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Wednesday, January 25, 2023

जोशीमठ : विकास, विनाश, किंतु-परंतु और पलायन का दंश

 

फोटो साभार : इंटरनेट
केवल तिवारी

घर मतलब घर। महज चहारदीवारी नहीं। महज चंद दरवाजे या खिड़कियां नहीं। इसीलिए तो Home और House में कई बार फर्क समझाया जाता है। घर एक भाव है जो सुरक्षा का अहसास कराता है। घर एक अपनापन है जो सारे जहां को कुछ गज में समेट देता है। घर में किसी का इंतजार होता है। घर में एक सामूहिक प्यार होता है। लेकिन इन दिनों कुछ घर इसलिए ढहाए जा रहे हैं कि सुरक्षा बनी रहे। घर के लोग सुरक्षित रह सकें। है ना अजीब सी बात। घर ढहाने में कैसी सुरक्षा, लेकिन ऐसा हो रहा है। ये घर इसलिए नहीं ढहाए जा रहे हैं कि जर्जर हो चुके हैं, बल्कि इसलिए तोड़े जा रहे हैं कि यहां एक अजीब सा खौफ दिनोंदिन मुंह फाड़ रहा है। खौफ की जो दरारें चंद दिन छोटी थीं, उनका आकार बढ़ता जा रहा है। आप ठीक समझे, बात कर रहे हैं उत्तराखंड के जोशीमठ की। इसे कुदरत का कहर कहें या अनियोजित विकास की रफ्तार की जोशीमठ पिछले कुछ समय से सुर्खियों में है। सुर्खियां यहां अचानक आ रही दरारों को देखकर। लोगों ने जीवनभर की जोड़ी गयी रकम से सपनों का घर बनाया था। लेकिन इस घर पर मानो बहुत बुरी नजर लग गयी। अभी तक लगभग हजार घरों में छोटी-बड़ी दरारों की सूचना आ चुकी है। अलग-अलग एजेंसियां जहां इसके कारणों को जानने में लगी हैं, वहीं खतरनाक घोषित किए गए भवनों को ध्वस्त करने का भी सिलसिला चल निकला है। खतरनाक तरीके से आपस में जुड़ गये चार होटलों (अलग-अलग स्थानों पर दो-दो होटल) को भी तोड़ा जा रहा है। मरता क्या न करता? सरकारी फरमान के बाद अनेक लोगों को अपना घर छोड़कर जाना पड़ा। एक शायर की दो पंक्तियां यहां सटीक बैठती हैं-
कोई वीरानी सी वीरानी है, दश्त को देख के घर याद आया।
दर-ब-दर ठोकरें खाईं तो ये मालूम हुआ, घर किसे कहते हैं क्या चीज़ है बे-घर होना।
आखिर दोष किसका
दोषारोपण करने में भी दो गुट बने हैं। सियासत की मानिंद। एक गुट जो कहता है, यह सब अनियोजित विकास के कारण हुआ है। सरकार ने सही जांच पड़ताल के बगैर ही बड़ी-बड़ी योजनाओं पर काम शुरू करवा दिया। उसका परिणाम आज दिख रहा है। ऐसा कहने वालों में ज्यादातर इस वक्त वे लोग मुखर हैं जो टेहरी बांध निर्माण के समय से ही सरकार की कटु आलोचना कर रहे हैं। उनकी बात में दम भी है क्योंकि प्रभावित क्षेत्र के आसपास ही इन दिनों अनेक विकास कार्य हो रहे हैं। इनमें सबसे चर्चित एनटीपीसी का टनल है। साथ ही रेलवे निर्माण कार्यों को भी गति मिलने की सूचना है। तर्क यह है कि जब हिमालयी पहाड़ा का यह हिस्सा बेहद कमजोर है तो आखिर क्यों यहां ऐसे विकास कार्य कराए जा रहे हैं जिनके कारण पहाड़ों को खोखला किया जा रहा है। इन सबसे इतर, एक दूसरा गुट है जो विकास कार्यों को अवश्यवंभावी बताता है। ऐसे लोग हिमाचल प्रदेश का उदाहरण देते हैं। साथ ही यह भी कहते हैं कि मैदानी इलाकों में बैठे वे लोग सामान्यत: ऐसे लोग विकास का विरोध करते हैं जो पहाड़ों पर महज टूरिस्ट बनकर आते हैं। इन लोगों का तर्क होता है कि पहाड़ को पहाड़ ही रहने दो। असल में जब विकास परियोजनाएं नहीं चलाई जाएंगी तो स्थानीय युवाओं को रोजगार कैसे मिलेगा। दोनों सोच का सार यही है कि नियोजित विकास हो, स्थानीय युवाओं को रोजगार मिले और पहाड़ भी सुरक्षित रहें। फिलहाल जोशीमठ के संबंध में राहत की बात यह है कि जान के नुकसान की दुखद सूचनाएं नहीं हैं। हां कुछ खबरें मवेशियों को लेकर हैं जो पीड़ा पहुंचाती हैं। यानी पालतू पशुओं को उनके हाल पर छोड़ दिया है। वैसे कुछ सामाजिक संगठन उनकी देखरेख के लिए आगे आई हैं, उम्मीद की जानी चाहिए कि दिल को पीड़ा पहुंचाने वाली कोई खबर न आने पाए।
रिवर्स पलायन जोर पकड़े तो अच्छा...
पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है, अपने ही घर में किसी दूसरे घर के हम हैं।
ज़लज़ला आया तो दीवारों में दब जाऊँगा, लोग भी कहते हैं ये घर भी डराता है मुझे।
अपने ही घर आकर अपनापन के बजाय परायापन सा महसूस हो तो इससे बड़ी विडंबना क्या होगी। लेकिन किसी शायर की उक्त पंक्तियां बहुत कुछ कहती हैं। उसी तरह जैसे कि किसी ने कहा है कि 'वर्षों बाद घर आया तो अजनबी से पता पूछना पड़ा।' पिछले कुछ वर्षों से उत्तराखंड में 'रिवर्स पलायन' की खबरें हैं। रिवर्स पलायन का मतलब सब समझ ही रहे हैं। यानी कि यहां से बाहर गए लोग फिर से यहां बस रहे हैं। उनकी बसावट अच्छा संकेत है। अगर यह बसावट अच्छा संकेत है तो इसे बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
फोटो साभार : इंटरनेट


Saturday, January 14, 2023

नये गीत, पुराने गीत और बच्चे

 केवल तिवारी 

हंसना, रोना और गाना गुनगुनानासंभवत: हर व्यक्ति केसाथ होता है। कोई खुलकर हंसता है, कोई मुस्कुराता है और कोईदेश, काल और परिस्थिति केहिसाब से अपनी हंसीको बिखेरता है। इसी तरह रोने के भी अपने-अपने भाव और ताव हैं। कोई अकेले में रोता है। कोई मौके पर रोता है और कोई चुपके-चुपके रात-दिन…। हंसने और रोने के बाद अब बात करत हैं गाने की। गीत कोई भी हो, कैसा भी हो अपनी-अपनी पसंद के मुताबिक गुनगुनाता है हर कोई। कोई बाथरूम सिंगर होता है, कोई गाहे ब गाहे गुनगुनाता रहा है। बड़े गायकों की बात छोड़ दें तो कुछ लोग हमारी आपकी फरमाइश पर दो-चार लाइनें किसी गीत का सुना देता है। अब अगर बात पसंद या नापसंद की करें तो भंडार है गीतों का। इसीलिए कई सार्वजनिक जगहों पर गुजारिश की जाती है कि संगीत न बजाएं। ज्यादा शौक हो तो ईयरफोन या हेडफोन लगाकर सुनें। आज तो ऑनलाइन इतने एप हैं कि बैकक्राउंड में म्यूजिक बजता रहेगा और आप बोल अपने डाल दीजिए। आपने कैसा गाया, इसकी रैंकिंग भी तुरंत मौजूद।  



खैर… भूमिका कुछ लंबी हो गयी। असल में बात निकली थी एक गीत के बोल से। गीत के बोल हैं तुझसे नाराज नहीं, जिंदगी हैरान हूं मैं…। इसी गीत के आगे एक मुखड़े में एक लाइन है मुस्कुराएं तो मुस्कुराने के कर्ज उतारने होंगे। छोटा बेटा धवल एक दिन अपनी मां से बोला, ‘आज मुझे इस लाइन का मतलब समझ में आ गया।’ कैसे, पूछने पर बोला, आज मैं स्कूल से आते वक्त बड़ा खुश था, लेकिन पैर में चोट लग गयी। हंस सकते ही नहीं, कुछ न कुछ हो जाता है। यह बात सुनकर मैं मुस्कुरा दिया। यूं तो पहले बड़ा बेटा कार्तिक (कुक्कू) भी मुझे कई गीतों को सुनने का आग्रह करता था, ज्यादातर गीत विदेशी होते थे। मैं अनमने भाव से सुनता था। लेकिन कुछ गीतों में मुझे रस आने लगा। वह तो अब पढ़ाई के लिए हॉस्टल में है। अब छोटा बेटा धवल भी कई बार उसी तरह के गीतों को यूट्यूब पर सुनने का आग्रह करता है। मुझे अच्छे भी लगते हैं। आजकल तो कई बार कतर में हुए फुटबॉल के थीम गीत को उसने सुनवाया। खैर उक्त गीत की पंक्ति के बारे में जब उससे पूछा कि उसने इसे कहां सुना, तो बोला आप लोग (मैं और भावना) से। असल में कई बार इस गीत को हम यूट्यूब चलाते हैं या कभी-कबार खुद ही गुनगुनाने लगते हैं। बच्चे ने इस गीत का अपने हिसाब से अर्थ लगाया। मेरे साथ भी ऐसा होता है, अगर मैंने कोई फिल्म न देखी हो और मैं उसके कुछ गीत गाता हूं या सुनता हूं तो उसका फिल्मांकन मेरे दिमाग में मेरे हिसाब से चलता है। ऐसे ही एक बार मैं एक गीत गुनगुना रहा था, ‘चिट्ठी ना कोई संदेश, जाने वो कौन सा देश जहां तुम चल गए, कहां तुम चले गये।’ मैं इसे अपने किसी अन्य संदर्भ में जोड़कर सुनता या गुनगुनाता था, बाद में फिल्म की कहानी का पता चला तो कुछ और ही मतलब निकला। चलिए गुनगुनाने, गाने और रोने पर आज की बात बस इतनी, बाकी फिर कभी।  



Wednesday, January 11, 2023

रहस्य-रोमांच, विश्वास-अविश्वास और....

केवल तिवारी

दैनिक ट्रिब्यून में मेरे वरिष्ठ सहयोगी पंडित अनिरुद्ध शर्मा जी का एक दिन फोन आया। उन्होंने कहा, दो पुस्तकों को पढ़ने की सलाह दे रहा हूं। बेहतर हो आप इन्हें खुद ही मंगवा लें। उन दिनों दो पुस्तकों को पहले से ही पढ़ रहा था। समीक्षार्थ। इसलिए करीब 15 दिनों बाद विश्वविद्यालय प्रकाशन को ईमेल किया।

 



पैसे भेजे और तीन या चार दिन में पुस्तकें आ गयीं। एक पुस्तक को तो जल्दी ही पढ़ गया। हालांकि उसमें कुछ क्लिष्ट शब्दों ने परेशान किया, लेकिन दूसरी पुस्तक को शुरू करने से पहले कई व्यवधान आए। खैर, आज 11 जनवरी, 2023 को दूसरी पुस्तक भी पढ़ डाली। ठंड के मौसम में कहीं जाने का कार्यक्रम था नहीं। पिछले तीन-चार दिनों से लगातार पढ़ रहा था और आज दोपहर उसे संपन्न कर लिया। साथ ही पुस्तक में दिए गए चित्रों को देखा और उनके कैप्शन पढ़े। पुस्तक में जगह-जगह चित्रों के माध्यम से यात्रा वर्णन के बारे में बताया गया है। पुस्तक में किशोर रिंचू के बारे में दी गयी बातें हों या फिर दुर्गम विषम परिस्थितियों का चित्रण, महज एक उबले आलू का सेवन हो या फिर सूक्ष्म शरीर से यात्रा का। एक मर चुके युवक से साक्षात्कार की बात हो या फिर महिला का विवाह संबंधी वर्णन साथ ही जगह-जगह प्रश्नोत्तरी... सचमुच यह सब वर्णन अनूठा है। दोनों पुस्तकों का नाम है, तिब्बत का रहस्यमयी योग व अलौकिक ज्ञानगंज और तिब्बत का अज्ञात गुप्त मठ। विवरण है श्रीमत् शंकर स्वामी की यात्रा वृतांत का। शंकर स्वामी को सिद्ध योगी माना जाता है। साथ ही कहा जाता है कि उन्होंने हिमालयी क्षेत्र के ऐसे दुर्गम स्थानों की यात्रा की है जहां सबके लिए जा पाना संभव नहीं होता। दावा तो यह भी किया जाता है कि आज भी उन दुर्गम स्थानों पर अगर कोई तप और योग के बल पर जाये तो उसे आलौकिक दर्शन होंगे। माजरा जो भी हो पुस्तक के कई अंश रोचक हैं, रोमांचकारी हैं। समीक्षात्मक टिप्पणी से पहले पुस्तक से ही लिए गए कुछ अंशों पर गौर फरमाइये जो यह संदेश भी देते हैं कि हिमालयी क्षेत्र महज पर्यटन और मौज मस्ती के लिए नहीं है। सिर्फ मौज मस्ती के दुष्परिणाम हमने देखे हैं- पढ़िए दोनों पुस्तकों से लिए गए कुछ अंश-
'विश्व विधाता की अपूर्व सृष्टि जगत को जिससने देखा ही नहीं, जाना ही नहीं उसके विधि-विधान को अनुभव भी नहीं किया, उसका विशाल विश्व का आयोजन भ्रमण पर्यटन का नाम दिया गया दो-चार मठ मंदिरों की परिक्रमा, होटलों में गले तक खाना पीना और उद्दंड हो हुल्लड़ करके आने को ही पर्यटन कहते हैं। बहुत घूमे। इस होटल की व्यवस्था अच्छी, इस रेस्टोरेंट का आहार रचना तृप्त उस गली में स्त्री पुरुषों के कपड़े सस्ते उस अंचल की स्थानीय युवतियां देखने में सुंदर। यह देखो वहां की कलाकृति, ... यह तो भ्रमण नहीं सिर्फ हुल्लड़ है। इस दलित मन में कहां पाएंगे वह मुक्ति। कौन देगा उन्हें आशा की किरण। जातियों की मानसिकता देख सुनकर अतिशय करो ना होती मोटरवाहन की सीट पर बैठकर दूर बहुत दूर दूसर पर्वत श्रेणियों के दृश्य में विविध भावनाओं में डूबा रहा बस में। अंत में अवतरण हुआ सीमांत जनपद धारचूला में।'

एक और वर्णन-

'अच्छी तरह से विशेष भाव से देखने पर मैं फिर चौंक उठा। देख रहा यह तो मेरा ही स्वरूप, मेरा ही प्रकाश, मैं ही उस में समाविष्ट, मेरा अस्तित्व, स्मृति बुद्धि आवेश उत्सव आस संवेदना उसी में स्पंदित एक लम्हे में न जाने क्या हुआ? मन की गति घूम गई अपने अंग आदि हस्त पर आदि के दर्शन कर रहा हूं। देखा मैं इंद्री अभी अशरीरी रक्त मांस हीन कंकाल का ढांचा मात्र फिर से गुहा स्थित ऋषि कंकाल में दृष्टिबाधित देख रहा है। यह कंकाल मेरे ही समान रूप रंग स्वरूप लेकर बैठा है और अपने शरीर को देखकर कंकाल का ढांचा यह क्या? यह कोई अघोरी तांत्रिक लीला लामा जी के संग में क्या फलीभूत हुआ मेरे रक्त मांस वरुण को खोलकर स्वरूप कंकाल ने स्वयं को आवृत किया इस कंकाल की हड्डियों के ढांचे को लेकर में जाऊंगा जीवन में एक बार नहीं कई बार स्वयं को देखा और प्रतीत कंकाल को देखा एक ही प्रकार प्रत्यय।'

एक और

'दुख में धैर्य धारण करने और सहने के लिए अभ्यस्त बनो। सुख-दुख समाहार दीप समूह अगर नहीं कोई शंका नहीं भाई रहो तथागत पर निर्भर। दुख जिस तरह वंचित नहीं सुख भी उसी तरह अभिलाष एक नहीं अनुराग। मनन चिंतन से विधि के विधान से पाऊं सुख और दुख स्वागत बंधु स्वागत निर्माण हो नम्र निवेदन करो ताकि जीवन जिज्ञासा सुख दुख आता जाता रहता है। ... कौन हो तुम और कौन यहां किसका!'

एक अन्य

'नेपाली छोकरा प्रीत शरीर लेकर मेरे पास काम कर रहा है उसने शिखर धाम में एक नए साधु की गुफा बनाई। लोहे की चादर से बने गेट पर एक जोड़ा ग्रिल पीठ पर लेकर वह मेरे साथ शिखर धाम से उत्तरकाशी में उतर आया। मरम्मत के बाद फिर से उन्हें वापस पहुंचाया अब तक समझ नहीं आया था कि वह एक नेपाली प्रेत काया है।'

और अंत में फिर एक

'संकीर्ण बुद्धि का मानव कहता है एक-दो तकनीक सिखा दो। यदि वे सैकड़ों तकनीक भी सीख लें तब भी अंतर्मन की गोपन वार्ता से अनभिज्ञ रह जाएंगे। हाय हाय बंधन में ही इनका आत्म सुख है। बंधन में ही इनका जीवन मरण त्याग उदारता के रस की मधुरिमा से वंचित है। नहीं जानते दूसरों की सेवा सहयोग के बिना हृदय प्रसारित नहीं होता। आत्म सुख भोग करते हुए घर पर बैठकर दो-चार तकनीक करने से परमात्मा का दर्शन कर लेंगे सोचते हैं। चतुराई कर आध्यात्मिक ज्ञान विवेक अर्जुन कर लेंगे, लेकिन इनसे कुछ भी नहीं होता जिनका मानव धर्म ही नहीं उनका आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश नहीं अधिकार ही नहीं...'

दोनों पुस्तकें रहस्य और रोमांच से भरपूर हैं, लेकिन शब्दावली कठिन है जिससे प्रवाह और वेग अटकता सा लगता है। कभी-कबार कुछ चीजों पर विश्वास सहज ही नहीं होता, लेकिन प्रामाणिक तरीके से चीजों को रखा गया है तो न मानने को भी मन नहीं मानता। दोनों पुस्तकें संग्रहणीय हैं। धन्यवाद अनिरुद्ध जी। 

Monday, January 2, 2023

कृष्ण के बाल्यकाल स्थलों के दर्शन... साथ में कुछ बातें-वातें

केवल तिवारी

श्रद्धा। भावना। परिक्रमा। पूजा-अर्चना। हरिनाम का जाप। यही सब तो होता है जब आप किसी धार्मिक स्थल पर जाते हैं। कुछ चीजों से आपका मन शांत और प्रसन्न हो जाता है तो कुछ चीजें आपको व्यथित भी कर देती हैं। लेकिन आपके वश में कुछ नहीं होता। हां, आप जिस उद्देश्य से जाते हैं, वह फलीभूत हो जाए तो बस क्या चाहिए? हमारी इच्छा भी थी कि भगवान श्रीकृष्ण जन्म और बाल्यकाल से जुड़े स्थलों पर सपरिवार जाकर पूजा-अर्चना करें। मैं तो एक बार गया हूं। हालांकि वह जाना बहुत जल्दी-जल्दी का था। कई वर्षों से विचार बना, लेकिन बुलावा इस बार आया। माध्यम बने भास्कर जोशी (राजू) का परिवार और उनके पड़ोसी अग्रवाल साहब। 


क्रिसमस पर्व के दिन रविवार 25 दिसंबर को मैं कार्तिक, धवल और भावना पहुंच गए फरीदाबाद। भव्य का इंतजार देखने लायक होता है। सातवीं में पढ़ने वाला यह बच्चा लाइव लोकेशन मांगता है। प्रीति मैडम की चाय और बच्चों के लिए विशेष डिश। पूरे परिवार का अपनापन खींच ले जाता है फरीदाबाद। फिर भावना और राजू का जुड़वां होना। खैर... चलते हैं सफर पर।
शुरुआत बरसाना और नंदगांव से
सोमवार को दोपहर हम लोग बरसाना के लिए चल पड़े। तय किया गया कि कुछ धार्मिक स्थलों पर आज शीश नवा के आ जाते हैं, कुछ पर मंगलवार को। सीधे बरसाना गए फिर नंद गांव। नंद गांव में एक वाकये ने परेशान किया। असल में मंदिरों की इस नगरी में भी जगह-जगह मंदिर हैं। एक जगह तो 'असली मंदिर' बताकर श्रद्धालुओं की श्रद्धा और भावनाओं से खेला गया। गाय के नाम पर और राधारानी के शृंगार के नाम पर पैसे लिए गए। बाद में जिसे पता चला कि असली मंदिर तो ऊपर है तो वह परेशान हुआ। पता नहीं क्यों ऐसी ठग विद्या करते हैं लोग। अव्वल तो यह है कि सभी धार्मिक स्थलों को ट्रस्ट बना दिया जाये। खैर हम श्रद्धाभाव से गए थे और दोनों मंदिरों के अलावा उस नगर की हर गली को भी शीश नवाया। मन में भगवान का सुमिरन किया। इसी मंदिर में जाते वक्त का एक वाकया याद है। असल में वहां खड़ी चढ़ाई में कार चलाकर ले गया। पहले तो ठीक चल रही थी जैसे ही आगे चल रही कार ने ब्रेक लगाया, मुझे भी लगाना पड़ा। जब दोबारा रेस दी तो कार थोड़ा सा पीछे को सरकी। कार में बैठीं प्रीति और भावना डर गए। वैसे सब ठीक रहा और वापसी में कार बैक राजू ने की और हम दर्शन कर प्रसन्नचित्त होकर आ गए। शाम को अग्रवाल साहब के घर पर रुके।
सुबह-सुबह परिक्रमा, फिर दर्शन और बांके बिहारी की भीड़ के साथ गुरुजी-वुरुजी




मंगलवार सुबह मैं, भावना, भास्कर और प्रीति चल पड़े वृंदावन की परिक्रमा करने। छह बजे शुरू परिक्रमा करीब साढ़े आठ बजे संपन्न हुई। इसके बाद घर आए और फिर बच्चों को लेकर गए बांके बिहारी के दर्शन करने। बांके बिहारी के अद्भुत दर्शन हुए। बिल्कुल सामने से। हमारे सामने ही आरती हुई। सभी प्रसन्न। फिर पैदल आते वक्त यमुना दर्शन किए। जल के छींटे डाले। गनीमत है कि इस इलाके में यमुना अभी भी नदी नजर आती है। दिल्ली में तो इस नदी का क्या हाल है, किसी से छिपा नहीं। उसके बाद हम लोगों ने निधि वन जाने का फैसला किया। निधि वन जाते वक्त किसी गुरुजी की शोभा यात्रा निकल रही थी। श्रद्धालु तख्तियां लिए चल रहे थे। आगे एक गाड़ी में बहुत बड़े स्पीकर रखे थे जो बज रहे थे, पीछे गुरुजी की प्रतिमा। अथाह भीड़। मेरा मोबाइल बेटे कार्तिक ने लिया था। हम लोग तेजी से जा रहे थे ताकि किनारे से समय पर निधि वन पहुंच जायें। मैं तेजी से आगे निकल गया। इस बीच, जानबूझकर जाम लगा दिया गया ताकि यह लगे कि गुरुजी के फॉलोअर बहुत ज्यादा हैं। तभी भगदड़ जैसी स्थिति बन गयी। बाकी परिवार अलग और मैं अलग। नंगे पैर था, किसी ने जूता रख दिया। अंगूठे के पास थोड़ा सा कट भी गया। अब करें क्या। इस भीड़ में धवल और भव्य तो परेशान हो गए होंगे। तभी एक महिला आई, बोली, भैया मोबाइल है तो देना मेरा बच्चा पीछे छूट गया है। लेकिन मेरे पास तो मोबाइल था ही नहीं। इसी दौरान एक युवक ने फोन दिया। उसी फोन से मैंने भी कुक्कू को कॉल की। किसी तरह हम लोग निधि वन पहुंचे। दर्शन और परिक्रमा एवं शीश नवाने के बाद हम लोगों ने तय किया मथुरा जाने का।
मथुरा में मन बहुत प्रसन्न हुआ
चूंकि मथुरा का पूरा सिस्टम पुलिस और प्रशासन के हाथ में है इसलिए यहां सबकुछ सिस्टमेटिक रहा और मन प्रसन्न भी हुआ। कृष्ण जन्मस्थली पर भी हालांकि ठगी के किस्से कदम-कदम पर सुनने को मिलते हैं, लेकिन उम्मीद है कि जल्दी ही सरकार इन मंदिरों में ऐसी व्यवस्था बनाएगी कि लोग मिसाल देंगे।
क्रम में हो सकती है गलती, जहां-जहां हम घूमे
धार्मिक यात्रा के अंतिम पड़ाव में हम लोगों ने गोवर्धन की परिक्रमा की। यह परिक्रमा ई रिक्शा के माध्यम से की। लेकिन यहां रास्तेभर लोगों की श्रद्धा देख मन भावुक हो गया। सचमुच पूजा, पाठ और पूजा-अर्चना श्रद्धा और भाव वाला ही मामला है। साथ ही नितांत निजी मामला। हम गए तो अनेक जगह और हो सकता है कि उपरोक्त वर्णन में क्रम कुछ गड़बड़ा गया हो। इसलिए कुछ प्रमुख स्थलों का नाम यहां लिख रहा हूं जहां-जहां हम लोग गए। साथ ही वापसी में सरसों के खेतों में कुछ फोटोग्राफी भी की। हम लोग गए-
कोकिला वन। शनि मंदिर। टेर कदम। आशेश्वर महादेव। नंद गांव। बरसाना।
बांके बिहारी मंदिर, वृन्दावन। यमुना दर्शन। निधि वन। मथुरा। रमन रेती। गोवर्धन। राधा कुंड। मानसी गंगा आदि।










Tuesday, December 20, 2022

‘सुखद-समृद्धि’ की ओर हरियाणवी विरासत

 केवल तिवारी 

यहां बेबाकी है। बेतकल्लुफी है। माटी से जुड़े रहने की ‘जिद’ है। आसमान में ‘उड़ने’ का हौसला है। परिवर्तन की गवाही है। सांस्कृतिक लिहाज है। आधुनिकता का खुलापन है। यह हरियाणा है। इस हरियाणा के सांस्कृतिक समृद्धि की झलक पिछले दिनों कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में आयोजित ‘रत्नावली’ कार्यक्रम में दिखी। संस्कृति की विभिन्न विधाओं में ‘लट्ठ गाड़ने’ वाले हरियाणावी देश-विदेशों में छा चुके हैं। खेलों में परचम लहरा रहा युवा वर्ग संस्कृति को सहेजने में जुटा है। विस्मृत की जा चुकी चीजों पर शोध कर रहा है। तभी तो जाने-माने कलाकार युवाओं को संदेश देते हैं, ‘सपनों का पीछा करो और ईमानदारी से आगे बढ़ो।’ 

गत 28 से 31 अक्तूबर तक कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय की रौनक कुछ अलग ही रही। प्रवेश करने से पहले ढोल की गूंज सुनाई देने लगती थी। रंग-बिरंगा परिसर और वहां सजे विभिन्न स्टॉल। कोने पर ही पगड़ी पहनने की होड़। बगल में ही दामण, लहंगा, चुनरी, हसली और कमरमंद का स्टॉल। बाहर के नजारे से जरा अंदर पहुंचे तो ऑडिटोरियम की दर्शक दीर्घा में हर कोई झूमने को मजबूर। झूमे भी क्यों ना। कभी रसिया, कभी लूर तो कभी समूह नृत्य। कलाकार जिन गीतों पर थिरके और संग-संग दर्शक झूमे जरा उन पर गौर फरमाइये- ‘दामन बावन गज का…, मैं मटक चलूंगी…’,‘रुत आई बंसत बहार की मेरा चुंदड़ उड़ उड़ जा…’,‘तेरे बिन आवे न चैन…’, ‘चलो री सखी मंगल गा लो…’ ‘यू म्हारा हरियाणा…’, ‘बसेरे आए रे बसेरे…’, ‘यशोदा मईया करो कमाल, रसिया हम खेले फागन में…’, ‘ऐसो कियो कमाल, बलम घर पडवा दे…’‘ब्रज में होरी मोरी रसिया…’, ‘होली खेलो कृष्ण मथुरा की गली…।’ मुख्य ऑडिटोरियम के बगल में दूसरे हॉल में सुनाई दीं कविताएं। कुल 26 महाविद्यालयों के काव्य प्रतिभागियों ने अलग ही माहौल बनाया। प्रथम, द्वितीय तो प्रतियोगिता की परिणति है, लेकिन दर्शकों के लिए तो हर क्षण आनंदित होने का था। इन कविताओं ने सबको मोह लिया। कविताओं के साथ ही कॉलेज विद्यार्थियों की हरियाणवी वेशभूषा और ‘सभी नै राम-राम’ का संबोधन सबको भा गया।  

दैनिक ट्रिब्यून की शुरुआती कवरेज


मजाकिया अंदाज, कटाक्ष के साथ संवाद 

रत्नावली समारोह में भले ही ज्यादातर कार्यक्रम प्रतियोगी स्वरूप में थे, लेकिन जीत-हार और प्रथम-द्वितीय की बात को दरकिनार रखा जाये तो इनके प्रस्तुतीकरण रहा लाजवाब। मजाकिया अंदाज और कटाक्षभरे संवाद। सिस्टम पर भी चोट और बात भी पते की। देखिये कुछ संवाद, ‘रै बालको! थम भी क्या याद करोगे, थारते कोरोना के सीजन में बिना पेपर दिए पास किया। इसते बत्ती ओर के चाहो हो, छह-छह साल में जो पास न होए, कोरोना मैं म्हारी दी छूट मै उनका कलेश कट गया।’ इस संवाद का जवाबी अंदाज देखिए, ‘इन बालकां का तो भला हो गया, पर उनके पेट पै लाठी लगी जो पिसे दे कै पास कराकै अपना टब्बर पालैं ते।’ अब थोड़ा सियासत में मजाकिया छौंक। देखिए संवाद-  

‘एक नेता बोल्या म्हारे तै वोट दो, म्हारे तै वोट मिलण तै देश नै इतना ऊंचा ले जैंगे.... अर इतनी ऊंचा... इतनी ऊंचा.... बस न्यूं समझ ल्यों ऊंचे तै भी ऊंचै। दूसरा नेता बोल्या-रोक दै मित्र इतनी ऊंचे तू देश नै लेग्या, ओड़े ऑक्सीजन का टोटा पड़ जैगा... अर ऑक्सीजन का टोटा दूर करना थारै बस का सोदा कोनै।’ कोरोना काल में ऑक्सीजन संकट पर यह गहरी चोट थी। ऐसे ही अनेक कार्यक्रम हुए जिनमें हंसी-मजाक के संदेश भी था। यही तो है हरियाणा और हरियाणवियों का अंदाज।  


रघुवेंद्र मलिक : संजीदा कलाकार हरियाणवी धरोहरों से प्यार 

राघवेन्द्र मलिक जी


जाने-माने कलाकार रघुवेंद्र मलिक की संजीदगी हमें अनेक मंचों पर देखने को मिलती रही है। कई फिल्मों में अपनी सशक्त भूमिका से दर्शकों का दिल जीतने वाले मलिक हरियाणवी धरोहरों को भी संजोने का काम कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि उनकी इच्छा इन धरोहरों को संजोकर रखने की है। यानी एक संग्रहालय बनाने की ताकि हरियाणा की आने वाली पीढ़ियों के मन से ये विस्मृत न हो जायें। कर्यक्रम से इतर उन्होंने कुछ चित्र दिखाए। चित्र उन धरोहरों के जो उनके पास हैं। इनके नाम देखिए परात, दोही, बोहिया, दरांत, पलिए, कुंडी, सिप्पी, लोटा, कटोरदान, छाज, छालणी, मूसल, हारी, तेलड़ी, दीपदान, लोढणी, छिक्का, खुरपी, तुंबा, खुरेहरा, बीजणा, फरमे, ठप्पे, लालटेन, डोलवगैरह-वगैरह।रघुवेंद्र ने कहा, ‘ये सभी चीजें हमारे रोजमर्रा की जरूरतोंमें शामिल रहा करती थीं।’ हरियाणा में इनमें से कुछ चीजें भले ही समय के साथ लुप्त हो गई हों, लेकिन अभिनेता रघुवेंद्र के पास इनका संकलन है और वह यह काम जारी रखे हुए हैं। उक्त सामानों के अलावा खेती-बाड़ी के लिए भी कई ऐसी चीजें थी जिनमें से शायद अब बहुत कुछ ना हो और लोगों को तो उनका पता ही ना हो जैसे दो सींगा चार सींगा जेली, गडासी, हालस, सांटा, जुआ, फरसा, गोपिया, नकेल, हल, हलस वगैरह-वगैरह। घर-परिवार की जिन चीजों को महिलाएं तैयार करती थीं, उनका संग्रह भी उनके पास हैं। इनमें शामिल हैं घागरा, ओढ़नी, झूला, टोपी, बटुए, बिंदरवाल, मोड़, तागड़ी, ईढ़ी, खेस, खरड़, पालना, दरी, मुड्डे, झुनझुना, चौपड़ आदि। मनोरंजन की सामग्री में संगीत से जुड़े कुछ वाद्य यंत्रों का भी उन्होंने जिक्र किया जैसे सारंगी, ग्रामोफोन, नगाड़ा, बीन, बांसली,डफ, तासावगैर-वगैरह। मलिक ने हरियाणवी फिल्मों पर भी बात की और उम्मीद जताई कि आज के युवा निश्चित रूप से स्थानीय सिने संसार को आगे ले जाएंगे।  


चार बार हुई शादी कैसे टूट सकती है : राजेंद्र गुप्ता 

कलाकारों और कार्यक्रम के संयोजक महासिंह पूनिया के साथ राजेंद्र गुप्ता।


संजीदा अभिनेता राजेंद्र गुप्ता से अनेक बातें हुईं। लेकिन जैसे ही उनसे प्रेम के संबंध में पूछा गया तो आसपास खड़े युवा ऐसे चौकन्ने हुए मानो उनके जवाब के लिए ‘इरशाद’ कर रहे हों। उन्होंने शुरुआत में कहा, ‘जब मैं 1963 में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय का छात्र था, लड़कियों की तरफ देखते हुए भी डरता था। वह वक्त कुछ और था।’ जवाब से जुड़ा सवाल, ‘आपने भी तो प्रेम विवाह किया, कैसे हुआ सबकुछ और कैसा अनुभव है जीवन में?’ बोले- ‘कैसे हुआ तो मैं भी नहीं जानता। फिल्मी सी कहानी है। नाटक अंधा युग की शूटिंग के दौरान दो दिन की मुलाकात के बाद तीसरे दिन बातचीत हुई और पहले मंदिर में चुपचाप शादी की। घर आए तो घरवालों ने हिंदू रीति-रिवाज से शादी कर दी। फिर कुछ संबंधियों ने कहा कोर्ट मैरिज करेंगे। वह भी हुआ। उसके बाद ससुराल भोपाल जाकर उनके रीति रिवाज यानी ईसाई धर्म के अनुसार विवाह हुआ। यानी चार बार शादी की रस्में।’ फिर हंसते हुए बोले- ‘चार बार हुई शादी कैसे टूट सकती है।’ एक समृद्ध व्यापारी का बेटा फिल्मों में कैसे, पूछने पर उन्होंने कहा, ‘व्यापार के लिए संवेदनाओं को कुचलना पड़ता है क्योंकि उसका पहला ध्येय मुनाफा है, वह मेरे से नहीं हुआ। रसायन शास्त्र की पढ़ाई में भी मन कम लगा और जहां लगा वहां आज हूं।’ उन्होंने कहा कि हरियाणवी सिनेमा को और समृद्ध बनाने के लिए हर किसी को अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभानी होगी।   

चीजों को संभालना, बेहतरी के परिवर्तन को होगा स्वीकारना 


कलाकारों ने माना कि समय के साथ-साथ कुछ चीजें लुप्तप्राय हुई हैं तो कुछ में परिवर्तन हुआ है। फैशन से जुड़े लोगों ने जहां माना कि दामण, कमरबंद और ऐसे ही अन्य चीजों में इनोवेशन हुई है और दावा किया कि नये रूप में इन्हें स्वीकारा जा रहा है। इसी तरह हरियाणवी सांग में बहुत मोडिफिकेशन हुआ है और लूर नृत्य में शोध हुए हैं। कलाकार नाम सिंह सांझी कहते हैं, 'सांग तो आठ-नौ घंटे तक चलता था। लोग भी इतने धैर्यवान थे कि डटे रहते थे, लेकिन समय के साथ आज इसे पहले दो-तीन फिर एक घंटे तक का करना पड़ा।' 'कलाकार संदीप ने कहा कि लंबे सांग में दर्शक गायब हो जाते हैं। हमने युवाओं के मन को पढ़ा और इसमें परिवर्तन किया।' उन्होंने कहा, 'छोटा सांग बड़े वर्ग को जोड़ेगा।' इसी तरह कई कलाकारों ने रसिया और अन्य नृत्यों के बारे में भी कहा कि इसमें परिवर्तन हो रहा है और युवाओं की भागीदारी सुखद अनुभूति है। 

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कलाकृतियों में भी रंगों का गजब संयोजन 

रत्नावली उत्सव में कला प्रतियोगिताएं भी हुईं। एक ओर जहां मझे हुए कलाकारों की पेंटिग्स की प्रदर्शनी चली तो दूसरी ओर नौजवानों ने कला के प्रति अपनी रुचि का इजहार किया। इनमें ज्यादातर प्रतिभागियों ने चटख रंग का प्रयोग किया था। वॉटर पेंटिंग, स्टिकर्स आर्ट्स, बुक मार्क्स, राइजिंग की-चेन, ईयर रिंग्स, इंक वर्क व मुख्य रूप से एल्कोहलिक इंक मार्क्स की पेंटिंग को देखते-देखते दर्शकों का हुजूम प्रतियोगिता के तौर पर बन रही चित्रकारी पर भी अटक जाता। पास में ही बने सेल्फी पाइंट पर भी लोगों का जमावड़ा देखा गया। खासतौर पर युवा वर्ग का। चरखी दादी की रीना कहती हैं, ‘सेल्फी क्लिक करने का ट्रेंड और अलग ही स्वैग है।’ 

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और छा गए यशपाल शर्मा 

पूरी मस्ती में यशपाल शर्मा


कार्यक्रम के अंतिम दिन यानी 31 अक्तूबर को जाने-माने अभिनेता यशपाल ने समां बांध दिया। पहले उन्होंने दर्शक दीर्घा में बैठे युवा वर्ग से सीधा संवाद किया और उनकी फिल्म दादा लखमी चंद की बात शुरू होते ही युवाओं की तालियों से सभागार गूंज उठा। इस फिल्म के प्रोमो भी समारोह परिसर में चल रहे थे। इस फिल्म में जहां वह लीड रोल में हैं, वहीं उन्होंने इसे निर्देशित भी किया है। उन्होंने इसकी तैयारी में पांच साल लगाए। उनकी इस फिल्म ने सर्वश्रेष्ठ हरियाणवी फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार जीता है। उल्लेखनीय है कि दादा लखमी फिल्म पंडित लखमी चंद के संगीतमयी यात्रा पर आधारित है। जिसको हाल में ही ‘राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार’ से नवाजा गया। बताया गया कि फिल्म लगभग 300 लोगों की 6 साल की कड़ी मेहनत का परिणाम है। पंडित लखमी चंद सोनीपत के गांव जाटी से थे

Monday, December 19, 2022

सार्थक प्रयास का समारोह, जोश-जज्बा, अपनों से मिलन और खबर-वबर

केवल तिवारी 
वे जोश से लबरेज थे। कोई उत्तराखंड की वादियों से आया था तो कोई वसुंधरा से। खचाखच भरे हॉल में अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। बहुत दिनों से तैयारी जो की थी। दो दिन दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में घूमने और उसकी चर्चा करने का लुत्फ अलग था। कार्यक्रम शुरू होने से पहले ही दिल्ली के आईटीओ स्थित हिंदी भवन में, मैं भी पहुंच चुका था। कुछ देर इन्हीं बच्चों से बतिया लिया जाये, यही सोचकर बच्चों से पूछा, ठंड नहीं लग रही, बोले बिल्कुल नहीं। मुझे जानते हो, चार बच्चों ने कहा हां। गजब। सिर्फ एक या दो बार सार्थक प्रयास के पुस्तकालय गया होऊंगा और बच्चों को याद है। बाद में जब इनका कार्यक्रम देखा तो समझ गया कि ठंड नहीं लग रही सवाल के जवाब में इनका जवाब इतना जोशीला क्यों था? गणपति बप्पा मोरया प्रस्तुति देखकर तो तालियों की ऐसी गड़गड़ाहट हुई कि बस उसे बयां करना मुश्किल है।



खैर… कार्यक्रम शुरू होने को अभी कुछ वक्त बाकी था, तभी चारूदा आए और बोले, ‘हिटो चहा पी ल्हीनू’ चाय पीने गए तो वहां सुशील बहुगुणा जी, उत्तराखंड से बच्चों की टीम लेकर आए पवन तिवारी जी, आकाशवाणी में वरिष्ठ प्रोड्यूसर एमएस रावत जी, सार्थक प्रयास से शुरू से जुड़े रवि जी, राजेन्द्र भट्ट जी समेत कई बंधु-बांधव मिले। मंच संचालन की जिम्मेदारी इस बार हंसा जी के अलावा सिद्धांत सतवाल को मिली थी। सार्थक प्रयास को हर परिस्थिति में आगे ले जाने में लगे उमेश पंत जी तो कभी यहां तो कभी वहां भागते नजर आ रहे थे। यह कार्यक्रम बहुत लंबे समय बाद हो पा रहा था। इससे पहले कोविड काल की बहुत सी दुश्वारियां झेलीं। इस दुश्वारियों के दौरान सार्थक प्रयास की सार्थक पहल भी देखी। साथ ही यह भी कुलबुलाहट हुई कि जब सबकुछ सामान्य चल पड़ा है तो कुछ नया हो जिसमें कुछ पुरानापन छिपा हो। इसी दौरान पंत जी का फोन आया कि वार्षिकोत्सव की तिथि तय कर दी गयी है। मैं नियत तिथि के दिन सुबह 6 बजे की बस से दिल्ली की ओर रवाना हो गया। एक बजे आईएनएस बिल्डिंग पहुंचा। मीडिया के कुछ मित्रों से मिला। कुछ को मैसेज किया। शाम को सांस्कृतिक कार्यक्रम में शामिल हुआ। कैसा लगा, बताने की जरूरत नहीं। शाम को मित्र जैनेंद्र सोलंकी जी, धीरज ढिल्लों जी और संजय जी के साथ कुछ वक्त बिताया। और फिर हो गयी वापसी। इस कार्यक्रम के लिए जो खबर तैयार थी उसे हू ब हू नीचे दे रहा हूं। साथ ही कार्यक्रम की कुछ तस्वीरें और अखबारों में मिली कवरेज की कुछ झलकियां। देखिए, समझिए। सार्थक प्रयास में भागीदार बनिए। अभी भी और भविष्य में भी।

हुनर को मिला मंच और सपनों को लगे पंख 
सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था सार्थक प्रयास के वार्षिकोत्सव पर बच्चों ने दी प्रस्तुति, 
'दृष्टि का हुआ लोकार्पण' 
नई दिल्ली। सचमुच प्रतिभा किसी की मोहताज नहीं होती। यह बात एक बार फिर साधनविहीन बच्चों ने सही साबित की। इन बच्चों को जब मंच मिला तो इन्होंने एक से बढ़कर एक ऐसे कार्यक्रम प्रस्तुत किए कि सभागार में बैठा हर व्यक्ति तारीफ किए बगैर नहीं रह पाया। मौका था सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था ‘ *सार्थक प्रयास’ के 12वें स्थापना दिवस का। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के हिन्दी भवन में संस्था के बच्चों ने विभिन्न सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दीं। इस अवसर संस्था की वार्षिक स्मारिका ‘दृष्टि’ का लोकार्पण भी किया गया। इस समारोह में अल्मोड़ा जनपद के चैखुटिया और वसुंधरा के बच्चों ने बहुत उत्साह और आत्मविश्वास से अपनी प्रस्तुतियों से लोगों का मन मोह लिया। संस्था के अध्यक्ष उमेश चंद्र पन्त ने बताया कि , ‘सार्थक प्रयास’ पिछले 12 वर्षों से आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर बच्चों के शिक्षा की व्यवस्था के अलावा उनमें रचनात्मकता के साथ आत्मविश्वास पैदा करने के लिए लगातार काम कर रहा है। संस्था ने अपनी सामाजिक यात्रा के इन पड़ावों में कई तरह से जरूरतमंद लोगों की मदद की है। गाजियाबाद के वसुंधरा क्षेत्र के झुग्गी-झोपड़ी के बच्चों का पढ़ाने से शुरू हुई इस मुहिम ने बाद में आपदा और कोविड-19 तक हर समय आम लोगों की तकलीफों के साथ खड़े रहकर मदद की है। उत्तराखंड मे 2010 में आई आपदा और केदारनाथ में 2013 की आपदा में संस्था ने प्रभावित लोगों कर मदद की। राहत कार्यो में भी अपनी भूमिका निभाई। पिछले दो-तीन सालों में कोविड के समय दवाओं के वितरण, लोगों को उनके घर पहुंचाने और जरूरतमंद लोगों तक राशन पहुंचाने का काम किया। अभी संस्था वसुंधरा, चौखुटिया और केदार घाटी में 150 के लगभग बच्चों के शिक्षा की व्यवस्था करती है। इन तीनो जगहों पर पुस्तकालयों की स्थापना कर बच्चों की रचनात्मकता को बढ़ाने का काम भी कर रही है। ‘सार्थक प्रयास’ के 12वें स्थापना दिवस पर बच्चों द्वारा प्रस्तुत सांस्कृतिक कार्यक्रमों की सभी ने प्रशंसा की। इस मौके पर अल्मोड़ा जनपद के चैखुटिया से आये बच्चों ने सरस्वती वंदना, कुमाउनी लोकगीतों, लोकनृत्यों और नृत्य नाटिका से दर्शकों का मन मोह लिया। वसुंधरा के बच्चों ने राजस्थानी लोकगीत-नृत्य, नुक्कड़ नाटक, थीम सांग प्रस्तुत किये। इस मौके पर संस्था की वार्षिक स्मारिका ‘दृष्टि’ लोकार्पण किया। स्मारिका का इस बार ‘प्रकृति, मानव और कोविड’ विषय पर केन्द्रित थी। इससे पहले संस्था के बारे में एक डाॅक्यूमेंटरी भी दिखाई गई। कार्यक्रम के पहले दिन चालीस बच्चों को दिल्ली के विभिन्न ऐतिहासिक स्थलों का भ्रमण कराया गया। दिल्ली मेट्रो में सफर के अलावा बच्चों ने इंडिया गेट, वार मैमोरियल, राष्ट्रपति भवन के अलावा आकाशवरणी का भ्रमण किया। कार्यक्रम का संचालन हंसा अमोला और सिद्धांत सतवाल ने किया। अंत मे रवि शर्मा ने सभी मेहमानों का धन्यवाद दिया। कार्यक्रम में चारु तिवारी, पवन तिवारी, सुषमा पन्त, राजेन्द्र भट्ट और संस्था के बहुत से गणमान्य लोग उपस्थित थे।









Wednesday, December 14, 2022

40 के भी नहीं हुए थे… फिर भी चले गए… अलविदा नानू

 केवल तिवारी

नानू। आचार्य नवीन चंद्र पांडेय। ऐसे ही तो संबोधित करता था तुमको। तुम्हारा वह मामा कहना कानों में गूंजता है अभी भी। कोई लाग लपेट नहीं। कोई ‘जी’ नहीं। सिर्फ मामा। और कभी-कभी अरे मामा कहना। पिछले कुछ समय से तुमसे घनिष्ठता बढ़ गयी थी। फिर उस शनिवार रात जिंदगी और मौत से जूझते हुए तुम लखनऊ पीजीआई में थे और मैं यहां चंडीगढ़ में सिर्फ प्रार्थना कर पा रहा था। 

एक पूजा में व्यस्त। अब बस यादें।


शनिवार रात आए थे तुम सपने में। कहा था मामा आपको उज्जैन महाकालेश्वर मंदिर ले जाऊंगा। मैंने तैयारी कर ली है। मैं पहुंच रहा हूं आप फिर आना। रविवार सुबह-सुबह पत्नी को सपने के बारे में बताया। उसने भी कहा, लगता है नानू अब धीरे-धीरे रिकवर हो जाएगा। धवल और भावना को लेकर हम चले गए शिव-शनि मंदिर। वहां एक गुरुजी के आश्रम में भी जहां में पिछले एक हफ्ते से रोज जा रहा था। दोपहर को लौटने लगे तो सूचना आई। सबकुछ सन्नाटा। पता नहीं क्या लगा? ड्राइव कर रहा था। भावना बोली कार आराम से चलाओ। पहले घर पहुंचो। लगा बड़ा सा ज्वार-भाटा पिछले एक हफ्ते से आ रहा था और अचानक सब थम गया। खौफनाक सन्नाटा। मरघट जैसा। मरघट ही पहुंच गए। क्या करता, क्या कहता? एक दोस्त को फोन किया। लखनऊ अर्जेंट जाना है। कुछ लोगों से बात की। सबने कहा, हड़बड़ी मत करो, अंतिम दर्शन नहीं कर पाओगे। पंकज से बात करने की भी हिम्मत नहीं हुई। एक मैसेज डाल दिया। अगले दिन तत्काल में रिजर्वेशन मिला। पहुंचा लखनऊ। 

आसमान टूटने से बेखबर बच्चियां मेरे साथ।


तुम्हारे बगैर वह सड़कें अनजानी सी लग रही थीं। घर में लग रहा था सब रो-रोकर थक चुके हैं। कुछ आसूं बहाए। तुम्हारी दोनों बेटियां कुछ समझ नहीं पा रही थीं। वह मेरे साथ खूब हंसी बोलीं। दीदियों का चेहरा देख, परिवार में सबकी स्थिति देख दिल दहल उठा। ज्योति तो जैसे पत्थर बन गयी। कुछ देर उसके साथ भी बैठा।

तभी मुझे अपने बारे में खयाल आया। कैसे संभाला होगा मेरी मां ने। बताते हैं कि जब पिताजी गुजरे थे तो मैं दो साल का था। भाई साहब नौवीं में पढ़ते थे। शीला दीदी और प्रेमा दीदी भी छोटी ही थीं। फिर तुलना करते-करते ठिठक गया। बातचीत में कहा, पिताजी का निधन 67 वर्ष में हुआ था। चलो कुछ तो जी गये थे। पिताजी को मेरे बचने की कोई उम्मीद नहीं थी। वह माताजी से ऐसा ही कह भी गए थे। नानू तुम तो अभी 40 के भी नहीं हो पाए थे। चले गए हो अब तो। सपनों में ही आओगे। क्या कहूं अब। मैं लिखकर ही अपने दिल की बात कह पाता हूं। क्योंकि इग्नोरेंस हमेशा झेला है। यहां भी यही बात तुमसे। खुश रहना। अलविदा।   

Monday, November 28, 2022

सपने में अपनापन देखेंगे

 केवल तिवारी



जीवन के विविध रंग देख लिए। लेकिन सचमुच समझ में बहुत कुछ नहीं आया। बहुत कुछ क्या, पर्याप्त भी नहीं आया। कभी किसी का इगो, कभी अहं ब्रह्मास्मि का भाव और कभी कुछ। अगर खुद के संदर्भ में कुछ कहूं तो पारिवारिक मसलों पर सरेंडर करने में ही सुख है। तमाम झंझावात देखे, कितने अज़ीज़ चले गए। एक बारगी मन में आया कि लेखन ही बंद कर दूं, लेकिन फिर खुद को समझाया। अगले पल का पता नहीं। आज कुछ काव्यात्मक अभिव्यक्ति मन से फूट पड़ीं। मन करे तो पढ़िएगा। आत्मिक आवाज आत्मा तक पहुंच ही जाएगी।


नींद आ जाए भरपूर कि आज सपने देखेंगे।

सपने में अब अपनों का अपनापन देखेंगे।।

मीठी-मीठी बातों का पैगाम कहेंगे।

सब सलामत रहें, ये दुआ कऱेंगे।।

जो बिछड़ गए उनसे कुछ दिल की कहेंगे।

वो बातों का सिलसिला हम टूटने न देंगे।।

नींद आ जाए भरपूर कि...

वो वादे, वो इरादे वो नजारे देखेंगे।

जो कह न सके जागते हुए, सपनों में कहेंगे।

खुली आंखों में रह गई थी जो कसक,

बंद आंखों में उसे भी रोशन करेंगे।।

ये क्यों, वो क्यों इधर उधर की न कहेंगे।

सीधे सीधे बस अपने दिल की ही कहेंगे।।

नींद आ जाए भरपूर कि आज सपने देखेंगे...

Saturday, October 22, 2022

कार्तिक का महीना, दिवाली का त्योहार और पर्यावरण-पारिजात

 केवल तिवारी 




दिवाली का त्योहार हम सब मना रहे हैं। इस त्योहार पर प्रदूषण को लेकर कई सवालात उठ रहे हैं। कहा जा रहा है कि पर्यावरण को खतरा है। खतरा है भी। धुआं फैलने और पटाखों की गंध से प्रदूषण तो बढ़ेगा ही। इस मुद्दे पर सियासत भी हो रही है, लेकिन सियासत से इतर इन दिनों हमारे घर में पारिजात फूल की खूब चर्चा हो रही है। पारिजात फूल खिलने की खुशी कई जगह साझा की। शीला दीदी ने कहा कि कार्तिक मास में इसे शिव और विष्णु पर चढ़ाने का विशेष प्रयोजन है। असल में लगभग एक साल पूर्व एक छोटा सा पौधा अपने ससुराल काठगोदाम से लेकर आया था। उम्मीद कम ही थी इसके ठीक से बढ़ पाने की। फिर भी एक नया गमला तैयार किया और पौधा रोप दिया गया। बमुश्किल 20-25 पत्तियां इस पौधे में थीं। उनमें से एक-दो पीली पड़कर नीचे गिर गयीं। मन को मनाया शायद यह पौधा गमले में नहीं होता होगा। लेकिन धीरे-धीरे उसमें रंगत आने लगी। मैंने भी समय-समय पर गुड़ाई और खाद-पानी देना जारी रखा। देखते-देखते उसमें पत्तियां बढ़ने लगीं। वह बड़ा होने लगा और लगभग 8 माह में ही वह मुझसे लंबा हो गया। इस बीच उसकी कई शाखाएं फूट गयीं। गत अगस्त माह से उसमें एक-एक शाखा में इतने सारे गुच्छे लगने शुरू हुए कि समझ में नहीं आता कि ये गुच्छे पत्तियों के हैं या कलियां खिलने वाली हैं। अक्तूबर शुरू होते-होते आश्वस्त हो गया कि ये फूल ही खिलने वाले हैं। और पता चला कि कार्तिक मास में ये फूल भगवान को चढ़ाए जाते हैं। एक शाम अपने ऑफ के दिन देखा कि छोटा सा बल्बनुमा कली सी लगी है। मैंने कैमरे में क्लिक कर दिया। करीब घंटेभर में ही वह कली फूल बन गयी और एक सुगंध सी बिखर गयी। सुबह वह फूल सचमुच स्वत: ही गिर गया। जैसा कि सुना था, वही हुआ। मैंने सबसे पहले काठगोदाम भावना के भाई शेखर जी और उनकी पत्नी को फोटो भेजकर खुशी जताई। फिर कई अन्य जगह भी। इसी सब पर मुझे याद आया कि कुछ दिन पहले ही पर्यावरण और हमारी संस्कृति पर बात हो रही थी। सचमुच पर्यावरण प्रेम और पेड़-पौधों को बचाने की परंपरा तो हमारे यहां सदियों से है। तुलसी, नीम, गेंदा, पीपल, बड़, बरगद और ऐसे ही अनगिनत पेड़-पौधों को बचाने की कवायद और धार्मिक मान्यताएं हमारे यहां प्राचीन काल से है। पारिजात का यह पौधा एक गमले में ही सही, पेड़नुमा बना है और रोज ढेर सारे फूल आंगन में दिखते हैं। साथ में ही गुड़हल भी है। सचमुच कुदरत ने हमें क्या-क्या अनमोल तोहफे दिए हैं। पारिजात के बारे में कई कहानियां भी प्रचलित हैं। कोई कहता है कि समुद्र मंथन के दौरान यह निकला था और किसी की मान्यता है कि भगवान कृष्ण ने इसे दिया था। जो भी हो, प्रकृति प्रेम हम सबमें होना चाहिए। चाहे वह धार्मिक मान्यताओं के आधार पर हो या फिर अपने पर्यावरण को बचाने के नाम पर। तो चलिए हम भी पर्यावरण प्रेम की ओर बढ़ें। जमीन है तो खूब पेड़-पौधे लगाएं। नहीं है तो गमले में ही बसंत को ले आएं। दिवाली और उसके बाद आने वाले सभी त्योहारों की शुभकामनाएं।  

Tuesday, October 4, 2022

सुखमें सुमिरन... दुख में सुमिरन

केवल तिवारी 

दुख में सुमिरन सब करे, सुखमें करे न कोय। जो सुख में सुमिरन करे दुख काहे को होय। 

कबीरदासजी के इस दोहे को पिछले दिनों नये रूप में महसूस किया।नया रूप क्या, कह सकते हैं बदले रूप में उस बदले रूप को लेकर बहसें हो सकती हैं। असल में इस माह की शुरुआत में उत्तराखंड प्रेमा दीदी के पास गयाथा।गत मार्च मेंजीजाजी के निधन केबाद मन में थाकि दो माह में एक बार तो हो हीआऊंगा। हालांकि मेरे जाने से दुख कम नहीं हो जाएगा, लेकिन सालभर तक का जो भयानक कालखंड होता है, शायद उसमें दो घड़ी मैं दुखों को साझा कर सकूं, ऐसा मेरा मानना है। हालांकि जीजाजी की स्मृतियां तो हर पल मन में हैं, दिल में हैं। दुखों को साझा करनेके ही क्रम में दीदी के साथ बातचीत कर ही रहा था कि दीदी बोली, 'मेरा मन तो पूजा-पाठ में अब बिल्कुल नहीं लग रहा।' क्यों कहते हैं कि दुख में सुमिरन सब करे। पूजा-पाठ में तो तभी मन लगता था जब तेरे जीजाजी थे। घर में सब अच्छा चल रहा होता है तो खूब पूजा-पाठ में मन लगता है। दुख में तो सुमिरन हो ही नहीं रहा। मैंने इस बात पर सहमति जताई कि हां, दुख जब आ जाता हैतो कई बार मन विचलित हो जाता है।पूजा-पाठ या यूं कहेंकि रुटीन के कर्मकांडों में मन कम लगता है।



लेकिन सुमिरन का जो कांसेप्टहै, उसकी विशाल व्याख्या हो सकती।लेकिन यहां मैंने दीदी के हां में हां मिलाई और एक दार्शनिक अंदाज में दिल ही दिल में रोते हुए कहा कि 'नियति को यही मंजूर।' कबीरदास जी की उक्तियां तो अनेकार्थी हैं। एक-एक वाक्य की बड़ी-बड़ी व्याख्या हो सकती है, लेकिन कुछ बातें ऐसी हैं जिनके बारे में दीदी की हां में हां मिलाना ही ठीक लगा। असल में सुमिरन का यह मामला तो उसी तरह है जैसे हमारे सामने कोई तात्कालिक परेशानी आ गयी, हम मन ही मन प्रभु से प्रार्थना करने लगे कि हे ईश्वर दुख दूर करना, जब परिस्थितियां सामान्य हो गयीं तो हम ईश्वर को भूल गये। या सुमिरन करने की औपचारिकता सी निभाने लग गये। असल में यहां सुमिरन करने या नहीं करने की कोई बात नहीं। यहां भाव की बात है। घर में माहौल अच्छा हो तो साफ-सफाई, पूजा-पाठ, मेहमाननवाजी आदि सब में मन लगता है, लेकिन जब माहौल अच्छा नहीं हो तो मन उखड़ा उखड़ा सा लगता है। यही उखड़ा हुआ मन इन दिनों चोरगलिया दीदी के यहां है। जाहिर है सबसे ज्यादा व्यथित दीदी है। दीदी ऐसी दार्शनिक बातें कभी करती नही थी, जैसा इन दिनों कर रही है। लेकिन यह सब भी नियति है और सब समय का फेर है। देसी अंदाज में हमारी माताजी (ईजा) कहती थी, ‘मन करे गुड़मुड़ गाड़मुड़, करम करे निखाणी’ अर्थात मन में हम बहुत मनसूबे बनाते हैं प्लानिंग करते हं, लेकिन कर्म फल तो कुछ और ही लिखे होते हैं। खैर… ईजा की भी याद ही याद हैं और जीजाजी की भी। 

मित्र जैनेंद्र संग चर्चा और अंकल जीकी याद 

इसी दौरान मित्र जैनेंद्र सोलंकी जी के पिताजी के निधन की दुखद सूचना आई। जैनेंद्र जिन्हें हम जैनीबाबू कहते हैं, से करीब 22 साल पुराना नाता है। अंडरस्टैंडिंग है। अंकल जी से भी यदा-कदा मुलाकातें हो जाया करती थीं। जैनीबाबू की शादी में उन्होंने पूछा था, ‘बेटा कैसा इंतजाम है?’ मैंने कहा, ‘अंकल जी शानदार।’ उन्होंने तपाक से कहा, ‘यही सुनना चाहता था।’ वह अक्सर कुछ शारीरिक दिक्कतों का भी जिक्र करते और फिर खुद ही कह देते उम्र बढ़ने के साथ-साथ ऐसी समस्याएं आती रहती हैं। आंटी से अपनापन बहुत मिलता रहता है। इस बीच, जैनीबाबू से बातें हुईं। जो बात उन्होंने कही वाकई वह बहुत गंभीर और हकीकत के करीब थी। जैसे कि अक्सर कुछ बताने को मन होगा तो उनकी याद आएगी। खासतौर पर कोई पॉजिटिव बात। सचमुच ऐसाही होता है। हमारी ईजा को इस दुनिया से गए 13 साल हो गए हैं। आज भी जब कोई खुशी की बात होती है तो मन करता है कि तुरंत ईजा को फोन लगाऊं, लेकिन फिर याद आता है ओह वह तो हैं ही नहीं। फिर पहले उनकी तस्वीर देखता हूं फिर आसमान में और अपनी बात कह देता हूं। क्योंकि मुझे लगता है वह है इसी ब्रह्मांड में है। ऐसे ही जैनीबाबू ने कहा कि अचानक उनकी यादें आया करेंगी। साथ ही हम दोनों ने एक-दूसरे से कहा कि जीवन की असली सच्चाई मौत ही है, बस असमय कुछ नहीं होना चाहिए। बाकी तो सब प्रभु की इच्छा पर निर्भर है।  

दुख के मौके पर भी सामान्य परिस्थिति बनाने में बच्चों का अनमोल योगदान 




बच्चे सचमुच उत्सव सरीखे होते हैं। इनमें से भी लड़कियों का योगदान ज्यादा है। भावुकता का मामला हो या फिर घर में माहौल को अच्छा रखने का, सचमुच लड़कियों का योगदान कुछ अधिक होता है। वह परिस्थितियों से सामंजस्य बिठाती हैं। जब दीदी के यहां पहुंचा तो था वहां भानजी रेनु अपनी बिटिया काव्या के साथ पहुंची थी। साथ ही भानजा मनोज था। मनोज की दोनों बिटिया जीवा और तनिष्का भी। तनिष्का के तो बोल अभी फूट ही रहे हैं, लेकिन वह इस बात को नहीं समझ पा रही है कि दादाजी आखिर गए कहां। बार-बार फोटो को देखती है और तेज इतनी है कि दादाजी के पसंद का गाना ढूंढ़ने को कहो तो यूट्यूब से खोल देती है। जीवा थोड़ी समझदार हो गयी है। उसने जब दादी यानी मेरी दीदी के गले लगकर यह कहा कि दादी हम हैं न आपके साथ, आप रोया मत करो। दादाजी तो स्टार बन गये हैं, मैं बहुत भावुक हो गया। उनकी कई और बातें भी दीदी ने बताईं जो बेहद भावु हैं। बात करें काव्या की तो पहले वह नाराज हो गयी कि जो चॉकलेट मैं ले गया था, वह उसे खाती ही नहीं। फिर दीदी की बहू दूसरी चॉकलेट लेकर आई तो फिर उसने बात शुरू की। अपने नाना को याद किया। मेरे सवालों का जवाब देते-देते उसने सवाल किया कि आप कल क्यों नहं आये। यानी वह एक दिन पहले आई थी और मेरे साथ खूब वक्त बिताना चाहती थी। फिर उसने मासूम सी बात कही कि शायद हो सकता है हमें भी जाने के लिए बस न मिले। यानी वह दिल से चाहती थी कि आज हम सब साथ रहें। इन बच्चों के मन में एक बात तो छिपी थी कि आज दादी के साथ इतने लोग हैं तो वह घड़ी-घड़ी रो नहीं रही है। इसलिए इस माहौल को बनाये रखना चाहिए। लेकिन ऐसा कहां होता है। दो घंटे बाद काव्या और रेनू चले गए और अगले दिन मैं भी चला आया। लेकिन थोड़े से वक्त में बच्चियों ने माहौल अच्छा बना दिया। आप भी देखिए ये एक-दो वीडियो।