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Tuesday, April 20, 2021

धीरेश ने की बात और बुजुर्गों की आई याद

आज सुबह मित्र धीरेश का फोन आया। संदर्भ था, फेसबुक पर मेरे साथ एक फोटो साझा होने की। मैंने हंसते हुए कहा कि मैं तो फेसबुक करीब दो साल से देख ही नहीं रहा हूं। वैसे इसमें थोड़ा सा झूठ शामिल था। फेसबुक पर कमेंट, लाइक या कोई पोस्ट डालना मैंने बंद कर रखा है, लेकिन ऑफिस का ऑनलाइन काम काफी देखता हूं। जैसे दैनिक ट्रिब्यून का ट्विटर हैंडल, ऑनलाइन समाचार आदि। इसी संदर्भ में कभी कबार दैनिक ट्रिब्यून के फेसबुक पेज को देखने के लिए अपने अकाउंट को पहले लॉगइन करना पड़ता है। उस दौरान कभी-कभी किसी पोस्ट पर नजर पड़ जाती है। साथ ही कुछ फ्रेंड रिक्वेस्ट भी। अगर प्रोफाइल लॉक न की हो और जानकार लग रहा/रही हो तो मैं रिक्वेस्ट को एक्सेप्ट कर लेता हूं। लेकिन कमेंट न करने, पोस्ट न डालने जैसे मसलों पर डटा हुआ हूं। खैर... बात का ट्रैक बदल गया। बेशक धीरेश ने फेसबुक पर मेरी फोटो से बात की शुरुआत की थी, लेकिन फिर उन्होंने मेरी माताजी को याद किया। मुझे बहुत अच्छा लगा। कुछ मित्र हैं जो बातों बातों में मेरी माताजी को याद कर लेते हैं। धीरेश ने कहा, ‘उनमें बहुत अपनापन था, गोरी-चिट्ठी। उनकी याद अक्सर आती है।’ मैंने जवाब दिया, ‘हां कुछ बच्चे मेरी मां को मलाई अम्मा कहते थे, लेकिन जहां तक अपनेपन की बात है यह तो उस दौर के सभी बुजुर्गों में होती थी।’ थोड़ी सहमति, असहमति के बीच मैंने मित्र धीरज ढिल्लों के पिताजी के एक किस्से को साझा किया। उन दिनों हम लोग कौशांबी के हिमगिरि अपार्टमेंट में रहते थे। मित्र सुरेंद्र पंडित हम सब लोगों को एक करने वाले थे। एक दिन धीरज के पिताजी अपने कुछ संगी-साथियों या जानकारों के साथ कौशांबी आये। नीचे गाड़ी में बाकी लोग बैठे रहे, अंकल जी नौवीं मंजिल 911 में हम लोगों से मिलने आये। मैंने कहा, ‘अंकल बैठो चाय बनाता हूं।’ उन्होंने कहा नहीं चाय नहीं पीनी है, अभी जल्दी में हूं। वह बाकी साथियों से बात करने लगे। मैंने एक बार फिर जोर देकर कहा, ‘अंकल चाय फटाफट बन जाएगी।’ अंकल जी तुरंत बोले, ‘फिर ऐसा कर 6 कप चाय बनाके फटाफट नीचे ले आ।’ मुझे उस वक्त थोड़ा अटपटा लगा। मैं चाय बनाकर ले गया। धीरज और अन्य मित्र भी मेरे साथ नीचे तक गये। बाद में मैंने इस वाकये पर विचार किया। फिर सोचा कितना अपनापन था उनका यह कहने में कि फटाफट नीचे ले आ। उन्होंने मुझे भी धीरज ही माना। इस वाकये को मैंने धीरेश के साथ जब आज मंगलवार 20 अप्रैल, 2021 को साझा किया तो हम दोनों हंस पड़े। फिर कहा कि हां वैसा अपनत्व कुछ कम हो गया। परिस्थितियां ऐसी हो गयी हैं, हम बदल गये हैं या फिर समय, कुछ पता नहीं। खैर ऐसे कई वाकये हैं। मित्र धीरज ढिल्लों की माताजी के स्नेह की झप्पी में कभी नहीं भूल पाऊंगा। बात 2008 की है। लखनऊ में मेरी माताजी का निधन हो गया था। तेरहवीं के बाद हम लोग लौटे। सुबह-सुबह ट्रेन आ गयी थी। हमारे फ्लैट की चाबी धीरज जी के यहां रखी थी। मैं, भावना और बेटा रिक्शे से उतरकर कुछ बोलते हुए आये। माताजी को अहसास हो गया कि हम आ गये हैं। उन्होंने दरवाजा खोला और सबसे पहले मुझे गले लगाया और उसी वक्त मेरी रुलाई छूट गयी। आंटी ने आसूं पोछते हुए कहा, ‘मैं हूं तेरी मां जैसी। रोना नहीं है। पहले कुछ देर यहां सुस्ताओ फिर ऊपर अपने फ्लैट पर जाना।’ आंटी के हाथ के पराठों का जिक्र तो हम घर पर अक्सर करते हैं। ऐसे ही सुरेंद्र पंडित जी के पिताजी के साथ हमारी अक्सर चर्चा होती थी। जैनेंद्र सोलंकी जी के पिताजी हों या वैभव शर्मा के पिताजी, राजेश डोबरियाल के माता-पिता हों या कोई अन्य मित्र के माता-पिता अनेक लोगों के साथ अनेक किस्से याद हैं। उनके अनुभव सुनने का लुत्फ ही कुछ और था। यहां तो उनका जिक्र है जो मित्र कौशांबी में रहते थे। इनके अलावा भी अनेक मित्रों के माता-पिता के साथ हुई बातें मेरी डायरी में दर्ज है। मसलन, बहादुरगढ़ राहुल के माता-पिताजी के साथ कई बार कई मुद्दों पर बात हुई है, दिल्ली के मनोज भल्ला, लखनऊ के भजनलाल, दिल्ली के ही अवनीश चौधरी, लोहाघाट केे श्रीनिवास ओली।नामों की सूची लंबी बनेगी। मित्र धीरेश का धन्यवाद कि पुरानी बातें फिर याद करा दीं। हर मित्र के साथ की कई बातें मेरी डायरी में दर्ज हैं। कुछ किस्सों पर हम लोग खूब हंसे भी हैं। कुछ मैंने छिपाई, कुछ बताईं। आज भी फिर कुछ पुरानी डायरियों को खंगालने लगा। बातोंबातों में धीरेश के साथ कथित बड़े साहित्यकारों, पत्रकारों और उनकी चेलागिरी पर भी चर्चा हुई। मन कर रहा था, आमने-सामने बैठकर बतियाया जाये। कुछ धीरेश पर नाराजगी जताई जाये और कुछ वह हंसहंसकर हमें चिढ़ाये। दुआ है कि जल्दी यह खौफनाक समय निकले और हम मित्रगण मिल बैठें। हम सब कुछ सुनाएं और कुछ सुनें। अंत में बता दूं कि जिस फेसबुक फोटो से चर्चा की शुरुआत हुई, वह लेखिका दीप्ति अंगरीश के साथ मेरी फोटो थी। कुछ दिन पूर्व वह चंडीगढ़ आई थीं, जाते-जाते एक फोटो खींच ली। बात खत्म करते-करते मुनव्वर राणा साहब का शेर याद आ रहे हैं जो मैं अक्सर दोहराता रहता हूं-

इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है, मां जब गुस्सा होती है तो रो देती है।

Tuesday, March 16, 2021

वसुंधरा की वह यात्रा और जीवन पथ गुलाबी बाग से नोएडा-गाजियाबाद के सफर का जिक्र

केवल तिवारी

मुझे मोहब्बत है अपने हाथों की सब उंगलियों से, ना जाने कौन से उंगली पकड़ के मां ने मुझे चलना सिखाया होगा

यह शायरी याद आ गयी आज जब कुछ लिखने को जी चाहा। हर दिन हर पल कुछ लिखने को मन में कुलबुलाता रहता है, लेकिन दिल की ज्यादातर बातें डायरी में दर्ज कर लेता हूं, जो बात ज्यादा हिलोरें मारती हैं या जिस बात पर लगता है कि इसे तो सबके साथ साझा किया जाना चाहिए, उसे अपने ब्लॉग पर चस्पां कर देता हूं। डायरी लिखने की बात आई तो हमारे भतीजे साहब बिपिन ध्यान में आये। उन्होंने एक डायरी हाल ही में मुझे दी है। इत्तेफाक देखिये मेरी पुरानी डायरी अभी-अभी भरी है, अब नयी शुरुआत इसी में करूंगा। खैर... बिपिन तिवारी द्वारा दी गयी डायरी का किस्सा बहुत पुराना नहीं है, हाल ही में मैं दिल्ली गया था। गाजियाबाद भी जाना हुआ। बिपिन से बात हो गयी थी। बिपिन ने कहा कि पहले ग्रेटर नोएडा आ जाओ, हम सब लोग नितिन के साथ हैं, फिर चलेंगे वसुंधरा। मैंने वसुंधरा स्थित अपने फ्लैट में कुछ काम करवाया था, उसे देखना था और ठेकेदार को कुछ पैसा भी देना था। इस बीच, भतीजी भावना तिवारी यानी कन्नू से भी मिलने का कार्यक्रम था, लेकिन इत्तेफाक से उस दिन उसकी व्यस्तता थी। मैं समझ सकता हूं कि इलेक्ट्रानिक मीडिया की व्यस्तता। फिर जिम्मेदारी और तरक्की के पथ पर बढ़ते रहने के लिए थोड़ी भागदौड़। खैर मैंने परिवार के अन्य सदस्यों से बात नहीं की क्योंकि मैं जानता था कहीं भी मिलने नहीं जा पाऊंगा। हेम, हरीश, दीप, प्रकाश सभी तो दूर-दूर हैं। भतीजियों को घर भी अलग-अलग दिशाओं में है, फिर और लोग भी हैं। खैर अपने सफर के दूसरे पक्ष की ओर जाऊंगा तो मुद्दा भटक सा जाएगा। सीधे मुद्दे पर आता हूं। मैं अपने साले साहब भास्कर जोशी (राजू) के यहां फरीदाबाद पहुंचा, वहां से ग्रेटर नोएडा गया। पहले वरिष्ठ पत्रकार और मुझसे खास स्नेह रखने वाले नरेंद्र निर्मल जी के यहां गये। करीब एक घंटा वहां बैठने के बाद आ गया नितिन के फ्लैट (स्लीओ कंट्री, सेक्टर 121-नोएडा) 12वीं फ्लोर पर घर। वहां नितिन की नानी जी और मामाजी भी मिले। नितिन की मम्मी बीना, बहन मिन्नी और एक साल से तिवारी परिवार से जुड़ी नयी नवेली बहू मानसी मिलीं। बेहद सरल और सहज अंदाज में हुई बातें। मैं तो वाचाल किस्म का हूं, काफी कुछ बोल गया। नितिन ने कहा, बड़बाज्यू खाना बनने तक आइये नीचे घूम के आते हैं। हम लोग सोसायटी देखने चले गये। सचमुच एक नयी दुनिया सी। गगनचुंबी इमारत के ग्राउंड फ्लोर पर उतनी ही सुविधाएं। कुछ दिन पहले इसी इलाके में नितिन-मानसी की शादी की साल गिरह का जश्न मना था। उस समारोह में मैं नहीं था, खैर वह कमी आज पूरी हुई। मानसी के हाथ का खाना पहली बार खाया। बेहतरीन लगा। भले गगनचुंबी इमारत हो, भले आलीशान सुविधाएं हों, भले एक नया संसार सा हो, लेकिन सहजता वही पुरानी थी, सरलता वही पुरानी थी। मेरी भी और बाकी अन्य की भी। बातों-बातों में मानो हम कह रहे हों-

पता अब तक नहीं बदला हमारा, वही घर है वही क़िस्सा हमारा।

दोपहर के भोजन के बाद मैं और बिपिन चले आये वसुंधरा, नितिन के मामा ने हमें वहां छोड़ दिया। इस बीच काफी बातें होती रहीं। पहले बिपिन के घर गये वहां कुछ देर आराम किया फिर चाय पी। उसके बाद मैं और बिपिन पैदल चल दिए मेरे फ्लैट की ओर। अनेक बातें हुईं और उन बातों का सार यही निकला कि-

रिश्तों को मजबूत बनाने के लिए, एक छोटा सा उसूल बनाते हैं। रोज कुछ अच्छा याद रखते हैं, और कुछ बुरा भूल जाते हैं

याद करने के इस क्रम में हम लोगों ने बात की गुलाबी बाग की। हमारे परिवार के एक हिस्से की बात हो और गुलाबी बाग का जिक्र न हो, कैसे हो सकता है। जिस तरह परिवार के दूसरे हिस्से की बात हो और लखनऊ तेलीबाग का जिक्र न हो, हो नहीं सकता, उसी तरह गुलाबी बाग का जिक्र तो स्वाभाविक था। गुलाबी बाग में भी 754 का। 754 वह नंबर है, जिसे हम तब से सुनते थे जब से हम शायद दिल्ली के बारे में भी सही से नहीं सुन पाए होंगे। मुझे याद है गांव से जब चिट्ठी लिखाई जाती थी तो कहा जाता था, बुद्धिबल्लभ तिवारी को मिले, 754 गुलाबी बाग-दिल्ली। बाद में मेरा भी उस घर में जाना हुआ। पुष्पा दीदी वहां कई महीने रही। मेरी माताजी वहां बहुत रहीं। हमारे परिवार का शायद ही कोई सदस्य होगा जो उस छोटे से घर 754 की विशालता और दीर्घता को न जानता हो। यह दीगर है कि नयी पीढ़ी के बच्चों ने सिर्फ सुना ही होगा। चूंकि जब से दिल्ली आया, बिपिन से नया रिश्ता भी बना, मित्रता का। बिपिन रिश्ते में भतीजा है, पूरा परिवार सम्मान देता है, लेकिन उम्र में तो बड़ा है ही। यहां मैं बिपिन के लिए इस तरह की शब्दावली लिख रहा हूं, लेकिन कभी बिपिन दंपती के लिए मुंह से तू-तड़ाक नहीं निकलता। आखिर मेरी लघुता में इतनी दीर्घता तो होना जरूरी है। खैर आते हैं चर्चा पर वापस। हम लोग अक्सर मिलते हैं। नहीं भी मिलते हैं तो परिवार के अन्य सदस्य किसी न किसी रूप में आपस में जुड़े हैं। सभी संस्कारी। हमारा परिवार है, इसलिए नहीं कह रहा हूं, बल्कि इस परिवार का उदाहरण दिया जाता है, इसलिए कह रहा हूं। क्योंकि-

अगर ज़िन्दगी एक सफर है तो परिवार उस सफर का सबसे सुन्दर हमसफ़र है।  

और इसलिए भी-

ऐ इंसानियत मेरी, मुझमें तुम बाकी रहना, परिवार को मुझमें, और मुझे परिवार में शामिल रखना।

चलिए बात जारी रखी जाये। नितिन के घर में जब हम सब बातें कर रहे थे तो सभी प्रसन्नचित्त दिख रहे थे। और इस बात को हम सब जानते हैं कि-

जिस परिवार में मां-बाप हंसते हैं, उसी घर में भगवान बसते हैं।

खैर 754 के बाद बिपिन ने गुलाबी बाग में दो मकान बदले। मुझे उनके नंबर ठीक से याद नहीं, लेकिन ग्राउंड फ्लोर के मकान में कई मौकों पर हम परिवार सहित मिले। एक शायद नितिन की जनेऊ के मौके पर और एक बार प्रेमा की शादी के मौके पर। वहीं दीप का भी घर है। अब प्रकाश भी उसी इलाके में अपने घर में रह रहा है। बड़ी प्रसन्नता होती है, यह सब सुनकर। खैर, चलना ही जिंदगी है। चलते-चलते और बातों बातों में पहुंच गया हूं वसुंधरा। यहां जब से बिपिन आया तो लगा अरे वाह अब तो पड़ोसी हो गये। उस दिन फिर बातचीत जारी रही। एक विचार आया कि-

इंसान आजकल इसलिए भी परेशान है, क्योंकि जो गर्मी रिश्तों में होनी चाहिए वो हमारे दिमाग़ में है।

हम लोग तो उस राह के राही हैं जिसके बारे में किसी शायर ने लिखा है-

अपनी गृहस्थी को कुछ इस तरह बचा लिया करो, कभी आंखें दिखा दी कभी सर झुका लिया करो।

रविवार के उस दिनभर की भागादौड़ी के बाद शाम को कुछ देर बैठकी हुई। बिपिन का बेहतरीन सौजन्य रहा। मेरे चार मित्र भी थे। विस्तार से उसकी क्या बात लिखनी। अपने इस यात्रा वृतांत को विराम देते हुए अंत में कहूंगा-

परिवार में कहना–सुनना आम है, बस लड़ाई के बाद सब भूल जाना आपका काम है।


भंवरे की गुंजन और बचपन की यादें...

केवल तिवारी

भंवरे की गुंजन है मेरा दिल, कब से संभाले रखा है दिल, तेरे लिए, तेरे लिए... इस धरती पर मेरे अवतरण से पहले बनी फिल्म कल आज और कल का यह गीत बहुत पहले से सुनता आया हूं। हसरत जयपुरी साहब के बोल और शंकर-जयकिशन का संगीत। आज अनायास ही फिर मुंह से फूट पड़ा। असल में घर के अंदर कहीं से एक भौंरा आ गया। छोटा सा। श्रीमती जी ने कहा, इसे बाहर कर दो। फिर आजकल ततैया भी खूब आ रही हैं। शायद यह मौसम उनकी ब्रीडिंग के लिए बहुत मुफीद होता है। भंवरे को बाहर करने उसके पास गया तो भ्रामरी योग में निकलने वाली आवाज सी आयी। धीरे-धीरे लगा अरे यह आवाज तो सुनी-सुनाई सी है। आज की नहीं, बहुत पहले की। शायद मैं तीसरी या चौथी में पढ़ता होऊंगा। या हो सकता है मैं चार-पांच साल का रहा होऊंगा। कालखंड सटीक याद नहीं है, हां गांव का नजारा था, यह अच्छी तरह याद है। गौर से सोचा तो याद आ ही गया वह दौर। गांव का। माता जी खेत में गयी होती थीं। दीदी या तो स्कूल या उन्हीं के साथ खेत में। मैं घर में अकेला होता था। बाहर के कमरे यानी चाख में ऐसा ही भौंरा या बड़ी मक्खी घूमती थी और उसकी भ्रमरगान मुझे उदासी से भर देता था। कभी खिड़की पर आकर बाहर को देखने लगता या फिर बाहर आ जाता। बाहर भी सन्नाटा सा पसरा दिखता। दिन में आराम करने का रिवाज होता था। कुछ लोग या तो घर में होते ही नहीं, होते तो आराम कर रहे होते। फिर हमारे जैसे बच्चों को कौन तवज्जो दे। खैर आज यह भौंरा आया, पत्नी ने बाहर करने को कहा तो मैं बचपन की बातें बताने लग गया। फिर मुझे लगा, पहले मुझे गीत गा लेना चाहिए था, 'भंवरे की गुंजन है मेरा दिल, कब से संभाले रखा है दिल तेरे लिए, तेरे लिए...' लेकिन क्या करें, यादों के पिटारे को सिर पर लादे फिरता हूं। याद आ गया वह मंजर। चलो इसी बहाने कुछ लिखने का मन हो गया और एक छोटा सा पीस यहां लिख डाला। 
और अंकल जी का कहना, खुश रहो तो वजन बढ़ेगा
बातों-बातों में एक रात पहले की बात याद आ गयी। अपने मित्रों के साथ कहीं गया था। वहां एक अंकल जी मिले। सरदार जी। बुजुर्ग, लेकिन सेहतमंद। वहीं हॉल के बाहर रखी वजन तोलने की मशीन थी। मैंने मित्र से कहा, 'यार मेरा वजन लगातार कम हो रहा है। हालांकि डॉक्टर ने ऐसे संकेत दिए हैं, लेकिन जब से जाड़ों के कपड़े उतर गये हैं कुछ ज्यादा ही दुबला दिखने लगा हूं।' मित्र ने कहा, वजन कुछ मेरा भी कम हुआ है। हम लोग बात ही कर ही रहे थे सरदार अंकल आ गये। मैंने और मित्र ने पूछा, 'अंकल वजन बढ़ाने के लिए क्या करें?' वे तुरंत बोले, 'खुश रहा करो, अच्छी गल किया करो, ऐहते दूजा कोई गल नहीं, वजन आपे बढ़ जावेगा।' मैं बोला, 'अंकल तुसी सच्ची गल कित्ता।' फिर हम सभी हंस पड़े, थोड़ा मेरी पंजाबी बोलने पर हंसना और थोड़ा अंकल की सही बात पर सहमति जताना। फिर मैंने और मित्रों ने कहा कि वास्तव में बात छोटी सी है, लेकिन असरदार। खुश रहना चाहिए। अच्छी बातें करनी चाहिए। शेष सब चलता रहता है। चलिए बातों बातों में कुछ बातें हो गयीं, बाकी फिर कभी---

Wednesday, January 13, 2021

जमाना स्मार्ट है, पर नोट भी कर लेना चाहिए

 मन में विचार मंथन चलते रहते हैं। कभी कुछ, कभी कुछ। विचार मंथनों से इतर, कई बार बच्चे बड़ी-बड़ी बातें कर जाते हैं। उनकी बातों से निकली बातों पर तो कभी लेख बन गये और कभी ब्लॉग पर लिख डाला। जैसे बच्चे का सवाल कि अगर आपके जमाने में online class की स्थिति आती तो क्या चिट्ठियां भेजकर पढ़ाई होती। ऐसी ही कई बातें। मैं बच्चों से कहता हूं कि डायरी लिखा करो, रोज नहीं तो कुछ खास मौकों पर। जैसे अगर कभी कोई मेहमान आया हो, उनके बच्चों से आपकी कोई बात हुई हो या घर में कोई नयी चीज आई हो या फिर किसी का जन्मदिन हो वगैरह-वगैरह। बच्चे कभी इसे फॉलो करते हैं और कभी बच्चे तो बच्चे ठहरे। जब बात लिखने की आती है तो कई बार मैं चीजों को नोट करने के लिए कहता हूं। खुद भी सोचता हूं कि यह बात नोट कर लूं, लेकिन जब-जब चूका हूं तब-तब भूला हूं। पिछले दिनों कई आइडिया आये। सोचा कि इन्हें नोट कर लूंगा, लेकिन भूल गया। कभी भूलने या न लिख पाने या कहीं जाने के समय को लेकर बात करता हूं तो छोटा बेटा धवल कहता है, पापा स्मार्ट बनो। smart कैसे बनो, वह इसे भी दिखाता है। इन दिनों उसकी ऑनलाइन क्लास चलती हैं। उसने हर क्लास के समय से पांच मिनट पहले का अलार्म लगा रखा है। कभी अगर हम उसे टोकते हैं कि चलो तैयार हो जाओ। पेन, नोटबुक, किताब निकालकर बैठो, क्लास आने वाली है, तो सीधे जवाब देता है कि smart हूं मैं, अलार्म लगा रखा है। उसके अलार्म की बात तो यह भी है कि एक दिन उसने पूछा, पापा आप सैर (morning walk) करने कितने बजे जाते हैं, मैंने कहा, आजकल (winter season) करीब साढ़े सात बजे। उसका अगला सवाल उठते कितने बजे हो, मैंने कहा कम से कम एक घंटा पहले। मैंने उससे पूछा कि तुम्हें चलना है, बोला नहीं। मैंने कहा, चला करो आपके भैया को तो मैं कभी-कभी ले जाता हूं। उसने फिर इनकार कर दिया। अगली सुबह ठीक साढ़े 6 बजे आवाज आई, 'पापा और भैया उठ जाइये' मैं हैरान, कि यह आवाज कहां से आ रही है, छोटे बेटे को देखा तो वह सो रहा है, फिर सिरहाने के पास रखे मोबाइल की ओर नजर पड़ी, देखा मोबाइल में अलार्म बज रहा है। यह अलार्म बच्चे ने अपनी आवाज रिकॉर्ड कर लगा दिया था। खैर उस वक्त उठने का बहुत मन नहीं कर रहा था, ठंड भी बहुत थी। पांच-10 मिटन बाद पत्नी गरम पानी लेकर आ गयी। पानी पीया। फिर थोड़ी देर बाद चाय आ गयी। उसके बाद फ्रेश होते-होते और सर्दियों में खूब सारे कपड़े पहनते-पहनते साढ़े सात बज गया। तभी आवाज आई, 'राउंड करने जाइये' यही वाक्य रिपीट हो रहा था। यह आवाज भी मोबाइल से ही आ रही थी। मैंने अलार्म off नहीं किया, उसे बजने दिया। बेटा अलसाया सा उठा, बोला पापा राउंड करने जाओ। मैं हंस दिया, वाह मेरे स्मार्ट बेटे। उसके बाद कई मौके आए जब लगा कि इस अलार्म को discontinue कर दूं, लेकिन खुद ही रुक गया। सुबह-सुबह अब तो इसे सुनना अच्छा लगने लगा है। इस तरह की smartness देखकर तकनीक और तकनीक पर बच्चों की निर्भरता को लेकर चिंता भी होती है। इस निर्भरता के कारण आज शायद कुछ ही लोग होंगे जिन्हें 10-12 फोन नंबर याद हों। एक जमाना होता था लोगों को कई चीजें याद होती थीं। यहां तक कि हफ्तेभर पहले किसी को मिलने का दिया गया समय और जगह भी। अब तो सबकुछ मोबाइल में होने लगा। स्मार्ट बनना अच्छी बात है, लेकिन नोट करने जैसी विधा की कोई सानी नहीं। नोट करने का मन नहीं होता तो इतना लिख भी कहां पाते। इसलिए मैंने तो सोच लिया है कि नोट करने की अपनी बात पर अमल करूंगा। तत्काल नहीं तो कुछ देर बाद ही सही। आप क्या कहते हैं।


Thursday, December 31, 2020

21वां साल शुभ हो...

 केवल तिवारी

21वीं सदी का 21वां साल शुरू हो गया है। या यूं कहें कि यह सदी भी अब उस दौर में पहुंच गयी है जब उमंगें होती हैं, उत्साह होता है। जज्बा होता है। घबराहट कम होती है। पीछे ज्यादा देखते नहीं, आगे की चिंता कम रहती है। अगर आप प्रौढ़ या वृद्ध हैं तो याद कीजिए अपने जीवन का 21वां साल। मैं यह नहीं कहता तब सबकुछ मस्त रहा होगा। हो सकता है हम-आप में अनेक ऐसे होंगे जिनके लिए 21वां साल खराब ही रहा हो, लेकिन फिर भी वैसी परिस्थितियां आज आ जायें तो क्या आप-हम में इतनी हिम्मत है कि हम उतनी ही आसानी से जीवन पथ पर बढ़ चलें। खैर...

21वां साल असल में कई मायने में अनूठा होता है। कहा जाता है कि मनुष्य बनने से पहले 84 हजार योनियों में कोई भी जीव विचरण करके आता है। अगर यह सच है कि 84 हजार योनियां होती हैं तो इसका चौथाई भाग है 21, यानी 21वां साल कुल योनियों की संख्या का चौथाई भाग। या हमारे जीवन का एक चौथाई भाग। अगर सौ वर्षों के जीवन की गणना सोचें तो चार साल बाद मनुष्य का गृहस्थ आश्रम शुरू हो जाता है। यानी यहां भी चार का अंक। इसी तरह कुंडली में 12 ग्रह होते हैं। इस 12 की संख्या को उलट दें तो 21 बनता है।

हम तो अपनी युवावस्था से ही सुनते आ रहे हैं कि भारत 21वीं सदी के लिए तैयार हो रहा है। लो जी देखते ही देखते 21वीं सदी के 20 साल निकल भी गये। जो जिंदगी 20-20 क्रिकेट की मानिंद रफ्तार से भाग रही थी, उसी जिंदगी में 2020 में ब्रेक लग गया। यह ब्रेक था कुछ सोचने के लिए वक्त लेने का। कुदरत ने कुछ समझाया, दुनियादारी ने कुछ समझाया और कुछ समझ पाये कुछ नहीं। कुछ की उम्र भी ऐसी हो गयी कि उन्हें संभवत: सोचने की बहुत जरूरत भी नहीं। जो भी हो, समय तो अपनी रफ्तार से चलता ही है। सो चल रहा है। अब 21वां साल शुरू हो गया है। यह साल सबके लिए शुभ हो, यही कामना है और इसी कामना के साथ एक कविता आपके लिए पेश है-


कुछ भूलेंगे, कुछ याद रह जाएगा


वो वक्त गुजर गया, ये वक्त भी चला जाएगा।

कुछ चीजें भूल जाएंगे, कुछ याद रह जाएगा।

क्यों उलझें इक-दूजे से

न मैं रहूंगा, न तू रह पाएगा।

संपूर्ण न मैं हूं, न तुम हो

किसी का कुछ भी न रह पाएगा।

भगवान न मैं हूं, न तुम हो

यह बात इंसान कब समझ पाएगा

भ्रम ने पैदा कर दीं इंसानी दूरियां

समझ ही से भ्रम को उतार पाएगा।

हम दोष देते हैं, इक दूजे को

न मैं झुकता हूं, न तू आगे आएगा।

इस सदी के दो दशक देखो गए

यूं ही हमारा यह जीवन भी चला जाएगा।

आओ नयी इबारत लिखें

बाद में न मैं रहूंगा, न तू रह पाएगा।

Monday, December 7, 2020

मैं तो ऐसा/ऐसी ही हूं... बदलना होगा यह भाव

 केवल तिवारी

‘कोई भला माने या बुरा, मेरी तो यही आदत है।’ ‘अपने को फर्क नहीं पड़ता।’ इस तरह के डायलॉग अक्सर अनेक लोगों से आप लोगों ने सुना होगा। अपने अनुभवों के आधार पर मैं कह सकता हूं कि असल में ऐसा कहने वाले एक तो अपनी आदत सुधारना चाहते हैं, लेकिन attitude change problem बीच में आ जाती है। ऐसे ही जो कहते हैं कि मुझे फर्क नहीं पड़ता, वाकई उन्हें फर्क पड़ता है। बस ऐसे लोग यह दिखाने के चक्कर में कि मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता, अंदर ही अंदर कुढ़ते रहते हैं परेशान रहते हैं। रिश्तों में खटास आती रहती है, स्वाभाविक प्रक्रिया है। क्योंकि मानव मशीन नहीं है। उसके अंदर गुस्सा, प्रेम, आदर, तिरष्कार, क्रोध आदि मनोभाव आते रहते हैं। जानकारों का कहना है कि अचानक आने वाले मनोभाव स्थायी नहीं रहने चाहिए। या यूं कहें कि स्थायी रखने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। इसका उदाहरण देते हुए पिछले दिनों एक सज्जन ने समझाया, ‘आप कभी उन बातों पर गौर कीजिए जिसकी शुरुआत में हम कहते हैं आज से कभी नहीं होगा या आज से उससे बातचीत बंद।’ असल में स्थायी घोषणा तो क्षणिक आवेग है। यानी हमेशा के लिए कोई चीज बंद करने या शुरू करने की बात कहना क्षणिक आवेग है। बाद में कुछ पल सोचना चाहिए। फिर मंथन करना चाहिए जब हमारा जीवन ही स्थायी नहीं है तो कोई चीज कैसे स्थायी हो सकती है। परिवर्तन तो सृष्टि का नियम है। फिर बिना नव्यता के सुख कहां मिलता है। नवीनता लाने के लिए मनोभावों के संबंध में स्थायी घोषणा भी कैसे हो सकती है।

आखिर शुरू कैसे करें

हो सकता है आपका मन कर रहा हो कि अब नयी शुरुआत करनी चाहिए। रिश्तों में गर्माहट लाने की कोशिश होनी चाहिए। दूसरा पक्ष इससे अनजान है तो आप एकाध कोशिशें कर सकते हैं। यदि उन कोशिशों का कोई प्रतिफल नहीं मिला तो निराश होने की जरूरत नहीं। कुछ दिन हालात को वक्त के हवाले कर दीजिए। असल में वक्त हर घाव को भर देता है। रिश्तों को बनाये रखने के लिए दोनों ओर से संवाद आवश्यक है। संवादहीनता की स्थिति तो अच्छी बात नहीं। यूं तो सब जानते हैं कि जीवन का अंतिम सत्य मृत्यु है। यानी मृत्यु निश्चित है। जीवन अनिश्चित। कोरोना काल ने इस संबंध में हमें और सचेत कर दिया है। अपने हिस्से के काम को अच्छे से निर्वहन करना बेहद जरूरी है।

सोशल मीडिया के संदेश और हम

आप अगर दो-चार व्हाट्सएप ग्रूप, फेसबुक या ऐसे ही अन्य सोशल साइट्स पर कुछ लोगों के मैसेज पर गौर करेंगे तो आपको पता चल जाएगा कि ज्ञान का भंडार भी वहां है और नफरत भी। कुछ लोग नकारात्मक (negative) बातों को ज्यादा प्रसारित करते हैं और कुछ हमेशा अच्छी बातों को। इन बातों से ही हमें खुद के लिए कुछ चीजों को चुनना है। जो ज्ञान गंगा बहती है, अगर उसमें से कुछ बूंदें भी हम सहेज लें और उन पर अमल कर लें तो हम अपने हिस्से में तो अच्छे हो ही जाएंगे। इसलिए न तो नकारात्मक बातों को तवज्जो दें और न ही उन्हें प्रसारित करें।

बच्चों को अपनों के बारे में बतायें

शहरी जीवनशैली में जहां एकल परिवार प्रथा (single family system) चल रहा है वहां बच्चों को कई बार रिश्तों की जानकारी नहीं होती। कोरोना काल में लंबे समय से परिवार के लोगों से मिलना नहीं हो रहा होगा। ऐसे में जरूरी है बच्चों को परिवार की अहमियत बताना। अपनों से बात कराते रहना। हो सके तो बच्चों को पुरानी कोई ऐसी बात न बताएं जिससे नफरत की जरा सी भी बू आती हो। कुछ समय के लिए तो यह अच्छा लग सकता है कि आपके बच्चे उन नफरतभरी बातों से आपको और ज्यादा अपनापन देने लग जाएं, लेकिन ये सब दीर्घकालिक गलत संदेश देने वाली शुरुआत होती है। तो चलिए कुछ अच्छा सोचें। अच्छा बोलें। रिश्तों को नये सिरे से जोड़ें। कौन जाने कल हो न हो। 

Thursday, November 26, 2020

अब कटारा जी की सूचना... बिछड़े सभी बारी-बारी

 केवल तिवारी

यह क्या हो रहा है? हर कुछ दिन बाद ऐसी सूचना। अभी दिनेश तिवारी जी के जाने की चर्चाएं ही चल रही थीं कि आज दोपहर पता चला राजीव कटारा जी नहीं रहे। हिंदुस्तान में जब मैं था वह स्पोर्ट्स एडिटर थे। मैंने जब 2008 में हिंदुस्तान छोड़ा और उनसे मिलने गया तो खुद सीट से उठकर उन्होंने मुझे गले लगा लिया। कुछ बातें हुईं और मुस्कुराते हुए वह मेरे साथ लोकल रिपोर्टिंग केबिन तक आये। उसके दो साल बाद उनसे फिर मिलने गया तो उन्होंने गर्मजोशीर से गले लगाया और मेरे साथ चलकर कई नये लोगों से मुलाकात कराई। उसके बाद उनसे फेसबुक पर ही बात होती। कभी-कबार व्हाट्सएप पर वह कुछ भेजते। 


उनके लेखन का कायल रहा हूं। फेसबुक पर वह त्योहारों पर छोटे-छोटे पीस लिखते जो कम शब्दों में बहुत कुछ सिखा जाते। कादंबिनी सरीखी पत्रिका के संपादक रहे कटारा जी से पिछले कुछ समय से बात करने का मन कर रहा था। खासतौर पर तब कादंबिनी के बंद होने की खबर आयी, लेकिन हिम्मत नहीं कर पाया। फिर सोचा कुछ दिन बाद बाद करूंगा। अभी पिछले दिनों अपने संपादक जी से उनके बारे में चर्चा हुई। तय हुआ कि कटारा जी से कुछ लिखवाया जाये। नये साल पर उनसे कुछ लिखने का आग्रह करेंगे। लेकिन वह मौका ही नहीं आया। कटारा जी चले गये। उनका वह मुस्कुराता चेहरा हमेशा याद रहेगा। हमेशा कुर्ते में ही रहने का उनका अंदाज भी निराला था। कटारा जी अभी समय तो नहीं हुआ था, लेकिन आप आखिर चले ही गये। हमेशा याद आएंगे। 

Sunday, November 15, 2020

अब क्या गायें और क्या सुनायें... चले गये दिनेश तिवारी जी

केवल तिवारी 

एक आसूं भी न निकल पाया जो उनके चले जाने की खबर सुनी। 
न खबर पे यकीन हुआ न बातों पर जाने कितनी कहानियां थी बुनीं 
वो बातें, वो मुलाकातें और लिखने-पढ़ने की वो योजनाएं। 
कुछ दिनों से वे मौन थे, अब क्या गायें और क्या सुनाएं।

हम एक-दूसरे को करीब 20 सालों से जानते थे। अनौपचारिक बातचीत शुरू हुई साल 2013 से। मेरे चंडीगढ़ आने के बाद। वो भी चंडीगढ़ दो-तीन बार आये। हम लोग घंटों साथ रहे। कभी मित्र मंडली की बात करते तो कभी कुछ लेखन की। इस लॉकडाउन से पहले हमारी योजना थी हिमाचल प्रदेश के पालमपुर जाने की। चंडीगढ़ प्रेस क्लब के पूर्व अध्यक्ष जसवंत सिंह राणा जी के सान्निध्य में बनी थी योजना। उनकी और राणा जी की भी अच्छी मित्रता हो गयी थी। मैं कभी दिल्ली जाता तो उनसे रीगल सिनेमा के पास कॉफी हाउस में या फिर प्रेस क्लब में मुलाकात होती। कुछ समय से वह योग, ध्यान पर काफी जोर देने लगे थे। लेकिन अचानक यह चैप्टर खत्म हो गया। बात कर रहा हूं वरिष्ठ पत्रकार और मुझे छोटा भाई जैसा मानने वाले दिनेश तिवारी जी की। इंडियन प्रेस क्लब के पूर्व उपाध्यक्ष एवं दैनिक हिंदुस्तान में एसोसिएट एडिटर रहे दिनेश तिवारी। दिवाली के दिन मनहूस खबर आई उनके चले जाने की। पिछली दिवाली और यह दिवाली बहुत अजीब सी रही। पिछली दिवाली मेरी बड़ी दीदी चल बसी थीं। इस बार भी दिवाली की पहली रात से मेरी पत्नी की तबीयत बहुत खराब हो गयी। तेज बुखार और बदन दर्द। कोरोना के इस खौफनाक माहौल में अजीब-अजीब लग रहा था। सुबह उठा बच्चों को उठाया। छोटा बेटा रोना लगा, बोला त्योहार पर मम्मा बीमार हो गयीं, अजीब लग रहा है। बड़े बेटे ने नाश्ता बनाया, मैंने घर की साफ-सफाई की। किसी को दिवाली विश करने का भी मन नहीं हो रहा था। 10 बजे तक पत्नी की तबीयत थोड़ी ठीक हुई, तब तक मैं डॉक्टर से भी बात कर चुका था और अस्पताल जाने की तैयारी कर रहा था। इसी बीच मैंने दो-चार व्हाट्सएप ग्रूप पर बधाई के संदेश भेज दिये। डॉक्टर के यहां से लौटकर पत्नी को एक डोज दवा देकर चाय बनाई और बच्चों से कहा कि चलो त्योहार की तैयारी करो। मम्मा अब ठीक हो जाएंगी।
दो साल पहले चंडीगढ़ लेक क्लब में दिनेश तिवारी जी के साथ की एक तस्वीर।
करीब साढ़े ग्यारह बजे मित्र फजले गुफरान का फोन आया। बड़े बेमन से उन्होंने दिवाली की बधाई दी। मैंने पूछा सब खैरियत तो है, बोले-क्या खैरियत है, कोई अच्छी खबर नहीं आ रही है। हर जगह से बुरी खबर ही आ रही है। मैंने कहा, ‘क्या हुआ?’ बोले-क्या बताऊं, दिनेश तिवारी जी नहीं रहे। मैं सन्न रह गया। कैसे, कहां जैसे तमाम सवाल हुए। उनसे बात करने के बाद मैंने व्हाट्सएप ग्रूप चेक किए। एक ग्रूप में दिवाकर जी का मैसेज था। फिर उसमें प्रमोद जोशी जी और प्रदीप सौरभ जी का भी मैसेज आ गया। दुर्भाग्य से यह खबर सच थी। लोग कह रहे थे फेसबुक पर कई लोगों ने टिप्पणियां की हैं। चूंकि मैंने लंबे समय से फेसबुक बंद कर रखा है, इसलिए कुछ जानकारों से बातचीत हुई। इस बीच तमाम लोगों के दिवाली बधाई के संदेश भी आये, कुछ के फोन भी आये, लेकिन मन उचाट सा रहा। पिछले साल तिवारी जी चंडीगढ़ आये थे। प्लान बना कि मार्च या अप्रैल में पालमपुर चलेंगे। जसवंत राणा जी ने कहा कि वहां एक-दो खूबसूरत लोकेशन हैं, वहां चलेंगे। कुछ लिखने-पढ़ने का भी मैटर मिलेगा। इस बीच, लॉकडाउन हो गया। कोरोना का खौफ पसर गया। बस फोन पर ही बात होती। मैं कई बार फोन नहीं भी कर पाता था, दिनेश जी का 20 या 25 दिनों के अंतराल में कोई व्हाट्सएप मैसेज या फोन आ जाता था। लेकिन इस बार 25 अक्तूबर से उनसे कोई बात नहीं हुई थी। मुझे लगा शायद कानपुर गये होंगे। या फिर अपनी पत्रिका में व्यस्त होंगे। वो इन दिनों उन लोगों को कोसते थे जो बेवजह लड़ते-झगड़ते या बैर पालते हैं। उनका कहना था कि आदमी कुछ बुरा-भला कहने या करने या लालच करने से पहले अपनी उम्र के बारे में सोच ले। कितना और जीयेगा। क्यों न सबको साथ लेकर चला जाये। उनको कई कविताएं कंठस्थ थीं। पुराने गीतों के बड़े शौकीन थे। कई बार मुझे भी लिंक भेजते थे। जब हिन्दुस्तान में वह नयी दिशाएं सप्लीमेंट निकालते थे तो कभी-कबार लिखने के लिए कहते थे, बस इतनी ही बात होती थी। इधर अब उनसे अक्सर ही बात होने लगती थी। इस बीच, बस यही कहते, दिल्ली आने का प्लान बने तो बताना। न वो चंडीगढ़ आये, न मैं दिल्ली जा पाया। और न ही करीब एक महीने से बात हुई। कुछ भी नहीं हुआ, वही हुआ जो नहीं होना चाहिए था, पर उस सफर पर किसी को जाने से कौन रोक सकता है। भगवान दिनेश जी की आत्मा को शांति दे। मेरी विनम्र श्रद्धांजलि।

Thursday, November 12, 2020

भारतीय सभ्यता, संस्कृति और आर्य... मैं आर्यपुत्र हूं

केवल तिवारी
पिछले दिनों एक किताब ‘मैं आर्यपुत्र हूं’ पढ़ डाली। लेखक हैं मनोज सिंह। आर्यों को लेकर जो तरह-तरह की शंकाएं-आशंकाएं पैदा होती हैं या की जाती हैं, उसके संबंध में प्रामाणिक तौर पर किताब में विस्तार से बताया गया है। इस किताब में सबसे जुदा बात यह है कि सूत्रधार शैली में आर्य एवं आर्या के के संवादों के जरिये पूरी बात कही गयी है। किताब को लेकर अपनी पूरी टिप्पणी करूं, इससे पहले इसके कुछ संवाद पर गौर फरमाइये- ‘आर्यपुत्र, धर्म व आस्था एक ऐसा विषया है, जिस पर आधुनिक युग में वार्तालाप की सर्वाधिक आवश्यकता है। धर्म और आस्था के नाम पर आधुनिक युग ने जितना अधर्म व अमानवीयता की है, वह चिंतनीय है।’ ..... वर्ण व्यवस्था तो ठीक समझ आ रही है, लेकिन यह जाति बीच में कहां से, कैसे आ गई? यह बताइये आर्यपुत्र!’
मैं यह कभी नहीं कहूंगा कि सिर्फ भारत में ही कृषि का विकास हुआ। मेरा उद्देश्य तो सिर्फ कुछ विद्वानों के मत को खंडित करना है, जो यह कहते हैं कि कृषि की दिशा में पहल पश्चिमी एशिया में हुई थी और वहां से भारत के भूखंड में आई। असल में किसी भी विकास को अपने क्षेत्र या अपने मानव समुदाय से जोड़कर देखना एक मानवीय कमजोरी के रूप में देखा जाना चाहिए। मगर इस चक्कर में हम बहुत सारे तकनीकी और सांस्कृतिक विकासक्रम समझ नहीं पाते। जैसा कि अब 10-15 हजार साल पुराने ऐसे पुरातात्विक प्रमाण मिल रहे हैं, जिनका संबंध भारत में कृषि से है। मैं तो पहले से ही कह रहा हूं कि पश्चिम के विद्वान, जो मेरे कालखंड को सीमित करके देखना चाहते हैं, वह असल में ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि उनका स्वयं का इतिहास मात्र दो-चार हजार साल पुराना है। मेरे अति प्राचीन होने के जैसे-जैसे प्रमाण मिलेंगे वामपंथी इतिहासकार चौंकेंगे। हम आर्यों का प्रतीक चिन्ह स्वास्तिक सौभाग्य और समृद्धि के लिए माना जाता रहा है। वह चारों दिशाओं का प्रतीक भी है। यह विश्व ब्रह्मांड में शुभ व मंगल का प्रतिरूप बन गया। किसी भी मांगलिक कार्य को प्रारंभ करने से पहले हम स्वस्तिवाचन करते हैं (यजुर्वेद 25/19)। यह मोहनजोदड़ो में भी मिला है। इसका आज भी हिंदुस्तान के हर कर्मकांड में प्रयोग किया जाता है। ... मोहनजोदड़ो में कमंडल भी मिला है, जो हम आर्यों से ही संबंधित है।... आर्यपुत्र, पूरे विवरण को समग्रता से देखकर कुछ बातें स्पष्ट रूप से कही जा सकती हैं। हम आर्य अपने कालखंड में असाधारण रूप से संपन्न थे। तकनीकी रूप से विकसित थे। सामाजिक रूप से सभ्य थे। सांस्कृतिक रूप से समृद्ध थे। ज्ञान की तो कोई सीमी ही नहीं थी, वेद इसका प्रमाण हैं।‘ जी आर्या, जहां तक रही बात हम वैदिक आर्यों की कर्मभूमि की, तो इसका विस्तार ऋग्वेद 10.75 सूक्त के ‘ऋषि सिंधुक्षित प्रैमयेध’ की ऋचाओं से स्पष्ट होता है। इसके देवता नदी समूह हैं। इसे नदी सूक्त भी कहा जाता है। इसमें 9 ऋचाएं, जिसमें 9 ऋचाएं, जिसमें सप्तसिंधु की पूरबी और पश्चिमी सीमा का उल्लेख है।... संवाद समाप्त अब आता हूं अपनी टिप्पणी में। सबसे पहले धन्यवाद ऑफिस के मेरे साथी ब्रजमोहन तिवारी जी का जिन्होंने यह रोचक, अनमोल किताब मुझे उपलब्ध कराई। पहले उन्होंने जब चर्चा की तो मैंने पूछा क्या ऑफिस में समीक्षा के लिए किताब आई है, उन्होंने कहा कि समीक्षा के लिए भी जमा कराई गयी है। मैंने उनसे कहा कि आप रहने दीजिए हो सकता है मुझे समीक्षा के लिए ही मिल जाये तो इससे दोनों काम हो जाएंगे। लेकिन बाद में उन्होंने कहा कि आप पढ़ना शुरू करो। समीक्षा के लिए मिल गयी तो लेखक की प्रति आप मुझे दे देना। खैर समीक्षा के लिए संभवत: किसी और को दी गयी और मैं किताब पढ़ने लगा। इतिहास का विद्यार्थी रहा हूं तो रोचक लगता है ऐसी किताबों को पढ़ना। इस किताब में सबसे पहले तो अच्छा लगा कि एक आर्य हैं और एक आर्या और दोनों संवादों के जरिये यह साबित करते हैं कि ‘भारतीय ही तो आर्य थे।’ आर्यों के आने के बारे में इतिहासकारों में मतभेद हैं। इस किताब में आर्य परंपरा और प्राचीन भारतीय परंपरा को तर्कों, साक्ष्यों के आधार पर जिस तरह जोड़ा गया है वह निश्चित रूप से रोचक है, पठनीय भी। लेखक मनोज सिंह ने मैं और मेरे आर्यपुत्र से लेकर मैं कलियुग में तक कुल 17 शीर्षकों के अलग-अलग पाठों के जरिये विस्तार से इसमें आर्य परंपरा का जिक्र किया है। शैली और भाषा सहज एवं सरल होने से आसानी से सबकुछ समझ आ सकने वाला है। तर्क-वितर्क और कुतर्क की हमेशा गुंजाइश बनी रहती है और तार्किक बात ही हमेशा अच्छी लगती है। मानव जीवन के हर अहम पड़ावों से लेकर विविध आयामों तक लेखक ने बहुत बेबाकी से चीजों को सामने रखा है। उन्होंने आश्रमों के बारे में भी बहुत रोचक वर्णन किया है, यथा कण्व आश्रम... शकुंतला यहीं रही थीं। भारद्वाज आश्रम। अगस्त्य आश्रम... आदि। कृषि, अर्थव्यवस्था, धर्म पद्धति जैसी बातों और आर्य परंपरा के साथ हमारे प्रागैतिहासिक काल खंड से मिलती-जुलती जीवनशैली का चित्रण किताब में है। किताब में मनोज सिंह ने लिखा है कि कैसे वह अगली किताब ‘मैं रामवंशी हूं’ में श्रीराम के जीवनचरित पर प्रकाश डालेंगे। जिस तरह यह किताब रोचक बन पड़ी है, उम्मीद है आने वाली किताब भी रोचक होगी। मनोज जी को साधुवाद। किताब उपलब्ध कराने के लिए बृृृजमोहनज जी का भी धन्यवाद।

Tuesday, November 10, 2020

आधार (Aadhar) के प्रयोग की कुछ जरूरी बातें जान लीजिए

अगर आप अपने आधार Aadhar कार्ड का कहीं प्रयोग करने जा रहे हों तो अपने अनुभव के आधार पर आपको कुछ बातें बता दूं। पहले तो अगर आप आधार का कलर प्रिंट कहीं से निकलवा रहे हैं तो पूरा प्रिंट निकालें। यानी wallet में रखने वाले आधार कार्ड को reject किया जा सकता है। चंडीगढ़ में कुछ कामों के लिए जगह-जगह ई संपर्क E Sampark केंद्र हैं। Industrial area स्थित E Sampark केंद्र पर मैं अपने छोटे बेटे के लिए निवास प्रमाणपत्र यानी Domicile Certificate बनवाने गया। पहले तो दो घंटे करीब इंतजार के बाद नंबर आया। इस बीच मैंने पांच रुपये का कोर्ट स्टैंप ले लिया। मेरे पास आधार कार्ड Wallet आकार का था। हालांकि फोटो कॉपी मैंने दोनों तरफ का एक ही पन्ने पर करवा रखी थी, लेकिन काउंटर पर मौजूद शख्स ने मना कर दिया। मैंने उनको पासपोर्ट की कॉपी और ऑरिजनल दिखाया तो उन्होंने इसे address proof मानने से ही इनकार कर दिया। यही नहीं मैंने उनसे कहा कि मैं E-Aadhar का print दे देता हूं, उन्होंने उसे भी मानने से इनकार करते हुए कहा कि पूरा आधार कार्ड रंगीन चाहिए। दो घंटे से मैं चुपचाप खड़ा था, इस वक्त मुझे गुस्सा आ गया। उनसे पूछा कि आप पासपोर्ट को भी प्रूफ नहीं मान रहे। खैर इस बीच, बगल के काउंटर पर बैठीं एक महिला ने कहा कि मैंने आपसे पूछा था कि फॉर्म कंप्लीट है। मैंने कहा, आपके सवाल पर मैं कह चुका था कि हां। असल में फॉर्म तो मेरा कंप्लीट ही था। खैर कुछ देर की बातचीत के बाद मैंने निवास प्रमाणपत्र नहीं बनाने का ही फैसला ले लिया क्योंकि उनका कहना था कि आज apply करने के 10 से 15 दिन के बाद प्रमाणपत्र बनकर आयेगा। चूंकि Sainik School में form भरने की अंतिम तिथि 20 नवंबर है, इसलिए कोई फायदा भी नहीं था, लेकिन इससे एक सबक मिला कि आधार कार्ड का original पूरा ही प्रिंट निकलवाना चाहिए यानी रंगीन एक पूरा पेज। फिर अगर कोई wallet size आधार प्रिंट लेना चाहिए तो एक प्रिंट तो पूरा निकलवा ही लेना चाहिए। खैर इसके बाद मैंने अपने गांव के प्रधान से बात की है। आश्वासन तो मिला है, देखते हैं क्या हो पाता है। इन तमाम कवायदों के बाद कुछ बातें समझ आती हैं, मसलन- कितनी ही बड़ी-बड़ी बातें की जायें, धक्के तो आपको खाने ही पड़ेंगे। online का जमाना हो या फिर पुराना ही। लाख कोई सरकार बड़े-बड़े दावे करे, सरकारी काम अपने ही ढर्रे से होता है। फर्जीवाड़ा में समय कम लगता है। कई लोगों ने मुझे वैसे रास्ते भी बताये, लेकिन मुझे सही documents के साथ originally बनवाना था। सही रास्ते पर ही चलना चाहिए, सबकुछ सही होने पर थोड़ी दिक्कत आती है, लेकिन अंतत: आपका काम होगा ही।  

Thursday, November 5, 2020

इस खुशी को क्या नाम दूं...

केवल तिवारी 1. उदास चेहरा लिये पार्क में अक्सर बैठा रहने वाला शोभित आज खुश था। पार्क का चक्कर तो वह आज भी लगा के आ गया, लेकिन आज उसने उदासी को खुद पर हावी नहीं होने दिया। ऐसा उसे कई मौकों पर होता था। एक तब, जब बेंगलुरू रह रहे अपने भाई से बात कर लेता या फिर वह घर आता था। इसके अलावा जब उसकी दीदी मायके आती तब भी वह बहुत खुश होता था। आज दीदी आने वाली थी। रांची शताब्दी से। दिल्ली में पली-बढ़ी उसकी बहन स्नेहा शादी के बाद रांची चली गयी थी। कोरोना महामारी के दौरान रांची से वह दिल्ली आये कि नहीं, इस पर असमंजस बना हुआ था। पहले स्नेहा ने ही फोन पर कहा कि आ रही हूं, फिर पता नहीं क्या बात हुई, खुद ही कहने लगी रहने देते हैं माहौल खराब है। जब मम्मी-पापा, भाई ने कहा कि आ जाओ कोई बात नहीं तो फिर आने का कार्यक्रम बना लिया। हालांकि शायद यह पहली बार था जब वह पति और बच्चों के बगैर आ रही थी। स्नेहा की बिटिया 10वीं में पढ़ती है, बेटा आठवीं में। पति ने ही समझाया कि बच्चों को दादा-दादी के पास ही रहने दो, बाद में हो आएंगे। मौका रक्षा बंधन का था और स्नेहा पिछले तीन सालों से मायके नहीं आ पायी थी। इस बार मार्च में बच्चों की छुट्टियों के बाद कार्यक्रम बना तो लॉकडाउन हो गया। अब अनलॉक की प्रक्रिया के दौरान कुछ ट्रेनें चलीं तो स्नेहा का मन बहुत व्याकुल हो गया। असल में स्नेहा के पिता मधुरेंद्र सरकारी नौकरी से रिटायर हो चुके हैं। मां थोड़ा अस्वस्थ रहती हैं। छोटे भाई शोभित की कहीं नौकरी नहीं लग पाई। बस कभी कहीं छोटी-मोटी नौकरी मिलती भी है तो शोभित वहां टिक नहीं पाता। बड़ा भाई राकेश पढ़ने में ठीक था। बीटेक करते ही बेंगलुरू में नौकरी लग गयी। वह सपाट सा है। स्नेहा से फोन कर उसने कह दिया अभी जाने की क्या जरूरत है। वह बात खरी करता है, लेकिन उसकी बात का कुछ लोग बुरा मान जाते हैं। हालांकि उसे इस बात की परवाह नहीं कि उसकी बात का बुरा माना जा रहा है या भला। शोभित उसे फोन पर खूब चाटता है। राकेश कभी-कभी शोभित के लिए पैसे भी भेज देता है। वह डांटता भी है तो शोभित बुरा नहीं मानता। लो जी स्नेहा आ गयी। शोभित चला गया लेने। स्टेशन से जैसे ही स्नेहा बाहर को आती दिखी, शोभित भागकर गया और अपनी दीदी का बैग ले लिया। स्नेहा ने उसे बैग थमाया और जोर से उसकी नाक खींच दी। ‘नाक को इतनी जोर से खींच दिया दीदी... आह’ शोभित चिल्लाया। ‘पहले मेरे पैर क्यों नहीं छुए,’ ‘स्नेहा ने सवाल किया।’ ‘सोशल डिस्टेंसिंग दीदी,’ शोभित बोला और दोनों पहले से बुक करके लायी गयी कैब की ओर चल दिये। आज शोभित के घर में अजब उत्साह था। मां भी जैसे भली-चंगी हो गयी। मधुरेंद्र भी बेहद खुश थे और सबसे ज्यादा चहक रहा था शोभित। हर कोई इस खुशी को समझ रहा था। लेकिन शोभित के समझ में नहीं आ रहा था कि इस खुशी को वह क्या नाम दे। 2. ‘भाई तूने अच्छा किया जो अलग रहने लग गया,’ मनीष ने यह बात अपने भाई मनन से कही। मनीष और मनन अभी नये-नये जवान हुए हैं। दोनों जुड़वां हैं। मनन को एक छोटी-मोटी जॉब क्या मिली वह आफिस और घर की दूरी का बहाना बनाकर मां-बाप से अलग रहने लगा। पता नहीं परवरिश में रह गयी कोई कमी है या फिर संगत का असर दोनों भाइयों की अपने माता-पिता से नहीं बनती। मां के प्रति तो प्रेम कभी उमड़ भी जाता है, लेकिन पिता के प्रति नहीं। उन्हें लगता है कि पिता हमेशा टोकाटाकी करते रहते हैं। वैसे उनके पिता इंद्रमोहन भी टोकाटाकी कुछ ज्यादा ही करते हैं। ‘निकल जाओ मेरे घर से’ जैसा डॉयलॉग तो वह एक दिन में एक-दो बार दोहरा ही देते हैं। असल में उन्हें लगता है कि बच्चे उनके हिसाब से पढ़-लिख नहीं पाये, जबकि बच्चे कहते हैं कि उनका जहां अलग है। मनीष एक्टिंग में हाथ आजमाना चाहता है और मनन संगीत में। हालांकि अपनी पसंद की फील्ड में भी दोनों कुछ खास कर नहीं पाये। उनकी मां ममता बिल्कुल आदर्श गृहिणी हैं। कभी पति की सुनती है और कभी बेटों की। अब मनन अलग रहने लगा तो मां को लगा कि ऑफिस से दूरी होगी ही इसीलिए अलग रहने लगा है। घर में भले ही खटपट हो लेकिन अजीब बात है कि मनीष और मनन कभी लड़ते नहीं, उल्टे एक दूसरे के पक्के दोस्त बनकर रहते हैं। मनन ने मनीष के लिए एक एक्टिंग स्कूल में बात की है। अगले हफ्ते से वह जाएगा। फीस मनन चुकाएगा। मनीष आज बहुत खुश है। अपने स्वभाव के अनुकूल वह फिलहाल आगे की नहीं सोच रहा है, बस एक्टिंग स्कूल में जाने को बेताब है। वह घर में इधर-उधर घूम रहा है, प्रसन्न है। उसके पिता भी यह सोचकर खुश हैं कि दूसरे बेटे ने अपने लिए नौकरी और ठीया ढूंढ़ लिया है, मां तो बेचारी सबके खुश रहने पर ही खुश है। सब खुश हैं, लेकिन किसी के समझ नहीं आ रहा है कि इस खुशी को क्या नाम दें। 3. मिसेज रजनी कृष्ण को तो बस अब कुछ दिन तक अलग तरह का भोजन बनाने, अचार बनाने और पाचक नमक तैयार करने में ही मजा आएगा। बेटा राजीव जो आया है। वैसे बेटे की कोई फरमाइशें नहीं रहतीं। वह तो बस मम्मी के हाथ का बना साधारण खाना ही पसंद करता है। बचपन से ही ऐसा है। उसे मम्मी के हाथ का बना अचार, खासतौर से तैयार किया पाचक नमक जिसमें उसकी मां जीरा, हींग, आजवाइन, सरसों के दाने, लौंग, काली मिर्च और काला नमक बनाकर तैयार करती है, जैसी चीजें पसंद हैं। हां बचपन से उसे आलू के पराठे दही के साथ बहुत अच्छे लगते हैं। एक हफ्ते के लिए आया है राजीव। अनेक मित्रों से मिलने भी जाना है। कुछ खाने की भी जिद करेंगे, लेकिन रजनी कृष्ण जी हैं कि मन कर रहा है कि सातों दिन बेटा उसी के हाथ से खाना खाये। बचपन से धीर-गंभीर राजीव ने पढ़ाई की और पढ़ाई पूरी होते ही हैदराबाद की एक कंपनी में लग गया। पूरे डेढ़ साल बाद आया है मेरठ स्थित अपने घर। मेरठ उनका मूल निवास नहीं है, लेकिन राजीव के पापा की जॉब के चलते यहीं घर बना लिया और यहीं के होकर रह गये। पापा भी रिटायर हो गये हैं। राजीव के आने पर बेहद खुश हैं। उनका मन तो बस राजीव से बातें ही करते रहने का होता है। रजनी जी तो इन दिनों सब भूलकर बस बेटे के लिए व्यंजन बनाने की विधि सीखने में ही मशगूल है। उनका मन कर रहा है कि कई चीजें बनाकर राजीव के लिए तैयार कर दें। कुछ रोज खाने को और कुछ ले जाने को। वह बहुत खुश हैं। खुश उनके पति भी हैं। हालांकि इस खुशी को कोई कुछ नाम नहीं दे पा रहा है। 4. आज तुम्हारा ऑफ है इसलिए मूड को ऑन रखो। खाने में क्या-क्या बनाऊं बताओ। गणेश कुमार की पत्नी रेखा ने सुबह की चाय के वक्त सवाल किया। अरे जो बच्चों को पसंद आये बना दो, मैं क्या खास बताऊं, गणेश ने अखबार पर नजर डालते हुए कहा। रेखा बोली, कभी तो अपनी पसंद बता दिया करो। गणेश कुमार ने अखबार किनारे रखा और मोबाइल में कुछ देखने लगे। रेखा ने पूछ लिया क्या ऑनलाइन सर्च कर रहे हो। गणेश मुस्कुराया नहीं पति-पत्नी पर खाने के संबंध में बने एक जोक किसी ने भेजा था, वही देख रहा था फिर खुद ही हंसने लग गया। रेखा उठकर चली गयी। असल में गणेश कुमार बेहद सरल व्यक्ति हैं। खाने-पीने की कोई खास फरमाइश नहीं। बच्चों की पसंद में ही उनकी पसंद है। हालांकि रेखा ने उनकी कुछ-कुछ पसंद पर गौर किया है और गाहे ब गाहे वह ऐसी चीजें बना दिया करती है, लेकिन उसकी इच्छा होती है कि पति कभी-कभी फरमाइश किया करे। हां, बच्चों की पसंद पर बेशक वह अक्सर बनाती रहती हैं, लेकिन सख्ती के साथ। जैसे हर समय तला-भुना नहीं, कई बार बिना पसंद के भी खाना पड़ेगा, वगैरह-वगैरह। आज गणेश कुमार के मन में आया कुछ बता ही दिया जाये। वह भी उठकर रेखा के पीछे किचन में चले गये और नाश्ते से लेकर डिनर तक के तीन-चार चीजें बना दीं। उसमें लंच बच्चों की पसंद का था। फिर क्या था रेखा आज बहुत खुश है। बाहर बूंदाबांदी हो रही है। इससे उमस बढ़ गयी है। बच्चे उठकर अपने-अपने काम में लग गये हैं, गणेश कुमार भी कुछ किताबों में सिर खपाये बैठे हैं, कभी टीवी भी देखने को उठ जाते हैं। रेखा है कि बहुत खुश है, पति ने फरमाइश तो की। हालांकि रेखा के समझ नहीं आ रहा है कि इस खुशी को वह क्या नाम दे। गणेश कुमार भी तो नहीं समझ पा रहे हैं कि आखिर रेखा आज इतनी क्यों खुश नजर आ रही है, जबकि काम का प्रेशर ज्यादा है। उक्त सभी किरदारों पर गौर करते हुए सवाल उठना लाजिमी है कि इस खुशी को क्या नाम दूं। शोभित का बहन के आने का इंतजार करना, मनन का अपने भाई मनीष को एक्टिंग स्कूल में भेजना, रजनी कृष्ण का बेटे राजीव के लिए खाना बनाना, रेखा का गणेश की फरमाइश पर इतराना। आखिर ये कौन सी खुशी है। इसका कोई तो नाम हो। शायद यह अनाम खुशी ही सबसे अनमोल है। क्या आपको भी होती है ऐसी अनाम खुशी...।