटिस्फेक्शन भी मिलती रही। लेकिन बॉस के मन को पढ़ लेने की कला में अपन हमेशा ही पिछड़े रहे.... इसलिए करियर में भी पिछड़े ही रहे।
ये बात अब पुरानी हो गई है कि जिन्हें हम चूतिया कहते थे (काम के लिहाज से) वो आगे बढ़ते रहे..... अब वो इतने आगे बढ़ चुके हैं कि उन्हें चूतिया कहना दरअसल खुद बनना है। पहले तो समझ नहीं आता था अब साफ़ दिखता है.... काम करने वाला हमेशा काम ही करता रहेगा और तरक्की करने वाला तरक्की का रास्ता ढूंढ ही लेगा।
अभी कुछ वक्त पहले एक ने पूछा-
कहां हो
यहीं
मतलब काम कहां कर रहे हो
काम या नौकरी
मतलब
मतलब काम क्या और नौकरी कहां
अच्छा नौकरी कहां कर रहे हो
साधना न्यूज़ नोएडा
(मुझे पता था वो कहां है) तुम क्या कर रहे हो
वही जो हमेशा करते थे
मतलब- बकलोली
वो बुरा मान गया
लेकिन वो बॉस हो ही नहीं सकता जिसे बकलोली न आती हो..... बॉस से दबना और जूनियर्स को दबाना... ख़बर या अफ़वाह सही आदमी तक पहुंचाना.... बॉस के मूड के हिसाब से काम करना और सही वक्त पर सही आदमी चुनकर उसके लटक जाना..... इसके अलावा तरक्की का क्या कोई और नुस्खा है ?
अगर जानते हो तो मुझे भी बताना
साभार सोत्डू
पहले भी सोचता रहा हूं- पिछले कुछ वक्त से ज़्यादा साफ़ दिख रहा है कि - अपन बॉस मटीरियल नहीं हैं। बॉसत्व प्राप्त लोगों से अपनी कभी अच्छी पटी भी नहीं.... कुछ मित्र भी बॉसत्व को प्राप्त हो गए हैं लेकिन वो तभी तक मित्र हैं जब तक उनके साथ काम न करना पड़े (एक के साथ करना पड़ा तो अब वो मित्र नहीं है)।
वैसे बॉसत्व की एक स्थिति को मैं भी प्राप्त हो गया हूं (करीब साल भर से) लेकिन भाव को प्राप्त नहीं हो पाया। अब भी मैं एक टीम लीडर ही हूं। वही टीम लीडर जो अमर उजाला में था (चाहे टीम दो-तीन आदमियों की क्यों न हो)। निश्चित काम, काम की निश्चित शर्तें और उसे डिलीवर करने का निश्चित समय। इन चीज़ों के साथ अपन ठीक रहे..... थोड़ी-बहुत जॉब सेटिस्फेक्शन भी मिलती रही। लेकिन बॉस के मन को पढ़ लेने की कला में अपन हमेशा ही पिछड़े रहे.... इसलिए करियर में भी पिछड़े ही रहे।
ये बात अब पुरानी हो गई है कि जिन्हें हम चूतिया कहते थे (काम के लिहाज से) वो आगे बढ़ते रहे..... अब वो इतने आगे बढ़ चुके हैं कि उन्हें चूतिया कहना दरअसल खुद बनना है। पहले तो समझ नहीं आता था अब साफ़ दिखता है.... काम करने वाला हमेशा काम ही करता रहेगा और तरक्की करने वाला तरक्की का रास्ता ढूंढ ही लेगा।
अभी कुछ वक्त पहले एक ने पूछा-
कहां हो
यहीं
मतलब काम कहां कर रहे हो
काम या नौकरी
मतलब
मतलब काम क्या और नौकरी कहां
अच्छा नौकरी कहां कर रहे हो
साधना न्यूज़ नोएडा
(मुझे पता था वो कहां है) तुम क्या कर रहे हो
वही जो हमेशा करते थे
मतलब- बकलोली
वो बुरा मान गया
लेकिन वो बॉस हो ही नहीं सकता जिसे बकलोली न आती हो..... बॉस से दबना और जूनियर्स को दबाना... ख़बर या अफ़वाह सही आदमी तक पहुंचाना.... बॉस के मूड के हिसाब से काम करना और सही वक्त पर सही आदमी चुनकर उसके लटक जाना..... इसके अलावा तरक्की का क्या कोई और नुस्खा है ?
अगर जानते हो तो मुझे भी बताना
साभार सोत्डू
Sunday, October 10, 2010
व्यवस्था में भ्रष्टाचार का वायरस
भ्रष्टाचार एक वायरस की तरह आज पूरी व्यवस्था में घुस चुका है। इसकी गहरी जड़ों का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कई बार आधिकारिक रूप से लिए गए निर्णय और उसके बाद कार्रवाई पर भी इसका चाबुक बीस साबित हो जाता है। व्यवस्था में बने रहने की बात हो या उसी का हिस्सा बनने की, भ्रष्टाचार का गोल चक्कर ऐसा है कि यह जुमला बन गया कि 'मुफ्त में कुछ नहीं होता।"
मृत्यु प्रमाणपत्र बनाने की बात हो या फिर शवों की अंत्येष्टि का मामला, शल्य चिकित्सा और दवा आपूर्ति का मामला हो सामान्य ट्रैफिक चालान से लेकर एफआईआर दर्ज करने की बात या फिर कोर्ट में चल रहा ट्रायल, राशन कार्ड से लेकर भू रिकॉर्ड की बात हो या पार्किंग से लेकर रेहड़ी-पटरी की बात हो। निर्माण की अनुमति का मामला हो या फिर तोड़फोड़ कार्रवाई की बात, खरीद मामला हो, फाइल आगे बढ़ाने की बात हो, चेक भुगतान का मामला हो, विकास कार्य या कल्याण योजना की बात हो, विभिन्न् तरह के अनापत्ति प्रमाणपत्र की बात हो या फिर कर निर्धारण का मामला। बात किसी की नियुक्ति या प्रोन्न्ति का हो, स्थानांतरण या फिर दंडित करने की बात। या यह कहें कि कोई भी सरकारी कामकाज, सबमें आज स्थिति यह है कि लेने-देने की बात को जैसे आत्मसात कर लिया गया हो। शायद ही कोई ऐसा काम होगा जहां लेन-देन की प्रकिया या इसकी बात न होती हो।
भ्रष्टाचार के वायरस का एक भयावह पहलू यह भी है कि भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा व्यक्ति इससे बच निकलने का रास्ता भी जानता है। कैसे वह पकड़ से बाहर रहे और यदि पकड़ा भी जाए तो कैसे उससे बचा जाए उसे भलीभांति आता है। व्यवस्था के कई चक्र ऐसे हैं कि जांच में भी मुश्किल आती है। असल में लंबी न्यायिक प्रणाली, गवाहों की खरीद-फरोख्त और लंबा समय निकलने के बाद यह युक्ति का चल जाना कि 'वह तो अब तक दोषी साबित नहीं हुआ" इस मामले को और घातक बनाता है। लगता है हमारे देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ जोश-ओ-खरोश दिखाने में कुछ हिचकिचाहट है। इससे इतर स्कैंडिनेवियाई जैसे न्यूजीलैंड या ऐसे ही कुछ और देशों में इसके स्तर को दसवें हिस्से तक लाया जा चुका है। अपने यहां हम यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि इस मामले में 'शून्य सहनशीलता" का फार्मूला अपनाएं या इसे छोड़ देने का। हमारे यहां भ्रष्टाचार मिटाने की दिशा में उत्साही कदम बढ़ाने के बजाय ज्यादातर ध्यान और शक्ति दिखावे के कामों में बर्बाद हो रही है।
कितना दुखद पहलू है कि सार्वजनिक सेवा में आने के बाद शपथ लेने वाले अगले ही पल उसका अनुपालन भूल जाते हैं। वह शपथ लेते हैं कि 'हम भारत के सार्वजनिक सेवा में जुड़े लोग सत्य और निष्ठा से शपथ लेते हैं कि अपने हर तरह के कार्य में पारदर्शिता बरतते हुए एकता को कायम रखते हुए भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए कार्य करते रहेंगे।" आज यह सर्वविदित है कि कितने लोग शपथ पर कायम रह पाते हैं।
भ्रष्टाचार उन्मूलन के मामले में एक महत्वपूर्ण बात सबके लिए विचारणीय है कि भ्रष्टाचार के विष को खत्म करने में अगर हम खुद को असमर्थ पाते हैं तो कम से कम उसके प्रसार को रोकने में तो कुछ भूमिका निभाई जा सकती है। इस संबंध में जोसेफ पुलित्जर ने संभवत: सही कहा है, 'किसी भी अपराध, चकमेबाजी, चाल, ठगी, अनैतिक कार्य गोपनीय नहीं रह सकते। इन सब चीजों को खुले दिमाग से मीडिया के माध्यम से सबके सामने रखें, गलत पर प्रहार करें, उनका तिरस्कार करें फिर देखिए जल्दी ही जनमत उन्हें साफ कर देगा।" यानी भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों को सामाजिक बहिष्कार का कड़वा घूंट देना होगा। समाज को इस दिशा में अपना रुख बदलना होगा तभी सदियों पुरानी इस बीमारी का मुकाबला करने में कुछ सफलता मिल सकेगी।
हमारे समाज में भ्रष्टाचार कोई एक दिन में पनपा विषाणु नहीं है। चाणक्य ने भ्रष्टाचार पर काबू पाने के लिए कई कदम उठाए। अकबर ने भ्रष्टाचारियों पर अंकुश लगाने के लिए कई सख्त फैसले सुनाए। इसी तरह अंग्रेजों के शासनकाल में वारेन हेस्टिंग और रॉबर्ट क्लाइव के भ्रष्ट आचरण की बात सब जानते हैं। इस कारण ईस्ट इंडिय कंपनी को हुए नुकसान और भ्रष्टाचार मसले पर उनको दिए दंड की बहुत चर्चा होती है। आजादी के बाद डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने कहा था कि स्वशासन के लिए प्राप्त आजादी में कई लोगों के बलिदान, नैतिक समर्थन आदि को भुलाकर कुछ लोग निजी स्वार्थों के लिए तंत्र का उपयोग कर रहे हैं।
भ्रष्टाचार को लेकर हमारे समाज में अजीब तरह का विरोधाभास है। एक तरफ सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी की उम्मीद की जाती है, दूसरी तरफ भ्रष्ट लोगों को एक खास किस्म का सम्मान मिलता है। भ्रष्टाचार के कुछ बड़े मामले जैसे पशुपालन, जेएमएम घूसकांड, संसद में सवालों के लिए पैसा, ताज कॉरिडोर आदि इसके उदाहरण हैं। इस बात में कोई अतिशयोक्ति नहीं कि समाज का एक विशेष बड़ा तबका (सफेदपोश) ज्यादा खतरनाक भ्रष्ट लोगों में शुमार है। जनता के पैसे डकारना और सरकारी पैसे को चबा जाना जैसे आयकर की चोरी, स्टांप शुल्क, सीमा शुल्क आदि की चोरी या अधिनियम का उल्लंघन बहुत घातक है। इस तरह के मामलों में छोटी सी चोरी करने वाला तो पकड़ा जाता है, बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं, लेकिन चारों ओर से मशीनरी का दुरुपयोग करने वाले को या तो बख्श दिया जाता है या फिर उसे पकड़ने की नीयत साफ नहीं होती। कभी पकड़ होती भी है तो ऐसे लोग एक जनसमूह को अपने पक्ष में ला खड़ा करता है।
ऐसा नहीं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ कदम नहीं उठाए गए। बड़े-बड़े प्रयास हुए, अधिनियम आए लेकिन समय-समय पर बदली परिस्थितियों और अन्य कमियों के चलते वे कारगर नहीं हो पाए। असल में हमारी मशीनरी इस शक्तिशाली वायरस (भ्रष्टाचार) से लड़ने के लिए पर्याप्त रूप से सफल नहीं हो पाई। 1947 के पीसी अधिनियम की धारा 5 के तहत तीन साल की सजा का प्रावधान रखा गया। एक आशावादी धारणा थी कि भ्रष्टाचार पर इस तरह की सख्ती से अंकुश लग जाएगा। ऐसा नहीं होने पर 1950 में इसे पांच साल किया गया। 1952 में सजा के नाम पर इसे दस साल का प्रावधान किया गया। लेकिन सिर्फ प्रावधान बना देने से कुछ नहीं होता। फिर हुआ वही जिसकी आशंका थी, यह वायरस बढ़ता ही रहा।
ऐसा नहीं कि पूरी व्यवस्था में भ्रष्टाचार ही भ्रष्टाचार व्याप्त है। लेकिन बाहुबलियों, सार्वजनिक सेवकों और कुछ नेताओं का ऐसा गठजोड़ है कि भ्रष्टाचार का भूत ज्यादा शक्तिशाली हो गया है।
भ्रष्टाचार के कई कारण हो सकते हैं लेकिन पिछले दशकों में यह बात सामने आई कि महंगा चुनाव राजनीतिक भ्रष्टाचार के कारणों में प्रमुख है।
भ्रष्टाचार के बड़े पैमाने पर भांडा फोड़ने की जब हम बात करते हैं तो सबसे पहले तहलका का स्टिंग हमारे सामने आता है। मार्च 2001 में उसके खुलासे ने सनसनी फैला दी थी। रक्षा सौदों में घोटालों की यह बात उजागर होने से लोगों को गहरा धक्का लगा। फिर बीएमडब्लू हिट एंड रन मामले में न्यायिक व्यवस्था में भ्रष्टाचार का खुलासा एनडीटीवी ने किया।
भ्रष्टाचार के संदर्भ में अगर हम धोखाधड़ी की बात करें तो कई मामले सामने आते हैं। जैसे परिवहन विभाग में लाइसेंस धोखाधड़ी, एमसीडी से संबंधित नालों से गाद निकालने का मामला, सामाजिक कल्याण विभाग में आवंटित धन की बंदरबांट। इन सबमें वरिष्ठों द्वारा मातहत के कंधे पर बंदूक रखकर रिश्वत लेने के कई मामले सामने आए। संगठनात्मक रूप से भी भ्रष्टाचार के कई मामलों को पिछले कुछ समय में खुलासा हुआ। जैसे नई दिल्ली नगर पालिका परिषद में दो दर्जन के करीब लोगों का स्टिंग हुआ। ट्रैफिक पुलिस का भांडा फूटा। खुलासे होने के क्रम में एक परिवर्तन यह सामने आया कि कई पीड़ित अपनी ओर से टैप या रिकॉर्ड करके भ्रष्टाचार निरोधक शाखा या ब्यूरो के पास आने लगे। असल में शाखा या ब्यूरो की सफलता भी इस पर निर्भर करती है कि तमाम मामलों को गुप्त रखते हुए त्वरित कार्रवाई की जाए।
भ्रष्टाचार रूपी वायरस को खत्म करने या इसको धीरे-धीरे अपनी व्यवस्था से हटाने का कोई सेट फॉर्मूला नहीं बना है। नोटिस देने, पैंफलेट चिपकाने, होर्डिंग्स बनाने या भ्रष्टाचार निरोधक सप्ताह मनाने भर से कुछ नहीं होगा। शपथ लेना या उक्त अन्य कार्य हमारी मानसिकता को नहीं बदल सकते। हमें अरुणाचल प्रदेश या इसी तरह की कई अन्य इलाकों की कुछ प्रथाओं से सबक लेना चाहिए। वे ऐसे मामलों में अपने रीति-रिवाजों के हिसाब से दंडित करते हैं। भ्रष्टाचार के बारे में पता लगने पर ऐसे व्यक्ति का सामाजिक बहिष्कार किया जाता है। भ्रष्टाचार के खिलाफ तमाम कार्रवाई के साथ ही भ्रष्ट के सामाजिक बहिष्कार की भावना को बलवती करना होगा। ईमानदार लोगों को एक सामाजिक पुल के रूप में काम करना होगा। भ्रष्टाचार इसी गति से बढ़ता रहा तो यह उन चंद लोगों के विश्वास को डिगाएगा जिन्हें इस वायरस ने अभी नहीं छुआ है।
लेखक डॉ. एन दिलीप कुमार वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी और वर्तमान में दिल्ली पुलिस के संयुक्त आयुक्त हैं उनके इस लेख को मैंने अनुवाद किया था : केवल तिवारी। साभार : नईदुनिया
मृत्यु प्रमाणपत्र बनाने की बात हो या फिर शवों की अंत्येष्टि का मामला, शल्य चिकित्सा और दवा आपूर्ति का मामला हो सामान्य ट्रैफिक चालान से लेकर एफआईआर दर्ज करने की बात या फिर कोर्ट में चल रहा ट्रायल, राशन कार्ड से लेकर भू रिकॉर्ड की बात हो या पार्किंग से लेकर रेहड़ी-पटरी की बात हो। निर्माण की अनुमति का मामला हो या फिर तोड़फोड़ कार्रवाई की बात, खरीद मामला हो, फाइल आगे बढ़ाने की बात हो, चेक भुगतान का मामला हो, विकास कार्य या कल्याण योजना की बात हो, विभिन्न् तरह के अनापत्ति प्रमाणपत्र की बात हो या फिर कर निर्धारण का मामला। बात किसी की नियुक्ति या प्रोन्न्ति का हो, स्थानांतरण या फिर दंडित करने की बात। या यह कहें कि कोई भी सरकारी कामकाज, सबमें आज स्थिति यह है कि लेने-देने की बात को जैसे आत्मसात कर लिया गया हो। शायद ही कोई ऐसा काम होगा जहां लेन-देन की प्रकिया या इसकी बात न होती हो।
भ्रष्टाचार के वायरस का एक भयावह पहलू यह भी है कि भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा व्यक्ति इससे बच निकलने का रास्ता भी जानता है। कैसे वह पकड़ से बाहर रहे और यदि पकड़ा भी जाए तो कैसे उससे बचा जाए उसे भलीभांति आता है। व्यवस्था के कई चक्र ऐसे हैं कि जांच में भी मुश्किल आती है। असल में लंबी न्यायिक प्रणाली, गवाहों की खरीद-फरोख्त और लंबा समय निकलने के बाद यह युक्ति का चल जाना कि 'वह तो अब तक दोषी साबित नहीं हुआ" इस मामले को और घातक बनाता है। लगता है हमारे देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ जोश-ओ-खरोश दिखाने में कुछ हिचकिचाहट है। इससे इतर स्कैंडिनेवियाई जैसे न्यूजीलैंड या ऐसे ही कुछ और देशों में इसके स्तर को दसवें हिस्से तक लाया जा चुका है। अपने यहां हम यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि इस मामले में 'शून्य सहनशीलता" का फार्मूला अपनाएं या इसे छोड़ देने का। हमारे यहां भ्रष्टाचार मिटाने की दिशा में उत्साही कदम बढ़ाने के बजाय ज्यादातर ध्यान और शक्ति दिखावे के कामों में बर्बाद हो रही है।
कितना दुखद पहलू है कि सार्वजनिक सेवा में आने के बाद शपथ लेने वाले अगले ही पल उसका अनुपालन भूल जाते हैं। वह शपथ लेते हैं कि 'हम भारत के सार्वजनिक सेवा में जुड़े लोग सत्य और निष्ठा से शपथ लेते हैं कि अपने हर तरह के कार्य में पारदर्शिता बरतते हुए एकता को कायम रखते हुए भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए कार्य करते रहेंगे।" आज यह सर्वविदित है कि कितने लोग शपथ पर कायम रह पाते हैं।
भ्रष्टाचार उन्मूलन के मामले में एक महत्वपूर्ण बात सबके लिए विचारणीय है कि भ्रष्टाचार के विष को खत्म करने में अगर हम खुद को असमर्थ पाते हैं तो कम से कम उसके प्रसार को रोकने में तो कुछ भूमिका निभाई जा सकती है। इस संबंध में जोसेफ पुलित्जर ने संभवत: सही कहा है, 'किसी भी अपराध, चकमेबाजी, चाल, ठगी, अनैतिक कार्य गोपनीय नहीं रह सकते। इन सब चीजों को खुले दिमाग से मीडिया के माध्यम से सबके सामने रखें, गलत पर प्रहार करें, उनका तिरस्कार करें फिर देखिए जल्दी ही जनमत उन्हें साफ कर देगा।" यानी भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों को सामाजिक बहिष्कार का कड़वा घूंट देना होगा। समाज को इस दिशा में अपना रुख बदलना होगा तभी सदियों पुरानी इस बीमारी का मुकाबला करने में कुछ सफलता मिल सकेगी।
हमारे समाज में भ्रष्टाचार कोई एक दिन में पनपा विषाणु नहीं है। चाणक्य ने भ्रष्टाचार पर काबू पाने के लिए कई कदम उठाए। अकबर ने भ्रष्टाचारियों पर अंकुश लगाने के लिए कई सख्त फैसले सुनाए। इसी तरह अंग्रेजों के शासनकाल में वारेन हेस्टिंग और रॉबर्ट क्लाइव के भ्रष्ट आचरण की बात सब जानते हैं। इस कारण ईस्ट इंडिय कंपनी को हुए नुकसान और भ्रष्टाचार मसले पर उनको दिए दंड की बहुत चर्चा होती है। आजादी के बाद डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने कहा था कि स्वशासन के लिए प्राप्त आजादी में कई लोगों के बलिदान, नैतिक समर्थन आदि को भुलाकर कुछ लोग निजी स्वार्थों के लिए तंत्र का उपयोग कर रहे हैं।
भ्रष्टाचार को लेकर हमारे समाज में अजीब तरह का विरोधाभास है। एक तरफ सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी की उम्मीद की जाती है, दूसरी तरफ भ्रष्ट लोगों को एक खास किस्म का सम्मान मिलता है। भ्रष्टाचार के कुछ बड़े मामले जैसे पशुपालन, जेएमएम घूसकांड, संसद में सवालों के लिए पैसा, ताज कॉरिडोर आदि इसके उदाहरण हैं। इस बात में कोई अतिशयोक्ति नहीं कि समाज का एक विशेष बड़ा तबका (सफेदपोश) ज्यादा खतरनाक भ्रष्ट लोगों में शुमार है। जनता के पैसे डकारना और सरकारी पैसे को चबा जाना जैसे आयकर की चोरी, स्टांप शुल्क, सीमा शुल्क आदि की चोरी या अधिनियम का उल्लंघन बहुत घातक है। इस तरह के मामलों में छोटी सी चोरी करने वाला तो पकड़ा जाता है, बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं, लेकिन चारों ओर से मशीनरी का दुरुपयोग करने वाले को या तो बख्श दिया जाता है या फिर उसे पकड़ने की नीयत साफ नहीं होती। कभी पकड़ होती भी है तो ऐसे लोग एक जनसमूह को अपने पक्ष में ला खड़ा करता है।
ऐसा नहीं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ कदम नहीं उठाए गए। बड़े-बड़े प्रयास हुए, अधिनियम आए लेकिन समय-समय पर बदली परिस्थितियों और अन्य कमियों के चलते वे कारगर नहीं हो पाए। असल में हमारी मशीनरी इस शक्तिशाली वायरस (भ्रष्टाचार) से लड़ने के लिए पर्याप्त रूप से सफल नहीं हो पाई। 1947 के पीसी अधिनियम की धारा 5 के तहत तीन साल की सजा का प्रावधान रखा गया। एक आशावादी धारणा थी कि भ्रष्टाचार पर इस तरह की सख्ती से अंकुश लग जाएगा। ऐसा नहीं होने पर 1950 में इसे पांच साल किया गया। 1952 में सजा के नाम पर इसे दस साल का प्रावधान किया गया। लेकिन सिर्फ प्रावधान बना देने से कुछ नहीं होता। फिर हुआ वही जिसकी आशंका थी, यह वायरस बढ़ता ही रहा।
ऐसा नहीं कि पूरी व्यवस्था में भ्रष्टाचार ही भ्रष्टाचार व्याप्त है। लेकिन बाहुबलियों, सार्वजनिक सेवकों और कुछ नेताओं का ऐसा गठजोड़ है कि भ्रष्टाचार का भूत ज्यादा शक्तिशाली हो गया है।
भ्रष्टाचार के कई कारण हो सकते हैं लेकिन पिछले दशकों में यह बात सामने आई कि महंगा चुनाव राजनीतिक भ्रष्टाचार के कारणों में प्रमुख है।
भ्रष्टाचार के बड़े पैमाने पर भांडा फोड़ने की जब हम बात करते हैं तो सबसे पहले तहलका का स्टिंग हमारे सामने आता है। मार्च 2001 में उसके खुलासे ने सनसनी फैला दी थी। रक्षा सौदों में घोटालों की यह बात उजागर होने से लोगों को गहरा धक्का लगा। फिर बीएमडब्लू हिट एंड रन मामले में न्यायिक व्यवस्था में भ्रष्टाचार का खुलासा एनडीटीवी ने किया।
भ्रष्टाचार के संदर्भ में अगर हम धोखाधड़ी की बात करें तो कई मामले सामने आते हैं। जैसे परिवहन विभाग में लाइसेंस धोखाधड़ी, एमसीडी से संबंधित नालों से गाद निकालने का मामला, सामाजिक कल्याण विभाग में आवंटित धन की बंदरबांट। इन सबमें वरिष्ठों द्वारा मातहत के कंधे पर बंदूक रखकर रिश्वत लेने के कई मामले सामने आए। संगठनात्मक रूप से भी भ्रष्टाचार के कई मामलों को पिछले कुछ समय में खुलासा हुआ। जैसे नई दिल्ली नगर पालिका परिषद में दो दर्जन के करीब लोगों का स्टिंग हुआ। ट्रैफिक पुलिस का भांडा फूटा। खुलासे होने के क्रम में एक परिवर्तन यह सामने आया कि कई पीड़ित अपनी ओर से टैप या रिकॉर्ड करके भ्रष्टाचार निरोधक शाखा या ब्यूरो के पास आने लगे। असल में शाखा या ब्यूरो की सफलता भी इस पर निर्भर करती है कि तमाम मामलों को गुप्त रखते हुए त्वरित कार्रवाई की जाए।
भ्रष्टाचार रूपी वायरस को खत्म करने या इसको धीरे-धीरे अपनी व्यवस्था से हटाने का कोई सेट फॉर्मूला नहीं बना है। नोटिस देने, पैंफलेट चिपकाने, होर्डिंग्स बनाने या भ्रष्टाचार निरोधक सप्ताह मनाने भर से कुछ नहीं होगा। शपथ लेना या उक्त अन्य कार्य हमारी मानसिकता को नहीं बदल सकते। हमें अरुणाचल प्रदेश या इसी तरह की कई अन्य इलाकों की कुछ प्रथाओं से सबक लेना चाहिए। वे ऐसे मामलों में अपने रीति-रिवाजों के हिसाब से दंडित करते हैं। भ्रष्टाचार के बारे में पता लगने पर ऐसे व्यक्ति का सामाजिक बहिष्कार किया जाता है। भ्रष्टाचार के खिलाफ तमाम कार्रवाई के साथ ही भ्रष्ट के सामाजिक बहिष्कार की भावना को बलवती करना होगा। ईमानदार लोगों को एक सामाजिक पुल के रूप में काम करना होगा। भ्रष्टाचार इसी गति से बढ़ता रहा तो यह उन चंद लोगों के विश्वास को डिगाएगा जिन्हें इस वायरस ने अभी नहीं छुआ है।
लेखक डॉ. एन दिलीप कुमार वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी और वर्तमान में दिल्ली पुलिस के संयुक्त आयुक्त हैं उनके इस लेख को मैंने अनुवाद किया था : केवल तिवारी। साभार : नईदुनिया
Friday, September 10, 2010
जिस्म बिकता इनका, पेट भरता उनका
एक बार जिज्ञासावश रिपोर्टिंग के लिए कुछमित्रों संग दिल्ली के जीबी रोड इलाके में चला गया। इस इलाके के बारे में बताने की शायद जरूरी नहीं। हां एक बात यह बताना जरूरी है कि वहां मोटर पार्ट्स, जनरेटर आदि का कारोबार भी होता है। मूलत: जीबी रोड किसलिए जाना जाना जाता है, यह सभी जानते हैं। मैं वहां कोठों की स्थिति का जायजा लेने गया था, मैंने जो देखा उस पर खबरनुमा एक रिपोर्ट
उन गलियों में कोई जाता भी होगा तो चोरी-छिपे। वहां के बारे में किसी के जेहन में कोई बात आती भी होगी तो नकारात्मक। सड़कों पर घूम रहे वहां के सौदागर भी कहते हैं तो सिर्फ एक शब्द एंजॉय। लेकिन वहां छिपे दर्द, वहां की तकलीफों को या तो कोई समझ नहीं पाता या समझने की जहमत नहीं उठाना चाहता। कुछ संस्थाएं समझने या कुछ करने की कोशिश कर रही हैं तो उनके प्रयास पर सवालिया निशान लग रहे हैं। हम बात कर रहे हैं जीबी रोड यानी स्वामी श्रद्धानंद मार्ग की। यहां बने मकानों के निचले तले पर तमाम दुकानें हैं, जहां ऑटो पार्ट्स से लेकर बड़े-बड़े जनरेटर भी मिलते हैं। उनके ऊपर बने हैं कोठे। यहां पेट भरने के लिए सेक्स वर्कर्स ग्राहकों के लिए अपने जिस्म को परोसने को तैयार बैठी हैं।
समस्या यह नहीं है कि यहां जिस्म का धंधा होता है। समस्या इसके बाद शुरू होती है। जिस्म के धंधे पर कई धंधे होते हैं। कोई इनकी भलाई के नाम पर अपने संगठन रूपी दुकान को चमका रहा है तो कुछ नौजवान बिना इनकी सहमति के सड़कों पर राहगीरों या व्यावसायिक सिलसिले में वहां आए लोगों को जाल में फांसने में लिप्त हैं। किसी नए व्यक्ति को देखते ही दो-चार लोग उसे घेर लेते हैं। उनकी शब्दावली पर गौर कीजिए-'सर एंजॉय करेंगे", 'हर तरह का माल है", 'कम उम्र की", देशी-विदेशी..... वगैरह-वगैरह। ग्राहक इनके झांसे में आ गया तो ठीक नहीं तो उसके साथ जोर जबरदस्ती। यहां विभिन्न् कोठों पर सेक्स वर्कर्स ने इन दलालों से किसी तरह की नाइत्तेफाकी जताई। यहां के विभिन्न् कोठों पर रह रहीं सलमा, पुष्पा, रजिया जैसी तमाम महिलाओं ने उल्टे यह शिकायत की कि इन जैसे लोगों से धंधा चौपट हो रहा है।
कभी किसी कोठे की हूर थी, आज वहीं भिखारिन बनीं
सेक्स वर्कर्स के जीवन में चालीसवां साल आते-आते जैसे तूफान आने लगता है। शरीर ढल रहा है, ग्राहकों ने आंखें तरेरनी शुरू कर दी हैं। स्वयंसेवी संगठन कुछ करते तो हैं, लेकिन इतना नहीं कि दो जून की रोटी मिल जाए। थोड़ा बहुत पढ़ी-लिखी हैं तो बच्चों को पढ़ा सकती हैं, सिलाई-बिनाई आती है तो भी शायद काम चल जाए, लेकिन इनमें से कुछ नहीं है और कोठा मालिक या मालकिन भी नहीं चाहती तो कोई चारा नहीं बचता। विभिन्न् कोठों की सीढ़ियों से जब हम लोग गुजरे तो वहां कई महिलाएं भीख मां रही थीं। उम्र पचास या उससे अधिक होगी। जानकारी ली गई तो बताया गया 10-20 साल पहले इनकी जगह भी कोठों पर थीं। इन जैसी कई महिलाएं हैं। कुछ काम-धंधे में लग गई। किसी को कोठे पर ही चौका-बर्तन का काम मिल गया, लेकिन कुछ अब भीख मांगने को मजबूर हैं।
एक पहलू यह भी...
विभिन्न् कोठों पर एक अलग पहलू भी देखने को मिला। सर्वधर्म समभाव के लिए दिखावे के तौर पर भले बड़े-बड़े लोग हो-हल्ला करते हों, लेकिन यहां धार्मिक एकता का जीता-जागता नमूना दिखा। अनेक कोठों पर सेक्स वर्कर्स अलग-अलग धर्म से हैं और उसी पद्धति से वे पूजा भी करती हैं। दीवारों पर भगवानों की मूर्तियां लगी हैं, अगरबत्ती जल रही है तो वहीं मुसलिम धर्म के अनुयायियों ने अपने धर्म के हिसाब से कैलेंडर टांगे हैं। नमाज अदा की जाती है, आरती भी होती है।
पहचान पत्र बने
पतिता उद्धार समिति का कहना है कि इन लोगों के लिए सबसे बड़ा संकट पहचान का है। बैंक में खाता खोलकर अगर दो पैसा बचाना भी चाहें तो हर जगह पहचान पत्र की जरूरत होती है। हालांकि समिति के प्रयासों से पिछले दिनों कुछ महिलाओं के पहचानपत्र बने भी, लेकिन यहां भी कई किस्म की राजनीति हुई। समिति के अध्यक्ष खैराती लाल भोला का कहना है कि महिलाओं का पहचानपत्र बन जाए तो उनकी कई दिक्कतें दूर हो जाएंगी। यहां की महिलाएं ज्यादातर दक्षिण भारत की हैं। कभी इनके मूल पते की जांच नहीं हो पाती और कुछ मामलों में राजनीति आड़े आ जाती है।
समस्याएं और भी बहुत हैं
पतिता उद्धार समिति के दिल्ली इकाई का कार्यालय संभाल रहे इकबाल का कहना है कि पहचानपत्र बन जाए तो इनकी कई समस्याएं स्वत: दूर हो जाएंगी। उन्होंने भी दलालों की समस्याओं को उठाते हुए कहा कि इनकी वजह से कई बार महिलाएं चोटिल हो चुकी हैं। मीना, आशा, रचना, आदि महिलाओं के सिर, हाथ और पैर में चोट दिखाते हुए इकबाल ने बताया कि यह सब दलालों की गुंडागर्दी का नतीजा है।
उन गलियों में कोई जाता भी होगा तो चोरी-छिपे। वहां के बारे में किसी के जेहन में कोई बात आती भी होगी तो नकारात्मक। सड़कों पर घूम रहे वहां के सौदागर भी कहते हैं तो सिर्फ एक शब्द एंजॉय। लेकिन वहां छिपे दर्द, वहां की तकलीफों को या तो कोई समझ नहीं पाता या समझने की जहमत नहीं उठाना चाहता। कुछ संस्थाएं समझने या कुछ करने की कोशिश कर रही हैं तो उनके प्रयास पर सवालिया निशान लग रहे हैं। हम बात कर रहे हैं जीबी रोड यानी स्वामी श्रद्धानंद मार्ग की। यहां बने मकानों के निचले तले पर तमाम दुकानें हैं, जहां ऑटो पार्ट्स से लेकर बड़े-बड़े जनरेटर भी मिलते हैं। उनके ऊपर बने हैं कोठे। यहां पेट भरने के लिए सेक्स वर्कर्स ग्राहकों के लिए अपने जिस्म को परोसने को तैयार बैठी हैं।
समस्या यह नहीं है कि यहां जिस्म का धंधा होता है। समस्या इसके बाद शुरू होती है। जिस्म के धंधे पर कई धंधे होते हैं। कोई इनकी भलाई के नाम पर अपने संगठन रूपी दुकान को चमका रहा है तो कुछ नौजवान बिना इनकी सहमति के सड़कों पर राहगीरों या व्यावसायिक सिलसिले में वहां आए लोगों को जाल में फांसने में लिप्त हैं। किसी नए व्यक्ति को देखते ही दो-चार लोग उसे घेर लेते हैं। उनकी शब्दावली पर गौर कीजिए-'सर एंजॉय करेंगे", 'हर तरह का माल है", 'कम उम्र की", देशी-विदेशी..... वगैरह-वगैरह। ग्राहक इनके झांसे में आ गया तो ठीक नहीं तो उसके साथ जोर जबरदस्ती। यहां विभिन्न् कोठों पर सेक्स वर्कर्स ने इन दलालों से किसी तरह की नाइत्तेफाकी जताई। यहां के विभिन्न् कोठों पर रह रहीं सलमा, पुष्पा, रजिया जैसी तमाम महिलाओं ने उल्टे यह शिकायत की कि इन जैसे लोगों से धंधा चौपट हो रहा है।
कभी किसी कोठे की हूर थी, आज वहीं भिखारिन बनीं
सेक्स वर्कर्स के जीवन में चालीसवां साल आते-आते जैसे तूफान आने लगता है। शरीर ढल रहा है, ग्राहकों ने आंखें तरेरनी शुरू कर दी हैं। स्वयंसेवी संगठन कुछ करते तो हैं, लेकिन इतना नहीं कि दो जून की रोटी मिल जाए। थोड़ा बहुत पढ़ी-लिखी हैं तो बच्चों को पढ़ा सकती हैं, सिलाई-बिनाई आती है तो भी शायद काम चल जाए, लेकिन इनमें से कुछ नहीं है और कोठा मालिक या मालकिन भी नहीं चाहती तो कोई चारा नहीं बचता। विभिन्न् कोठों की सीढ़ियों से जब हम लोग गुजरे तो वहां कई महिलाएं भीख मां रही थीं। उम्र पचास या उससे अधिक होगी। जानकारी ली गई तो बताया गया 10-20 साल पहले इनकी जगह भी कोठों पर थीं। इन जैसी कई महिलाएं हैं। कुछ काम-धंधे में लग गई। किसी को कोठे पर ही चौका-बर्तन का काम मिल गया, लेकिन कुछ अब भीख मांगने को मजबूर हैं।
एक पहलू यह भी...
विभिन्न् कोठों पर एक अलग पहलू भी देखने को मिला। सर्वधर्म समभाव के लिए दिखावे के तौर पर भले बड़े-बड़े लोग हो-हल्ला करते हों, लेकिन यहां धार्मिक एकता का जीता-जागता नमूना दिखा। अनेक कोठों पर सेक्स वर्कर्स अलग-अलग धर्म से हैं और उसी पद्धति से वे पूजा भी करती हैं। दीवारों पर भगवानों की मूर्तियां लगी हैं, अगरबत्ती जल रही है तो वहीं मुसलिम धर्म के अनुयायियों ने अपने धर्म के हिसाब से कैलेंडर टांगे हैं। नमाज अदा की जाती है, आरती भी होती है।
पहचान पत्र बने
पतिता उद्धार समिति का कहना है कि इन लोगों के लिए सबसे बड़ा संकट पहचान का है। बैंक में खाता खोलकर अगर दो पैसा बचाना भी चाहें तो हर जगह पहचान पत्र की जरूरत होती है। हालांकि समिति के प्रयासों से पिछले दिनों कुछ महिलाओं के पहचानपत्र बने भी, लेकिन यहां भी कई किस्म की राजनीति हुई। समिति के अध्यक्ष खैराती लाल भोला का कहना है कि महिलाओं का पहचानपत्र बन जाए तो उनकी कई दिक्कतें दूर हो जाएंगी। यहां की महिलाएं ज्यादातर दक्षिण भारत की हैं। कभी इनके मूल पते की जांच नहीं हो पाती और कुछ मामलों में राजनीति आड़े आ जाती है।
समस्याएं और भी बहुत हैं
पतिता उद्धार समिति के दिल्ली इकाई का कार्यालय संभाल रहे इकबाल का कहना है कि पहचानपत्र बन जाए तो इनकी कई समस्याएं स्वत: दूर हो जाएंगी। उन्होंने भी दलालों की समस्याओं को उठाते हुए कहा कि इनकी वजह से कई बार महिलाएं चोटिल हो चुकी हैं। मीना, आशा, रचना, आदि महिलाओं के सिर, हाथ और पैर में चोट दिखाते हुए इकबाल ने बताया कि यह सब दलालों की गुंडागर्दी का नतीजा है।
Wednesday, September 8, 2010
मित्र सुधीर राघव की टिप्पणी पर टिप्पणी
काश! वह दिन जल्दी आए जब एक सर्वमान्य बोली विकसित हो। आज के हिंग्लिश की तरह या फिर पचमेल खिचड़ी की तरह। जैसा कि मित्र सुधीर राघव (इनका ब्लॉग समृद्ध है, अच्छा लिखते हैं) ने कहा है कि भविष्य में ऐसी बोली बनेगी। उनकी सब बातों से इत्तेफाक रखता हूं। यह भी सब जानते हैं कि कुछ शब्दों को आत्मसात किए जाने पर कोई हर्ज नहीं, लेकिन जबरन शब्दों को ठूंसने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। मैं फिर एक उदाहरण देना चाहता हूं। मैं नियमित रूप से लोकल ट्रेन में चलता हूं (दोनों शब्द लोकल और ट्रेन हिन्दी के नहीं हैं) उसमें बहस होती है। पिछली बार फिर बहस छिड़ी भाषायी ज्ञान और बोलचाल पर। बात-बात में दिल्ली मेट्रो की बात छिड़ गई। अनौपचारिक रूप में एक बड़े अधिकारी ने कहा था कि यमुना किनारे बने मेट्रो स्टेशन का नाम असल में यमुना तट रखा जाना था, लेकिन बाद में इसे यमुना बैंक कर दिया गया। कुछ मित्रों ने अपनी बात के समर्थन में कहा कि देखिए अंग्रेजी का प्रयोग सफल है। मैंने उनसे एक वाक्य के बारे में कहा जो मेट्रो के अंदर उद्घोषित होता है। उसमें उद्घोषक कहता है कि यात्रियों से अनुरोध है कि मेट्रो दरवाजों पर अवरोध उत्पन्न् न करें। ऐसा करना दंडनीय अपराध है। मेरा सवाल था कि इसमें कठिन क्या है? समझ में न आने जैसी बात क्या है?
मैं बार-बार यह कहता हूं कि दूसरी भाषा का कतई विरोध नहीं करता। अज्ञानता को छिपाने के लिए अन्य भाषा का इस्तेमाल सरासर गलत है। हालांकि आजकल सरल और बोलचाल की भाषा के इस्तेमाल की बात कहकर खिचड़ी भाषा इस्तेमाल की जा रही है। सुधीर जी की यह बात कि अपनी बात को वजनी बनाने के लिए लोग अंग्रेजी शब्दों, वाक्यों का इस्तेमाल करते हैं, से सहमत हूं। मुझे एक छोटी सी बात याद आ रही है। रेल आरक्षण केंद्र पर मैं खड़ा था, अंदर बैठे सज्जन ने मेरा नंबर आने पर मेरी एक टिप्पणी पर अंगे्रजी में दो-तीन वाक्य जड़ दिए। मैंने उनसे कहा था भाई साहब गुस्से में क्यों हैं? वे बोले मैं गुस्से में नहीं हूं। मैंने कहा, आम भारतीय दो ही मौकों पर अंग्रेजी बोलता है, एक तो तब जब उसने शराब पी हो और दूसरी तब जब वह गुस्से में हो। यकीन मानिए वे व्यक्ति मुस्कुरा दिए और बहुत अच्छे से पेश आए। आज घरों में बच्चों के स्कूल से लिखकर आता है कि अंग्रेजी में बच्चों से बातें करें। और तो और हिन्दी विषय का गृहकार्य अंग्रेजी में लिखकर देते हैं। एक स्कूल में मेरा विरोध रंग लाया और कम से कम हिन्दी का गृह कार्य अब होम वर्क लिखकर नहीं दिया जाता। चलिए इस पर बातें जारी रहेंगी। एक गुजारिश है कि कोशिश भी जारी रखिए...। आत्मसात के इस क्रम में बता दूं की मेरा तो ब्लॉग ही चलन में प्रयोग वाले शब्द से शुरू होता है के टी यानी केवल तिवारी
धन्यवाद
मैं बार-बार यह कहता हूं कि दूसरी भाषा का कतई विरोध नहीं करता। अज्ञानता को छिपाने के लिए अन्य भाषा का इस्तेमाल सरासर गलत है। हालांकि आजकल सरल और बोलचाल की भाषा के इस्तेमाल की बात कहकर खिचड़ी भाषा इस्तेमाल की जा रही है। सुधीर जी की यह बात कि अपनी बात को वजनी बनाने के लिए लोग अंग्रेजी शब्दों, वाक्यों का इस्तेमाल करते हैं, से सहमत हूं। मुझे एक छोटी सी बात याद आ रही है। रेल आरक्षण केंद्र पर मैं खड़ा था, अंदर बैठे सज्जन ने मेरा नंबर आने पर मेरी एक टिप्पणी पर अंगे्रजी में दो-तीन वाक्य जड़ दिए। मैंने उनसे कहा था भाई साहब गुस्से में क्यों हैं? वे बोले मैं गुस्से में नहीं हूं। मैंने कहा, आम भारतीय दो ही मौकों पर अंग्रेजी बोलता है, एक तो तब जब उसने शराब पी हो और दूसरी तब जब वह गुस्से में हो। यकीन मानिए वे व्यक्ति मुस्कुरा दिए और बहुत अच्छे से पेश आए। आज घरों में बच्चों के स्कूल से लिखकर आता है कि अंग्रेजी में बच्चों से बातें करें। और तो और हिन्दी विषय का गृहकार्य अंग्रेजी में लिखकर देते हैं। एक स्कूल में मेरा विरोध रंग लाया और कम से कम हिन्दी का गृह कार्य अब होम वर्क लिखकर नहीं दिया जाता। चलिए इस पर बातें जारी रहेंगी। एक गुजारिश है कि कोशिश भी जारी रखिए...। आत्मसात के इस क्रम में बता दूं की मेरा तो ब्लॉग ही चलन में प्रयोग वाले शब्द से शुरू होता है के टी यानी केवल तिवारी
धन्यवाद
Thursday, August 26, 2010
हिन्दी की बात, निबंध प्रतियोगिता और मैं
पिछले दिनों ब्लॉग पर मैंने एक नई पोस्ट हिन्दी के खिलाफ साजिश शीर्षक से प्रकाशित की थी। तीन-चार लोगों की प्रतिक्रियाएं उसको लेकर आईं। मेरे एक मित्र ने इस बहस को आगे बढ़ाने की सलाह दी है। इसी बीच हमारे अखबार (नईदुनिया) की ओर से आयोजित निबंध प्रतियोगिता के तहत आईं हजारों प्रविष्टियों में से बेहतरीन निबंधों को छांटने की जिम्मेदारी मुझे दी गई। विषय था, मेरे सपनों का भारत। कक्षा तीन से 12वीं तक के विद्यार्थियों ने बहुत जोश के साथ इसमें भाग लिया था। कुछ स्कूलों से आईं प्रविष्टियों से साफ झलक रहा था कि अध्यापक ने बच्चों को सामने बिठाकर उन्हें निबंध लिखवाया है। एक सी भाषा और एक सी बात। लेकिन आश्चर्यजनक यह था कि विषय को पकड़ने में उसमें बहुत देरी की गई थी। ऐसा ही कुछ स्कूलों ने बच्चों से निबंध तो खुद लिखने को कहा, लेकिन उसे उत्तर पुस्तिका की तरह जांचकर भेज दिया। यानी जगह-जगह उसमें पेन के निशान, शब्दों को सुधारने की कोशिश दिख रही थी। इन सबके बावजूद हजारों निबंध बहुत अच्छे थे। उसमें लग रहा था कि बच्चों ने विषय को समझा है और सीधे उस पर लिखना शुरू किया है। यह जरूर है कि कई बच्चों ने मर्यादाओं को समझा नहीं था। खैर रोचक था यह काम और कम समय होने के कारण मुझसे अन्य लोगों की मदद लेने के लिए भी कहा गया। मैंने साथ के लोगों को ज्यादा परेशान करने के बजाय, हमारे संस्थान में प्रशिक्षण के लिए आए पत्रकारिता के विद्यार्थियों को कुछ निबंध बांट दिए। जिन लोगों को मैंने ये निबंध दिए, उनमें से ज्यादातर ने तो पचासों सवाल इस तरह मुझसे पूछ लिए कि मुझे वे प्रविष्टियां वापस मांगनी पड़ीं। कुछ बच्चों ने कह दिया, 'सर एक्चुअली मेरी हिन्दी थोड़ी वीक है।" उनके इस तर्क पर मेरा सवाल था, फिर भी आप हिन्दी अखबार में प्रशिक्षण के लिए आए हैं, वो तो सर 'वर्क कल्चर देखने के लिए।" जवाब फिर एक मुस्कान। मैंने तर्क देना उचित नहीं समझा। धीरे-धीरे कर प्रविष्टियां मुझे उसी अवस्था में लौटा दी गईं। एक सज्जन ने कुछ छांटकर दीं। उन्हें मैंने गौर से देखा तो मेरा सवाल था, क्या है इन निबंधों में जो आपको सही लगीं। उन 'भावी पत्रकार" महोदय का जवाब था, देखिए सर इसने लिखा है कि भारत सोने की चिड़िया था, बांग्लादेशियों की समस्या को खत्म करो। लोग अपने देश से प्यार नहीं करते। सब नेता गद्दार हैं। मैंने कहा, आपको जो विषय मैंने बताया था, उस पर इन्होंने क्या लिखा है। वह सज्जन कुछ सकपका गए। दर्जनभर लोगों में से किसी ने 'कुछ" किया तो है सोचकर मैंने उनको ज्यादा नहीं छेड़ा। खैर....।
निबंधों में से कुछ को छोड़कर शेष में से चयन करने में मुझे खासी दिक्कत हुई। बच्चों के सपनों के भारत के बारे में क्या-क्या बातें आईं, यह तो मैं आगे इसी क्रम में लिखी गई खबर को ही लगा दूंगा, लेकिन उनको पढ़कर हिन्दी भाषा में लिखे निबंध में अशुद्धियों से मैं परेशान हो उठा। अशुद्धियां ही नहीं, जानकारी भी गलत। 12वीं का छात्र यदि यह लिखे कि हम भारत में रहते हैं इसलिए इंडियन हैं। या फिर तीसरी का छात्र यह लिखे कि भ्रष्टाचारी नेताओं ने देश का माल गटक लिया है.... मुझे अजीब लगा। छोटे बच्चे को भ्रष्टाचार की चिंता खाई जा रही है, 12वीं का छात्र जो अब कॉलेज की डगर पकड़ेगा कह रहा है कि भारत में रहते हैं इसलिए इंडियन हैं। ऐसी कई पंक्तियां देखकर तो और माथा खराब हो गया जिसे काटकर अध्यापक महोदय ने ठीक किया था दुर्योग से वह ठीक, गलत निकला। खैर निबंधों में से पुरस्कृत निबंधों को अलग से निकाला गया। बड़ी मशक्कत के बाद। सपनों का भारत भी बच्चों का जान पड़ा, लेकिन इस बीच के अनुभव बहुत अजीब रहे।
हिन्दी नहीं जानने की बात कहने वाले सज्जन को एजेंसी पीटीआई का एक टेक दिया और उससे कहा कि जैसी हिन्दी जानते हो या हिन्दी-अंग्रेजी मिली भाषा (हिंग्लिश) में ही कुछ लिख दो। थोड़ी देर बाद वे आए बोले, मेरी एक अर्जेंट कॉल आई है, इसे आज करना जरूरी है, मैंने कहा, घर से कर के ले आना। वे बोले फिर इसका क्या यूज। मैंने कहा, इंटर्नशिप के लिए आए हो, कुछ काम नहीं सीखोगे...। वह सज्जन चले गए और लौटकर नहीं आए। एक को कोर्ट की खबर दी जिसमें लिखा था दिस पेटिशन कैन नॉट बी इंटरटेन... साहिबान ने लिखा इस याचिका पर मनोरंजन नहीं हो सकता। वह भी अंग्रेजी ज्यादा जानने और हिन्दी कम आने की बात कहते थे। खैर इन बच्चों में ज्यादातर ऐसे थे जिन्हें वे हिन्दी फीचर लेख लिखने या पढ़ने में बहुत मजा आता है जिसमें कुछ भी हिन्दी, अंग्रेजी में लिखा हो। जैसे बारिश में खूब एंजॉय किया, लोग पार्क में गए, शॉपिंग की। या फिर इस तरह का जैसे ही रोहित ने मॉल में एंटर किया वह शॉक रह गया, सामने स्टेज पर...। मुझे ऐसा लगा आम बोलचाल की भाषा कहकर ऐसा लिखने वाले वाकई हिन्दी जानते ही नहीं। या फिर उन्हें डर है कि कहीं वे गलत नहीं लिख दें।
निबंधों को छांटने के बाद जो खबर मैंने लिखी
देश भक्ति की भावना से ओतप्रोत 10 हजार से अधिक बच्चों ने लिखे निबंध
केवल तिवारी
नई दिल्ली। एक-एक निबंध में देशभक्ति की भावना का समावेश। तीसरी कक्षा का बच्चा हो या फिर 12वीं का छात्र। सबकी लेखनी से सपनों के भारत की इतनी खूबसूरत तस्वीर झलकी कि पुरस्कृत करने के लिए उनके चयन में खासी दिक्कत आई। स्वतंत्रता दिवस के मौके पर जब निबंध प्रतियोगिता की घोषणा की गई तो नईदुनिया अखबार के दफ्तर में एक के बाद एक प्रविष्टियां आने लगीं। देखते ही देखते आंकड़ा दस हजार पार कर गया। दिल्ली-एनसीआर के बच्चों को गांवों की भी सुध है और तकनीकी रूप से समृद्ध होना भी उनका सपना है।
नईदुनिया ने तीन वर्ग के बच्चों के लिए निबंध प्रतियोगिता आयोजित की थी। विषय था 'कैसा होगा अपने सपनों का भारत।" पहले वर्ग में तीसरी कक्षा से छठी कक्षा के बच्चों को अपने सपनों के भारत की तस्वीर पेश करनी थी। दूसरे वर्ग में सातवीं कक्षा से दसवीं तक के बच्चों को निबंध लिखना था। तीसरे वर्ग में ग्यारहवीं और 12वीं कक्षा के विद्यार्थियों ने प्रविष्टियां भेजीं।
जब इन निबंधों को पढ़ने की शुरुआत की तो छोटे से बच्चे से लेकर 12वीं के विद्यार्थी ने अपनी भावनाओं को मानो उसमें उड़ेल दिया। कोई सर्वशिक्षित भारतवासी का सपना देखता प्रतीत हो रहा है तो किसी को बांग्लादेशी घुसपैठियों से दिक्कत है। भ्रष्टाचार की तपन ने बच्चों को विचलित किया है। तकनीकी रूप से समृद्ध होना इन बच्चों का सपना तो है। ऐसा नहीं है कि दिल्ली-एनसीआर के बच्चों को गांवों का दर्द मालूम नहीं है। वे चाहते हैं हर गांव में अच्छी सड़क, स्वास्थ्य, पेयजल आदि सुविधाएं हों।
खूबसूरत अंदाज में अपने भावनाओं को उड़ेलने वाले इन बच्चों की प्रविष्टियां देखने लायक थीं। किसी ने निबंध वाले कागज को तिरंगे का रूप देते हुए भारत को फिर से सोने की चिड़िया सरीखा बनाने का सपना देखा है। किसी ने मोती सरीखे शब्दों से निबंध को नईदुनिया दफ्तर में भेजा है।
कई बच्चों ने अपना दर्द भी निबंध में उड़ेला है। किसी को यह बात परेशान करती है कि कई बच्चे सुबह राष्ट्रगान के समय पर गंभीर नहीं होते। किसी को अपने भले के लिए झूठ बोलने वालों से नफरत है तो कोई अपने निबंध के जरिये कल्पना करना है कि भारत फिर जगद्गुरु बने। एक प्रक्रिया के तहत दस हजार से अधिक निबंधों में तीनों वर्गों में प्रथम, द्वितीय और तृतीय पुरस्कृत निबंध चयनित किए गए। इसी तरह 10 सांत्वना पुरस्कार भी चयनित किए गए। कुछ छात्रों का प्रयास भी बेहद सराहनीय रहा। पुरस्कारों की श्रेणी में नहीं आ पाने पर भी छात्रों का यह उत्साह और देशप्रेम सचमुच उत्साहित करने वाला है।
साभार नईदुनिया
निबंधों में से कुछ को छोड़कर शेष में से चयन करने में मुझे खासी दिक्कत हुई। बच्चों के सपनों के भारत के बारे में क्या-क्या बातें आईं, यह तो मैं आगे इसी क्रम में लिखी गई खबर को ही लगा दूंगा, लेकिन उनको पढ़कर हिन्दी भाषा में लिखे निबंध में अशुद्धियों से मैं परेशान हो उठा। अशुद्धियां ही नहीं, जानकारी भी गलत। 12वीं का छात्र यदि यह लिखे कि हम भारत में रहते हैं इसलिए इंडियन हैं। या फिर तीसरी का छात्र यह लिखे कि भ्रष्टाचारी नेताओं ने देश का माल गटक लिया है.... मुझे अजीब लगा। छोटे बच्चे को भ्रष्टाचार की चिंता खाई जा रही है, 12वीं का छात्र जो अब कॉलेज की डगर पकड़ेगा कह रहा है कि भारत में रहते हैं इसलिए इंडियन हैं। ऐसी कई पंक्तियां देखकर तो और माथा खराब हो गया जिसे काटकर अध्यापक महोदय ने ठीक किया था दुर्योग से वह ठीक, गलत निकला। खैर निबंधों में से पुरस्कृत निबंधों को अलग से निकाला गया। बड़ी मशक्कत के बाद। सपनों का भारत भी बच्चों का जान पड़ा, लेकिन इस बीच के अनुभव बहुत अजीब रहे।
हिन्दी नहीं जानने की बात कहने वाले सज्जन को एजेंसी पीटीआई का एक टेक दिया और उससे कहा कि जैसी हिन्दी जानते हो या हिन्दी-अंग्रेजी मिली भाषा (हिंग्लिश) में ही कुछ लिख दो। थोड़ी देर बाद वे आए बोले, मेरी एक अर्जेंट कॉल आई है, इसे आज करना जरूरी है, मैंने कहा, घर से कर के ले आना। वे बोले फिर इसका क्या यूज। मैंने कहा, इंटर्नशिप के लिए आए हो, कुछ काम नहीं सीखोगे...। वह सज्जन चले गए और लौटकर नहीं आए। एक को कोर्ट की खबर दी जिसमें लिखा था दिस पेटिशन कैन नॉट बी इंटरटेन... साहिबान ने लिखा इस याचिका पर मनोरंजन नहीं हो सकता। वह भी अंग्रेजी ज्यादा जानने और हिन्दी कम आने की बात कहते थे। खैर इन बच्चों में ज्यादातर ऐसे थे जिन्हें वे हिन्दी फीचर लेख लिखने या पढ़ने में बहुत मजा आता है जिसमें कुछ भी हिन्दी, अंग्रेजी में लिखा हो। जैसे बारिश में खूब एंजॉय किया, लोग पार्क में गए, शॉपिंग की। या फिर इस तरह का जैसे ही रोहित ने मॉल में एंटर किया वह शॉक रह गया, सामने स्टेज पर...। मुझे ऐसा लगा आम बोलचाल की भाषा कहकर ऐसा लिखने वाले वाकई हिन्दी जानते ही नहीं। या फिर उन्हें डर है कि कहीं वे गलत नहीं लिख दें।
निबंधों को छांटने के बाद जो खबर मैंने लिखी
देश भक्ति की भावना से ओतप्रोत 10 हजार से अधिक बच्चों ने लिखे निबंध
केवल तिवारी
नई दिल्ली। एक-एक निबंध में देशभक्ति की भावना का समावेश। तीसरी कक्षा का बच्चा हो या फिर 12वीं का छात्र। सबकी लेखनी से सपनों के भारत की इतनी खूबसूरत तस्वीर झलकी कि पुरस्कृत करने के लिए उनके चयन में खासी दिक्कत आई। स्वतंत्रता दिवस के मौके पर जब निबंध प्रतियोगिता की घोषणा की गई तो नईदुनिया अखबार के दफ्तर में एक के बाद एक प्रविष्टियां आने लगीं। देखते ही देखते आंकड़ा दस हजार पार कर गया। दिल्ली-एनसीआर के बच्चों को गांवों की भी सुध है और तकनीकी रूप से समृद्ध होना भी उनका सपना है।
नईदुनिया ने तीन वर्ग के बच्चों के लिए निबंध प्रतियोगिता आयोजित की थी। विषय था 'कैसा होगा अपने सपनों का भारत।" पहले वर्ग में तीसरी कक्षा से छठी कक्षा के बच्चों को अपने सपनों के भारत की तस्वीर पेश करनी थी। दूसरे वर्ग में सातवीं कक्षा से दसवीं तक के बच्चों को निबंध लिखना था। तीसरे वर्ग में ग्यारहवीं और 12वीं कक्षा के विद्यार्थियों ने प्रविष्टियां भेजीं।
जब इन निबंधों को पढ़ने की शुरुआत की तो छोटे से बच्चे से लेकर 12वीं के विद्यार्थी ने अपनी भावनाओं को मानो उसमें उड़ेल दिया। कोई सर्वशिक्षित भारतवासी का सपना देखता प्रतीत हो रहा है तो किसी को बांग्लादेशी घुसपैठियों से दिक्कत है। भ्रष्टाचार की तपन ने बच्चों को विचलित किया है। तकनीकी रूप से समृद्ध होना इन बच्चों का सपना तो है। ऐसा नहीं है कि दिल्ली-एनसीआर के बच्चों को गांवों का दर्द मालूम नहीं है। वे चाहते हैं हर गांव में अच्छी सड़क, स्वास्थ्य, पेयजल आदि सुविधाएं हों।
खूबसूरत अंदाज में अपने भावनाओं को उड़ेलने वाले इन बच्चों की प्रविष्टियां देखने लायक थीं। किसी ने निबंध वाले कागज को तिरंगे का रूप देते हुए भारत को फिर से सोने की चिड़िया सरीखा बनाने का सपना देखा है। किसी ने मोती सरीखे शब्दों से निबंध को नईदुनिया दफ्तर में भेजा है।
कई बच्चों ने अपना दर्द भी निबंध में उड़ेला है। किसी को यह बात परेशान करती है कि कई बच्चे सुबह राष्ट्रगान के समय पर गंभीर नहीं होते। किसी को अपने भले के लिए झूठ बोलने वालों से नफरत है तो कोई अपने निबंध के जरिये कल्पना करना है कि भारत फिर जगद्गुरु बने। एक प्रक्रिया के तहत दस हजार से अधिक निबंधों में तीनों वर्गों में प्रथम, द्वितीय और तृतीय पुरस्कृत निबंध चयनित किए गए। इसी तरह 10 सांत्वना पुरस्कार भी चयनित किए गए। कुछ छात्रों का प्रयास भी बेहद सराहनीय रहा। पुरस्कारों की श्रेणी में नहीं आ पाने पर भी छात्रों का यह उत्साह और देशप्रेम सचमुच उत्साहित करने वाला है।
साभार नईदुनिया
Tuesday, August 17, 2010
हिंदी के खिलाफ साजिश
हिन्दी के बारे में
पिछले दिनों हिन्दी के एक बड़े अखबार वाले से भाषा को लेकर कुछ बहस हुई। उन साहिबान का कहना था कि हिन्दी के अखबारों को अधिक से अधिक अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग करना चाहिए। मैं इसे बिल्कुल गलत मानता हूं। मेरा कहना है कि हिन्दी भाषा के साथ-साथ किसी भी अन्य भाषा का ज्ञान होना चाहिए। खूब होना चाहिए, लेकिन बोलचाल की भाषा का बहाना बनाकर अंग्रेजी शब्दों को ठंूसना सरासर गलत है।
हिन्दी बोलने-लिखने के साथ यह तर्क विशुद्ध रूप से गढ़ा गया है कि बोलचान की भाषा में दिक्कत होती है। अंग्रेजी के कई शब्दों को समझने के लिए, अर्थ ढूंढ़ने के लिए और उसके उच्चारण को समझने के लिए हम न जाने कितनी बार शब्दकोश का सहारा लेते हैं। जरा सोचिए कि हिन्दी के बीच में तमाम अंग्रेजी शब्दों को घुसेड़ने में भी क्या खासी दिक्कत नहीं हुई होगी। फिर उन्हें जबरन लोगों से बुलवाया गया होगा। कौन नहीं समझता उप निरीक्षक (सब इंस्पेक्टर), छात्र (स्टूडेंट), जौहरी (ज्वेलर), हत्या (मर्डर), विशेष (स्पेशल), मुठभेड़ (एनकाउंटर)...वगैरह-वगैरह। ऐसे अनगिनत शब्द हैं जो हिन्दी में अच्छे-खासे प्रचलित हैं, खूब बोले जाते हैं, लेकिन न जाने क्यों साजिशन महज यह कहकर कि आम बोलचाल की भाषा है उन शब्दों को खत्म किया जाता है। निवेश को इनवेस्ट कहना या लिखना, पर्वतीय इलाके को हिल एरिया, खूबसूरत को ब्यूटीफुल, नख-शिख को टॉप टू बॉटम कहना या लिखना एक साजिश नहीं तो क्या है।
हिन्दी के प्रयोग को लेकर इस लेख का यह अर्थ कतई नहीं कि अन्य भाषा को दरकिनार कर दिया जाए। हर भाषा की अपनी गरिमा है। फिर हिन्दी की समृद्धता को लेकर तो किसी भी प्रकार का किंतु या परंतु है ही नहीं। आप लिखने-पढ़ने का कुछ काम हिन्दी में में कर रहे हैं तो उस भाषा के साथ पूरी तरह से ईमानदारी बरती जानी चाहिए। दिमाग पर ज्यादा जोर देने के बजाय आप कहीं पर भी कोई शब्द, खासतौर पर अंग्रेजी का शब्द चला देते हैं तो यह चलताऊपन खोखले दिमाग का परिचायक है। आप सोेचिए थोड़ा जोर डालिए, आपकी मेहनत उस कार्य में खूबसूरती ही लाएगी। पोस्टमैन को डाकिया लिख देंगे तो वह गलत नहीं हो जाएगा। इंडिविजुअल को व्यक्तिगत लिख देंगे तो गलत नहीं होगा। क्या हर्ज होगा यदि आप सोशल को सामाजिक, डिस्टेंस को दूरस्थ, कैंपस को परिसर और ग्रीनरी को हरियाली लिख लेंगे तो। हिन्दी भाषा के महत्व को समझिए, इसकी इस खूबसूरती को तो समझिए ही कि जैसा लिखेंगे वैसा ही बोलेंगे। साइकोलोजी जैसे शब्द का आपको भ्रम नहीं होगा, सीन जैसा कोई शब्द भ्रामक नहीं रहेगा।
केवल तिवारी
पिछले दिनों हिन्दी के एक बड़े अखबार वाले से भाषा को लेकर कुछ बहस हुई। उन साहिबान का कहना था कि हिन्दी के अखबारों को अधिक से अधिक अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग करना चाहिए। मैं इसे बिल्कुल गलत मानता हूं। मेरा कहना है कि हिन्दी भाषा के साथ-साथ किसी भी अन्य भाषा का ज्ञान होना चाहिए। खूब होना चाहिए, लेकिन बोलचाल की भाषा का बहाना बनाकर अंग्रेजी शब्दों को ठंूसना सरासर गलत है।
हिन्दी बोलने-लिखने के साथ यह तर्क विशुद्ध रूप से गढ़ा गया है कि बोलचान की भाषा में दिक्कत होती है। अंग्रेजी के कई शब्दों को समझने के लिए, अर्थ ढूंढ़ने के लिए और उसके उच्चारण को समझने के लिए हम न जाने कितनी बार शब्दकोश का सहारा लेते हैं। जरा सोचिए कि हिन्दी के बीच में तमाम अंग्रेजी शब्दों को घुसेड़ने में भी क्या खासी दिक्कत नहीं हुई होगी। फिर उन्हें जबरन लोगों से बुलवाया गया होगा। कौन नहीं समझता उप निरीक्षक (सब इंस्पेक्टर), छात्र (स्टूडेंट), जौहरी (ज्वेलर), हत्या (मर्डर), विशेष (स्पेशल), मुठभेड़ (एनकाउंटर)...वगैरह-वगैरह। ऐसे अनगिनत शब्द हैं जो हिन्दी में अच्छे-खासे प्रचलित हैं, खूब बोले जाते हैं, लेकिन न जाने क्यों साजिशन महज यह कहकर कि आम बोलचाल की भाषा है उन शब्दों को खत्म किया जाता है। निवेश को इनवेस्ट कहना या लिखना, पर्वतीय इलाके को हिल एरिया, खूबसूरत को ब्यूटीफुल, नख-शिख को टॉप टू बॉटम कहना या लिखना एक साजिश नहीं तो क्या है।
हिन्दी के प्रयोग को लेकर इस लेख का यह अर्थ कतई नहीं कि अन्य भाषा को दरकिनार कर दिया जाए। हर भाषा की अपनी गरिमा है। फिर हिन्दी की समृद्धता को लेकर तो किसी भी प्रकार का किंतु या परंतु है ही नहीं। आप लिखने-पढ़ने का कुछ काम हिन्दी में में कर रहे हैं तो उस भाषा के साथ पूरी तरह से ईमानदारी बरती जानी चाहिए। दिमाग पर ज्यादा जोर देने के बजाय आप कहीं पर भी कोई शब्द, खासतौर पर अंग्रेजी का शब्द चला देते हैं तो यह चलताऊपन खोखले दिमाग का परिचायक है। आप सोेचिए थोड़ा जोर डालिए, आपकी मेहनत उस कार्य में खूबसूरती ही लाएगी। पोस्टमैन को डाकिया लिख देंगे तो वह गलत नहीं हो जाएगा। इंडिविजुअल को व्यक्तिगत लिख देंगे तो गलत नहीं होगा। क्या हर्ज होगा यदि आप सोशल को सामाजिक, डिस्टेंस को दूरस्थ, कैंपस को परिसर और ग्रीनरी को हरियाली लिख लेंगे तो। हिन्दी भाषा के महत्व को समझिए, इसकी इस खूबसूरती को तो समझिए ही कि जैसा लिखेंगे वैसा ही बोलेंगे। साइकोलोजी जैसे शब्द का आपको भ्रम नहीं होगा, सीन जैसा कोई शब्द भ्रामक नहीं रहेगा।
केवल तिवारी
मिठास और हिन्दी भाषा के विविध प्रयोग
हिन्दी गद्य और पद्य के विकास में खास भूमिका निभaaने वाले कलम के सिपाहियों ने अपनी लेखनी से विविध प्रयोग किए। हिन्दी दिवस के मौके पर उनकी कुछ रचनाओं को अगर याद किया जाए तो उसमें घ्ाुली मिसरी का सहज ही भ्ाान हो जाएगा। इस पर चर्चा करने से पहले मुझे याद आते हैं वे दिन जब स्कूलों में हिन्दी साहित्य के इतिहास के संदभर््ा में अध्यापक याद कराने के लिए रोचक तरीके से चीजों को बताते थे। उदाहरण के लिए आधुनिक हिन्दी साहित्य यानी भ्ाारतेन्दु युग से पूर्व चार महत्वपूर्ण लेखकों के नाम और उनकी रचनाओं को इस तरह से याद कराया जाता था-
दोसा लाई
याद करने का सामान्य तरीका था दक्षिण भ्ाारतीय व्यंजन दोसा (डोसा) लेकर कोई आई। लेकिन असल में यह था दो बार स और ल औ ई। यानी पहले स से तात्पर्य था सदासुख लाल और दूसरे वाले स का मतलब था सदल मिश्र। फिर आते हैं ल और ई। ल से मतलब था लल्लूलाल और ई से तात्पर्य था इंद्गाा अल्ला खां। अब याद करनी थी इनकी रचनाएं। इसके लिए भ्ाी बहुत आसान तरीका निकाला गया। जैसा नाम वैसी रचना यानी सदासुख लाल में सुख द्गाब्द है तो उनकी रचना का नाम था सुख सागर और सदल मिश्र यानी जाति से ब्राह्मण तो संस्कृत का प्रयोग इनकी रचना का नाम भ्ाी क्लिद्गट था यानी नासिकेतोपाख्यान। फिर लल्लूलाल सामान्य नाम और उसी अनुरूप रचना प्रेम सागर। फिर आते हैं इंद्गाा अल्ला खां। इनका जितना बड़ा नाम उतनी ही बड़ी रचना। इनकी रचना का नाम था रानी केतकी की कहानी। यह प्रसंग तो सहज इस रूप में था कि कुछ लोग तमाम तरह के किंतु-परंतु और बहाने लगाते हैं हिन्दी साहित्य के विकास की गाथा समझने या समझाने में।
हम अगर बात करें रहीम और कबीर के जमाने की तो आज द्गाायद ही कोई मौका होगा जब इनकी रचनाओं का जिक्र नहीं होता होगा। कबीर की रचनाओं में जहां कहीं भ्ाी एकरूपता नहीं दिखती वहीं रहीम, मीरा, रसखान और तमाम कवियों की रचनाओं में खास समानता और विद्गोद्गा बोली नजर आती है।
कबीर कहीं पर लिखते हैं-
मसि कागद छुयो नहीं, कलम गही नहिं हाथ।
कबीर ही यह भ्ाी लिखते हैं-
पाहन पूजे हरि मिले तो मैं पूजूं पहाड़
उन्हीं कबीर की रचनाओं में अेसे द्गाब्द भ्ाी दिखते हैं-
अंसड़ियां झाईं पड़ियां, पंथ निहारि-निहारि, जीभ्ाणियां छाला पड़ियां राम पुकारि-पुकारि
रहीम की रचनाओं की अगर बात करें तो उनके दोहों और छंदों में एक खास पैगाम होता था। रहीम एक जगह लिखते हैं-
कह रहीम कैसे निभ्ो, बेर-केर को संग
वे डोलत रस आपने, उनके फाटत अंग
रहीम जी ही यह संदेद्गा भ्ाी देते हैं-
रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय
तोड़े से फिर ना जुड़े, जुड़े तो गांठ पड़ जाय।
मीरा की रचनाओं में अगर नजर दौड़ाएं तो भ्ाक्ति के रस में सराबोर उनके द्गाब्द कहते हैं-
मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरा न कोई
रसखान की रचनाओं का रस अलग ही है, वे कहते हैं-
मानुस हों तो वही रसखान, बसों ब्रज गोकुल गांव के ग्वारन
जो पद्गाु हों तो बसेरो करों, मिली कालिंदी कूल कदंब की डारन।
असल में इन महान विभ्ाूतियों का जिक्र इसलिए कहा जा रहा है कि हिंदी का विकास अपने समय के हिसाब से होता रहा। हर काल में इसे एक नया रस, नया आयाम और नई अनुभ्ाूति मिलती रही।
भ्ाारतेंदु हरिद्गचंद्र के बाद जिसे हम आधुनिक हिंदी साहित्य का काल कहते हैं, में भ्ाी कई प्रयोग हुए। फिर हिंदी में द्गोरन्ओ द्गाायरी का दौर आया। इसमें दुद्गयंत के कई प्रयोग बेहद याद किए जाते हैं-
कौन कहता है आसमान में छेद नहीं होता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो
इसी तरह की तमाम रचनाओं, जिनकी द्गाायरी में हिन्दी पुट दिखता है, में द्गाामिल हैं निदा फाजली, बद्गाीर बद्र वगैरह-वगैरह।
निदा फाजली लिखते हैं-
बच्चा बोला देखकर मस्जिद आलीद्गाान
अल्लाह तेरे एक को इतना बड़ा मकान।
हिन्दी की मिठास की गति में तमाम तरह के प्रयोग होते रहे। आधुनिक हिन्दी में छायावाद, प्रयोगवाद नव प्रयोगवाद, उत्तर आधुनिक काल तमाम चलते रहे। इस नए प्रयोग में एक लेखक की कविता पर गौर करिए-
मां जा रही हो
हां
कब आओगी
द्गााम को
क्या लाओगी
थकान
हिन्दी का यह सतत विकास ही है जब आज तमाम पत्र-पत्रिकाएं उत्तरोत्तर विकास कर रही हैं। चैनलों पर हिन्दी में काम हो रहा है। कॉल सेंटर में हिन्दी के लिए विद्गोद्गा प्रद्गिाक्षण दिया जा रहा है और कई अेसे ज्ञान-विज्ञान के चैनल हैं जिनके हिन्दी कार्यक्रमों को खासी ख्याति मिल रही है। हिन्दी रचनाओं में हर काल में चाहे वह भ्ाक्तिकाल हो, वीरगाथा काल हो या फिर आधुनिक काल अपनी रचनाओं का रचनाकारों ने डंका बजाया है। हिन्दी के इस सतत विकास को एक नमन।
केवल तिवारी
साभaar - इस्पात भाषा भारती
दोसा लाई
याद करने का सामान्य तरीका था दक्षिण भ्ाारतीय व्यंजन दोसा (डोसा) लेकर कोई आई। लेकिन असल में यह था दो बार स और ल औ ई। यानी पहले स से तात्पर्य था सदासुख लाल और दूसरे वाले स का मतलब था सदल मिश्र। फिर आते हैं ल और ई। ल से मतलब था लल्लूलाल और ई से तात्पर्य था इंद्गाा अल्ला खां। अब याद करनी थी इनकी रचनाएं। इसके लिए भ्ाी बहुत आसान तरीका निकाला गया। जैसा नाम वैसी रचना यानी सदासुख लाल में सुख द्गाब्द है तो उनकी रचना का नाम था सुख सागर और सदल मिश्र यानी जाति से ब्राह्मण तो संस्कृत का प्रयोग इनकी रचना का नाम भ्ाी क्लिद्गट था यानी नासिकेतोपाख्यान। फिर लल्लूलाल सामान्य नाम और उसी अनुरूप रचना प्रेम सागर। फिर आते हैं इंद्गाा अल्ला खां। इनका जितना बड़ा नाम उतनी ही बड़ी रचना। इनकी रचना का नाम था रानी केतकी की कहानी। यह प्रसंग तो सहज इस रूप में था कि कुछ लोग तमाम तरह के किंतु-परंतु और बहाने लगाते हैं हिन्दी साहित्य के विकास की गाथा समझने या समझाने में।
हम अगर बात करें रहीम और कबीर के जमाने की तो आज द्गाायद ही कोई मौका होगा जब इनकी रचनाओं का जिक्र नहीं होता होगा। कबीर की रचनाओं में जहां कहीं भ्ाी एकरूपता नहीं दिखती वहीं रहीम, मीरा, रसखान और तमाम कवियों की रचनाओं में खास समानता और विद्गोद्गा बोली नजर आती है।
कबीर कहीं पर लिखते हैं-
मसि कागद छुयो नहीं, कलम गही नहिं हाथ।
कबीर ही यह भ्ाी लिखते हैं-
पाहन पूजे हरि मिले तो मैं पूजूं पहाड़
उन्हीं कबीर की रचनाओं में अेसे द्गाब्द भ्ाी दिखते हैं-
अंसड़ियां झाईं पड़ियां, पंथ निहारि-निहारि, जीभ्ाणियां छाला पड़ियां राम पुकारि-पुकारि
रहीम की रचनाओं की अगर बात करें तो उनके दोहों और छंदों में एक खास पैगाम होता था। रहीम एक जगह लिखते हैं-
कह रहीम कैसे निभ्ो, बेर-केर को संग
वे डोलत रस आपने, उनके फाटत अंग
रहीम जी ही यह संदेद्गा भ्ाी देते हैं-
रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय
तोड़े से फिर ना जुड़े, जुड़े तो गांठ पड़ जाय।
मीरा की रचनाओं में अगर नजर दौड़ाएं तो भ्ाक्ति के रस में सराबोर उनके द्गाब्द कहते हैं-
मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरा न कोई
रसखान की रचनाओं का रस अलग ही है, वे कहते हैं-
मानुस हों तो वही रसखान, बसों ब्रज गोकुल गांव के ग्वारन
जो पद्गाु हों तो बसेरो करों, मिली कालिंदी कूल कदंब की डारन।
असल में इन महान विभ्ाूतियों का जिक्र इसलिए कहा जा रहा है कि हिंदी का विकास अपने समय के हिसाब से होता रहा। हर काल में इसे एक नया रस, नया आयाम और नई अनुभ्ाूति मिलती रही।
भ्ाारतेंदु हरिद्गचंद्र के बाद जिसे हम आधुनिक हिंदी साहित्य का काल कहते हैं, में भ्ाी कई प्रयोग हुए। फिर हिंदी में द्गोरन्ओ द्गाायरी का दौर आया। इसमें दुद्गयंत के कई प्रयोग बेहद याद किए जाते हैं-
कौन कहता है आसमान में छेद नहीं होता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो
इसी तरह की तमाम रचनाओं, जिनकी द्गाायरी में हिन्दी पुट दिखता है, में द्गाामिल हैं निदा फाजली, बद्गाीर बद्र वगैरह-वगैरह।
निदा फाजली लिखते हैं-
बच्चा बोला देखकर मस्जिद आलीद्गाान
अल्लाह तेरे एक को इतना बड़ा मकान।
हिन्दी की मिठास की गति में तमाम तरह के प्रयोग होते रहे। आधुनिक हिन्दी में छायावाद, प्रयोगवाद नव प्रयोगवाद, उत्तर आधुनिक काल तमाम चलते रहे। इस नए प्रयोग में एक लेखक की कविता पर गौर करिए-
मां जा रही हो
हां
कब आओगी
द्गााम को
क्या लाओगी
थकान
हिन्दी का यह सतत विकास ही है जब आज तमाम पत्र-पत्रिकाएं उत्तरोत्तर विकास कर रही हैं। चैनलों पर हिन्दी में काम हो रहा है। कॉल सेंटर में हिन्दी के लिए विद्गोद्गा प्रद्गिाक्षण दिया जा रहा है और कई अेसे ज्ञान-विज्ञान के चैनल हैं जिनके हिन्दी कार्यक्रमों को खासी ख्याति मिल रही है। हिन्दी रचनाओं में हर काल में चाहे वह भ्ाक्तिकाल हो, वीरगाथा काल हो या फिर आधुनिक काल अपनी रचनाओं का रचनाकारों ने डंका बजाया है। हिन्दी के इस सतत विकास को एक नमन।
केवल तिवारी
साभaar - इस्पात भाषा भारती
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