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Tuesday, September 29, 2020

वैज्ञानिक सोच, मानवीय संवेदनाओं का व्यक्तित्व : ये हैं तरुण जैन

ये तरुण जैन हैं जिनकी सोच वैज्ञानिक है और व्यक्तित्व मानवीय संवेदनाओं से युक्त। ‘वैज्ञानिक दृष्टिकोण’ नामक अखबार के संपादक हैं। वैज्ञानिक शोध, नयी जानकारी आदि के संबंध में यह अखबार हिंदी भाषा का पहला ऐसा अखबार है जो पूरी तरह विज्ञान को समर्पित है। तरुण जी के नाम से परिचित था। नेशनल यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट के जरिये और कुछ मित्रों के जरिये। पहली मुलाकात हुई वर्ष 2016 में जब गोवा में ‘ओस्नोग्राफी’ यानी समुद्री विज्ञान के एक कार्यक्रम में देशभर के अनेक पत्रकार आये थे। बेहद सरल व्यक्तित्व। एक-दो मुलाकातों के बाद पता नहीं क्यों मुझे लगा कि इनसे मेरी पटरी मेल खाएगी। मैं एक तो संकोची स्वभाव का हूं, दूसरा मैं विज्ञान का छात्र नहीं रहा हूं। साहित्य के प्रति मेरा रुझान रहा। यह अलग बात है कि पिछले 20 वर्षों से विज्ञान एवं शोध को लेकर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में हजार से अधिक लेख लिखे। विज्ञान का छात्र न होने के कारण किसी चीज की पूरी ताकीद करने के बाद ही उस पर लिखता हूं। खैर गोवा का वह कार्यक्रम समुद्री विज्ञान पर आधारित था। पूरे दिन वैज्ञानिकों को अलग-अलग विषयों पर सुना। जहां कभी कोई दिक्कत होती, तरुण जी से ही पूछ लेता। कभी लगता कि ये झल्ला न जायें। अभी दो दिन तो हुए मिले हुए, लेकिन ये तो चाटू निकले। मैं खुद पर ये चाटू का लेबल कभी भी चस्पां नहीं होने देता। ऐसा कुछ नहीं हुआ, जैसा मैंने सोचा। एक बात बहुत अच्छी लगी तरुण जी की जब मैंने उनसे कुछ जानना चाहा तो सबसे पहले उन्होंने मुझसे पूछा, आप विज्ञान बैकग्राउंड से हैं या आर्ट्स। उसके बाद उन्होंने शुरू से बताना शुरू किया। कोटा में प्लाज्मा तकनीक के बारे में हो या फिर विज्ञान के अन्य पहलुओं की बात, उनसे काफी चर्चा हुई।
चूंकि उस कार्यक्रम में देशभर से अनेक पत्रकार आये थे। पत्रकार बिरादरी को अच्छी तरह जानता हूं। कहीं स्वाभिमान, कहीं घमंड और कहीं संस्थान का पैमाना। तरुण जी कई बातों के गवाह हैं। वैज्ञानिक बातों के बीच उनका लब्बोलुआब को एक पंक्ति में कहूंगा-
चांद को छूके चले आए हैं विज्ञान के पंख, देखना ये है कि इन्सान कहां तक पहुंचे।

 

संक्षिप्त परिचय
ऊपर तो एक संक्षिप्त विवरण था तरुण कुमार जैन से मेरी मुलाकात का। आइये उनके बारे में थोड़ा सा आपको बता दूं। पिंकसिटी जयपुर निवासी तरुण कुमार जैन अपने पाक्षिक अखबार ‘वैज्ञानिक दृष्टिकोण’ में नित नये मुद्दों को उठाते हैं। वह विज्ञान और प्रौद्योगिकी के सार्वजनिक संचार पर 11 वें अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के पोस्ट कॉन्फ्रेंस सत्र के संयोजक रहे, जिसमें 60 से अधिक देशों के विशेषज्ञों ने भाग लिया था। उन्होंने कई मेगा वैज्ञानिक कार्यक्रमों के दौरान दैनिक विज्ञान समाचार पत्र प्रकाशित किए हैं। तरुण कुमार जैन विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय विज्ञान दिवस 2018 पर प्रिंट मीडिया के माध्यम से विज्ञान और प्रौद्योगिकी संचार के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित हैं। उन्हें चौधरी चरणसिंह कृषि अनुसंधान पत्रकारिता में उत्कृष्टता के लिए कृषि मंत्रालय भारत सरकार से राष्ट्रीय पुरस्कार मिला और हिंदी विज्ञान पत्रकारिता के लिए 70 वें स्वतंत्रता दिवस समारोह पर राज्य पुरस्कार, राजस्थान के मुख्यमंत्री द्वारा। डॉ बीसी देब मेमोरियल पुरस्कार मैसूर विश्वविद्यालय में 103 वीं भारतीय विज्ञान कांग्रेस के दौरान प्रदान किया जा चुका है। इनके अलावा भारतीय विज्ञान लेखक संघ द्वारा दिलीप एम सलवी इस्वा राष्ट्रीय विज्ञान संचार पुरस्कार, तथा विज्ञान संचार और विज्ञान लोकप्रियकरण के क्षेत्र में सराहनीय कार्य के लिए दीपक राठौर मेमोरियल अवार्ड से भी पुरस्कृत किया जा चुका है। वह भारत के अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान महोत्सव, वैज्ञानिक दृष्टिकोण सोसाइटी, भारतीय विज्ञान कांग्रेस एसोसिएशन, भारतीय विज्ञान लेखक संघ जैसे कई संगठनों से जुड़े हैं। वह माध्यमिक शिक्षा बोर्ड राजस्थान की पत्रिका के संपादकीय बोर्ड के पूर्व सदस्य रहे और पिंकसिटी प्रेस क्लब जयपुर की पत्रिका का भी संपादन किया। वह वर्ष 2012 में भारतीय विज्ञान लेखक संघ के संयुक्त सचिव, पिंकसिटी प्रेस क्लब जयपुर के निदेशक मंडल के चार बार सदस्य, जर्नलिस्ट एसोसिएशन ऑफ़ राजस्थान (जार) के राज्य प्रचार सचिव चुने गए।
परिचय अभी जारी है
तरुण जी से मेरी दूसरी मुलाकात करीब सवा साल पहले कोटा में हुई। यहां परमाणु ऊर्जा संयंत्र के तहत पत्रकारों का एक सम्मेलन था। बेशक एक लंबे समय के बाद उनसे मुलाकात हो रही थी, लेकिन बीच-बीच में कभी-कभी बात हो जाती थी। हमारी मुलाकात को लंबा वक्त हो चुका था, लेकिन अब तक हम लोग घर-परिवार की बातें नहीं कर पाये। फिर उनके अखबार को लेकर चर्चा हुई। मेरे कुछेक सवाल पर उनका अंदाज इस तरह था जैसे एक कवि ने लिखा है-
खुशबू बनकर गुलों से उड़ा करते हैं, धुआं बनकर पर्वतों से उड़ा करते हैं। ये कैंचियां खाक हमें उड़ने से रोकेगी, हम परों से नहीं हौसलों से उड़ा करते हैं|
कोटा में भी अनेक जगहों से आये पत्रकार बंधु मिले। इसी दौरान ‘वैज्ञानिक दृष्टिकोण’ के विस्तार की भी चर्चा उन्होंने की। उनसे जब कुछ सवालात किए तो उनका अंदाज ऐसे था मानो कह रहे हों-
शर्तें लगाई जाती नहीं दोस्ती के साथ, कीजै मुझे क़ुबूल मेरी हर कमी के साथ।
इसको भी अपनाता चल, उसको भी अपनाता चल, राही हैं सब एक डगर के, सब पर प्यार लुटाता चल।
कोटा में मेरी दोस्ती कुछ अन्य पत्रकारों से भी हुई। तरुण जी से वे लोग अच्छी तरह परिचित थे, मेरी मुलाकात नयी थी। फिर तो मैंने देखा कि अनेक वैज्ञानिक से लेकर विज्ञान के क्षेत्र में लिखने वाले धुरंधर पत्रकार भी ‘जैन साहब’ को जानते हैं। मुझे लगा-
मिलेगी परिंदों को मंजिल ये उनके पर बोलते हैं, रहते हैं कुछ लोग खामोश लेकिन उनके हुनर बोलते हैं। 
कोटा में मुलाकात को करीब सवा साल हो गया। इस बीच तरुण जी के अखबार को पीडीएफ फॉर्मेट में देखता रहा। इसी बीच, पत्रकार संगठनों में कुछ तनातनी के मसले पर तरुण जी से फोन पर बात हुई। उनकी पहली प्रतिक्रिया थी, ‘हमें मिलजुलकर एक होकर रहना होगा, तभी भलाई है।’ वाकई बिना किसी की बुराई किए, किसी की तारीफ किए उन्होंने मेलजोल की बात कही जो मन को भा गयी। उसी दिन सोचा कि तरुण जी को लेकर अपने ब्लॉग पर कुछ लिखूंगा। आज उन पर कुछ लिखते-लिखते चंद पंक्तियां देखने को मिलीं जिनका यहां जिक्र करना प्रासंगिक लग रहा है-

हो मायूस न यूं शाम से ढलते रहिये, ज़िन्दगी भोर है सूरज सा निकलते रहिये, एक ही पांव पे ठहरोगे तो थक जाओगे, धीरे-धीरे ही सही राह पे चलते रहिये 
हदे शहर से निकली तो गांव गांव चली, कुछ यादें मेरे संग पांव-पांव चली, सफ़र जो धूप का हुआ तो तजुर्बा हुआ, वो जिंदगी ही क्या जो छांव छांव चली।
कोटा सेमिनार के अंतिम दिन मित्र मंडली।



Tuesday, September 15, 2020

बेखौफ समेटिये ताजगी और सेहत... क्योंकि ये फल सब्जियां ‘सेनेटाइज्ड’ हैं

मेरे बुज़ुर्गों का साया था जब तलक मुझ पर, मैं अपनी उम्र से छोटा दिखाई देता था।

उम्र से छोटा दिखने का यह सिलसिला चल सकता है लगातार। जरा उन बुजुर्गों के बारे में भी तो सोचिये जो अकेले रहते हैं। कोरोना के इस दौर में जब चारों ओर खतरा, डर और अविश्वास सा फैला हो तो कोई क्या करे। ऐसे समय में एक छोटी सी शुरुआत की गयी है चंडीगढ़ के सेक्टर 24 में। यह शुरुआत ताजे फलों और सब्जियों के संबंध में। शुरुआत है ‘सेनेटाइज्ड’ सब्जियों और फलों के बारे में। पूरा दावा है कि सेनेटाइज्ड हैं, लेकिन केमिकल से नहीं। यानी फल और सब्जियां ऐसी हैं कि आप ऑनलाइन मंगाइये या आउटलेट पर जाकर खुद लेकर आइये और सीधे खाइये या पकाइये।

असल में फ्रेश चॉप (freshchop) खोलने का पहले पहल आइडिया एकाकी बुजुर्गों को देखकर ही आया। उस शेर की मानिंद जिसके बोल हैं-

उसे भी खिड़कियां खोले ज़माना बीत गया... मुझे भी शाम-ओ-सहर का पता नहीं चलता।

जब इस महामारी के दौर में अनेक बुजुर्ग ऐसे हैं जो खुद जाकर सब्जी या फल नहीं ला सकते। किसी से मंगायें तो डर कि साफ है या नहीं या फिर जो व्यक्ति ला रहा है, वह कैसा है। ऐसे में फ्रेश चॉप (freshchop) का दावा है कि ऑनलाइन मंगाइये या फिर आउटलेट पर खुद जाकर लाइये, सब्जी या फल ताजे होने के साथ साफ तरीके से धुले होंगे। कटे नहीं होंगे। हाथ नहीं लगाया होगा। इसलिए इसमें कीटाणु या विषाणु होने जैसी कोई बात ही नहीं।

इस सबंध में एक खबर के तौर पर कहा गया कि कोरोना काल में बाहर से कुछ भी लाने में लोग घबराते हैं, लेकिन खाने-पीने की जरूरी चीजें तो लानी ही पड़ती हैं। हालांकि डर उसमें भी लगा रहता है। ऐसे में 'फ्रेश चॉप' के नाम से 'ऑनलाइन वेजिटेबल सर्विस' के जरिये इस डर को काफी हद तक डर को दूर करने का दावा किया गया है। एफएसएसएआई से लाइसेंस लेकर शुरू किए गए फ्रेश चॉप के प्रमुख का कहना है कि बिना रासायनिक पदार्थों के इस्तेमाल किए फलों और सब्जियों को साफ किया जाया जाता है। बैक्टीरिया एवं वायरस को खत्म करने के लिए ओजोन क्लीनिंग पद्धति का इस्तेमाल करते हुए वैक्यूम पैक किया जाता है। बताया जा रहा है कि बिना कटे इन फल एवं सब्जियों को पूरी तरह से साफ किया जा सकता है ताकि इसे मंगाने वाले सीधे इसका इस्तेमाल कर सकते हैं। दावा किया जा रहा है कि यह सेवा घर में अकेले रह रहे बुजुर्ग दंपति एवं वर्किंग कपल के लिए बेहद फायदेमंद है। ऑर्डर 7986059017 पर व्हाट्सएप या फोन कर दिया जा सकता है। फ्रेशचॉप का आउटलेट एससीओ 140, सेक्टर 24 डी, चंडीगढ़ में है। फ्रेश चॉप  की ओर से कहा गया कि ऑनलाइन ऑर्डर न करने वाले आउटलेट पर आकर भी सब्जियों एवं फलों को ले सकते हैं।

पूरे प्रकरण पर यही कह सकते हैं-

इरादे नेक हों तो सपने भी साकार होते हैं, अगर सच्ची लगन हो तो रास्ते आसां होते हैं।


Monday, September 7, 2020

एक नया नशा

 उमेश पंत

हमारे मित्र और बड़े भाई जी श्री चन्द्र कांत झा जी पिछले साल ही टाइम्स ऑफ इंडिया से रिटायर होने के बाद "सार्थक प्रयास" से जुड़े और अब अक्सर हमारे साथ चौखुटिया और केदारघाटी के बच्चों से मिलने जाते हैं। अनुभव आपसे शेयर कर रहा हूं। थोड़ा लंबा है पर कोरोना काल  में पढ़ा जा सकता है। जरूर पढें। सार्थक प्रयास को समझने मै आसानी होगी।

(नोट : उमेश पंत जी से पिछले दो दशकों की मित्रता है। सार्थक प्रयास से भी जुड़ा रहा हूं। उनकी यह पोस्ट पढ़ी तो अच्छा लगा उनकी अनुमति से इसे ब्लॉग पर शेयर कर रहा हूं। - केवल तिवारी) 

 


अल्मोड़ा, नैनीताल, रानीखेत - आँखों के आईने में  एक चित्र उभरता था, पहरों का, तालों का, सोतो का, हरियाली का,  फूलों की खुशबू का और कुछ खास जायकों का -- जब पिछले दिनों अल्मोड़ा से करीब 60 किलो मीटर दूर, अंदर चौखुटिया की यात्रा का मौका मिला तो ये चित्र ज़हन में ऐसे गहरे उतरे कि लगा जीवन की आपा धापी में बहुत कुछ पीछे रह गया !! लोगों से मिला और फिर यहाँ के बच्चों से -- तो जीवन का एक और फ़लसफ़ा सामने आया कि, 'भगवान' शाश्वत रूप में कहीं हैं तो इनकी सादगी और मासूमियत में है -- एक प्रश्न अकस्मात् मन में कौंधा, 'फिर मंदिर क्यों और भगवान की खोज वहां क्यों ??' यह खोज मनुष्य और प्रकृति में क्यों न हो भला ??  

बीतते प्रहर के साथ-साथ अनुभव गहराते रहे, उनके रंग और भाव भी बदलते रहे! बातें होने लगीं, परतें खुलने लगीं , ज्ञान चक्शु खुलने लगे, दिल और दिमाग के हालात बदलते चले गए  - जो सच सामने आया  -- लगा की ७० साल की स्वंतंत्रता, ७० साल का विकास या फिर पिछले 6 साल का 'हो हल्ला विकास ', समाज की एकजुटता, लोगों की एक दुसरे के प्रति संवेदना, सभी कुछ खोखला है। ऐसा लगा की यह शहर के आटालिका, रौशनी की जगमगाहट, हाईवे, मॉल, गुड़गाँव मॉडल, सभी कुछ एक मृग तृष्णा भर है। थोड़ी सी नज़र पैनी करें तो यह सब, एक कंकाल या वीरानी शुष्क हवा के अलावा कुछ भी नहीं है। कभी गुड़गाँव या दिल्ली के कुछ एक किलोमीटर अंदर जाएं, कस्बों में कुछ समय लोगों के साथ गुजारें तो यही अनुभव आपका भी होने वाला है। सबका साथ सबका विकास मॉडल फेल दिखाई देने वाला है!! कुल मिला कर स्थिति ह्रदय को द्रवित करने वाली है बशर्ते औहदे, पैसे, ऐशो आराम की ज़िन्दगी ने या फिर किसी की जीवन पार्जन की मजबूरी ने उसे एक 'आत्मकेंद्रित रोबोट' न बना दिआ हो -- वैसे ऐसा अक्सर ही देखने को मिलता है!

इन मासूमों के जीवन के अन्दर झाँका तो पता चला कि इस समाज, इस देश का हर विकास का मॉडल इनके या इनके परिवारों या फिर इस समाज और इस इलाके के जीवन को छूने में अब तक असमर्थ रहा है। आज तक अगर कोई रोज़ी रोटी की लड़ाई लड़ रहा हो, दो जून की रोटी जुटाने में दिन और रात काट जाता हो, या फिर कैसे जुटेगी इसकी चिंता या जुगाड़ में सर ओखली में देता हो और उसकी आत्मा पिसती हो -- साली वो भी तो नहीं पिसती क्योंकि वो पत्थर हो चुकी -- जहाँ बीमारी के इलाज को लोग तरसते हों और जहाँ चूल्हे जलने के लिए भटकना हो। पढ़ाई लिखाई, करीयर, एक दिवा स्व्प्न हो -- वह ज़िन्दगी जिए तो क्या जिए। अल्मोड़ा, नैनीताल के तमाम रंगीन चित्र अचानक से मठमैले होने लगे। यथार्थ सामने मूँह चिढ़ाने लगा -- सैलानी की तरह आये थे कुछ समय बिताने, मज़े करने, खुश होने, और बस इतने में ही 'हिल' गए।

कुछ और पल तो बिताओ चौखुटिया में!! 

इन बच्चों को और इन परिवारों को जानने की उत्सुकता अब बढ़ती गयी थी! कॉरपोरेट नौकरी ने और रोज़ी रोटी के जुगाड़ ने अलग थलग एक मशीन तो बना ही दिया था शरीर को, लेकिन संस्कार और स्वयं के 'मूल' ने आत्मा की संवेदनाओं को अब तक ज़िंदा रखा हुआ था भले ही वो एक कवछ के पीछे से अब तक मजबूरन ही देखा था :: हर बच्चे के पीछे एक कहानी छिपी थी जो मन को हिला देने के लिए अपने में काफी था। अनुभव ऐसा ही था की जैसे पेग के बाद पेग से खुमार चढ़ता जाता है उसी तरह यहाँ हर एक कहानी के बाद दूसरी कहानी ज़हन के खुमार को सुलगा रही थी! सुलगने का पीक (पराकाष्ठा) एक बच्चे का वो दर्द था जो इन शब्दों में सामने आया, "काश मेरा बाप नहीं होता तो शायद मैं कुछ बन गया होता पढ़ लिख कर"। यह मजबूर बच्चा एक शराबी पिता का पुत्र है जिसकी लत ने घर तबाह कर डाला। रोज़ी रोटी से महरूम किया और खान पान की जगह घरवालों को हिंसा दी"। बच्चा इतनी उम्र में ही जवान हो गया है और हक़ीक़त से परिचित, पढ़ने लिखने की जगह रोज़ी रोटी जुटाता है।

ऐसे ही १२वीं पास एक लड़की जिसकी मेधा उसे और पढ़ा सकती थी, कुछ बना सकती थी। लेकिन मजबूर है अपने भाई बहनों के भरण पोषण की ज़िम्मेदारी से। छोटी सी ज़मीन पर खेती और एक दो गाय बैल, यही तो है पूँजी और साधन उसकी कमाई के। कैसे छोड़े इनको? कैसे दफना दे इनके जीवन को? दफ़नाने को मजबूर है वो अपने अरमानो को नियति के आगे। आखिर उसकी ताई ने भी अपने अरमानों को दफ़ना कर उसे पाला था जब इसके माँ बाप नहीं रहे थे।

हमारी सरकार, हमारा समज, हमारी व्यवस्था इतना भी जुगाड़ न कर पाई है की वहाँ ऐसों के लिए कुछ रोज़गार के साधन ही हो पाएं!!  स्थिति तब और भी विकृत हो जाती है जब ऐसे में कोई बीमारी से ग्रसित हो जाये। और वो भी जिसका इलाज वहां नहीं हो सकता या इलाज लम्बा खिंचता हो। मसलन एक लड़की जिसको टी बी हुआ है, उसकी लड़ाई अब शारीरिक, आर्थिक, सामाजिक, सभी कुछ एक साथ है। क्या करे ऐसे में कहाँ जाये? व्यवस्था के लिए वो एक पेशेंट मात्र है, एक बोझ! उससे ज़्यादा कुछ भी नहीं!!  यकीन मानिए दिल बैठने लगा था इस हक़ीक़त के आगे -- जो सोच कर आया था, हरियाली, रूमानी वादियाँ -- सभी तेल लेने जा चुके थे।

एक ही संतोष था -- कि आज, जीवन के इस मोड़ पर, जीवन से और भी सार्थक रूप से जुड़ने के प्रयास में तो हूँ -- वही प्रयास तो यहाँ तक ले कर आया है। और धन्यवाद " *सार्थक प्रयास* " संस्थान का जो मुझे ऐसा मौका और ऐसे अनुभवों से रुबरु करा रहा है। ये वही संस्थान है जो इन मजबूरों के जीवन में छोटे छोटे से परिवर्तन की कोशिश कर रहा है। और इन सुदूर, नज़रअंदाज़ किए गए इलाकों में, इन समाजों में, इन बच्चों में -- शिक्षा, स्वास्थ्य, स्किल डेवलपमेंट, के माध्यम से उनको मज़बूत करने में लगा है।

गर्व है इनसे जुड़ कर ! धन्यवाद *सार्थक प्रयास 



Thursday, September 3, 2020

कुछ रिश्ते बनाना क्या tharakipana है

एक मित्र के साथ बात हो रही थी। दारू पार्टी के अगले दिन। लंबा पॉज और आज इस पोस्ट के कयी साल बाद देखा एक लाइन का ब्लॉग। बहुत नाइंसाफी है। लिखूंगा, इसे पूरा करूंगा।

Tuesday, September 1, 2020

पितृ पक्ष... यानी हमारे होने का अर्थ



(यह लेख दैनिक ट्रिब्यून के 30 अगस्त 2020 के अंक में छप चुका है।)
विनय ठाकुर
हम जैसों की पीढ़ी जो धर्म जनता की अफीम है पढ़कर बडी हुई है। वह अपने पहचान व होने के अर्थ की खोज मोबाइल के की पैड पर थिरकती उंगलियों के सहारे सैकड़ों व्हॉट्स ग्रुप व फैसबुक फ्रेंड लिस्ट में खोजती हैं। हमारी यह पीढ़ी धर्म विरोधी करार दिए गए लाल झंडे वाली विचारधारा की दुर्गतिकथा देख सुनकर भी धार्मिक विशेषण लगे हर चीज से ऐसे बिदकती है जैसे वह कोई बिजली का नंगा तार हो और तुरंत करंट मार देगी। कुछ हमारी समझ में इसका गैर जरूरी आऊट डेटेड होना और कुछ पंडित जी की बेदिली नतीजा कर्मकांडों के आवरण के नीचे दबे हमारे संस्कारों के मूल मर्म को हम नहीं समझ पाते हैं। मूल संदेश घंटी शंख और मंत्र के मिले जुले शोर में खो जाता है। इस कठिन कोरोना काल ने कुटुंब और कुटुंब भाव की महत्ता को बड़े गहरे तौर पर रेखांकित महसूस कराया है। कुटुंब से जुड़ा सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक संस्कार है पितृ यज्ञ या श्राद्ध जो हिंदु /सनातन धर्म के पंच महायज्ञों में प्रमुख माना गया है। यूं तो यह नित्य प्रति किया जाना चाहिए पर तेज रफ्तार जिंदगी में यह कुछ अवसरों तक सिमट गया है इसमें प्रमुख अवसर है पितृ पक्ष।
पितृ पक्ष एक ऐसा अवसर है जब हम सही मायने में पुरखों के जरिए प्रकृति में अपना विस्तार करते है व उसके प्रवाह को अपने भीतर महसूस करते हैं। यह ऐसा अवसर है जो हमारी लघुता के दायरे को तोड़कर हमारे होने की अर्थ परिधि का विस्तार करता है। मैं के घेरे को तोड़कर हमारी पहचान उस प्रवाह से कराता है जो बताता है कि मैं पिता पितामह प्रपितामह बृद्ध प्रपितामह के रूप में जारी एक धार का हिस्सा हू और यह धार यहां तक के अर्थ पड़ाव में अकेली नहीं है उसमें माता मातामही बृद्ध मातामही के रूप में आती दूसरी धार का भी संगम है।हम एक श्रृंखला की कड़ी हैं और हमारा दायित्व इस श्रृंखला को कायम रखने के साथ ही उसके विस्तार को भी सुनिश्चित करना है।हमारी नियति महज हमारे कर्मों से ही निर्धारित नहीं होती बल्कि हमारे पुरखों के कर्मं से भी।हमारा दायित्व महज अपने दोषों का परिहार मात्र नहीं है बल्कि अपने पुरखों के दोषों का भी परिहार करना है।यह हमें एक गहरे दायित्व बोध के जरिये संस्कारित करता है। यह हमारी जवाबदेही महज पुरखों तक ही सीमित नहीं कर पंच भूतों व देवताओं के माध्यम से संपूर्ण प्रकृति तक ले जाता है।इसमें श्रद्धा और शुचिता के रूप में विभिन्न आयामों में अनुशासन का पाठ भी है।इसके मूल में करूणा व प्रेम है तो साथ ही है प्रकृति के साथ अंतरंगता भी ।श्राद्ध के श्रेष्ठ स्थानों में नदियों के संगम तालाब के रूप में वे तीर्थ स्थान है जो प्राकृतिक महत्व के है या फिर सार्वजनिक धर्मस्थल है। सामूहिकता श्राद्ध के सार तत्वों में से एक है । ग्रास निकालते वक्त गाय को पहले देना  फिर कौओं कुत्तों को।ये सभी सर्वजनिक स्वास्थ्य व समृद्धी की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
मेरे जैसों के लिए पितृपक्ष जैसे शब्द एक बला की तरह थे। कोशिश यह रहती थी कि जितनी जल्दी हो सके जान छुड़ाओ।हम तब तक किसी परेशानी में नहीं थे जब तक आप परिवार के मुखिया की भूमिका में नहीं थे।सबकुछ पिता या बड़े भाई के जिम्मे था। बात बदली जब अचानक माता जी का देहांत हुआ कर्ता की भूमिका मे आना पड़ा। सवाल शुरू हुए धोती धारण कीजिए, आसन लगाकर बैठिए यहां तक सब ठीक कठिनाई थी पर निभा लिया। सिलसिला आगे बढ़ा श्राद्ध के समय पंडित जी ने पूछा नाम गोत्र मदद के लिए परिवार  था बाधा पार कर ली गयी। पर जैसे ही बात पितामह होते हुए प्रपितामह के नाम की आयी एक सन्नाटा पसर गया। पंडित जी ने यथा नाम बोलने की सहूलियत देकर उबार लिया। न जानने का थोड़ा बुरा लगा पर कोई बात नहीं आगे बढ़ा पिता की तरफ तो पितामह तक जा पाया पर बात जब पितामही की आयी तो एक बार फिर निरुत्तर था अब मुझे अपने उपर शर्मिंदगी महसूस हो रही थी।जिनसे कोई रिश्ता नहीं उसकी तो सात पुश्तों के नाम कंठस्थ है यह तो जानना चाहिए। माता पिता के रहते याद नहीं किया अब कौन बताता पिता पहले गुजर चुके थे और माता जी का तो श्राद्धकर्म ही था। पढ़ाकू माने जाने वाला मै अपने आप से बुरी तरह नाराज था पूरी दुनिया के बारे में जिज्ञासा रखने वाले को अगर अपनी ही जड़ों के बारे में कोई जानकारी नही हो तो सारी सामाजिकता और उसके प्रति निष्ठा बेकार है।अचानक लगा कि कितनी छिछली है हमारी जिंदगी बिना जड़ मूल के। पिछले साल किसी ने श्रीमद भागवत पुराण उपहार में दे दिया एक बार को लगा दूसरे लोक के किस्सों और मिथकों को जानकर मैं करूंगा क्या? पर फिर सोचा चलो किसी मौके पर पंडित जी पर ही रौब गांठ लूंगा । पढ़ने लगा तो न समझ में आने वाले कहानियों के बीच से बहुत सी बातें सामने आने लगी जिसने हमारी क्षुद्रता की गांठों को खोलकर हमारी समझ को फैलाना शुरू कर दिया।धूप दीप गंध पुष्प नैवेद्य जल ये महज सज्जा या आचारवश नहीं है प्रकृति के साथ रिश्तों की पहचान व उसका आभार है। कुश पर देवताओं को यूं ही नहीं बिठाया गया है। काल निर्धारण भी प्रकृति के चक्र के हिसाब से किया गया है। 

Friday, August 28, 2020

कादम्बिनी और नंदन का बंद हो जाना


केवल तिवारी
शुक्रवार शाम सूचना मिली कि हिन्दुस्तान टाइम्स प्रकाशन की पत्रिकाएं-कादम्बिनी और नंदन को बंद कर दिया गया है। संभवत: संस्थान से कुछ लोगों का इस्तीफा भी लिया गया है। कादम्बिनी और नंदन का यूं अचानक बंद हो जाना वाकई बेहद दुखद है। मैंने हिन्दुस्तान अखबार में आठ वर्षों तक काम किया है। बेशक उक्त दोनों मैग्जीनों से सीधे नहीं जुड़ा रहा, लेकिन दोनों में लेख छपे। लेख लिखने से भी ज्यादा यादगार रहे कुछ पल। जैसे नंदन पत्रिका में जाने-माने लेखक प्रकाश मनु से मुलाकात। कादम्बिनी में क्षमा शर्मा जी से मुलाकात। क्षमा जी आजकल हमारे अखबार दैनिक ट्रिब्यून में लिखती हैं। पिछले साल बाल दिवस पर प्रकाश मनु का इंटरव्यू छापा था। मनु जी की किताब ‘ये जो दिल्ली है’ कई बार पढ़ चुका हूं।

इन यादों के अलावा इन पत्रिकाओं से बहुत पुरानी यादें भी जुड़ी हैं। हमारे गांव में पंडित जी थे। पांडे जी। प्रकाश पांडे जी के पिता। मैं जब छठी-सातवीं में पढ़ता था और गर्मियों की छुट्टियों में घर जाता था तो पांडे जी को नंदन और कादंबिनी पढ़ते हुए पाता था। यही नहीं वह इन पत्रिकाओं में छपी कहानियों और चुटकुलों को भी सुनाते। उनका सेंस ऑफ ह्यूमर पहले से ही बहुत उम्दा था, उस पर दोनों पत्रिकाओं के वह नियमित पाठक थे। दूर रानीखेत से उन्हें मंगवाते थे। दिल्ली से छपकर रानीखेत आने तक ही पत्रिकाओं को कई दिन लगते थे।

इससे पहले एक मशहूर पत्रिका पराग छपा करती थी। करीब 15-20 साल पहले मेरे बारे में किसी ने जिक्र किया होगा तो मुझे एक ऑफर मिला था। कहा जा रहा था कि पराग, चंदामामा आदि पत्रिकाएं फिर शुरू हो रही हैं। मैं वहां मिलने तो गया, लेकिन ज्वाइन नहीं कर पाया। अंतत: इन मशहूर पत्रिकाओं के फिर से शुरू होने की योजना पाइपलाइन में ही रह गयी।

बेशक आज जमाना बदल रहा है, डिजिटल युग आ गया है, लेकिन ऐसी मील का पत्थर के मानिंद इन पत्रिकाओं को यकायक बंद नहीं किया जाना चाहिए था। उनको डिजिटल फार्मेट या अखबार के साथ जोड़कर भी तो जारी रखा जा सकता था। यदि माहौल अच्छा बनता तो उसे फिर शुरू कर सकते थे। लेकिन प्रबंधन कहां घाटे की बात सहता है। दोनों पत्रिकाओं के बंद होने का वाकई दुख है। 

Friday, August 21, 2020

गणपति बप्पा... अपनों की दूरी... पर दिल की नहीं मजबूरी

केवल तिवारी

फिर आये गणपति। फिर क्यों। वे तो हमेशा हैं। हमारे साथ। लेकिन यह पर्व भी तो है। गणपति को घर लाने और फिर विसर्जित करने का। क्या फर्क पड़ता है कि महाराष्ट्र से शुरू हुआ यह उत्सव आज विश्वभर में मनाया जाता है। गणेश तो हैं ही जीवन सार। उनकी एक-एक बात में जीवन का मतलब। उन्हें घर लाने, उन्हें विसर्जित करने, उनके बड़े कान, छोटी आंख, बड़ा पेट, उनके मोदक हर चीज में छिपा है जीवन संदेश। वह कहते हैं अपनों के साथ रहो। उत्सव मनाओ। आज कोरोना महामारी के कारण दूरी बेशक मजबूरी बन गयी है, लेकिन दिल की दूरी नहीं है। होनी भी नहीं चाहिए। मतभेद होना स्वाभाविक है। इंसानों के बीच में मतभेद होता है। मनभेद नहीं होना चाहिए। मनभेद है तो गणपति का संदेश हम नहीं समझ पाये। आपको लगता है कोई आपका अपना नाराज है। ऐसा नहीं है। आप मन में सिर्फ और सिर्फ यही मानिये कि सब मुझे अच्छा मानते हैं। अपना मानते हैं। मेरी गलतियों पर फटकारते हैं। जीवन के इन्हीं सार संदेशों को तो बताते हैं गणेश।

फोटो : भावना
हर साल गणेश उत्सव का मनाने का यही अर्थ तो है। सब काम से पहले करो जय-जय गणेश की.... जय-जय गणेश की सब काम से पहले का मतलब उनके शरीर से समझिये। उनका सिर बहुत बड़ा है अर्थात वह शुभ काम की शुरुआत कर रहे हो तो सोचने का दायरा बड़ा रखना चाहिए। गणेश जी केे सिर की तरह। जब सोच बड़ी होगी तो विचार भी बड़ा होगा। ऊंचे और मजबूत विचार से ही व्यक्ति का उद्धार संभव है।

उनके बड़े-बड़े कान हैं। सूप जैसे। अर्थात ‘सार-सार को गाहि रहे थोथा देहि उड़ाय।’ इसका मतलब सूप अनाज को रखता है और बाकी अवेशष को उड़ा देता है। यही बात गणेश जी मनुष्य को समझाते हैं कि विभिन्न चीजों का सार पकड़ो और निरर्थक बातों को छोड़ो।

गणेश जी की आंखें छोटी हैं : छोटी आंखों का यही मतलब है कि इंसान को दुनियादारी बहुत सूक्ष्म तरीके से समझनी चाहिए। गहराई से चीजों को नहीं समझेंगे तो बुद्धि कभी भी गहराई के तल को छू नहीं पाएगी। बड़ी सोच, चीजों को गहराई से समझना और अच्छी बातों को ही याद रखना जीवन संदेश। यानी वही बात फिर कि जीवन का संदेश दे रहे हैं भगवान गणेश।

गणेश जी का पेट  लंबा है। यानी लंबोदर। उदर लंबा है, लेकिन भोग लगता है सिर्फ मोदक। पेट बड़ा, लेकिन भोजन थोड़ा सा। इसे समझिये। वह भूख को नियंत्रित करने की सीख देते हैं। इस नियंत्रण से जहां मनुष्य का संयम गुण विकसित होता है, वहीं विचार शक्ति भी मजबूत होती है। नियंत्रण का मतलब सिर्फ भोजन कम खाने से नहीं है। व्यसनों पर नियंत्रण, वाणी पर नियंत्रण।

अब आते हैं उनके वाहन पर : उनका वाहन है चूहा। यानी मूषक। मूषक जैसा छोटा वाहन रखने वाले गणपति बताते हैं कि इंसान को अपनी इच्छाओं और भावनाओं को काबू में रखना चाहिए। दिखावे की संस्कृति के जाल में न फंसकर जिंदगी सहज और सरल ढंग से बितानी चाहिए। आज के समय में अधिकतर लोग तनाव और अवसाद का शिकार केवल इसलिए हैं कि वे इस दिखावे के जाल में उलझ गए हैं। जबकि मन के भार को कम करने के लिए जरूरी है कि हम इच्छाओं की सीमा को समझें। अपने जीवन में बनावटी भाव को कभी ना आने दें। दिखावे की सोच इंसान को जरूरी-गैर जरूरी चीजें जुटाने के फेर में उलझा देती है। तन से नहीं ही नहीं, मन से भी बीमार बना देती है। इसीलिए सादगीपूर्ण जीवन जीने की बप्पा की सीख आज के समय में वाकई हमारे जीवन में संतुलन लाने का काम कर सकती है।

अब बात करते हैं उनके प्रिय भोजन मोदक की। मोदक के आकार पर गौर कीजिए। उसका ऊपरी भाग खाएंगे तो हल्का सा स्वाद आएगा। धीरे-धीरे उसमें मेवों का स्वाद आने लगेगा। इसका अर्थ है ऊपर से हमें ज्ञान बहुत छोटे आकार का मालूम पड़ता है, सत्य यह है कि इसे प्राप्त किया जा सकता है गहराई में जाने से। अभ्यास करने पर पता चलता है कि ज्ञान तो अथाह है। और मोदक का निचले भाग का स्वाद  इस बात का प्रतीक है कि गहराई में जाकर पाए ज्ञान का स्वाद बहुत मीठा होता है।

उनके शुभ चिन्ह स्वास्तिक पर ध्यान दीजिए। मनुष्य का कल्याण इस स्वास्तिक चिन्ह को समझने में निहति है। जीवन में आनंद धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के बराबर स्थान से आएगा। अगर किसी एक-दो को ही पकोड़ोगे, तो जीवन का आनंद मिट जाएगा। उनके चार हाथों में अलग-अलग चीजें जो हम देखते हैं, उनका संदेश है कि किसी नये काम को करने पर मंगल तभी होगा जब हमारा प्रबंधन उचित होगा।

 ऊं गणानां त्वा गणपति हवामहे प्रियाणां त्वा प्रियपति हवामहे निधीनां त्वा निधपति। यह मंत्र हम अपनी पूजा अर्चना के समय करते हैं। इसका मतलब है गणों के पति आप लोगों का जो प्रिय करने वाले स्वामी हो। आप लोगों को धन रूपी भौतिक और प्रेम, सत्कार रूपी अभौतिक संपत्तियां उपलब्ध कराये। शास्त्र कहता है कि जो किसी समूह का स्वामी बनता है, उसमें यह विशेषता होनी चाहिए। गणपति करोड़ों सूरज की तरह दैदिप्यमान हैं।

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।

निर्विघ्नं कुरु में देव सर्वकार्येषु सर्वदा।।

 

गणपति का आना और जाना

गणेश भगवान को अपने घर स्थापित करने और कुछ समय बाद उनके विसर्जन की कहानी ज्यादा पुरानी नहीं है। यूं तो ज्यादातर घरों में गणपति और लक्ष्मी को पूजागृह में स्थायी तौर पर विराजमान करने का रिवाज है। गणपति कहां जाते हैं हमारे घर से। हमारा मन ही तो हमारा घर है। लेकिन उन्हें विराजमान करने की शृंखला में अनेक लोग जुड़े हैं। मूर्तिकार, फूलवाला, पूजन सामग्री वाला... आदि-आदि। फिर गणपति बप्पा मोरया का जयघोश। बप्पा का अर्थ है अपना सा। इस संकट में भी इसी अपनेपन को पोषित करने वाले प्रथम पूज्य गणेश घर-घर विराजे हैं। उनका संदेश है सब परिजन मिलकर उत्सव मनायें। इस महामारी में परिजन दूर-दूर हैं तो क्या हुआ। मन में उत्सव मनाइये। कुछ सीख लीजिए। कुछ दिन पूजन के बाद उनके विसर्जन में भी तो संदेश है। पुरानी बातें जाएंगी तभी तो नयी आएंगी। फिर कुदरत का संदेश है बिना नव्यता के सुख कहां। यानी अगर आपके विचारों में नवीनता नहीं होगी, आपको कार्यों में नवीनता नहीं होगी तो सुख कहां मिलेगा। पुरानी रट को ही लगाये रहेंगे तो सुख तो मिलने से रहा। गणेश जी का विसर्जन यही संदेश देता है। अब नये की तैयारी कीजिए। बप्पा का अपना हमेशा साथ रहेगा। तो क्यों ना परिवारजनों के साथ हंसते-मुस्कुराते हुए इस पर्व पर अपनेपन को सहेजा जाये। पुरानी बातों की अच्छाईयों को याद कर नये विचारों को जगह दी जाये। गणपति की ओर आशाभरी निगाहों से देखने का मतलब उलझनें भूल जाने जैसा है। यही वजह है कि बच्चे हों या बड़े, सबके लिए वे अपने से हैं।

 

गणपति तेरे कितने नाम

आदिदेव भगवान श्रीगणेश बुद्धिसागर भी हैं, विनायक भी हैं और प्रथम पूज्य भी। विघ्ननाशी श्रीगणेश का नाम वेदों में ‘ब्रहमणस्पति,  पुराणों में श्रीगणेश और उपनिषद में साक्षात ब्रहम बताया गया है। इन्हें विघ्नेश्वर, गजानन, एकदंत, लम्बोदर, परशुपाणि, द्धैमातुर और आरवुग आदि अनेक नामों से जाना जाता है। वैसे गणेश का अर्थ है गणों का स्वामी। महाराष्ट्र में है गणपति के आठ शक्तिकेंद्र- श्रीमयूरेश्वर, सिद्धिविनायक, श्रीबल्लालेश्वर, श्रीवरदविनायक, श्रीचिंतामणि, श्रीगिरिजात्मक विनायक, श्रीविघ्नेश्वर और त्रिपुरारिवरदे श्रीमहागणपति। ये अपनी अलग तरह की प्रतिमाओं के इतिहास से जुड़े गणपति के आठ विशेष रूप हैं। इन्हें अष्टविनायक भी कहा जाता है। तो घर में पधारो गजानन जी के संदेश के साथ अपने मन मंदिर में गणेश को विराजमान करें जो विघ्नहर्ता हैं। उनके साथ ही अपनों को याद करते हुए मनायें गणेशोत्सव। जय गणेश। 

Monday, August 10, 2020

तो क्या अब गांवों की प्रतिभाओं को नहीं रोकेगी अंग्रेजी की दीवार

केवल तिवारी

केंद्र सरकार ने नयी शिक्षा नीति की घोषणा कर दी है। अभी पूरा अध्ययन मैंने नहीं किया। तमाम बातों के अलावा जो बात समझने की मुझे सबसे जरूरी लगी वह है भाषा। यानी पढ़ाई का माध्यम क्या होगा? शुरुआत में कहा जा रहा था कि पहली से पांचवीं तक के बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाई ही नहीं जाएगी। फिर कहा गया कि अंग्रेजी एक विषय के तौर पर पढ़ाई जाएगी, न कि माध्यम के रूप में। संभवत: यही बात सत्य है। एक जानकार ने बताया कि अंग्रेजी पढ़ाई तो जाएगी, लेकिन एक सब्जेक्ट यानी विषय के रूप में। बाकी पढ़ाई का माध्यम होगा हिंदी या क्षेत्रीय भाषा। यानी पंजाब में है तो पंजाबी भाषा माध्यम, दक्षिण के किसी राज्य में है तो वहां की भाषा और पूर्वोत्तर या पश्चिम आदि में वहां की भाषा। अब इसका अभी खुलकर तो विरोध हुआ नहीं है, मुझे लगता है कोई बड़ा दल विरोध में उतरेगा भी नहीं, अलबत्ता एआईडीएमके की नेता कनिमोझी ने जरूरी इसे कार्पोरेट कल्चर थोपने वाला बताया है। शिक्षा नीति में ताजा बदलाव पर बहस-मुबाहिशें चल रही हैं। बेशक केंद्रीय कैबिनेट पर इस पर अपनी रजामंदी की मुहर लगा दी है, लेकिन अभी इसके अमल में आने में लंबा वक्त है।

इन सबके बीच, अगर भाषायी मसला ऐसा ही हो जाता है जैसा सरकार के प्रस्तावित मसौदे में है तो मुझे लगता है ग्रामीण इलाकों से प्रतिभाएं आएंगी। लेकिन एक शंका है कि क्या निजी स्कूलों की व्यवस्था भी ऐसी होगी। अंग्रेजी के कारण ही निजी स्कूलों की दुकानें चमकीं। धीरे-धीरे सरकारी स्कूलों से बच्चे नदारद हो गये। केवल आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के बच्चे ही सरकारी स्कूल का रुख करते हैं। असल में भारत के गांवों में प्रतिभाओं का भंडार है। पढ़ाई, लिखाई से लेकर गीत-संगीत के क्षेत्र में भी। अनेक बार ऐसा होता है कि अंग्रेजी की गिटिर-पिटिर के कारण वे सकुचाते हैं और चुपचाप दूसरी डगर भर लेते हैं। या तो कुंठा में जीते हैं या फिर नियति मानकर अपने दूसरे कामधंधे में लगते हुए जीवन यापन करते हैं। ऐसा नहीं कि अंग्रेजी के कारण हमेशा उनके आगे दीवार ही खड़ी हो। ऐसे भी उदाहरण है जब मेहनती और कर्मठ युवाओं ने इस भाषा पर भी पूरी कमांड पा लेने के बाद शिखर को छुआ है, लेकिन ऐसे उदाहरण कम ही हैं। इसलिए अंग्रेजी भाषा की दीवार फौलादी नहीं होगी तो आने वाले समय में गांवों की प्रतिभाएं भाषायी कुंठा से पीछे नहीं रहेंगी, ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए। मुझे याद है जब 25 साल पहले हिंदी आंदोलनों का मैं भी हिस्सा बना था। सिविल सेवा परीक्षाओं में हिंदी एक विषय के तौर पर ही नहीं, बल्कि माध्यम के तौर पर भी अनिवार्य बनाये जाने की मांग की गयी थी। अब देखना यह होगा कि पांचवीं तक अंग्रेजी एक विषय और छठी से माध्यम वाली यह योजना कैसे सिरे चढ़ती है और निजी स्कूल कैसे इसका पालन करते हैं। इससे पहले तो नीति के सिरे चढ़ने का मामला है। 

Thursday, August 6, 2020

ये सफर बहुत है कठिन मगर... मोनू पांडे की संवेदनाओं का जिक्र

अखबार में मिली कवरेज
अखबार में मिली कवरेज
केवल तिवारी

कहीं नहीं कोई सूरज धुआं धुआं है फ़ज़ा 
ख़ुद अपने आप से बाहर निकल सको तो चलो 

मशहूर शायर निदा फाजली का यह शेर मौजूं है उस शख्स के लिए जिसने कोरोना काल में इंसानियत दिखाई। हो सकता है किसी को यह बड़ी बात न लगे, हो सकता है इसे कोई यूं ही समझे, लेकिन जो दौर चल रहा है और जिस दौर में बेहद 'संवेदनशून्य' लोगों की खबरें भी आ रही हैं, उसी दौर में यह काम मुझे तो बेहद प्रभावित कर गया। बात कर रहा हूं काठगोदाम के ब्यूरा निवासी नवीन पांडे की। उन्हें उनके निक नेम मोनू पांडे के नाम से भी जाना जाता है। पहले इलाके के प्रधान भी रह चुके हैं। अभी उनकी पत्नी पार्षद हैं। मेरी भी उनसे आत्मीयता तब से है जब ब्यूरा में अपने ससुराल आना-जाना हुआ। कई मौकों पर बात करते हैं। मजाक करते हैं। फिलहाल उस बात का जिक्र कर रहा हूं, जिसका पता मुझे कल चला। उनके इलाके में एक व्यक्ति की हार्ट अटैक से मौत हो गयी। उम्र ज्यादा नहीं थी। यही कोई 45-50 के बीच। बाद में पता चला उन्हें कोरोना भी हुआ था। तीन बच्चियां हैं। बताया जाता है कि इस बीच उस व्यक्ति की पत्नी ने पति के चले जाने के गम में अपनी बच्चियों के साथ कुछ जहरीला निगल लिया। हालत बिगड़ गयी। अस्पताल कौन ले जाये। सामान्य समय में लोग आगे नहीं आते, इस वक्त तो पता चल चुका था कि पति को कोरोना हुआ था। मोनू पांडे यानी नवीन पांडेय को इसका पता चला तो तुरंत चल दिये। अपनों ने थोड़ा टोका। जाहिर हिचकिचाहट सभी को होती है, लेकिन अपने मिजाज से मिलनसार और लोगों के साथ खड़े रहने वाले मोनू ने अपनी जिम्मेदारी निभाई और इस पीड़ित परिवार को अस्पताल पहुंचाया। अब खबर है कि जहरीला पदार्थ निगलने वालों की हालत स्थिर है। मोनू ने सुरक्षा की दृष्टि से खुद को क्वारंटीन कर लिया। उनके इस कृत्य पर निदा फाजली साहब का ही एक शेर याद आ रहा है-
घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूं कर लें
किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए।
वाकई ऐसे काम ही तो हैं जिससे व्यक्ति थोड़ा डिफरेंट बनता है। मोनू पांडे जी शिवभक्त हैं। हर साल अमरनाथ यात्रा पर जाते हैं। इस बार कोरोना महामारी के कारण अमरनाथ यात्रा स्थगित हो गयी थी। उनके द्वारा किए जा रहे उक्त नेक काम भी अमरनाथ यात्रा सरीखे हैं। ऐसे शख्स को साधुवाद।  

Sunday, July 26, 2020

गमले में वसंत

करेले की बेल
यह मौसम वसंत का तो नहीं है, लेकिन मेरे गमलों में इन दिनों माहौल वसंत जैसा ही है। पेड़-पौधों से बहुत स्नेह है और इस संबंध में बहुत कुछ लिखता भी रहा हूं। पिछले साल गमलों में गेंदे के फूल खिले। रोज पूजा के लिए तोड़ता और अगले दिन फिर खिले मिलते। गेंगे के फूल मुझे बेहद भाते हैं। गमलों में कुछ पौधे तो 10 साल से भी ज्यादा पुराने हैं। असल में चंडीगढ़ आए हुए सात साल हो गये हैं। जब चंडीगढ़ आया तो गमलों को भी साथ ले आया। मूवर्स एंड पैकर्स के जरिये सामान लाने का फायदा ये हुआ कि गमले सुरक्षित पहुंचे। एक पौधा बौंगनविलिया यानी कागजी फूल का है। इस फूल में कोई खुशबू नहीं होती, लेकिन इसकी छटा निराली होती है। पता नहीं क्या बात है पिछले दो सालों से इसमें फूल नहीं आ रहे हैं। लगता है उसकी उम्र पूरी हो गयी। कुछ दिन और देखूंगा फिर वहां पर कुछ नया पौधा लगेगा। पिछले साल छोटे बेटे धवल को स्कूल से एक पौधा लगाने का प्रोजेक्ट मिला था। उसने एक नीले रंग के फूल अपराजिता की बेल लगायी। खूब फूल आये। इस बार वह नहीं हुआ। इस बार धवल ने मिर्च का एक पौधा लगाया जो धीरे-धीरे बड़ा हो रहा है। बोंगनविलिया की ही तरह एक और पेड़ सदाबहार का है। दसियों बार कटाई-छंटाई कर चुका हूं। छोटे-छोटे लाल फूल आते हैं।
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एक मनी प्लांट का पौधा है। एक बार तो वह यहां आंगन में पूरा फैल गया। अब उसे हमने कांट-छांट कर गमले तक ही सीमित कर दिया। पिछले साल पत्नी ने एक गमले में पुदीना यानी मिंट लगा दिया। खूब चटनी खाई। इन दिनों कुछ सूख सा गया है। क्योंकि उसी गमले में गेठी की बेल बहुत फैल गयी है। गेठी पहाड़ों में होती है। आप कह सकते हैं बेल पर लगने वाला आलू। लेकिन इस आलू में शुगर नहीं होता। यह पहले हरा होता है बाद में काला। छिलका निकालने के बाद अंदर से आलू जैसा ही होता है। बचपन में इसे खूब खाते थे। इसे पकाकर खाइये या भूनकर। अभी सिर्फ बेल ही खूब फैली है, उस पर गेठी आनी बाकी है। इसे भी पत्नी ने लगाया था। बेहद रोचक किस्सा है। ससुराल से गुछ गेठियां आई थीं। एक गेठी में तोर आ गया। पत्नी ने उसे हल्का सा काटा और गमले में डाल दिया और गेठी की बेल खूब फैल गयी। पहले साल कुछ नहीं हुआ। अगले साल खूब गेठियां आईं। उसके बाद मैंने बेल को जड़ से काट दिया। क्योंकि वह अपने मौसम के हिसाब से सूख चुकी थी। एक बार गांव में किसी से बात हुई तो उन्होंने कहा कि बेल को उखाड़ना नहीं चाहिए था। क्योंकि अपना मौसम आते ही वह फिर फलने-फूलने लगती है। मुझे अफसोस हुआ कि मैंने क्यों गमला नयी पौध के लिए तैयार किया होगा। लेकिन यह क्या इस बार भी गेठी अपनेआप पनप गयी। यानी थोड़ी सी जड़ गमले में रह गयी होगी। गेठी के अलावा इन दिनों करेले की बेल भी खूब फैल गयी है। उस पर करेले भी लगे हैं। भिंडी के तीन पौधे लगे हैं। तीनों में भिंडियां आ रही हैं। कभी दो तो कभी चार। दो पौधे तुलसी के हैं। कुल मिलाकर चंडीगढ़ के जिस मकान में मैं किराये में रहता हूं, वहां गमले में वसंत आया हुआ है। सात साल हो गये इसी मकान में हूं। मकान मालिक राजेंद्र मोहन शर्मा जी बेहद अच्छे स्वभाव के हैं। बच्चों ने कई ख्वाब संजोये हैं आने वाले समय के लिए, देखना होगा उन ख्वाबों में वसंत बहार कब तक आती है।  

Thursday, July 23, 2020

बहादुर मां और साहसी पड़ोसियों को सलाम

केवल तिवारी

एक मुद्दत से मेरी मां सो नहीं पायी
मैंने इक बार कहा था मुझे डर लगता है।

मां को समर्पित यह मशहूर शेर आज जैसे मौजूं लगता है। मां ममतामयी होती है। मां साहसी होती है। बच्चे पर आंच आये तो वह जान की भी परवाह नहीं करती। ऐसा ही हुआ दिल्ली के शकरपुर इलाके में। पूरी कहानी से पहले मैं उस मां को सलाम करता हूं। और उन पड़ोसियों को भी, जो मदद की गुहार सुनते ही जैसी अवस्था में थे, वैसे ही दौड़ पड़े। वर्ना आज कहां कोई किसी की मदद के लिए दौड़ता है। खासतौर पर दिल्ली में तो कई बार ऐसे किस्से सामने आये हैं कि लोग तमाशबीन तो खूब बने, लेकिन आगे आकर मदद की बात तो बस फिल्मों में ही देखते थे।
सीसीटीवी फुटेज।


खैर, अब आते हैं पूरे मामले पर। दिल्ली के शकरपुर इलाके में। यहां दो बाइक सवार बदमाश आये। उनमें से एक स्टार्ट बाइक पर बैठा रहा। दूसरा किसी के घर में घुसा। चार साल की बच्ची को उठाया और स्टार्ट बाइक के पीछे बैठने ही वाला था कि बच्ची की मां तेजी से घर से निकली और बदमाशों से भिड़ गयी। साथ ही शोर मचाती रही। मां की हिम्मत देख बच्ची को उठाने वाला शख्स तेजी से बाइक छोड़कर आगे भाग गया। थोड़ी दूर जाकर वह अपने बैग में कुछ तलाशने लगा। शायद हथियार निकालने की कोशिश कर रहा था। इसी बीच शोर सुनकर दो-तीन लोग निकले। इन सभी लोगों को सलाम कि वे मदद की गुहार सुनते ही दौड़े आये। सबसे बड़ी बात तो यह है कि जो जिस अवस्था में था उसी अवस्था में दौड़ आया। एक व्यक्ति कच्छे में ही था। हो सकता है वह नहाने के लिए जा रहा हो। या हो सकता है सोकर उठा हो। जो भी हो, उसने परवाह नहीं की और दौड़ पड़ा बदमाश के पीछे। तभी दूसरी तरफ भी दो-तीन लोग निकल आये और बदमाशों को घेर लिया। बदमाश डर के मारे बाइक वहीं पर छोड़ भाग गये। इस बीच, एक बदमाश को चोटें भी आयीं। बदमाश का पीछा करना वाकई खतरे से खाली नहीं था। क्योंकि बाद में पता चला कि उनके पास हथियार भी थे। लेकिन लोगों ने हौसला दिखाया। बाद में इसी बाइक के बलबूते पुलिस पूरी साजिश का पर्दाफाश कर पायी।
सगे चाचा ने रची थी साजिश
पुलिस के मुताबिक बाइक के नंबर प्लेट से उसके मालिक का पता चला। तय पते पर गये तो उसने कहा कि यह साजिश बच्ची के सगे चाचा ने ही रची थी। वह बच्ची के बदले फिरौती लेना चाह रहा था। यह सुनकर मन और द्रवित हो गया और उस बात की एक बार फिर ताकीद हुई कि अपराध करने वाले ज्यादातर तो अपने ही इर्द-गिर्द के लोग होते हैं। एक बार क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के हवाले से कहा गया था कि बच्चियों से कई तरह के अपराध में ज्यादातर मामले अपनों से ही होते हैं। इसी के बाद यह बात भी कही गयी कि बच्चों को बेड टच और गुड टच के बारे में समझायें। इसका एक पहलू था कि बच्चियों को चौकन्ना बनाया जाये, दूसरा दुखद पहलू यह भी रहा कि भरोसे का रिश्ता धीरे-धीरे कम होता गया।
दिल्ली में मदद को कम ही लोग आते हैं
मैंने दिल्ली के जीवन में करीब 17 साल बिताये हैं। ब्लू लाइन बसों की खूब सवारी की है। उन दिनों बसों में जेब काटने की बहुत वारदात होती थीं। कई लोगों को पता होता था कि जेब कतरों का गैंग बस में घुस चुका है, लेकिन कोई कुछ बोलता नहीं था। एक बार मैंने एक सज्जन से धीरे से कहा कि अपनी जेब का ध्यान रखना, जेब कतरे घूम रहे हैं, लेकिन वह व्यक्ति जोर से चिल्ला उठा, 'जेब कतरे कहां हैं।' तभी एक जेब कतरा मेरे पास आया, बोला-बहुत सयाना बनता है, तेरे मुंह पर ब्लेड ऐसा मारूंगा कि आइंदा भूल जाएगा। सच मानिये मैं कई हफ्तों तक उस रूट की बस में गया ही नहीं। धीरे-धीरे दिल्लीवाला जैसा बनता चला गया। बाद में ऑफिस की कैब मिली तो आते-जाते सड़क हादसों में कई लोगों की मदद अन्य मित्रों के साथ की। मैं देखता था लोग सड़क पर दुर्घटना देखने के बावजूद निकल पड़ते थे। हम लोग करीब 20 लोगों को अलग-अलग समय पर अस्पताल ले गये। कई बार पुलिस के बेजा सवालों से भी दो-चार हुआ। खैर शकरपुर की इस घटना से जहां स्तब्ध हूं, वहीं खुशी है कि कुछ लोग मदद को तुरंत आगे आये तो। उस मां को तो बड़ा सैल्यूट है। दिल्लीवालों को भी। नहीं तो एक आम धारणा तो ऐसी थी कि-

इस वक्त कौन जाए वहां धुआं देखने
आग कहां लगी, कल अखबार में पढ़ लेंगे।