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Tuesday, December 30, 2025

बगिया को बुहारो तुम....

केवल तिवारी 

आंगन में खिले ये फूल 

इनको तनिक निहारो तुम

बगिया को बुहारो तुम

घर का उपवन तुमने संवारा

अपनी खुशियों को भी वारा

छोटी सी बात न पकड़े तूल

क्यों सोचना हमने ऊल-जुलूल

छोटी सोच को करो संपादन तुम

जीवन का करो रसास्वादन तुम

परिवार को गेंदा फूल बनाया

हम सबको भी खूब समझाया

अपने लिए अब जीयो भरपूर

हर्षोल्लास का भी चमके नूर

समझो हमारी भावना को तुम

केवल, कार्तिक और धवल हो तुम

आंगन में खिले ये फूल 

इनको तनिक निहारो तुम

बगिया को बुहारो तुम....

Wednesday, December 17, 2025

अब उम्दा भी चले गए... उस जहां में भी आनंदित रहना उमेश

केवल तिवारी

एक माह के भीतर ही फिर एक मनहूस खबर आई कि खिलगजार उमेश दा इस जहां को छोड़कर चले गए। मैं भी उमेश दा कहता था। बल्कि उम्दा कहता था। इसमें मुझे अच्छा भी लगता था। उम्दा मतलब बेहतरीन। यह अलग बात है कि रिश्ते में वह मेरे भतीजे लगते थे। उनका अभिवादन का तरीका होता था, 'चाचसैप नमस्कार।' मुझे याद है वह जब पहली बार गांव में प्रधान चुने गए थे तो इत्तेफाक से मैं भी उन दिनों लखनऊ से गांव गया था। उनका चुनाव चिन्ह संभवत: कुर्सी था। उन दिनों शायद एक ही ग्रामसभा थी हमारे गांव में। अब तो दो गयी हैं। सरना और मलोटा। हो सकता है इन बातों में कुछ तथ्यात्मक गलतियां हों क्योंकि बेशक हमारे रिश्ते चाचा-भतीजा वाले हों, लेकिन वह मुझसे लगभग 15 साल बड़े थे। करीब पांच साल पहले जब भतीजा प्रिय विपिन कोविड की लहर में काल कलवित हुआ तो उम्दा का फोन आया था, सांत्वना जताने। क्योंकि उम्दा से चाहे जितना पुराना संबंध हो, विपिन के साथ गांव आने-जाने के क्रम में यह मित्रता बढ़ गयी थी। हम खिलगजार उनके घर जरूर जाते थे। वैसे भाभी जी (उम्दा की माता जी) और दाज्यू (उम्दा के पिताजी) से हमारे स्नेहिल संबंध रहे। उनके घर में होने वाली कथा और अन्य पूजन कार्यक्रमों की मुझे बहुत याद है। उनका आदेश देना और अन्य बातों पर बातों को साझा करना अच्छा लगता। खैर इस वक्त बात उम्दा की। प्रधानी के समय के अलावा मुझे उम्दा की दूसरी बात याद है जब वह डाबर घट्टी में 'सरकारी सस्ते गल्ले की दुकान' के प्रोपराइटर थे। हम कहीं से भी आते तो वह दुकान हमारा अड्डा होती। ज्यादा सामान हुआ तो उनके दुकान पर रख दिया और घर को चल दिए। मैं तो उन दिनों चाय नहीं पीता था, लेकिन अगर मेरे साथ कोई होता तो वह जरूर वहां चाय पीता। उम्दा की कई बातें जेहन में उमड़-घुमड़ रही हैं। इसी क्रम में उनकी एक कमी का भी जिक्र करना जरूरी है। वह बहुत जल्दबाज सरीखे थे। मानो संदेश दे रहे हों कि भागते रहे, भागना ही जिंदगी है। कभी मेरा मन करता कि उनसे कहूं कि भागना, नहीं चलना ही जिंदगी है, लेकिन चूंकि उम्र में बड़े थे, इसलिए कहते हुए संकोच होता।

बिना माइक राम की लीला का मंचन 

बचपन की उन स्मृतियों में भी उमदा हैं जब रामलीला मंचन में माइक नहीं होते थे। गैस लाइट का इंतजाम होता था। कलाकार की आवाज बुलंद होती थी। उमदा भी राम की भूमिका में आते और बुलंद आवाज होती। सब यादें हैं।

उम्दा संबंधी बातों का जिक्र होते-होते एक प्रकरण याद आ रहा है। करीब दो साल पहले हल्द्वानी में मैं और मेरी पत्नी पीली कोठी के लिए ऑटो में बैठे। उसी वक्त एक सुंदर युवक भी हमारे साथ बैठा। मैं और पत्नी कुछ बोल ही रहे थे कि उसने कहा कि आप लखनऊ वाले हो। मैंने कहा हां। वह बोला, मैं खिलगजार उमेश जी... अच्छा...अच्छा। मैंने समझा कि उनका कोई रिश्तेदार है। मैंने कहा, आपका नाम। वह बोला, विनोद तिवारी। भाजपा के किसी सम्मेलन की तैयारी में जुटा हूं। हमने नंबरों का आदान-प्रदान किया। उसके बाद विनोद कुछ प्रेस रिलीज और जानकारियों को भेजने लगा। अब जब पिछले दिनों उम्दा के निधन की खबर आई तो मैंने दिल्ली में अपने भतीजे प्रकाश से कहा कि उम्दा के बच्चों का नंबर दो। दो बोल सांत्वना के बोल दूंगा। उसने नंबर भेजा और कहा कि यह उनके बेटे का नंबर है। मैंने जैसे ही क्लिक किया, वह नंबर पहले से सेव था। तब पता चला कि जिसे मैंने भाजपा नेता के नाम पर सेव किया था, वह तो विनोद है, उम्दा का बेटा। असल में उम्दा के भाइयों हरीशदा, दीपदा या चचेरे भाइयों मदन, कृपाल एवं नवीन से तो बात होती रहती थी, लेकिन बच्चों से ज्यादा बातचीत का सिलसिला नहीं चल पाया। विनोद और पूरे परिवार को दिल से सांत्वना। दुख की इस घड़ी में मैं परिवार के साथ हूं। उम्दा अब तो आप चले ही गए हो, उस जहां में खुश रहना...।

Sunday, December 14, 2025

स्वाति चली ससुराल, कार्यक्रम में सब हुए निहाल

 केवल तिवारी 

परिवार मिलन का शुभ संदेशा आया, पांडेय जी ने सबको बुलाया। 

जाग्रत हो गयी खुशियों की 'चेतना', अब तो मनीष को है सबको देखना।

भाइयों ने शुरू की पुलकित तैयारी, बहनें गुफ्तगू करें बारी-बारी।

समधी-समधन, मौसी और बुआ, हर परिजन ने मांगी दुआ।

सदा खुश रहे स्वाति हमारी, मां-बाप की लाडली, दादी की दुलारी। 

विवाह समारोह की अब लिखता हूं पूरी बात, चलो करता हूं शुरुआत


एक अम्मा (दादी) हैं। अम्मा की एक पोती है। पोती की शादी है। उसका नाम स्वाति है। स्वाति का एक भैया है। दूर एक जगह ट्रेनिंग में व्यस्त होने से वह अनुपस्थित है। पारिवारिक भाइयों ने समा बांधा है। खुशनुमा माहौल में भावनाओं का उमड़-घुमड़ है। परिचय का दौर चलता है। हंसते-गाते कार्यक्रम संपन्न होते हैं। यह विशेष ब्लॉग हल्द्वानी में सुरेश पांडे जी (मेरे साढू भाई) की बेटी स्वाति के विवाह समारोह को लेकर है। जाहिर है साढू भाई हैं तो इनसे मुलाकात शादी के बाद होनी थी, यानी 24 सालों की मुलाकात। उसके बाद से इनको जितना समझ पाया हूं, वह यही कि पांडेय जी इंसान हैं। निश्छल। 'निंदा रस' में कोई रुचि नहीं। टू द पाइंट बात करने वाले। भविष्य में मेरे लिए 'घर' का इंतजाम करने वाले। हंसमुख और चरित्रवान। उतनी ही अच्छी इनकी पत्नी यानी मेरी पत्नी की दीदी। गुड़िया दीदी, नाम के अनुरूप ही हैं। यह निक नेम है। माता-पिता का दिया हुआ नाम और हम इसी नाम से उन्हें पुकारते हैं। इन्हें देखकर पूरे विश्वास से कह सकता हूं कि जोड़ियां ऊपर ही बनती हैं। इनकी माता जी। जिन्हें मैं ईजा कहता हूं। संघर्षशील महिला। सबको आशीर्वाद देने वाली महिला। चौथी अवस्था में भी लाज का घूंघट रखने वाली महिला। सबको सम्मान देने वाली महिला। सबको आशीर्वाद देने वाली ईजा। परिवार का बाकी जिक्र इस ब्लॉग में आ ही जाएगा। 

पांडे जी से जब फोन पर बात हुई तो हमने कार्यक्रम बनाना शुरू कर दिया। चूंकि मैं और राजू (यह निक नेम है, असली नाम भास्कर, मेरी पत्नी भावना का जुड़वां भाई) चंडीगढ़ में ही रहते हैं, इसलिए दोनों परिवारों का कार्यक्रम साथ-साथ बना। राजू से भी रिश्ते से इतर दोस्ती है। एक-दूसरे से बिना 'मोल-भाव' के बातें शेयर करने वाली दोस्ती। राजू का बेटा भव्य और मेरा छोटा बेटा धवल अपनी बालसुलभ मस्ती के बीच तैयारी में जुट गए। अपनी-अपनी मम्मियों से कई बातें करने लगे। मेरे बड़े बेटे कार्तिक का मन भी खूब था कार्यक्रम में पहुंचने का, लेकिन बेंगलौर में नयी-नयी नौकरी के चक्कर में छुट्टी का संकट था। दूरी भी एक प्रमुख कारण था, उसके न पहुंचने का। लेकिन वीडियो कॉल से हम उसे हर रस्म को दिखाते रहे। खैर... हम लोग बुधवार 10 दिसंबर को चल पड़े। ट्रेन अम्बाला से थी। सुबह दस बजे ट्रेन में बैठे। रास्ते भर अंताक्षरी खेलते हुए, कुछ बातें करते हुए हम लोग कब शाम करीब सात बजे पांडेजी के घर पहुंच गए पता ही नहीं चला। असल में बड़ी राहत मिली जब शेखर दा (स्वाति के दूसरे मामा, इस ब्लॉग में अब सारे रिश्ते इसी तरह से चलने चाहिए) कार लेकर लालकुआं आ गए। मैं और राजू बाद में कैब से चले गए, बाकी परिवार आराम से पहले पहुंच गया। हम दोनों को एक जगह सिद्धांत जोशी उर्फ सिद्धू (शेखर दा का बेटा) लेने आ गया। उस शाम कोई खास कार्यक्रम नहीं था, लेकिन हंसी-मजाक कुछ देर चली। अगले दिन हल्दी और मेहंदी का कार्यक्रम था। उस कार्यक्रम से पहले मैं और राजू एक चक्कर काठगोदाम (मेरा ससुराल) चले गए। वहां नंदू भाई (स्वाति के सबसे बड़े मामा) से मुलाकात हुई। उनके नये घर और शेखर दा के under constructio घर को देखा। सिद्धू भाई का डिजाइन बहुत पसंद आया। ऐसे मौके पर जो हंसी-मजाक होती है, वह भी हुआ और गंभीर discussion भी। खैर... स्वाति की हल्दी रस्म पर सुबह से ही चहल-पहल थी। इस चहल-पहल के बीच ज्योति (स्वाति की बड़ी दीदी) और उमाजी (स्वाति की बुआ) विशेष तौर पर व्यस्त नजर आ रही थीं। स्वाति की मम्मी की तो बात ही अलग थी। काम करते-करते वह कब चाय बनाकर ले आईं, पता ही नहीं चला। काम और तैयारी के बीच सामंजस्य बिठाना कोई उनसे सीखे। इसी तरह ज्योति भी। ज्योति के पति कपिल जी, उसके ससुरजी, सासू मां, ननद और उनके पति भी कार्यक्रम में पहुंचे थे। उनसे परिचय हुआ। बिटिया के ससुर जी से कई बातें हुईं। ज्योति अपनी तैयारी के साथ-साथ अपने दोनों परिवार (ससुराल व माईके के परिजन का पूरा ध्यान रख रही थी)। विशेष अवसरों पर ज्योति का यह टैलेंट मैं उसके बचपन में भी देख चुका हैं। उसे सैल्यूट। खैर... हल्दी की रस्म बहुत शानदार और भव्य तरीके से संपन्न हुई। हल्दी कार्यक्रम के बीच में स्वाति की नजर सामने बैठी अम्मा पर गयी। उधर से अम्मा उठीं और इधर से स्वाति। दोनों गले मिलीं और रोने लग गयीं। आज के बेहद ज्यादा भौतिकवादी युग में यह दृश्य शुभ संकेत था इस बात का कि 'परिवार व्यवस्था अभी जिंदा है।' इस दृश्य पर मेरी और मेरे बगल में खड़े देवी दा (भावना की मामी के बेटे और ज्योति की ननदिया सास के पति के बेटे) की आंखों में भी आंसू आ गए। इसी रस्म के बीच स्वाति के भाई इशान जिसे प्यार से ईशू कहते हैं, से वीडियो कॉल करवाई गयी। वह इन दिनों धर्मशाला में इंटर्नशिप (होटल मैनेजमेंट कोर्स) कर रहा है। वह कार्यक्रम में नहीं आ पाया। इन दो चीजों से आप मेरे इस ब्लॉग के इंट्रो (किसी खबर या लेखन की शुरुआत, दोहा-कविता को छोड़कर, को इंट्रो कहा जाता है)। सभी कार्यक्रमों की कुछ फोटो ब्लॉग के अंत में शेयर करूंगा। हल्दी की रस्म के साथ-साथ दोपहर भोज के बाद तैयारी शुरू हो गयी मेहंदी कार्यक्रम की। इस कार्यक्रम में नाच-गाना हुआ। अनेक जानकारों से परिचय भी होता रहा। भोजन के बाद हम लोग (चंडीगढ़ ग्रुप) शेखरदा के यहां चले गए। मुख्य कार्यक्रम अगले दिन यानी 12 दिसंबर को थे। दिन में महिला संगीत। शाम को शादी। दोनों ही कार्यक्रमों में अनेक लोगों से मिला। कुछ को पहली बार में ही पहचान गया, कुछ से परिचय लेना पड़ा। अनेक लोगों ने कहा, कमजोर हो गये हो, कुछ ने कहा, पहले से ठीक लग रहे हो। मैं मजाक में किसी से कहता, 'क्या थे, क्या हुए और क्या होंगे अभी' लोग हंस पड़ते और किसी से कह देता, 'आईना मुझसे मेरी पहली सी सूरत मांगे, मेरे अपने, मेरे होने की निशानी मांगें।' मेरे इस अंदाज पर कोई बोल देता, अब तो यकीन हो गया कि आप, आप ही हो। खैर... महिला संगीत में खुशी और भव्यता के बीच, भावनाओं का उमड़-घुमड़ होता और चंद आंसू भी निकल आते। इस बीच, अल्मोड़ा वाली नानी जी (सिद्धू की नानी), लता दीदी, एक और गुड़िया दीदी, बैणी-वसंत और तिवारी जी, दिसि, निहित एवं अन्य लोगों से भी मुलाकात हुई। बातचीत में स्वास्थ्य, लाइफ स्टाइल भी मुद्दा रहा। एक माता जी से मुलाकात रह गई, जल्द मिलूंगा।

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यादगार रहा नेहा और ज्योति की अपनेपन की भागदौड़, मुनिया की एनर्जी 

इस संपूर्ण कार्यक्रम के दौरान अगर बच्चियों नेहा और ज्योति का जिक्र न किया जाए तो अन्याय होगा। नेहा स्वाति के मामा नंदाबल्लभ यानी नंदू भाई की बिटिया है। टीचर है। ज्योति का जिक्र पहले भी कर चुका हूं, स्वाति की दीदी। उधर, नेहा करीब एक माह से पहले अपनी बुआओं, चाचियों के बारे में सोच रही थी, चर्चा कर रही थी। यानी उनके शृंगार से लेकर गीतों के चयन को लेकर। साथ ही अन्य कार्यक्रमों के बारे में। नेहा नौकरी के साथ-साथ जिस तरह से बाकी काम भी संभाल रही थी, वह काबिले गौर और काबिले तारीफ था। ऐसा अपनापन और शिद्दत से जिम्मेदारी निर्वहन की ऐसी जद्दोजहद प्रेरित करती है। इधर, ज्योति का खाना खाते वक्त भी अपनी जिम्मेदारी निभाने और सबका ध्यान रखने का अंदाज अलग ही लेवल का था। प्राहिल की मम्मी नेहा और घर-परिवार की जिम्मेदारी संभाल रही नेहा, दोनों को सैल्यूट। इस सबके बीच, हमारी योगाचार्य जिसे उसके शेखर मामा मुनिया कहते हैं और हम सब मुन्नू की एनर्जी देखने लायक थी। रातभर जगने के बाद भी तरोताजा लगी जो घर आते ही गहरी नींद में सो गयी। God bless her.

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etiquette वाले और बेहद आकर्षक मनीष

इस पूरे कार्यक्रम में हीरो का जिक्र न हो, ऐसा कैसे हो सकता है। मनीष। दूल्हे राजा। फिलवक्त छत्तीसगढ़ में कार्यरत। मेरा पूर्व परिचय नहीं था, लेकिन जब मिला तो लगा ही नहीं कि हम अपरिचित हैं। बेहद आकर्षक व्यक्तित्व के धनी मनीष को शिष्टाचार का भी पता था। मैं देख रहा था कि दूल्हा-दुल्हन के लिए बने मंच पर बैठे मनीष जैसे ही किसी बड़े व्यक्ति को आते देखते, उठ जाते। कई बार उनसे बैठने के लिए भी कहा गया। बातचीत में भी सौम्यता। अभी ज्याता तारीफ नहीं करूंगा। भविष्य में मिलेंगे, लंबी बातचीत होगी तब बातें और लेखन जारी रहेगा। एक बात तो यहां बनती है कि सभी बाराती और मनीष के परिजन पहली मुलाकात में भा जाने वाले लगे। कुछ से मिल पाया, कुछ से नहीं। ऐसे कार्यक्रमों में ऐसा ही होता है। 

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तीन-तीन लड़कों की तिकड़ी, मचा दी धमाचौकड़ी

इस कार्यक्रम में जो अलग छाए रहे, वे थे तीन लड़के। सिद्धू, धवल और भव्य। इनका जिक्र ऊपर कर चुका हूं। इनके अलावा योग गुरु रोहित, चिन्मय और तन्मय। इन सबके लिए लड़का शब्द कहने पर कोई आपत्ति न करे, क्योंकि इनकी एनर्जी, काम निभाने का अंदाज और डांस आदि में गजब का जोश था। धवल और भव्य को सुपरवाइज कर तो रहे थे सिद्धांत जोशी, लेकिन इन्हें आदेश-निर्देश कोई भी दे रहा था। ये लोग बिना उफ्फ किए तन-मन से जुट जाते। बस विदाई के समय धवल बहुत रो गया और उसके अनेक सवालों ने मुझे भी हैरान कर दिया। उन सवालों का जिक्र फिर कभी। अब इस ब्लॉग के आखिर में यही कहूंगा कि सुरेश पांडे जी की बिटिया की इस शादी में परिवार, समाज और संसार में अपनेपन की भीनी खुशबू महसूस हुई। जय हो।

अब कुछ तस्वीरें 













Wednesday, December 10, 2025

निरंतर मेहनत और लगन से हासिल होती है उत्कृष्टता : नायब सैनी ‘द ट्रिब्यून अचीवर्स अवार्ड’ में बोले हरियाणा के सीएम- सफल वही होते हैं, जो सपनों को धरातल पर उतारने का साहस रखते हैं

 



साभार : दैनिक ट्रिब्यून

केवल तिवारी/ट्रिन्यू

चंडीगढ़, 7 दिसंबर

हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने कहा कि निरंतर मेहनत और लगन से ही उत्कृष्टता हासिल होती है। उन्होंने कहा कि सफल वही लोग होते हैं, जो सपनों को धरातल पर उतारने का साहस रखते हैं। शनिवार शाम चंडीगढ़ के ‘द ताज’ होटल में आयोजित ‘द ट्रिब्यून अचीवर्स अवार्ड्स’ में नायब सैनी बतौर मुख्य अतिथि पहुंचे। उन्होंने कार्यक्रम में सम्मानित होने वाली प्रमुख हस्तियों को संबोधित करते हुए कहा, ‘आप केवल सफल व्यक्ति नहीं हैं, आप समाज के प्रकाश स्तम्भ हैं, जो अंधेरे में भी रास्ता दिखाते हैं।’ कार्यक्रम में ‘द ट्रिब्यून’ के ट्रस्टी जस्टिस एसएस सोढ़ी, गुरबचन जगत, परमजीत सिंह पटवालिया, ‘द ट्रिब्यून ट्रस्ट’ के महाप्रबंधक अमित शर्मा, ‘द ट्रिब्यून’ की एडिटर इन चीफ ज्योति मल्होत्रा, ‘दैनिक ट्रिब्यून’ के संपादक नरेश कौशल, ‘पंजाबी ट्रिब्यून’ की संपादक अरविंदर पाल कौर जौहल, अनेक उद्योगपति, समाजसेवी एवं लोक कलाकार मौजूद रहे।

दीप प्रज्वलन से शुरू हुए कार्यक्रम में लोक कलाकारों ने प्रस्तुतियां दीं। इससे पहले, कार्यक्रम के मुख्य अतिथि हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी एवं सम्मानित होने वाले उद्यमियों, समाज सेवियों का स्वागत करते हुए ‘द ट्रिब्यून’ के ट्रस्टी जस्टिस एसएस सोढ़ी ने ट्रिब्यून के समृद्ध एवं प्रतिष्ठित इतिहास को याद किया। उन्होंने कहा, ‘हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की मौजूदगी से हमें बहुत गर्व महसूस हो रहा है। हरियाणा के लोगों के विकास और भलाई के लिए उनकी लीडरशिप और कमिटमेंट को सब मानते हैं।’ उन्होंने कहा, ‘मैं चाहता हूं कि ‘द ट्रिब्यून ट्रस्ट’ भविष्य में भी योग्यता को सम्मान देता रहे।’ उन्होंने याद किया कि दूरदर्शी समाजसेवी स्वर्गीय सरदार दयाल सिंह मजीठिया ने ‘द ट्रिब्यून’ को शुरू किया था। इसका मकसद था- सच्चाई, आज़ादी और ईमानदारी के साथ समाज की सेवा करना। 144 से ज्यादा वर्षाें से ‘द ट्रिब्यून’ ने ‘दैनिक ट्रिब्यून’ और ‘पंजाबी ट्रिब्यून’ के साथ मिलकर इस मिशन को पूरी लगन से निभाया है। उन्होंने कहा कि ‘द ट्रिब्यून ट्रस्ट’ आज के मीडिया माहौल में सबसे अलग है। यह गैर व्यावसायिक, नॉन-कॉर्पोरेट है और पूरी तरह से जनसेवा के लिए समर्पित है। पीढ़ियों से जाने-माने ट्रस्टियों के दिशा-निर्देश में यह ट्रस्ट निष्पक्षता, ज़िम्मेदारी और निडर पत्रकारिता के सिद्धांतों पर मजबूती से खड़ा है। यह विरासत सिर्फ ऐतिहासिक नहीं, यह हमारे रोज के काम में


निरंतर मेहनत और लगन से हासिल होती है उत्कृष्टता : नायब सैनी


अपने संबोधन में मुख्यमंत्री नायब सैनी ने संविधान के शिल्पी भारत रत्न बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर को उनके महापरिनिर्वाण दिवस पर नमन करते हुए कहा कि समाज को कुछ देने की जिजीविषा हर सफल व्यक्ति को होती है। उन्होंने कहा कि यह बहुत हर्ष का विषय है कि स्थापना के समय से लेकर हमेशा से ही ‘ट्रिब्यून समाचार पत्र समूह’ ने अपनी छवि, गरिमा और ऊंचे मानदंडों को बनाए रखा। ‘द ट्रिब्यून अचीवर्स अवार्ड’ का जिक्र करते हुए सीएम सैनी ने कहा, ‘अचीवर शब्द अपने आप में ऊर्जा, संकल्प, परिश्रम और साहस की कहानी कहता है।’ उन्होंने कहा कि चाहे शिक्षा का क्षेत्र हो, विज्ञान हो, उद्यमिता हो, कला-संस्कृति हो, नवाचार हो, खेल हो, स्वास्थ्य क्षेत्र हो या सामाजिक सेवा, आप सभी की उपलब्धियां नयी पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। ये हमें विश्वास दिलाती हैं कि भारत का भविष्य सुरक्षित हाथों में है। उन्होंने कहा कि आप जैसे ‘गेम चेंजर्स’ आगे आते हैं तो समाज भी तरक्की करता है। कार्यक्रम के अंत में मुख्य अतिथि, सभी ट्रस्टियों, प्रतिभागियों का एवं मौजूद लोगों का धन्यवाद देते हुए ट्रिब्यून ट्रस्ट के महाप्रबंधक अमित शर्मा ने कहा कि यह कार्यक्रम बहुत सफल और यादगार रहा। दैनिक ट्रिब्यून के संपादक नरेश कौशल का विशेष धन्यवाद देते हुए उन्होंने सभी सहयोगियों को आभार व्यक्त किया।


देश को आगे ले जाने वालों के साथ है हरियाणा

सीएम सैनी ने कहा कि देश और समाज को सशक्त बनाने वालों के साथ हरियाणा सरकार है। सरकार के विभिन्न कदमों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, ‘हमने हरियाणा सीएसआर एडवाइजरी बोर्ड का गठन किया है। इसका पोर्टल भी बनाया गया है। इस पर सेवा करने वाले लोग, कंपनियां, उद्यमी आदि अपना पंजीकरण करवाते हैं। उन्होंने ‘राज्य शिक्षक पुरस्कार’, ‘हरियाणा विज्ञान रत्न पुरस्कार’, ‘अटल बिहारी वाजपेयी सुशासन पुरस्कार’, ‘कल्पना चावला हरियाणा सोलर अवार्ड’ एवं ‘सुषमा स्वराज अवार्ड आदि का जिक्र करते हुए कहा कि देश को आगे बढ़ाने में मददगारों के साथ हरियाणा सरकार है। उन्होंने कहा कि अच्छा काम करने वाले श्रमिकों को ‘मुख्यमंत्री श्रम पुरस्कार’ से सम्मानित किया जाता है। इसी प्रकार, पद्म पुरस्कार विजेताओं को भी ‘हरियाणा गौरव सम्मान’ से विभूषित किया जाता है।


रंगारंग कार्यक्रम ने बांधा समां

अचीवर्स अवार्ड समारोह में रंगारंग कार्यक्रम ने भी समा बांधा। निर्माता निर्देशक हरविंदर मलिक के नेतृत्व में लोक कलाकार महावीर गुड्डू, नम्रता शांडिल्य एवं विधि देसवाल ने अलग-अलग प्रस्तुतियां दीं। विधि देसवाल एवं उनकी टीम ने जब ‘जगत में न कोई परमानेंट, काल सभी को खा जाएगा लेडी हो जेंट...’ गाया तो खचाखच भरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा हॉल गूंज उठा। इसके साथ ही गंगाजी के प्यार में..., ‘यो म्हारा हरियाणा’ आदि प्रस्तुतियों ने सभागार में मौजूद लोगों को झूमने पर मजबूर कर दिया। सभी कलाकारों को भी कार्यक्रम में सम्मानित किया गया और बाद में सभी ने सीएम सैनी एवं ट्रस्टी पटवालिया के साथ फोटो खिंचवाई।


https://www.dainiktribuneonline.com/news/nation/excellence-is-achieved-through-continuous-hard-work-and-dedication-nayab-saini/

Friday, November 21, 2025

माध्यम बदले हैं, लेखन और पाठन कम नहीं हुआ : डॉ. सुमिता मिश्रा, तीन दिवसीय चंडीगढ़ लिट फेस्ट 21 नवंबर से

केवल तिवारी

पढ़ने के माध्यम भले ही बदले हों, लेकिन साहित्यानुराग कम नहीं हुआ। हां यह भी एक तथ्य है कि लेखन का स्वरूप भी बदला है। यह बात कही डॉ. सुमिता मिश्रा, आईएएस, चेयरपर्सन, चंडीगढ़ लिटरेरी सोसाइटी (सीएलएस) और फेस्टिवल डायरेक्टर, सीएलएफ लिटराटी ने। इस वर्ष यानी 2025 के चंडीगढ़ लिटफेस्ट के संबंध में डॉ. सुमिता ने शनिवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में विस्तार से जानकारी दी। इस मौके पर उनके साथ मौजूद मनमोहन सिंह आदि ने भी माना कि बच्चे हों या बड़े रीडिंग हैबिट बनी रहनी चाहिए। साहित्य और कला से संबंधित अनेक सवालात इस दौरान किए गए। सुखद है कि ऐसे साहित्योत्सव हो रहे हैं। चंडीगढ़ भी इसका गवाह बन रहा है। दिल्ली में अनेक पुस्तक मेलों में जाने का मौका मिलता था, कवरेज भी खूब किया। इस बार इस कार्यक्रम में जाने का मन बना। कार्यक्रम तो आगामी 21 से 23 नवंबर के बीच है, फिलहाल कट एंड रेजर यानी प्री इवेंट की इस कवरेज से संबंधित मीडिया विज्ञप्ति को हू-ब-हू नीचे दे रहा हूं। अपने अखबार दैनिक ट्रिब्यून के लिए खबर बन चुकी है।



लिटरेचर फेस्ट के सीएलएफ लिटराटी 2025 का आयोजन 21 नवंबर से शहर में

एड गुरु प्रह्लाद कक्कड़, अभिनेत्री -कवि संध्या मृदुल, पुलिस अधिकारी व लेखक अमित लोढ़ा सहित अन्य के अलग अलग सेशन आयोजित होंगे

डॉ.सुमिता मिश्रा, आईएएस, चेयरपर्सन, चंडीगढ़ लिटरेरी सोसाइटी (सीएलएस) और फेस्टिवल डायरेक्टर, सीएलएफ लिटराटी 2025 (चंडीगढ़ लिटफेस्ट) ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में 21 से 23 नवंबर तक आयोजित होने वाले आगामी सीएलएफ लिटराटी 2025 (चंडीगढ़ लिटफेस्ट) की घोषणा की। डॉ. मिश्रा ने बताया कि यह लिटरेचर फेस्टिवल सीएलएस द्वारा आयोजित किया जा रहा है और 21 नवंबर को उत्सव की शुरुआत के उपलक्ष में एक सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया जाएगा। उन्होंने बताया कि लिटफेस्ट के दौरान साहित्यिक चर्चाएं 22-23 नवंबर को लेक क्लब में शांत सुखना लेक की पृष्ठभूमि में होंगी।

डॉ. सुमिता मिश्रा ने कहा कि इस वर्ष साहित्य, विचारों और कल्पना के उत्सव का थीम 'वर्ल्डस विदइन वर्ड्स' है। दो दिनों तक चलने वाले इंटरैक्टिव सेशंस में 27 लेखक, कवि, एड फिल्म निर्माता और कलाकार भाग लेंगे। इस उत्सव में पंद्रह (15) विचारोत्तेजक सत्र, चार (4) पुस्तक विमोचन और एक क्रिएटिव राइटिंग वर्कशॉप होगी।

डॉ. मिश्रा ने आगे कहा कि हमने पूरे भारत और ऑस्ट्रेलिया के लेखकों की एक दिलचस्प सूची तैयार की है, जो समकालीन विमर्श को आकार देने वाले मुद्दों पर जाने-माने वार्ताकारों के साथ चर्चा करते नज़र आएंगे।

इस वर्ष के उत्सव में सबसे प्रतीक्षित नामों में से एक एड फिल्म निर्माता और एड गुरु प्रह्लाद कक्कड़ हैं, जो प्रतिष्ठित विज्ञापन कैम्पेंस के लिए जाने जाते हैं। इस शानदार कार्यक्रम में साहित्य और कला जगत के अन्य जाने-माने नामों के साथ प्रशंसित अभिनेत्री और कवियत्री संध्या मृदुल भी शामिल होंगी।

21 नवंबर की शाम रानी लक्ष्मी बाई भवन, सेक्टर 38 में प्रसिद्ध कलाकार भुवन शर्मा द्वारा प्रस्तुत सांस्कृतिक प्रस्तुति 'साज़ औ आवाज़' से लिटरेचर फेस्टिवल का शुभारंभ होगा।

साहित्यिक आदान-प्रदान शनिवार, 22 नवंबर को डॉ. सुमिता मिश्रा के स्वागत भाषण के साथ शुरू होगा, जिसके बाद राष्ट्रीय साहित्य अकादमी के प्रेसीडेंट माधव कौशिक उद्घाटन भाषण देंगे। इसके बाद निम्नलिखित संवादात्मक सत्र आयोजित किए जाएंगे:

'द पावर ऑफ़ अ स्टोरी: एडवरटाइजिंग इनसाइट्स' में प्रह्लाद कक्कड़ लेखिका अराधिका शर्मा के साथ बातचीत करेंगे; 'इंडियन डेमोक्रेसी: इवॉल्विंग पॉलिटी एंड पब्लिक डिस्कोर्स' में पूर्व सांसद शाहिद सिद्दीकी, जो अपने संस्मरण 'आई, विटनेस: इंडिया फ्रॉम नेहरू टू नरेंद्र मोदी' के लिए जाने जाते हैं; राशीद किदवई, जिन्हें '24 अकबर रोड' और 'द हाउस ऑफ सिंधियाज' जैसी किताबों के लिए जाना जाता है, और पुरस्कार विजेता पत्रकार नीरजा चौधरी, वरिष्ठ पत्रकार रमेश विनायक के साथ बातचीत करेंगे; 'बांग्लादेश: द स्टोरी ऑफ एन अनफिनिश्ड रेवोल्यूशन' में, प्रशंसित लेखक दीप हलदर, जिन्हें 'ब्लड आइलैंड, बंगाल' और 'बीइंग हिंदू इन बांग्लादेश' पुस्तकों के लिए जाना जाता है; और लेखक और रिसर्चर रामी देसाई, वरिष्ठ पत्रकार कार्तिकेय शर्मा के साथ आमने-सामने के अंदाज में बातचीत करेंगे।

उत्सव के दूसरे दिन दो पुस्तकों का विमोचन होगा, महक ग्रोवर की 'द साइलेंट ब्रेव' और मंजू जैदका की 'द लीजेंड ऑफ सांझी-गिरी'।

इसके बाद एक सेशन 'शब्द की सुगंध: हिंदी साहित्य का नया दौर' होगा जिसमें माधव कौशिक, कवि और जीवनी लेखक चंद्र त्रिखा और मोटिवेशनल स्पीकर और लेखक चंद्रशेखर वर्मा वरिष्ठ पत्रकार शायदा बानो के साथ बातचीत करेंगे। 'दिल दे कागज़ उत्ते: नवी लहर दे कलमकार' में, सेवानिवृत्त मनमोहन सिंह (आईपीएस) और एक प्रशंसित और पुरस्कार विजेता कवि और लेखक-शायर बब्बू तीर लेखिका रावी पंधेर के साथ बातचीत करेंगे। 'चंडीगढ़: द सिटी दैट इज़, एंड दैट वाज़ नॉट' में आर्किटेक्चर इतिहासकार रजनीश वत्स इतिहासकार और लेखक राजीव लोचन के साथ बातचीत करते हुए दिखाई देंगे; डॉ सुमिता मिश्रा प्रसिद्ध कवि पत्रकार मनराज ग्रेवाल के साथ 'शी राइट्स, शी लीड्स: स्टेटक्राफ्ट एंड स्टैंज़ा' में बातचीत करते हुए दिखाई देंगे;और 'अनटेमड साइलेंस: द मेनी लाइव्स ऑफ़ संध्या मृदुल' में, संध्या मृदुल लेखिका और कवि सोनिया चौहान के साथ बातचीत करेंगी।

22 नवंबर की शाम को, सीएलएस 'नृत्य प्रांगण', भवन डांसिंग कोर्टयार्ड के सहयोग से भारतीय विद्या भवन, सेक्टर 27 में डॉ सुचेता भिड़े-चापेकर के शिष्यों द्वारा भरतनाट्यम प्रस्तुति 'स्वरित मुद्राएं' प्रस्तुत करेगा।

तीसरे दिन - रविवार, 23 नवंबर को उत्सव के अंतिम दिन, सोनिका सेठी और देवयानी सिंह द्वारा 'क्रिएटिव राइटिंग वर्कशॉप' के साथ फेस्टिवल की शुरुआत होगी; 'स्प्रिचुअल कोर्ड्स: स्टोरीज ऑफ चेंज एंड चॉयस' में शालिनी मोदी जिन्होंने 'रासा इन डिवाइन रिलेशनशिप्स एंड इम्मॉर्टैलिटी: ए बून ऑर ए कर्स' पुस्तक लिखी है और कृष्णपद दास कृष्ण - अक्षय पात्र फाउंडेशन के एक आध्यात्मिक गुरु, अन्नूरानी शर्मा, एक बाइलैंग्वुअल कवि, लेखक और भक्ति गायक के साथ बातचीत करेंगे। 'रूट्स एंड रेसिपीज़: ए वेलनेस कन्वर्सेशन' में भारत की प्रमुख न्यूट्रीनिशस्ट और पब्लिक हेल्थ एडवोकेट रुजुता दिवेकर शामिल होंगी। वहीं, 'बिहार डायरीज़ एंड ग्राउंड ज़ीरो: रियल हीरोज़, रियल स्टोरीज़' में आईपीएस अधिकारी अमित लोढ़ा शामिल होंगे, जिनकी बेस्टसेलिंग कृति 'बिहार डायरीज़, लाइफ इन द यूनिफ़ॉर्म, एंड पुलिस अफेयर्स' को एक लोकप्रिय ओटीटी सीरीज़ में बनाया गया था , अमित लोढ़ा के साथ पूर्व राष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी वीना रमन भी होंगी और दोनों आईपीएस अधिकारी और लेखक अर्श वर्मा के साथ बातचीत करेंगे ।


इन सेशंस के बाद दो पुस्तकों - सोनिया वशिष्ठ ओबेरॉय की 'लाइफ, लव एंड अस' और रावी पंधेर की 'इकोज़ ऑफ़ द सोल' का विमोचन होगा।

पुस्तक विमोचन के बाद, कई और सेशन होंगे, जिनमें 'इंडिया थ्रू मेमोरी एंड ट्रैवल' जिसमें ऑस्ट्रेलियाई लेखक सीन डॉयल कवि सुनैना जैन के साथ बातचीत करेंगे; 'टेलिंग टेल्स, टचिंग लाइव्स' में पुरस्कार विजेता लेखिका शोभा थरूर और एक अन्य पुरस्कार विजेता लेखिका मोना वर्मा सोनिका सेठी के साथ बातचीत करेंगी। राईवर्स पब्लिशिंग ग्रुप के संस्थापक-निदेशक और सूफी कॉलमनिस्ट अफ्फान यस्वी और एक सूफी संगीतकार, जिन्हें 'प्रिंस ऑफ कव्वाली' के नाम से जाना जाता है - ध्रुव सांगारी - कवि, अनुवादक और रिसर्चर डॉ. विशाखा गोयल के साथ बातचीत करेंगे। 'सीधा संवाद' में हिंदी लेखक बलराम और प्रसिद्ध कवि, कहानीकार और नाटककार विजय कपूर के बीच चर्चा होगी। 'फ्रॉम कृष्णा टू चाणक्य: रिटेलिंग भारत विद ए ट्विस्ट' में इंग्लिश फिक्शन लेखक अश्विन सांघी 'सुनीता विलियम्स: एस्ट्रोनॉट एक्स्ट्राऑर्डिनेयर' की लेखिका आराधना शर्मा के साथ बातचीत करेंगे।

महोत्सव का समापन सीएलएफ लिटराटी अवॉर्ड समारोह के साथ होगा जिसमें डॉ. सुमिता मिश्रा और टीम लिटराटी द्वारा अंग्रेजी और हिंदी दोनों की फिक्शन और नॉन-फिक्शन कैटेगरीज में विजेताओं को सीएलएफ लिटराटी अवॉर्ड्स प्रदान किए जाएंगे।


सीएलएफ लिटरेचर अवॉर्ड्स के लिए चयनित पुस्तकें:

इंग्लिश नॉन-फिक्शन में

देवदत्त पटनायक द्वारा ‘अहिम्सा: 100 रिफलेक्शंस ऑन द हड़प्पन सिविलाइजेशन’ (हार्परकॉलिन्स पब्लिशर्स इंडिया); गोपालकृष्ण गांधी द्वारा ‘द अनडाइंग लाइट: ए पर्सनल हिस्ट्री ऑफ इंडिपेंडेंट इंडिया’ (एलेफ बुक कंपनी); नजमा हेपतुल्ला द्वारा ‘इन परस्यूट ऑफ डेमोक्रेसी: बियॉन्ड पार्टी लाइन्स’ (रूपा पब्लिकेशंस इंडिया); रस्किन बॉन्ड द्वारा ‘अनदर डे इन लंडौर: लुकिंग आउट फ्रॉम माई विंडो’ (हार्परकॉलिन्स पब्लिशर्स इंडिया) और शशि थरूर द्वारा ‘ए वंडरलैंड ऑफ वर्ड: अराउंड द वर्ड इन 101 एसेज’ (एलेफ बुक कंपनी)।


इंग्लिश फिक्शन में


अमिताभ बागची द्वारा ‘अननोन सिटी: ए नॉवेल’ (हार्परकॉलिन्स पब्लिशर्स इंडिया); अनीता देसाई द्वारा ‘रोसारिता पैन’ (मैकमिलन इंडिया); एनी जैदी द्वारा ‘द कमबैक: ए नॉवेल’ (एलेफ बुक कंपनी); 'द अयोध्या एलायंस: भारत कलेक्शन 8' अश्विन सांघी (हार्पर कॉलिन्स पब्लिशर्स इंडिया) द्वारा और 'व्हिसल्स ऑफ द सिफूंग: टेल्स फ्रॉम द बोडो हार्टलैंड' रश्मि नारज़ारी (ओम बुक्स इंटरनेशनल) द्वारा।


हिंदी फिक्शन/नॉन-फिक्शन में


बलराम (राजकमल प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड) द्वारा 'शुभ दिन'; गीताश्री (राजकमल प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड) द्वारा 'कामनाओं की मुंडेर पर' और कैफ़ी हाशमी (लोकभारती प्रकाशन) द्वारा 'शीया बटर'।

Saturday, November 15, 2025

हिम्मत से जीने वाली भाभी जी, मौत से भी बेखौफ नजरें मिलाईं

केवल तिवारी

जिंदगी तो बेवफा है एक दिन ठुकराएगी, मौत महबूबा है अपने साथ लेके जायेगी। फिल्म मुकद्दर का सिकंदर के इस गीत के बोल बरबस तब याद आए जब गांव से मदन ने सूचना दी कि खिलगजार भाभीजी नहीं रही। उस परिवार की बुजुर्गतम महिला। हमारे परिवार की भी। लंबा-चौड़ा परिवार है हमारा। भाभी जी मुकद्दर का सिकंदर थीं या नहीं, इस पर सबकी अपनी राय हो सकती है, लेकिन शायद इसमें दो मत नहीं होंगे कि वह बहुत हिम्मती थीं। इतनी हिम्मती कि चौथी अवस्था में भी बड़े आराम से कहतीं, 'सब इंतजाम हो जाएगा।' कुछ साल पहले की बात है, मैंने उनसे कहा, 'बोजी (भाभीजी) हम लोग घर आएंगे, लेकिन...' पूरा सवाल सुने बिना ही वह समझ गयीं कि गांव में इंतजाम की बात पूछी जा रही है। हमारा मूल घर जीर्ण-शीर्ण हो चुका है। अचानक किसी के घर इतने लोग कैसे पहुंच सकते हैं? भाभीजी ने बीच में ही रोककर कहा, सब इंतजाम हो जाएगा, बस हफ्तेभर पहले बता देना। सच में उनके इंतजामात का असली आनंद आता जब वह भागवत करातीं। स्नेह से सबको बुलातीं। दीदीयों को भी नहीं भूलतीं। सबको निमंत्रण देना, गांव पहुंचने पर बहुत खुश होना और आशीर्वाद का पिटारा खोल देना, यही सोच थी उनकी। उनसे बेहद लगाव था। बहुत पुरानी बात याद करूं तो वह है प्रेमा दीदी की शादी का। कन्यादान जोड़े में ही हो सकता है। माता-पिता का जोड़ा तो पहले ही टूटा हुआ था, याद भी नहीं कि पिताजी कब चले गये। निकट परिवार में सब नौकरी-पेशा वाले, दूर-दराज निवासी। भाई साहब की शादी हुई नहीं थी, ऐसे में यही भाभी ने आंचल फैलाया और आशीर्वाद दिया। बाद तक भी कहती रहीं, 'प्रेमा ललि तो मेरि चेली जस छन।' यानी प्रेमा (ललि मतलब ननद) तो मेरी बेटी जैसी हैं। उसके बाद मेरा कुछ वर्षों का प्रारंभिक जीवन गांव में चला। बहुत ज्यादा चीजें समझ नहीं आती थीं। बाद में लखनऊ आ गया। एक बार 12वीं कक्षा में पढ़ाई के दौरान गांव गया। ईजा (माताजी) ने मिठाई की पुड़िया खिलगजार आदि जगह देने के लिए कहा। वह बोलीं, इसी बहाने तू सबसे मिल भी आएगा। तब भाभी जी ने कहा था, केवल तुमने इतना बोलना कहां से सीख लिया। असल में, मैं बहुत अंतर्मुखी टाइप व्यक्ति था। फिर मैंने उनकी बात पर गौर किया तो लगा सचमुच मैं बोलने और लिखने वाला बहुत हो गया हूं। खुद ही जवाब ढूंढ़ लिया, अब ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया है, इसलिए शायद बहुत बलार (बोलने वाला) हो गया हूं। शाहजहांपुर में ट्यूशन पढ़ाता था तो बच्चों से ज्यादा उनके मां-बाप को सिखाना पड़ता था। पढ़ाई के अलावा भी बच्चों के प्रति उनके अनेक आग्रह और दुराग्रह रहते थे। खैर... बाद में भाभीजी से साल-दो साल में मिलना होता रहता था। इस दौरान माताजी चल बसीं। वह अक्सर कहतीं, तुम्हारी ईजा तो भगवान का रूप थीं। महात्मा थीं। मैं मुस्कुरा देता। मां के प्रति मेरा अगाध स्नेह रहा है, जैसा कि हर बच्चे का अपनी मां के प्रति रहता ही है। मुझे उनकी बातें याद रहतीं। बातों ही बातों में भले ही हम पुरानी चीजों को याद करते, लेकिन उनका संदेश भविष्य के प्रति ज्यादा होता। बीती ताहि बिसार दे... का भाव लिए हुए। वह भागवत करातीं तो कभी बिपिन के साथ तो कभी अकेले जाना हुआ। बिपिन भी अब दुनिया में नहीं रहा। पिछली बार मैं जा नहीं पाया था। इस बार भाभी जी खुद ही चली गयीं। बिना किसी को कोई कष्ट दिये और बिना खुद कोई शारीरिक कष्ट झेले। मानसिक रूप से वह कैसे मजबूत रहती थीं, वहीं जानें। गांवों में पुराने संस्कार ऐसे ही थे कि हम ज्यादातर बड़े लोगों का नाम ही नहीं जानते थे। कोई चाची, कोई ताई और कोई भाभी। कभी किसी के नाम का पता ही नहीं चला। प्रसंगवश एक किस्सा याद आ रहा है। मैं एमए में जब पढ़ रहा था तो गांव गया। ईजा भी उन दिनों गांव में थी। मैंने कहा, ईजा मैंने माकोट (ननिहाल) नहीं देखा है। चलते हैं। वहां गये तो शाम के वक्त एक पूजा में बैठे थे। तभी एक बुजुर्ग सज्जन ने ईजा का नाम लिया और पूछा, तू कब आई। ईजा के नाम का संबोधन और बहन की तरह आत्मीय भाव से ऐसा पुकारा जाना मुझे बेहद भावुक कर गया। तभी ईजा ने मुझसे कहा, बेटा ये मामा हैं, पैर छुओ। पहली बार किसी के मुंह से मैंने मां का नाम सुना। गांव में तो अक्सर किसी के मुंह से उनके लिए अम्मा, ताई, चाची या भाभी जैसे ही संबोधन सुने थे। अब मुझे इन भाभी का भी नाम का पता ही नहीं। मैंने किसी से पूछा भी नहीं। खिलगजार की बोजी को सादर नमन। पुण्यात्मा का यदा-कदा स्मरण होता ही रहेगा। ऊं वासुदेवाय नम:

Tuesday, November 11, 2025

चंडीगढ़, द ट्रिब्यून स्कूल और मैं

खबर एवं क्लिप्स: साभार दैनिक ट्रिब्यून 

केवल तिवारी
आज इस ब्लॉग को लिखने का मुख्य कारण चंडीगढ़ के सेक्टर 29 स्थित द ट्रिब्यून स्कूल में चले दो दिवसीय मॉडल युनाइटेड नेशंस यानी एमयूएन की कवरेज है। शनिवार 8 नवंबर और रविवार 9 नवंबर तक दो दिन तक कार्यक्रम चला। मेरी मूल कवरेज शनिवार की रही। जिसकी मूल खबर और अखबार में प्रकाशित खबर की कटिंग को साझा करूंगा। इसी बहाने अपने कुछ अनुभव इस तरह से हैं-
चंडीगढ़ को अपनी कर्मभूमि बनाए हुए लगभग डेढ़ दशक होने वाला है। इतने ही समय से द ट्रिब्यून स्कूल से नाता जुड़ा है। कभी बतौर पत्रकार कार्यक्रमों की कवरेज के नाते और कभी बच्चों के अभिभावक के तौर पर पीटीएम में जाने के नाते। पहले यह ट्रिब्यून मॉडल स्कूल था, फिर बना द ट्रिब्यून स्कूल। उस वक्त ट्रिब्यून समाचार पत्र समूह के दैनिक ट्रिब्यून से जुड़ा। कुछ समय इस शहर में अकेला रहा फिर वसुंधरा, गाजियाबाद से बच्चों को भी यहीं शिफ्ट करने की तैयारी हुई। तमाम लोगों से बातचीत और खुद स्कूलों में जाकर कुछ दिन होमवर्क किया। फाइनली यही तय किया कि ट्रिब्यून स्कूल में ही बच्चों को पढ़ाया जाये, अगर एडमिशन मिल जाये तो। विकल्प के तौर पर और स्कूलों के लिए भी तैयारी रखी थी, क्योंकि बच्चों को साथ ही लाना था। ट्रिब्यून स्कूल में बात की तो पता चला कि फॉर्म भरना होगा। बड़े बेटे को कक्षा 6 और छोटे को एलकेजी में दाखिला दिलाना था। हालांकि मैंने एक गलती कर दी कि छोटे का नर्सरी के लिए फॉर्म भर दिया। तीन महीने बाद अनुरोध और एक छोटे से टेस्ट के बाद उसे एलकेजी में दाखिला मिल गया। खैर... स्कूल में बताया गया कि बड़े बेटे की पहले लिखित परीक्षा होगी, फिर इंटरव्यू। छोटे का सिर्फ बातचीत आधारित टेस्ट। मैं तय तिथि के अनुसार एक हफ्ते के लिए बच्चों को लेकर आया। टेस्ट दिलवाया। दोनों का एडमिशन हो गया। बड़े बेटे कार्तिक ने यहां दसवीं तक पढ़ाई की और छोटा धवल अभी दसवीं में है। बड़ा अभी जॉब में लग गया है, छोटे की तमन्नाएं उड़ान भर रही हैं। धवल को साथ मिला है उसके मामा के बेटे भव्य जोशी का। भव्य के पिता भास्कर का दो साल पहले चंडीगढ़ ट्रांसफर हो गया। उन्होंने भी द ट्रिब्यून स्कूल में उसके लिए कोशिश की और एडमिशन मिल गया। 8 और 9 नवंबर, 2025 को हुए कार्यक्रम में लंबे अरसे बाद फिर एक बार कवरेज के लिए गया, हालांकि स्कूल की खबरें यदा-कदा करता रहता हूं। यह कार्यक्रम खास था। ऐसा यह दूसरा आयोजन है। इसमें मुख्य अतिथि रहे पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के जस्टिस अमन चौधरी। इस मौके पर द ट्रिब्यून ट्रस्ट के ट्रस्टी एवं पूर्व राज्यपाल गुरबचन जगत, महाप्रबंधक अमित शर्मा, प्रिंसिपल रानी पोद्दार, शिक्षकगण एवं विभिन्न विद्यार्थी मौजूद रहे।
इस दो दिवसीय आयोजन की कवरेज की पूरी स्टोरी और दैनिक ट्रिब्यून की क्लिप यहां साझा कर रहा हूं 



द ट्रिब्यून स्कूल में दो दिवसीय द ट्रिब्यून एमयूएन  
बेहतरीन मंच पर उत्साही बच्चों का वैश्विक हुनर
खुद से शुरुआत करें नेक कार्यों की : जस्टिस अमन चौधरी
बच्चे कल के नेता, सबको शुभकामनाएं : गुरबचन जगत
केवल तिवारी/ट्रिन्यूचंडीगढ़, 8 नवंबर
विभिन्न देशों के 'प्रतिनिधि' एक मंच पर। संयुक्त राष्ट्र का नजारा। चर्चाएं अपने देश के संसद में भी। पक्ष-विपक्ष में बहस-मुबाहिसें। माहौल उत्साह का। कुछ सीखने का। जानकारी जुटाने को हर कोई आतुर क्योंकि ये राजनयिक, ये नेता और ये प्रतिनिधि सभी बच्चे हैं। जी हां, शनिवार को सेक्टर 29 स्थित 'द ट्रिब्यून स्कूल' प्रांगण का नजारा जोश और उत्साह से भरपूर था। मौका था दो दिवसीय 'ट्रिब्यून मॉडल युनाइटेड नेशंस (एमयूएन)' के सीजन-दो का। इस कार्यक्रम के पहले दिन ट्राईसिटी के विभिन्न स्कूलों के 250 विद्यार्थियों ने पंजीकरण करायाचितकारा विश्वविद्यालय द्वारा प्रायोजित और ग्रिड एडवरटाइजिंग द्वारा संचालित इस दो दिवसीय द ट्रिब्यून एमयूएन के उद्घाटन समारोह के मुख्य अतिथि रहे पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के जस्टिस अमन चौधरी। कार्यक्रम में नागालैंड, मणिपुर के पूर्व राज्यपाल एवं द ट्रिब्यून के ट्रस्टी गुरबचन जगत, ट्रिब्यून ट्रस्ट के महाप्रबंधक अमित शर्मा आदि मौजूद रहे। इस तरह के आयोजन की सराहना करते हुए अपने संबाेधन में मुख्य अतिथि जस्टिस चौधरी ने कहा, 'विचारों में असहमति हो सकती है, लेकिन दूसरों को सुनना भी बहुत बड़ी कला है।' कार्यक्रम में शिरकत कर रहे बच्चों को सौभाग्यशाली बताते हुए जस्टिस चौधरी ने कहा कि अपनी तुलना किसी दूसरे से मत कीजिए, हर कोई 'यूनीक' है। प्रतियोगी भाव रखिए, लेकिन ईर्ष्या नहीं। साथ ही उन्होंने किसी भी नेक कार्य की शुरुआत खुद से करने पर जोर दिया। अपने संबोधन में पूर्व राज्यपाल एवं द ट्रिब्यून के ट्रस्टी गुरबचन जगत ने युवा प्रतिभागियों को संयुक्त राष्ट्र के मॉडल से परिचित कराया और इसके इतिहास और अंतर्दृष्टि को साझा किया, ताकि युवा स्कूली विद्यार्थियों को संयुक्त राष्ट्र की अवधारणा समझने में मदद मिल सके। बच्चों से मुखातिब होते हुए उन्होंने कहा, 'आप सभी कल के नेता हैं। मैं सभी प्रतिभागियों को शुभकामनाएं देता हूं।' इससे पहले कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन से हुई। स्कूल के संगीत विभाग ने सुंदर प्रस्तुति दी। प्रिंसिपल रानी पोद्दार ने अतिथियों का स्वागत करते हुए बच्चों को शुभकमानाएं दी। उद्घाटन समारोह के बाद बच्चों ने अलग-अलग सत्रों में अपने जोशीले अंदाज से अपनी बात रखीं। रविवार को कार्यक्रम का समापन होगा और विजयी टीमों को पुरस्कृत किया जाएगा। उद्घाटन दिवस पर, छात्रों ने संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) में भाग लिया, जिसमें सतत विकास के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और शासन के नियमन पर चर्चा की गई। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) ने इज़राइल-गाजा संघर्ष के क्षेत्रीय प्रभावों की रोकथाम और मध्य पूर्व में स्थिरता पर चर्चा की। और, मानवाधिकार परिषद (एचआरसी) ने संघर्ष क्षेत्रों में यातना, मनमानी हिरासत और न्यायेतर हत्याओं पर बहस की। अंतर्राष्ट्रीय प्रेस, पत्रकारिता और फ़ोटोग्राफ़ी समितियों से जुड़े कार्यक्रमों के अलावा, ये कार्यक्रम रविवार को भी जारी रहेंगे।
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प्रोजेक्ट उड़ानभूमिकार्यक्रम का एक और मुख्य आकर्षण रहा- प्रोजेक्ट उड़ानभूमि। यह आनवी मधु चितकारा द्वारा स्थापित एक छात्र-नेतृत्व वाला गैर-सरकारी संगठन है जो पर्यावरण जागरूकता को समर्पित है। एनजीओ की टीम ने द ट्रिब्यून एमयूएन में एक स्टॉल लगाया। यहां टीम ने अपनी भावुक पहल 'एक पेड़ समर्पित करें' का प्रदर्शन किया। स्टॉल का नेतृत्व संस्थापक आनवी ने किया।
यहां पेस्ट कर रहा हूं उस खबर की क्लिप जो हमारे अखबार में प्रकाशित हुई। जय हो

दूसरे दिन की कवरेज 


प्रतिभा को मंच मिला तो सपनों के फलक पर लहराया परचम 
द ट्रिब्यून स्कूल में दो दिवसीय द ट्रिब्यून एमयूएन संपन्न 
केवल तिवारी/ट्रिन्यूचंडीगढ़, 9 नवंबर 
हर प्रतिभागी ने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। जिस देश का प्रतिनिधित्व मिला, वहां की बात को तर्कों के साथ रखा। इन राजनयिकों, नेताओं के बीच से 'सर्वश्रेष्ठ का चयन' करना एकबारगी निर्णायक मंडल के लिए भी मुश्किल हो गया। आखिरकार मंच पर अपनी प्रतिभा का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वालों को लगा मानो सपनों के फलक पर सच का परचम लहरा दिया। जो पुरस्कृत श्रेणी में नहीं आ सके, उन्हें भी बहुत कुछ सीखने को मिला। हम बात कर रहे हैं सेक्टर 29 स्थित द ट्रिब्यून स्कूल में आयोजित दो दिवसीय 'द ट्रिब्यून मॉडल युनाइटेड नेशंस (एमयूएन)' के समापन समारोह का। रविवार शाम कार्यक्रम में प्रतिभागी ट्राईसिटी के अनेक स्कूलों के बच्चों में सर्वोत्तम प्रस्तुति देने वालों को पुरस्कृत किया गया। पंजाब विश्वविद्यालय के विधि विभाग की अध्यक्ष डॉ. वंदना अरोड़ा, द ट्रिब्यून की प्रधान संपादक ज्योति मल्होत्रा; द ट्रिब्यून के महाप्रबंधक अमित शर्मा और द ट्रिब्यून स्कूल की प्रधानाचार्या रानी पोद्दार ने विजेताओं को पुरस्कृत किया। चितकारा विश्वविद्यालय द्वारा प्रायोजित और ग्रिड एडवरटाइजिंग द्वारा संचालित इस दो दिवसीय द ट्रिब्यून एमयूएन समारोह के समापन पर जिन विद्यार्थियों को विभिन्न श्रेणियों के तहत विजेता घोषित किया गया उनमें यूएनजीए के तहत कार्यकारी बोर्ड एक व दो के सहजप्रीत सिंह और तपन भारद्वाज शामिल रहे। इनके अलावा हंसराज पब्लिक स्कूल, पंचकूला के धैर्य गुप्ता, चितकारा इंटरनेशनल स्कूल, सेक्टर 25 की गुरबाई बोपाराय, सेंट ऐनी स्कूल, सेक्टर 32 के कैविश शर्मा, आशियाना पब्लिक स्कूल, सेक्टर 46 की कायरा अरोड़ा, सेंट स्टीफंस स्कूल, सेक्टर 45 के अक्षांश ठाकुर, द ट्रिब्यून स्कूल, सेक्टर 29 की मोनिशा, चितकारा इंटरनेशनल स्कूल के हरलिव कौड़ा, आशियाना पब्लिक स्कूल की शरण्या पाठक शामिल रहे। यूएनएचआरसी समिति में कार्यकारी सदस्य अरहंत महाजन (अध्यक्ष) और हेमंक्ष गुप्ता (उपाध्यक्ष) के अलावा रेयान इंटरनेशनल स्कूल, सेक्टर 49 के राघव शर्मा, ब्लॉसम्स सीनियर सेकेंडरी स्कूल, पटियाला के सुखमन वासाती, यादवेंद्र पब्लिक स्कूल, मोहाली के ऐशनी सिंह, हंसराज पब्लिक स्कूल, पंचकूला के दक्षेश, सेंट कबीर, सेक्टर 26 के अयान गर्ग, द ट्रिब्यून स्कूल की मिष्टी मनचंदा, को चयनित किया गया। यूएनएससी (समिति 3) के कार्यकारी बोर्ड में अभिजय नागल शामिल रहे। इसमें हंसराज पब्लिक स्कूल, पंचकूला की आराध्या गुप्ता, के अलावा गुरु नानक पब्लिक स्कूल, सेक्टर 36 के वशवीर, अभिरूप पुरस्कृत हुए। इनके अलावा सेंट जोसेफ सीनियर सेकेंडरी स्कूल, सेक्टर 44 के जयवर्धन, बीवीसी के अर्नव पुरा, दिल्ली पब्लिक स्कूल, सेक्टर 40 के कबीर सिंह, द ट्रिब्यून स्कूल के ध्रुव गर्ग, सेंट जोसेफ स्कूल की तन्वी, समरबीर कंबोज की कार्यकारी समिति वाली एआईपीपीएम समिति (4) ने हंसराज पब्लिक स्कूल, पंचकूला के हिमाक्ष चौधरी (रिचर्ड वी) को सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधि चुना गया। इनके अलावा गुरुकुल ग्लोबल स्कूल के अर्नव गुप्ता, माउंट कार्मेल स्कूल के देवांश शर्मा, गुरु नानक पब्लिक स्कूल की फलक शेखू, गुरुकुल ग्लोबल स्कूल के नाभिज कौड़ा का विशेष उल्लेख किया गया। आयुष्मान मोंगा की कार्यकारी समिति (4) के तहत हंसराज पब्लिक स्कूल के परमवीर को सर्वश्रेष्ठ पत्रकार के लिए चयनित किया गया। इनके अलावा सेंट सोल्जर स्कूल, पंचकूला की निधानी, गुरु नानक पब्लिक स्कूल की मिथिलेश को सर्वश्रेष्ठ फोटो पत्रकार और ट्रिब्यून स्कूल की प्रेरणा को विशेष उल्लेख के तहत चयनित किया गया। 


Friday, October 10, 2025

यह भ्रम कोई संकेत या प्रकृति का सहज गुण...

 



केवल तिवारी
यह भ्रम कोई संकेत है या फिर प्रकृति का सहज गुण। कहा जाता है कि इंसान अपनी प्रकृति बदल सकता है। यानी उसमें सुधारात्मक जिसे सकारात्मक कह सकते हैं या फिर नकारात्मक अथवा नेगेटिव गुण-दुर्गुण आ सकते हैं। कुछ लोग समय के साथ अपने नेगेटिव थॉट में बदलाव ले आते हैं और जीवन दर्शन के हिसाब से चलने लगते हैं और कुछ लोगों में नकारात्मकता बढ़ती जाती है। कुछ अनुभव से सीखते हैं और कुछ खुद के अनुभव को ही सर्वश्रेष्ठ मानते हैं। यानी मैं सही हूं, या कोई भला माने या बुरा, मैं तो ऐसा ही हूं। लेकिन तमाम शोध, जानकारों की बातचीत और मोटिवेशनल लोगों की बातों का निचोड़ तो यही निकलता है कि समय के साथ कदमताल करने वाला ही श्रेष्ठ है। जीवन दर्शन को समझने वाला ही महान है। परिस्थितियां अलग-अलग होती हैं। हर परिस्थिति से पार पा लेने की उम्मीदभर कर लेने वाला उन लोगों के बनिस्पत ज्यादा अच्छा है जो हार मान लेते हैं। खैर... भ्रम या संकेत का यह वाकया मेरे दिमाग में इसलिए कौंधा क्योंकि मेरे आंगन में लगे गुलबांस या गुल अब्बास अथवा four o'clock या फिर कृष्णकली जैसे कई नामों से जाने जाने वाले फूल के दो पौधे लगे हैं। अपनी प्रकृति के अनुरूप ये फूल सामान्यत: दोपहर बाद यानी चार बजे के आसपास खिलते हैं। उसी तरह जिस तरह एक फूल सुबह आठ-नौ बजे के आसपास खिलता है जिसे हम office time भी कहते हैं। अब ये जो 4o'clock फूल है पिछले दिनों सुबह-सुबह ही खिल गए। मैं आश्चर्य में पड़ गया। करीब आठ बजे। इससे दो दिन पहले ही पूर्णमासी के व्रत के दौरान पत्नी ने इन्हें शाम पांच बजे के दौरान तोड़ा था, पूजा के लिए। अब मेरी नजर इस पर पड़ी। मैंने पत्नी को बुलाया, और सवालिया अंदाज में पूछा आज ये फूल सुबह-सुबह कैसे खिल गए? जवाब मिलने से पहले ही मुंह से निकल पड़ा जिस तरह मौसम कनफ्यूज है, उसी तरह ये फूल भी लगता है भ्रम की स्थिति में आए हैं। फिर मुझे ध्यान आया मौसम विभाग की ओर से जारी अलर्ट संबंधी खबर का। पहली रात ही अपने अखबार दैनिक ट्रिब्यून (The Tribune Group) में खबर लगाकर आया था कि दो दिन जोरदार बारिश हो सकती है। आज जब शाम के फूलों को सुबह खिला देखा तो नजर आसमान की ओर भी गयी। बेशक सुबह के करीब आठ बज रहे थे, लेकिन लग रहा था मानो शाम हो रही हो। घने बादल। चिड़ियों का ऐसा शोर जैसे शाम के वक्त वह घरों को लौटने के लिए करती हैं। फिर मन में सवाल आया कि यह प्रकृति का भ्रम है या फिर कोई संकेत। भ्रम तो कतई नहीं हो सकता। कम से कम प्रकृति तो भ्रम में हो ही नहीं सकती। प्रकृति हिसाब तो बराबर कर सकती है, जैसा कि पहाड़ों से इस बार खतरनाक खबरें आईं। सहायक नदियों के किनारे जिन्हें उत्तराखंड में गध्यार कहा जाता है, के किनारे बड़े-बड़े रिसॉर्ट बन गये। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई हुई, विकास के नाम पर पहाड़ों को तोड़ा-फोड़ा गया और नतीजा। इसलिए प्रकृति भ्रम में तो नहीं, अलबत्ता संकेत है कि शाम जैसा नजारा है। कम से कम आज तो दिन नहीं निकलेगा, आज शाम ही है। तभी तो फूल कह रहे थे, लो मैंने भी मान लिया है कि आज दिनभर तो शाम जैसा नजारा रहना है। फूल कह रहा है, लो जी मैं तो खिल गया। बदलाव के साथ चल दिया। संकेत यह भी कि तेज बारिश हो सकती है, मेरी खूबसूरती लुभा रही तो मुझे बचाने का उपाय कर लो। नहीं भी करोगे तो मैं झेल लूंगा तेज बारिश। फिर उठ खड़ा होऊंगा। बदलाव से सामंजस्य बिठाना हमें आना चाहिए। फूल तो अच्छे ही लगते हैं, बेमौसमी भी, लेकिन यह तो बेवक्त खिले हैं, लेकिन अच्छे लग रहे हैं। भ्रम तो मैं न ही पालूं, संकेतभर ही हो सकता है, क्या कहते हैं आप....

Thursday, October 2, 2025

चौधरी शिवराज सिंह जी की बात, अंकल जी की बात... उसूलों के साथ... सादर नमन

केवल तिवारी

अगर आप कुछ उसूलों वाले हों (वैसे उसूलों वाली पीढ़ी अब रही नहीं... फिर भी), आपके उसूलों पर आपकी संतानें भी अगर कोई किंतु-परंतु न करती हों, आपका ध्यान रखती हों। इन सबके साथ अगर आप में जिंदगी जीने की जिजीविषा हो तो निश्चित तौर पर आप ठीकठाक जिंदगी जीयेंगे। यह ठीकठाक जीने की एक तात्कालिक उदाहरण हैं हम मित्रों के आदरणीय अंकल चौधरी शिवराज सिंह जी। हमारे मित्र धीरज ढिल्लों के पिताजी। इस परिवार से ढाई दशक से पुराना नाता है।



 गत 20 सितंबर को अंकल जी के निधन की सूचना मिली। सांत्वना देते-देते धीरज को भी कह बैठा, 'मेरी संवेदनाएं आपके साथ हैं, पिताजी जी गये।' अंकल जी की कई बातें याद हैं। उनकी उन बातों का यदा-कदा जिक्र भी मैंने किया है। बेबाक बातें, कोई लाग लपेट नहीं। लगता है ऐसी पीढ़ी अब कहां। अब सुनने वाले भी और बोलने वाले भी, दोनों बहुत 'समझदार' हो गये हैं। अभी 30 सितंबर को अंकलजी के लिए अरदास कार्यक्रम में गया। वहां सभी भाई-भाभियों और बच्चों से मुलाकात हुई। अनेक वर्षों से नहीं मिले मित्रों से भी मिलना हुआ। बातों-बातों में अंकल जी का जिक्र आया। अरदास कार्यक्रम में एक सरदार जी ने चौधरी शिवराज सिंह जी के गन्ना समिति के चेयरमैन रहने के दौर के किस्से साझा किये। उन्होंने बताया कि शिवराजजी ने कभी भी उसूलों से समझौता नहीं किया। किसानों के गन्ना का भुगतान नहीं हुआ तो लखनऊ तक जाकर लड़ाई की और सफल रहे। स्कूल खुलवाने का काम किया। अन्य कई लोगों ने भी अपने-अपने विचार साझा किए। मेरा मानना है कि चौधरी शिवराज सिंह जी जैसे लोगों के विचारों, कृत्यों का डाक्यूमेंटेशन होना चाहिए। साथ ही परिवार के लोगों पर भी चर्चा हो, जिन्होंने उनका खयाल रखा। इन चर्चाओं का महत्व है, आलोचनात्मक ही सही। फिर उनकी जीवनशैली का आज के लोगों के साथ तुलनात्मक अध्ययन होना चाहिए। मैं मानता हूं कि ऐसी चीजें जरूर हम सब लोगों के काम आएंगी। साथ ही काम आएंगी वे बातें जो धीरजजी और परिवार ने पूरी शिद्दत, सम्मान के साथ किया। अंकल जी का ध्यान रखा। करीब डेढ़ दशक पहले आंटी इस दुनिया से विदा ले चुकी थीं। उनकी भी बहुत यादें हैं। उनसे जुड़ी कुछ बातों को कहानी के तौर पर लिखा है, खुद संतुष्ट होने पर आप लोगों को पढ़ाऊंगा। खैर... अंकल जी की बातें अब यदा-कदा होंगी। उनकी याद रहेगी ही। वह मुझे भी स्नेह करते थे और राजनीतिक बातें भी मेरे साथ करते थे। सियासी चर्चाओं में उनको रस आता था। उनको सादर नमन करते हुए एक पंक्ति अर्पित करता हूं। क्योंकि गुजरे व्यक्ति के साथ संवाद एकतरफा ही होता है और वह होता है उनके बारे में सोचना और उनके कृत्यों का जिक्र करना-

आप के बा'द हर घड़ी हम ने, आप के साथ ही गुज़ारी है। सादर

Wednesday, September 24, 2025

तुझे साज लिखूं आवाज लिखूं... किताब के बहाने राजेन्द्र धवन जी की बात

केवल तिवारी 

मेरे ब्लॉग के इस अंश के शीर्षक के पहले पांच अक्षर या यूं कहें कि शुरुआती पंक्ति ‘दैनिक ट्रिब्यून’ में न्यूजरूम के मेरे साथी राजेन्द्र धवन जी की पुस्तक 'मैं सागर खारा, तुम नदी मीठी' की कविता 'तेरा क्या नाम लिखूं' से ली गई है। असल में धवन जी से मेरा परिचय उतना ही पुराना है, जितना समय मुझे दैनिक ट्रिब्यून में आए हुए हो गये। यानी यह मुलाकात अब डेढ़ दशक की ओर अग्रसर है। उस वक्त दो-चार लोगों को छोड़ मेरा वास्ता ज्यादा लोगों से नहीं था। संभवतः राजेन्द्र धवन जी से भी सिर्फ हेलो, हाई तक ही। धवन जी उन चंद लोगों में शामिल हैं जो अभिवादन के लिए सामने वाले का इंतजार नहीं करते। मैंने यहां अजीब आग्रह, दुराग्रह देखे हैं, लेकिन राजेन्द्र धवन जी उन सबसे इतर। वह अपनी उस कविता की मानिंद हैं, जिसमें उन्होंने लिखा है, मेरे से तू इंसान की बात मत कर…धवन जी की यह पुस्तक मिल गयी थी करीब महीनेभर पहले, इसे पढ़ भी लिया था, लेकिन कुछ लिखने का मौका आज यानी साप्ताहिक हवकाश सोमवार 22 सितंबर को ही मिला। 



किताब में छोटी, बड़ी अनेक कविताएं हैं। कवि एवं गीतकार इरशाद कामिल ने बहुत बेहतरीन और सारगर्भित भूमिका लिखी है। उन्होंने लिखा है, ‘अगर हां की आशा न हो तो नहीं को स्वीकार करना समझदारी है।’ वह आगे लिखते हैं, ‘अगर नहीं पता की कविता क्या है तो यह जानने का प्रयत्न आवश्यक है की कविता क्या नहीं है। कविता आपके डेली डायरी नहीं है कविता कोई शिकायत पत्र नहीं है कविता आपके रोज का विज्ञापन नहीं है। न आपकी कुंठाओं का आलेख न आपकी ग्रंथियां का उल्लेख न आपकी मानसिकता पर लेख। यह उन बातों को रखने का माध्यम भी नहीं है जो बातें किसी के सामने कहने की आपकी हिम्मत नहीं होती। यह बंद कमरे में किसी पर चीखने जैसा काम भी नहीं है। विशेषत: उस पर चीखने जैसा जो वहां उपस्थित ही न हो।’ 

भूमिका के बाद मैंने कवि की ‘अपनी बात’ को भी पूरी तरह पढ़ लिया। पुस्तक में लिखी गई विभिन्न कविताओं से लगता है जैसे कवि को मोहब्बत है, कवि का दिल टूटा है, कवि को बेपनाह प्यार हुआ है। कवि अपनी बात कहने में बहुत आनंदित हैं, लेकिन लिखने का तात्पर्य सिर्फ अपने ऊपर गुजरी बातें ही नहीं होतीं जैसा कि खुद राजेंद्र धवन जी ने ‘अपनी बात’ में लिखा है, ‘यह भी सच है कि साहित्य में कही लिखी हर बात सच नहीं होती, कई बार लेखक कल्पनाओं का सहारा लेते हैं जैसे चांद को साहित्यकारों ने सुंदरता का प्रतीक बना दिया है लेकिन चाद न तो स्त्री है और न ही किसी का मामा। दुनिया के सात अजूबों में शामिल ताजमहल मोहब्बत की निशानी है तो मकबरा भी है।’ 

जब कोई गीत, गजल या कविता हम सुनते-पढ़ते हैं तो उसके मायने हर किसी के लिए अलग होते हैं। हर पंक्ति के मायने हर किसी के लिए अलग हो सकते हैं। एक जगह कवि लिखते हैं, जो कमाया उतना ही खर्च किया हिसाब जिंदगी का यूं बराबर किया। एक अन्य जगह उनकी पंक्ति की खूबसूरती देखिए, ‘गुनाह तुमने भी किया था मेरे जितना, तू पाक साफ तो मेरा कसूर क्यों?’ 

राजेंद्र धवन जी की इस किताब में उत्तर आधुनिक युग की कवित्त शैली है तो तुकबंदी भी, कहीं शायराना अंदाज़ है तो कहीं बहती धारा सी आनंदित करने वाली शैली। इतना बेहतरीन लिखने वाले राजेंद्र धवन जी से कभी भी इस संबंध में बात ही नहीं हुई। यानी छुपे रुस्तम जैसे धवन साहब ने एक जगह लिखा है, ‘खूबी नहीं कोई मुझ में बस किस्मत का खा रहा हूं लिखा नहीं कोई गीत किसी और का गुनगुना रहा हूं।’ पुस्तक में कुल 70 कविताएं हैं। एक से बढ़कर एक। धवन जी की यह रचनाधर्मिता ऐसे ही चलते रहें। हार्दिक शुभकामनाएं।


मुझे अपनी पुस्तक भेंट करते राजेन्द्र धवन‌ 


Thursday, September 11, 2025

जिंदगी से मोहब्बत



केवल तिवारी 

जिंदगी से इश्क हुआ है मुझे, जीने की बढ़ी है ललक।

कितना तो भागा-दौड़ा, अब खुद की देखनी है झलक।

बहुत देखी दुनिया और दुनियादारी अब झपकेगी पलक।

थोड़ा बोलना, ज्यादा सुनना, कहीं नैन न जाएं छलक।

चलो बाहें फैलाएं, सबको अपनाएं क्या करना फरक।

खुशियां समेटें सारे जहां की, यहीं स्वर्ग, यहीं नरक।

आती हैं याद पुरानी बातें, पर क्यों हम जाएं बहक।

चलो कि जीयें जिंदगी, भूल जायें जो रह गईं कसक।

चंद लम्हों की जिंदगी और ढेर सारे हैं ग़म

उनकी सुनें, अपनी कहें और मुस्कुराएं हरदम।

यह महज काव्य नहीं, जीवन की है एक तान।

मिलते जुलते रहें और जारी रहे यह मधुर मुस्कान।