केवल तिवारी
रास्ता सोचते रहने से किधर बनता है। सर में सौदा हो तो दीवार में दर बनता है। आखिरकार यह शेर मेरे एक काम को लेकर सटीक सा लगता है। जीवन के भटकाव, प्राइवेट नौकरी का दंश और चलते रहने की फितरत। इस सफर में कुछ लोग ऐसे मिलते हैं जिनकी एक अलग छाप बनती है। आज यह लेखन वरिष्ठ पत्रकार राकेश थपलियाल जी के लिए। इस वक्त वह नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट (NUJ) के अध्यक्ष हैं। उनसे बहुत पुराना परिचय है। परिचय के साथ-साथ उनके जरिये मॉरल सपोर्ट भी मिला है। पहले वर्तमान संदर्भ पर बात कर लूं फिर थोड़ी सी पुरानी याद। असल में जब वह हाल में ही इस संगठन यानी NUJके अध्यक्ष बने तो उनको बधाई दी साथ ही अपनी एक समस्या भी बता दी। असल में ईपीएफओ में मेरी सर्विस लेंथ एड नहीं हो पाई। पिछले दिनों हायर पेंशन योजना को एडॉप्ट करने में भी यह समस्या आड़े आई। मैंने वर्ष 2000 में हिंदुस्तान जॉइन किया था, फिर 2008 में नईदुनिया। उस वक्त मैंने अपना पीएफ ट्रांसफर करवा लिया। यह काम करना तो चाहिए था दैनिक जागरण छोड़ने के बाद भी, लेकिन कर नहीं पाया। खैर...। नईदुनिया छोड़ने के बाद पीएफ का पैसा निकलवा लिया। पिछले साल जब सरकार की हायर पेंशन स्कीम आई तो मैंने भी अप्लाई कर दिया। दैनिक ट्रिब्यून के एक साथी ने कहा कि आप अपना पुरानी सर्विस का डिटेल भी भर दो। मैंने कहा कि मैं तो वह पीएफ निकलवा चुका हूं। उन्होंने कहा कि उससे क्या होता है। कुल सर्विस अगर दस साल से अधिक की हो गयी हो तो ईपीएस का पैसा सरकार के पास पड़ा होता है। मैं उस वक्त से सक्रिय हो गया। पहले अपने ऑफिस में संबंधित अधिकारी से संपर्क किया। उन्होंने हाथ खड़े कर दिए। फिर चंडीगढ़ के पीएफ ऑफिस गया, वहां भी कुछ नहीं हुआ। फिर मध्य प्रदेश के इंदौर स्थित नईदुनिया कार्यालय में संपर्क किया, वहां भी 'Record not found'जैसे वाक्य का प्रयोग कर दिया। उस दौरान वहां के एक पत्रकार ने भी कुछ मदद की। फिर पत्रकारों के एक नेता से संपर्क किया। वह मध्य प्रदेश के ही थे। उनसे कहा कि मैं इंदौर आ रहा हूं। उन्होंने गर्मजोशी से कहा कि स्वागत है। लेकिन जब मैं इंदौर पहुंचा तो उन्होंने फोन ही नहीं उठाया और न ही मैसेज का कोई रिप्लाई किया। तमाम जगह प्रयास कर मैं थक-हार गया। पिछले दिनों राकेश थपलियाल जी से भी इस काम के बारे में कहा। उन्होंने कहा मुझे डॉक्यूमेंट भेजो, मैं आपका केस केंद्रीय श्रम मंत्री तक पहुंचा दूंगा। मुझे थोड़ी हिचक तो हुई कि पता नहीं... लेकिन इसी पता नहीं और संकोच के बीच मैंने अगले दिन उनको पीडीएफ भेज दीं। दो-चार दिन बाद ही उनका फोन आया कि सभी दस्तावेजों का प्रिंटआउट निकालकर मैंने पहुंचा दिया है और आश्वासन मिला है कि काम हो जाएगा। पता नहीं क्यों, दिल में कुछ-कुछ भरोसा जगने लगा। क्योंकि अब तक तो आश्वासन भी नहीं मिल रहा था। सच में राकेश जी की कोशिश रंग लाई और एक हफ्ते बाद इंदौर से फोन आया। वहां के पीएफ ऑफिस के सज्जन ने कहा ये काम तो आप खुद भी कर सकते हैं ऑनलाइन हो जाएगा। मैंने कहा भाई हर संभव कोशिश करने के बाद मंत्रालय के जरिये आप तक पहुंचा है यह केस। आप चाहें तो मेरा यूजर आईडी और पासवर्ड ले लें। उन्होंने वह तो नहीं किया अलबत्ता ऑनलाइन सर्विस हिस्ट्री जुड़वाने की कोशिश में मेरी मदद की, लेकिन वह काम नहीं हुआ। फिर वह सज्जन बोले, आप परेशान मत होइये काम तो होकर रहेगा। फिर उन्होंने ऑफलाइन की प्रक्रिया समझाई। यह केस नईदुनिया को रैफर हो गया। नईदुनिया से एक सज्जन का फोन आया। उन्होंने इतने डॉक्यूमेंट मांगे कि सच में मैंने अगर वे पेपर नहीं रखे होते तो टालमटोल होने का पूरा खतरा था। खैर... लब्बोलुआब यह है कि वह काम आखिरकार हो गया और अब पीएफ पोर्टल पर मेरी सर्विस हिस्ट्री दिखने लगी है। यह काम पहले हो जाता तो शायद मैं हायर पेंशन के लिए अप्लाई कर देता, लेकिन कोई नहीं देर आयद दुरुस्त आयद। पीएफ राशि तो नईदुनिया छोड़ते वक्त निकाल चुका था, लेकिन ईपीएस का कुछ फायदा शायर 60 साल के बाद मिल जाये। राकेश जी को बहुत-बहुत धन्यवाद और दिल से आभार। उनके प्रयास और मेरी कोशिशों पर एक शेर याद आता है-
इतना भी ना-उमीद दिल-ए-कम-नज़र न हो। मुमकिन नहीं कि शाम-ए-अलम की सहर न हो।
कुछ पुरानी यादें और बातें...
राकेश थपलियाल जी के नाम से तो पहले ही परिचित था, लेकिन सीधा वास्ता पड़ा वर्ष 1998 में जब दैनिक जागरण जॉइन किया। राकेश जी शुरू से ही खेल पत्रकार रहे हैं। वह 15 दिन आईएनएस में होते और कवरेज करते और 15 दिन डेस्क पर। जागरण जाने पर पता चला कि वहां एक अलग किस्म की राजनीति है। राकेश जी उन चंद लोगों में थे जिन्होंने मेरा साथ दिया और समय-समय पर कुछ जरूरी ताकीद की। फिर वर्ष 2000 में हिंदुस्तान आए तो राकेश जी भी वहां खेल डेस्क पर पहुंचे। वहां भी वह कई बातों को साझा करते। इसी दौरान मेरी शादी तय हुई और राकेश जी भी हल्द्वानी-काठगोदाम पहुंचे। मुझे बहुत अच्छा लगा। बाद में राकेश जी के विवाह में मुझे भी जाने का मौका मिला। उनके साथ अच्छा वक्त गुजरा। अब मैं करीब डेढ़ दशक से चंडीगढ़ हूं, राकेश जी से बीच-बीच में कुछ मुलाकातें हुई हैं। सिलसिला जारी रहेगा।


1 comment:
कुछ लोग बातें नहीं बनाते काम करते हैं। ऐसे लोगों को साधुवाद
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