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Thursday, July 22, 2021

अतीत से घबराना और अतीत को ही सहेजना

 केवल तिवारी

कुछ बुजुर्गों और कुछ ‘झिलाऊ’ लोगों की तरह कुछ-कुछ अपनी भी आदत है अतीत के कुछ किस्सों को सुनाने की। गनीमत है कि बीबी और बच्चे धैर्य से सुनते हैं और कभी-कभी लगता है इंट्रेस्ट भी ले रहे हैं। हां अनेक बार ऐसा भी हुआ है कि मैं किस्सा शुरू करता हूं और बच्चे उसे पूरा करते हुए कहते हैं, ‘आप इस बात को कई बार बता चुके हैं।’ फिर लगता है किस्सागोई में क्या मैं गरीब हो चुका हूं। फिर अपनी आत्मा से ही बात करते हुए कहता हूं कितनी बातें तो मैं एडिट करके बताता हूं। किस्से भी क्या होंगे मेरे जीवन के। आज इन बातों को लिखने का असल में एक खास कारण बना। अपने बचपन की बातों को याद करते हुए पत्नी भावना बोली, भगवान अगर मुझसे पूछे क्या चाहती हो मांगो तो मैं बोलूं, एक बार बचपन के उन दिनों में ले चलो। बड़े बेटे कार्तिक ने जवाब दिया, ‘फ्यूचर में जाना तो हो सकता है कभी संभव हो जाये, लेकिन भूतकाल में जान संभव नहीं।’ छोटा बेटा धवल बोला, ‘क्या मम्मा आपको अच्छा लगेगा नानी जी बीमार थीं, नाना जी भी बीमार थे।’ भावना बोली बेटा में बचपन की बातें कर रही हूं, जब हम भाई बहन लड़ते थे। पापा यानी आपके नाना जी हर हफ्ते दही-जलेबी लाते थे। हर इतवार को त्योहार जैसा होता था क्योंकि नानाजी शनिवार को आते थे और सोमवार को निकल जाते थे। असल में वह उन दिनों की बात कर रही थी जब वह आठवीं या नौवी में पढ़ती होगी। उनके पिता मनोहर दत्त जोशी नैनीताल में पोस्टेड थे। वे health department में जॉब करते थे। भावना की बात खत्म हुई तो फिर वैसा ही सवाल मुझसे भी हुआ। क्या कहता? मैंने कहा नहीं बच्चो मैं तो भविष्य की ओर देखने वाला व्यक्ति हूं। मैं अपने अतीत में जाना नहीं चाहता। फिर ज्यादा मैं कुछ नहीं बोला। धवल और कार्तिक एक साथ बोले, पुराने दिनों की अलग-अलग यादें होती हैं। जैसे हम कहेंगे कि हम लोग कैसे साथ खाना खाते थे। कभी-कभी प्रेस क्लब जाते थे। पापा पहले नाइट ड्यूटी करते थे तो हम लोगों से मुलाकात भी रोज कहां होती थी। पापा जब उठते थे हम स्कूल जा चुके होते थे। पापा जब रात को आते थे, हम सो चुके होते थे। बच्चों की यह बात तो यहीं खत्म हो गयी, लेकिन मैं न जाने क्यों अतीत की ओर झांकने लगा। दिमाग पर जोर देकर कि देखता हूं कहां तक पहुंचता हूं। पिताजी की छवि तो मेरे दिमाग में बिल्कुल भी नहीं है। हां पहाड़ में अपने घर की खिड़की पर बैठकर एक व्यक्ति सब्जी काटता हुआ मेरे जेहन में बचपन से है। शायद वो पिताजी ही होंगे। वैसे मैंने नाना-नानी भी नहीं देखे। जब पिताजी को नहीं देखा तो दादा-दादी की बात क्या करूं। असल में इसमें संपूर्ण दुर्भाग्य मेरा ही तो है। पहली बात तो मैं धरती पर आया, यही आश्चर्यजनक है, फिर जिंदा रहा यह भी आश्चयर्जजनक। ईजा बतातीं थी कि पिताजी जब अंत समय के दौर में थे तो कहते थे, भुवन ‌(बड़े भाई साहब) को इंटर ज़रूर करा देना, बेटियां अपनी किस्मत से खाएंगी और इसको (मेरे लिए) बचना नहीं है। खैर मैं बच गया और देखते-देखते जीवन के 50 बरस पूरे करने जा रहा हूं। खैर... अतीत में झांकने की कोशिश में मैं चला गया हूं कक्षा चार में। नयी किताबें ला नहीं सकते। माता जी करीब 10 किलोमीटर पहाड़ी सफर तय कर कहीं किताबें लेने गयीं, ‘सेकेंड हैंड।’ पहले दिन जवाब मिला, हम किताब बेचते नहीं.... दूसरे दिन फिर वही सफर। इस बार वो पिघल गये जिन्होंने एक दिन पहले किताबें देने को मना किया था और इस तरह मेरी ‘नयी’ किताबें आ गयीं। यह किस्सा में बच्चों को हर साल तब सुनाता हूं जब उनके लिए नयी कॉपी-किताबें आती हैं। मुझे याद है मैं और शीला दीदी कहीं शादी-व्याह में जाते थे तो जब कोई हमसे पूछता तुम किसके बच्चे हो तो हमारा जवाब होता हम ‘भुवन के भाई-बहन हैं।’ यानी बड़े भाई साहब भुवन चंद्र तिवारी के छोटे भाई-बहन हैं। यही तो पहचान थी हमारी। यही अब भी है। फिर एक धुंधली सी याद आती है प्रेमा दीदी की शादी की। मुझे आधी रात को बिस्तर से उठाया गया ताकि मैं खील देने की परंपरा का निर्वहन कर सकूं। फिर कई बातें। अभी शायद मेमोरी ठीक है, फिर तो कई किस्से याद हैं जो मैं बच्चों को बताता रहता हूं। मसलन, कक्षा 6 बाल विकास मांटेसरी स्कूल में मेरा एडमिशन और काउ (गाय) पर निबंध की बात। मैं तो काव मतलब काल समझता था। पुष्पा दीदी का मुझे कमांड हास्पिटल दिखवाने ले जाना। जीजा जी यानी स्व. ख्यालीराम जोशी का मुझे भगत कहना, आठवीं में बड़े भाई साहब द्वारा मेरा एडमिशन लखनऊ मांटेसरी में करवाना और मुझे खुद लिस्ट देखने के लिए भेजना और पीछे-पीछे चुपचाप उनका आना, लखनऊ मांटेसरी तक कई बार पैदल जाना, अनेक बार डॉ. अग्निहोत्री द्वारा लिफ्ट दिया जाना, पूरे तेलीबाग में कुछ ही घरों में टेलीविजन होना, बाद में हमारे घर में भी टीवी आना, छत पर जाकर एंटीना को ठीक करने में ही विशेष मजा आना, वो किस्से भी जब भाई साहब मुझे आकाशवाणी लेकर जाते थे। इसके बाद वह किस्सा भी जब मैं आठवीं में पढ़ता था जब भाभीजी को लेने गांव गया। फिर बाद में एक बार किस तरह हमने ट्रेन पकड़ी, फिर टिकट लेने लालकुआं स्टेशन पर उतरा। तब तक ट्रेन चलने लगी। भाभीजी और छोटा सा भतीजा दीपू उसमें बैठे थे। भाग-भागकर ट्रेन पकड़ी। अगले स्टेशन पर उस डिब्बे को ढूंढ़ने लगा जिसमें भाभीजी और भतीजा बैठे थे। बड़ी मुश्किल से वहां तक पहुंचा। ऐसे ही एक किस्सा जब मैं शाहजहांपुर से गांव गया तो रानीखेत से आगे बसें शाम सात बजे बाद नहीं चलती थीं, तब मैंने ठिठुरते-ठिठुरते रानीखेत में पूरी रात बिताई। ऐसे ही अनेक किस्से। शाहजहांपुर में विमला दीदी के यहां निवास के, बाद में भानजे पंकज का केंद्रीय विद्यालय मे एडमिशन की जद्दोजहद। उसके बाद यानी करिअर पथ के अनेक किस्से। फिर अपने बारे में सोचता हूं या जब कोई आत्मीय हो जाता है और मेरे बारे में पूछता है तो कहता हूं-

न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता,

डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता।

 

गालिब साहब के इस शेर की अगली पंक्तियां हैं-

हुआ जब ग़म से यूं बे-हिस तो ग़म क्या सर के कटने का,

न होता गर जुदा तन से तो ज़ानू पर धरा होता।

हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है,

वो हर इक बात पर कहना कि यूं होता तो क्या होता।


क्या-क्या याद किया जाये। अतीत में जाना नहीं चाहता, यह मैं कहता जरूर हूं, लेकिन अतीत को सहेजते भी रहता हूं। वर्ष 1996 में जब दिल्ली आया तो डायरी लेखन को नियमित कर दिया। पहले भी लिखता था, लेकिन तब कुछ किंतु-परंतु उठ गये तो बंद सा किया। अब तो करीब 15 डायरियां भरी हुई रखी हैं। बाकी जारी हैं। दिल्ली आने के कुछ समय बाद मुझे लगा यह डायरी लेखन नहीं, यह तो ईश्वर से मेरा सीधा संवाद है। इसलिए जब परेशान होता हूं या खुश होता हूं तो डायरी तक खुद-ब-खुद कदम बढ़ जाते हैं। डायरी लेखन को कोई नियत समय नहीं। कभी भी, कहीं भी।

अब तक के जीवन पर नजर डालते हुए एक बात पर सचमुच आश्चर्य होता है कि मुझे मित्र बहुत अच्छे मिले हैं। कुछ बड़े भाई की तरह, कुछ छोटे भाई की तरह और कुछ जुड़वां भाई की तरह। मेरा अतीत शायद जानते हों या शायद न जानते हों, लेकिन मेरा वर्तमान तो उनके सामने ही रहा, हमेशा ही। यह अलग बात है कि कुछ ऐसे लोग भी मिले जिनसे मेरा सीधे कोई नाता नहीं, लेकिन एक अजब सी चिढ़ या कंपटीशन की भावना उन्होंने मेरे साथ रखी। कुछ को गलतफहमियां भी हुईं। उनमें से कुछ मित्रों की गलतफहमियां दूर करने का मेरा मन है, लेकिन कुछ का नहीं। उन्हें उसी अंदाज में चलते रहने देना चाहता हूं।

जरा सी बात पर मैं कहां से कहां चल दिया। वैसे मेरा मानना है कि छोटी-छोटी बातों को याद रखना चाहिए, लेकिन उन्हीं बातों को जो खुशी देती हों। जैसे परिवार संग कहीं घूमने गये तो कई बार उसकी चर्चा की। मित्रों संग घूमने गए तो कई यादें सहेज लीं, तभी तो गीत बना छोटी-छोटी बातों की है यादें बड़ी... भूलें नहीं बीती हुई एक छोटी घड़ी... लगता है कुछ ज्यादा लिख दिया है। स्वांत: सुखाय के लिए इससे ज्यादा लिखना ठीक नहीं। अपने आप को बहलाने के लिए कुछ और शेर और कॉपी पेस्ट कर देता हूं जिन्हें इंटरनेट से उठाया है जो मशहूर भी हैं-

ज़माना तो बड़े शौक से सुन रहा था, हम ही रो पड़े दास्तां कहते कहते..

 

मेरे जीवन का बस इतना फसाना है, कागज़ की हवेली है बारिश का ज़माना है..

 

कर लो एक बार याद मुझको, हिचकियां आए भी ज़माना हो गया...

तमाम बातों को याद करते हुए अंत में उसी गीत को याद करूंगा जिसके बोल हैं-ये जीवन है, इस जीवन का यही है यही है यही है रंग रूप, थोड़े गम हैं, थोड़ी खुशियां हैं...

Tuesday, July 20, 2021

खुशी, गम, उत्साह, बेचैनी और जन्मदिन पर शानदार बधाइयां

केवल तिवारी

कभी खुशी, कभी गम या दुख, कभी बेचैनी और कभी उत्साह। दिनचर्या में ऐसे ही मनोभावों से तो गुजरते हैं हम लोग। कभी खुश हम अपने कारणों से होते हैं तो कभी दूसरों के कारण भी। इसी तरह दुख का कारण भी कभी हम खुद होते हैं तो कभी कोई और होता है। वैसे तो कारणों की पड़ताल करें तो कई बातें सामने आएंगी, लेकिन वर्तमान पल को जी लेने की जो शिक्षा हमारे बड़े-बुजुर्ग देते हैं, वह है बहुत शानदार। आप कोशिश करें खुशी के पलों को भरपूर जीने की। फिर कभी उदासी में उन्हें याद करें। इसी तरह कभी आप दुख वाले पलों को याद करें फिर कारण जानें संभव हो तो उनका निदान करने की कोशिश करें। मामला 18 जुलाई का है। यानी 18 जुलाई, 2021, मेरा जन्मदिन। बधाई संदेशों का तांता लग गया। मजे की बात यह है कि मैं खुद कई बार लोगों को जन्मदिन पर बधाई नहीं दे पाता। एक तो मैं फेसबुक नहीं देख रहा, दूसरे याददाश्त की कमी है। जन्मदिन पर मैसेज तो पहली रात से ही आने लगे थे, लेकिन 18 जुलाई की सुबह से ही बधाई के लिए फोन भी आने लगे। हमारे पूर्व समाचार संपादक हरेश वशिष्ठ जी का फोन सबसे पहले आया। फिर ट्रिब्यून से ही रिटायर वरिष्ठ पत्रकार कमलेश भारतीय जी का। इसके बाद बैंकिंग क्षेत्र के शीर्ष पदाधिकारी एवं यूनियन में सक्रिय अश्विनी राणा जी का। ऑफिस आया तो संपादक जी ने आशीर्वाद दिया। फिर वरिष्ठ पत्रकार रास बिहारी जी का फोन आया। ऐसे ही अनेक मित्रों, अनुजों के फोन आये। कमलेश भारतीय जी ने उम्र पूछी तो मैंने कहा कि 50 के करीब पहुंच गया हूं। उन्होंने बड़े सहज भाव से कहा, यानी 10 साल और दैनिक ट्रिब्यून की सेवा करनी है। उनकी ये blessing अच्छी लगी। उस दिन मैंने सुबह और शाम दोनों टाइम डायरी लिखी। ब्लॉग भी लिखने का मन था, लेकिन समय नहीं मिल पाया। शाम को डॉ चंद्र त्रिखा जी का मैसेज भी आया, उन्होंने आशीर्वाद दिया। उनके चैनल से भी कई जानकारियां मिलती हैं। birthday के बाद आज (मंगलवार 20 जुलाई, 2021) भी सुबह से ठानी थी कि ब्लॉग लिखूंगा। फिर मंगलवार का व्रत। सुबह पूजा-पाठ का लंबा कार्यक्रम चला। दोपहर को जब ऑफिस के लिए निकला तो मन उदास हो गया। मेरी गाड़ी के windscreen पर किसी ने पत्थर मारा था। पहला शक तो बच्चों पर ही जा रहा है जो कॉलोनी के बाहर की तरह बने घर की छत पर खेलते रहते हैं। करीब महीने भर पहले ही मैंने शीशा बदलवाया था। मारुति के सर्विस सेंटर से। बाकी तो बीमा क्लेम हो गया, लेकिन करीब डेढ़ हजार फिर भी लगे। दिनभर काम में व्यस्त रहा। ऑफिस आकर भी मूड खराब सा ही रहा। फिर सोचा, अब उदासी से क्या होगा। कुछ solution ढूंढ़ना होगा। शीशा तो  बदलना ही होगा, लेकिन उससे बड़ा झंझट सारे स्टीकर फिर से बनवाने का है। शाम होते-होते जब काम तो थोड़ा फारिग हुआ तो ब्लॉग लिखने बैठ गया। दिनभर इस मसले ने उदास ही करके रखा। असल में एक तो हम जैसे lower middle class वालों के लिए कार लेना भी घर लेने जैसा ही है, तिस पर इस तरह के खर्च और झंझट अंदर तक तोड़ देते हैं। दो दिन बाद ही कार से अंबाला जाना है। खैर चलिए क्या कर सकते हैं। इस बार का जन्मदिन बधाइयों के मामले में खास रहा। आज के समय में जहां अनेक लोग तोलमोल के बधाई देते हैं या नफा-नुकसान का अंदाजा लगाकर मैसेज या फोन करते हैं, उस दौर में बेहद आत्मीयता से मुझे बधाइयां मिलीं, मैं गदगद हुआ। अब इस नये संकट से भी उबर ही जाऊंगा। शाम को जब हमारे यहां से ही रिटायर हुए और Tribune Society Complex में मेरे पड़ोसी गणेश जी से बात हुई तो मन थोड़ा हल्का हुआ। जीवन के विविध आयाम हैं, चलते रहिए।

Friday, July 16, 2021

छोटी-छोटी बातों की यादें बड़ी

 ऑफिस के लिए तैयार हो चुका था। बेटे कार्तिक के पास फोन आया। वह बोला मैं बाहर आ रहा हूं। मेरी छठी इंद्रिय सक्रिय हो गयी। क्या मंगाया है? पूछा तो भावना बोली पता नहीं। छोटा बेटा धवल, जो ऑनलाइन क्लास ले रहा था, बोला मास्क मंगाये हैं। आपके ऑफिस जाने के लिए। पहले जो मंगाये थे, वे कम पड़ गये हैं। भावना, धवल बात कर भी रहे थे और मंद-मंद मुस्कुरा भी रहे थे। मैं ऑफिस के लिए तैयार तो हो गया था, बस जूते पहनने बाकी थे। जूते जिन्हें कई दिनों से धोने की योजना बन रही है। भावना कई बार कह चुकी है कि गंदे हो गये हैं, लेकिन धो देंगे तो सूखेंगे नहीं। कार चलाने में मुझे पता नहीं क्यों ये लाइटवेट जूते ही कंफर्ट लगते हैं। एक जोड़ी और भी जूते हैं जो हैवी हैं, उन्हें गाड़ी चलाते वक्त पहनता हूं तो अटपटा लगता है। खैर...। भावना बोली पांच मिनट रुक जाओ। तभी कार्तिक यानी कुक्कू एक पैकेट लेकर आ गया। बेहद उत्साहित। ये क्या हैं? फिर मैंने सवाल किया। फिर खुद ही जवाब भी दिया, लग रहा है जूते हैं। ओह... समझा। मेरे लिए गिफ्ट। दो दिन बाद मेरा जन्मदिन जो आ रहा था। यानी 18 जुलाई। इस 18 जुलाई को 49 सालों का हो जाऊंगा। यानी अर्धशतक से एक साल पीछे। अरे क्यों मंगाये। मैंने कपड़े दिए तो हैं सिलाने के लिए, मेरा सवाल था, पूरे परिवार से। ये कपड़े सिलवाने की जिद भी भावना की ही थी। कपड़े गिफ्टेड थे, बस उन्हें सिलवाना था। गिफ्ट का पैकेट आया और मैंने जूते कहा तो पैकेट को खोलने की तैयारी हो गयी। उसी वक्त धवल दौड़कर आया और पैकेट लाकर छिपाने लग गया, बोला नहीं आपके बर्थडे के दिन खोलेंगे। तभी देखना इसमें क्या है। कुक्कू बोला, पापा को पता लग गया है। भावना ने भी कहा, अब खोलकर पहन ही लो। धवल नाराज हो गया। मैं कहने लगा अरे बच्चे की जिद मान लेते। खैर... जूते खोले गये। बहुत शानदार। रंग भी बहुत शानदार। हल्के। मैंने पहन लिए। धवल की थोड़ी नाराजगी से परेशान हुआ, लेकिन उसकी नाराजगी का भी एक अलग मजा था। कुछ समय पहले वह मेरे से लिपटालिपटी कर रहा था। परिवार की यही खुशी तो अनमोल खजाना है। मैं कार चलाते वक्त भावुक हो गया। भावुकता में शायद थोड़ा सुबक भी गया। मुझे पहले वह गीत आया जिसके बोल हैं छोटी-छोटी बातों की है यादें बड़ी, भूलें नहीं बीती हुई एक छोटी घड़ी। सोचता रहा। सचमुच ये बातें कितनी अनूठी होती हैं। गिफ्ट छोटा या बड़ा नहीं होता। मैं कितना खुश हो जाता था जब धवल और कुक्कू मुझे कागज पर हैप्पी बर्थडे पापा लिखकर देते थे। ऐसे ही जब मैं लखनऊ में ट्यूशन पढ़ाता था तो कई बच्चे मुझे न्यू ईयर कार्ड बनाकर देते थे। गिफ्ट परंपरा को मैं बहुत अच्छा नहीं मानता। लेकिन परिवार के बीच खुशियों के इस तरह के पल मुझे भावुक कर जाते हैं। मैं आज सुबह से तमाम बातें याद कर रहा था। हरेला के दौरान मुझे बचपन, फिर जवानी और अब बची-खुची जावानी याद आ रही थी। इसी दौरान मुझे याद आया एक शेर जिसके बोल हैं-

इस प्यारी सी दुनिया में एक छोटा सा मेरा परिवार है,
खुशियां मुझे इतनी मिलती है जैसे रोज कोई त्योहार है।

सचमुच त्योहार ही तो था यह। आज तो वैसे भी हरेला पर्व था। सुबह उसकी खुशी भी की सेलिब्रेट। हरेला काटा। एक दूसरे के सिर पर रखा। आशीर्वाद दिया। मंदिर गये। बच्चों के लिए कुछ पकवान बने। हम सबने खाये। फिर भावना को डॉक्टर के यहां ले गया क्योंकि उसके मुंह में कुछ छाले हो रहे थे। वहां डॉक्टर ने मेरा शुगर चेक कराया। डॉ कमल बहुत केयरिंग हैं। वह अक्सर मेरा हालचाल लेते हैं। शुगर आज 187 आया। अमूमन मेरा शुगर 220 या 230 आता है। मैंने लाइफ स्टाइल में बहुत बदलाव किया है। इस बदलाव में और शुगर लेवल कम करने में परिवार का पूरा हाथ है। असल में मीठे की यह बीमारी खत्म भी होती है मीठे से ही यानी घर में वातावरण अच्छा है, तनाव नहीं है तो बीमारी खत्म। बीमारी बढ़ने का कारण भी परिवार ही हो सकता है, लेकिन इतना विस्तार में क्या जाना। इस वक्त तो चार पंक्तियां और याद आ रही हैं जिसमें कवि ने कहा है-

मुसीबत में खड़ा जो साथ बन दीवार होता है, हमारा हौसला हिम्मत वही परिवार होता है,
बड़े मजबूत दुनिया में लहू के रिश्ते होते हैं, कहां सबके नसीबों में लिखा ये प्यार होता है।

थैंक्स धवल, थैंक्स कुक्कू और थैंक्स भावना।

Monday, July 12, 2021

‘ट्रेजडी किंग’ ने महसूस किया हर रंग



स्मृति शेष : दिलीप कुमार

साभार : दैनिक ट्रिब्यून

केवल तिवारी

रील लाइफ में ज्यादातर त्रासद-दुखद अभिनय के कारण ट्रेजडी किंग के नाम से मशहूर हुए दिलीप कुमार निजी जीवन में हर रंग से रू-ब-रू हुए। वह भरपूर जीवन जी गये। बीच के थोड़े से समय को छोड़ दें तो उनका जीवन बेहतरीन रहा। उन्हें मोहब्बत हुई, उन्होंने शोहरत की बुलंदियों को छुआ, मुफलिसी का दौर भी झेला, राजनीति के मंच पर चमके, परिवार की जिम्मेदारियों को भी निभाया। 25 साल की उम्र में बतौर अभिनेता अपनी पहचान बना चुके दिलीप साहब ने 54 साल के फिल्मी कॅरिअर में लगभग इतनी ही फिल्में कीं, जबकि उनके अभिनय से बहुत कुछ सीखने वाले कई दिग्गज अभिनेताओं ने अपने करिअर में फिल्मों का शतक लगाया और उससे आगे भी गये। अकसर यह सवाल उठता है कि दिलीप साहब जैसे महान अभिनेता ने कम फिल्में ही क्यों कीं, इस पर स्वयं एक बार उन्होंने एक कार्यक्रम में कहा था कि वह संख्या बढ़ाने पर विश्वास नहीं रखते। फिल्में ऐसी हों जो समाज को कोई संदेश दे। यहां उल्लेखनीय है कि दिलीप साहब ने स्वयं कई फिल्मों में अभिनय करने से इनकार कर दिया। वर्ष 1998 में बनी फिल्म किला के बाद उन्होंने किसी फिल्म में काम नहीं किया। उन्होंने 1961 में ‘गंगा-जमुना’ फिल्म का निर्माण भी किया, जिसमें उनके साथ उनके छोटे भाई नासिर खान ने काम किया। उनकी चर्चित फिल्में हैं-

सुपर-डुपर हिट :
जुगनू, मेला, अंदाज, आन, दीदार, आजाद, मुगल-ए-आजम, कोहिनूर, गंगा-जमुना, राम और श्याम, गोपी, क्रांति, विधाता, कर्मा और सौदागर।
 
सुपर हिट :
शहीद, नदिया के पार, आरजू, जोगन, अनोखा प्यार, शबनम, तराना, बाबुल, दाग, उड़न खटोला, इंसानियत, देवदास, मधुमती, यहूदी, पैगाम, लीडर, आदमी, संघर्ष।

हास्य अभिनय :
शबनम, आजाद, कोहिनूर, लीडर, राम और श्याम, गोपी।

दबंग भूमिका :
आन, आजाद, कोहिनूर, क्रांति।

नेगेटिव रोल :
फुटपाथ, अमर।

अधूरी रहीं फिल्में :
काला आदमी, जानवर, खरा-खोटा, चाणक्य-चंद्रगुप्त, आखिरी मुगल।

अभिनय से किया इनकार :
बैजू बावरा, प्यासा, कागज के फूल, संगम, दिल दौलत और दुनिया, नया दिन नयी रात, जबरदस्त, लॉरेंस ऑफ अरेबिया, द बैंक मैनेजर।

बनने गये थे लेखक, बन गये एक्टर

इसे समय का फेर कहिये या किस्मत का करिश्मा कि मुफलिसी के दौर में दिलीप कुमार बनने तो गये थे लेखक, लेकिन बन गये एक्टर। किस्सा कुछ इस तरह से है। पिता के व्यवसाय में घाटा हो जाने के कारण उनको कॉलेज की पढ़ाई अधूरी छोड़नी पड़ी। उन्होंने पुणे के फौजी कैंटीन में मामूली नौकरी कर ली और फलों का व्यवसाय भी जारी रखा। मुंबई में यूसुफ अपने पिता के व्यवसाय को फिर से बढ़ाने की सोच ही रहे थे कि अब्बा ने उन्हें राय-मशविरे के लिए पारिवारिक मित्र डॉ. मसानी के पास भेजा। डॉ. मसानी को पता था कि यूसुफ की उर्दू अच्छी है और साहित्य में भी उनकी रुचि है, इसलिए उन्होंने उन्हें देविका रानी से मिलने की सलाह दी जो उन दिनों बॉम्बे टॉकीज का संचालन कर रही थीं। बॉम्बे टॉकीज उन दिनों प्रसिद्ध फिल्म निर्माण संस्था थी। यूसुफ ने देविका रानी से भेंट की और लेखक के रूप में काम मांगा। यूसुफ को देखकर उन्होंने उन्हें एक हजार रुपए प्रतिमाह पर अभिनेता के रूप में नियुक्ति दे दी। देविका रानी ने ही उन्हें अपना फिल्मी नाम दिलीप कुमार रखने की सलाह दी थी।

शुरू में घरवालों से छिपायी एक्टिंग

यूसुफ खान से दिलीप कुमार बने इस नये अभिनेता ने बॉम्बे टॉकीज में काम शुरू करने की बात अपने अब्बा को नहीं बतायी। अब्बा की फिल्मी लोगों के बारे में अच्छी राय नहीं थी। इसीलिये दिलीप कुमार ने घरवालों से झूठ बोला। उन्होंने अपने घर पर बताया कि वे ग्लैक्सो कंपनी में काम करने लगे हैं। अब्बा खुश हुए और फरमान सुनाया कि रोज ग्लैक्सो कंपनी के बिस्किट घर में लाना। क्योंकि द्वितीय विश्वयुद्ध की वजह से खाद्यान्न का बड़ी किल्लत थी और परिवार भी बड़ा था। इससे दिलीप कुमार एक नयी मुसीबत में फंस गए। ऐसे में कॉलेज का एक मित्र काम आया, जो शहर में जहां भी ग्लैक्सो बिस्किट मिलते दिलीप तक पहुंचा देता। एक दिन राजकपूर के दादा दीवान बशेशरनाथ ने इसका भंडाफोड़ कर दिया। कुछ समय नाराज रहने के बाद अब्बा ने यूसुफ को माफ कर दिया। दिलीप कुमार की फिल्म ‘शहीद’ उन्होंने परिवार के साथ देखी और फिल्म उन्हें पसंद आई। फिल्म का अंत देखकर उनकी आंखों में आंसू आ गए थे और उन्होंने यूसुफ से कहा था कि आगे से अंत में मौत देने वाली फिल्में मत करना। यह भी अजीब इत्तेफाक है कि ‘ट्रेजडी किंग’ कहे जाने वाले दिलीप कुमार ने फिल्मों में जितने मृत्यु दृश्य किए हैं, उतने शायद किसी अन्य भारतीय अभिनेता ने नहीं दिए। फिल्म फेयर अवार्ड में रिकॉर्ड बनाने वाले दिलीप कुमार को वर्ष 1995 में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 1991 में उन्हें भारत सरकार ने पद्मभूषण की उपाधि से नवाजा। 1998 मे उन्हें पाकिस्तान का सर्वोच्च नागरिक सम्मान निशान-ए-इम्तियाज़ भी प्रदान किया गया।

मोहब्बत भी हुई

दिलीप कुमार अपने जमाने के नंबर वन हीरो थे। व्यक्तित्व आकर्षक था। स्वभाव रोमांटिक। मीना कुमारी और नरगिस से दिलीप कुमार के दोस्ताना ताल्लुकात थे। वैजयंतीमाला और वहीदा रहमान के साथ भी फिल्मों में उनकी भागीदारी अच्छी निभी, लेकिन उनके करीबी जानकारों के हवाले से कहा जाता है कि दो अभिनेत्रियों से दिलीप कुमार ने सचमुच प्यार किया। वे थीं कामिनी कौशल और मधुबाला। 1948 और 50 के बीच दिलीप-कामिनी ने चार फिल्मों में साथ काम किया था। कामिनी कौशल ब्याहता थीं। उनका वास्तविक नाम उमा कश्यप था। बड़ी बहन की असामयिक मृत्यु के कारण दीदी की छोटी बच्चियों की खातिर जीजा से विवाह करके मुंबई आ गई थीं। पति बन चुके जीजा ने कामिनी को फिल्मों में काम करने की आजादी दे रखी थी। सामाजिक ताना-बाना उस वक्त का ऐसा था कि दिलीप साहब और उमा ने अपने प्रेम को दबाया और जरा सी भनक लगने का अहसास हुआ तो कई सालों तक एक दूसरे के सामने भी नहीं पड़े। मधुबाला-दिलीप कुमार ने एक साथ सिर्फ चार फिल्में की। इनमें ‘मुगल-ए-आजम’ (1960) उनकी अंतिम फिल्म है, जिसे लोग इन दोनों की प्रेम कहानी के रूप में ही देखना पसंद करते हैं। दिलीप कुमार के जीवन में प्रेम संबंधों के कई नाटकीय मोड़ आये।

11 दिसंबर, 1922 को पेशावर (अब पाकिस्तान में) में जन्मे दिलीप साहब (यूसुफ खान) ने अभिनेत्री सायरा बानो से 1966 मे विवाह किया। विवाह के समय दिलीप कुमार 44 वर्ष के और सायरा बानो उनसे आधी उम्र की थीं। 1980 में उन्होंने असमा रहमान नाम की एक युवती से दूसरी शादी भी की, हालांकि यह ज्यादा नहीं चली।

46 साल बाद अमिताभ को मिला ऑटोग्राफ

यह बात शायद सबको अटपटी लगे कि उस दौर के बड़े अभिनेता का ऑटोग्राफ अमिताभ नहीं ले पाये थे। दिलीप कुमार का ऑटोग्राफ लेने के लिए अमिताभ को 46 बरस तक लंबा इंतजार करना पड़ा था। यह बात अमिताभ ने खुद अपने ब्लॉग पर लिखी है। बिग बी ने दिलीप साहब को पहली बार 1960 में देखा था। तब वह अपने पिता के साथ मुंबई गए थे। अमिताभ ने लिखा है कि उस समय साउथ बांबे के एक प्रसिद्ध रेस्तरां में वह अपने परिवार के साथ खानपान में जुटे थे कि उस समय के सुपर स्टार दिलीप साहब अंदर आए और अपने कुछ मित्रों से बात करने लगे। अमिताभ, दिलीप कुमार का ऑटोग्राफ लेने के लिए इतने उतावले थे कि रेस्तरां से निकले और भागकर पास की एक स्टेशनरी की दुकान से ऑटोग्राफ बुक खरीद लाये। हांफते हुए वह रेस्तरां के अंदर घुसे और डरते हुए दिलीप साहब के पास पहुंचे। ऑटोग्राफ लेने के लिए बुक उनकी ओर बढ़ा दी। दिलीप साहब की नजर इस बच्चे पर नहीं पड़ी। ब्लॉग में अमिताभ लिखते हैं कि कुछ ही समय बाद दिलीप साहब वहां से चले गये, उन्हें ऑटोग्राफ नहीं मिल पाया। धीरे-धीरे समय गुजरता गया। अमिताभ हिंदी सिनेमा के नए सुपरस्टार बन गए। इस बीच अमिताभ को दिलीप साहब के साथ एक फिल्म में काम करने का मौका मिला। रेस्तरां की घटना के बाद अमिताभ ने दिल्ली में तीन मूर्ति भवन में दिलीप साहब को देखा जहां तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कलाकारों के सम्मान में पार्टी दी थी। उस समय बच्चन परिवार के नेहरू परिवार से बेहद घनिष्ठ संबंध थे और बच्चन परिवार को भी आमंत्रित किया गया था। यहां अमिताभ ने राज कपूर, देव आनंद तथा दिलीप साहब को एक साथ पहली बार देखा था। अमिताभ लिखते हैं कि समय बीत गया। 2006 में वडाला के आईमैक्स में उनकी फिल्म ‘ब्लैक’ का प्रीमियर था। फिल्म समाप्ति के बाद बाहर इंतजार कर रहे दिलीप साहब के पास अमिताभ गये। उन्होंने अमिताभ के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए। दोनों में से किसी ने कुछ नहीं कहा। अमिताभ लिखते हैं, ‘उसके दो दिन बाद मुझे दिलीप साहब का एक खत मिला, जिसमें मेरी एक्िटंग की तारीफ की हुई थी। इसी खत में नीचे दिलीप कुमार के दस्तखत थे।’

राजनीति से हुआ मोहभंग

भले दिलीप साहब लंबे समय तक कांग्रेस की ओर से राज्यसभा सांसद रहे, लेकिन राजनीति में उन्होंने लंबी दिलचस्पी नहीं दिखायी। यह अलग बात है कि उन्होंने कई बार नेताओं का प्रचार किया। इस सबके बावजूद जवाहरलाल नेहरू, शाहनवाज खान, मौलाना आजाद और फखरुद्दीन अली अहमद से उनके अच्छे रिश्ते रहे। सन 1980 में दिलीप कुमार को मुंबई का शेरिफ नियुक्त किया गया।

Sunday, June 20, 2021

पापा तो पापा हैं...

 



साभार : दैनिक ट्रिब्यून

बाहर से धीर गंभीर और सख्त। अंदर से बेहद मुलायम। ऐसे ही तो होते हैं ना पापा। कभी-कभी बच्चों के साथ बच्चे बन जाते, कभी डांट देते। कभी कड़वा बोलते, कभी बातों से शहद टपकाते। कभी जीवन का फलसफा समझाते और कभी अपने अनुभव से ‘जनरेशन गैप’ को भरते। कभी टीचर बनते, कभी दोस्त। कितना कुछ तो करते। कितने तो रूप धरते, लेकिन हर रूप में सबसे अहम, पिता का पिता बने रहना। किसी के लिए बापू, किसी के पापा दि ग्रेट, किसी के अब्बू जान और किसी के डैडी। फादर्स डे पर हर पिता को बधाई।


केवल तिवारी

दफ्तर से घर लौटता हूं तो बच्चों की मुस्कान सारी थकान दूर कर देती है, ऐसा कई बार आपने भी कहा होगा। अपने साथियों से भी सुना होगा। असल में ऐसी बात वो सब करते हैं जो बच्चों के साथ घुलमिलकर कभी अपना बचपन याद करते हैं तो कभी बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए उनको पढ़ाने में मशगूल रहते हैं। लेकिन इधर, दो सालों से तो सारा सिस्टम ही बिगड़ा हुआ है। ज्यादातर लोगों के लिए घर ही दफ्तर बना हुआ है और घर में बच्चों का कोहराम मचा हुआ है। बच्चे हैं तो हो-हल्ला होगा ही और बाहर की दुनिया ‘बंद’ है तो इसका मतलब यह थोड़े है कि भावनाओं का समुंदर भी हिलोरे नहीं मारेगा। अब इस विवाद में क्या पड़ना कि पिता के लिए कोई एक दिन नहीं होता या माता का कोई एक दिन नहीं होता। यह बिल्कुल सत्य वचन है कि माता-पिता का कोई एक दिन हो ही नहीं सकता, उनका साथ तो हमारी एक-एक सांस की तरह है। लेकिन अगर किसी एक दिन को विशेष तौर पर मनाते हैं तो उत्सव का माहौल तो बनता ही है। जब उत्सव सरीखा माहौल बने, जज्बात उमड़ें तो उस दिन को क्यों न उल्लासपूर्वक मनाया जाये। एक त्योहार की तरह। ऐसा ही हो रहा है। फादर्स डे के लिए भी तैयारियां चलीं। जिनके बच्चे छोटे हैं, वे पिता के लिए कार्ड बना रहे हैं, उनके लिए अच्छे संदेश बना रहे हैं। गाना गा रहे हैं, केक काट रहे हैं। जिनके बच्चे बड़े हैं, वे अपने तरीके से पिता से प्यार का इजहार कर रहे हैं और जिनके बच्चे दूर हैं वे पिता के लिए या तो ऑनलाइन गिफ्ट भेज रहे हैं या फिर पुरानी यादों को ताजा कर रहे हैं। इसलिए किसी भी खास दिन को मनाने से उत्सवधर्मिता तो बनती ही है। फिर यह तो ‘फादर्स डे’ है। पिता के प्रति प्यार जताने का दिन। जाहिर है पिता की भूमिका हमारे जीवन के हर पहलू के साथ बंधी है। बच्चे पिता की दिनभर की थकान को छूमंतर कर देते हैं, वही जब बड़े होते हैं तो ‘बहुत हो गया पापा, अब आप अपने लिए भी तो जीओ’, कहकर सारी खुशियां दे देते हैं। किसी भी बच्चे के लिए दुनिया में सबसे बेहतरीन व्यक्ति उसके पापा होते हैं और किसी भी व्यक्ति के लिए अनुभवों का खान भी उसके पिता ही होते हैं। छोटे हैं तो मजा आता है पिता के बचपन की बातें सुनने में, बड़े होते हैं तो उन्हीं बातों को अन्य लोगों के साथ साझा करने का आनंद ही कुछ और है, जिसकी शुरुआत ही होती है इस वाक्य से, ‘मेरे पापा कहते हैं...।’



बच्चों में खुद को देखता पिता

हिन्दी फिल्म अधिकार का गीत है-‘सूरज से किरणों का रिश्ता, सीप से मोती का। तेरा मेरा वो रिश्ता जो आंख से ज्योति का।’ सचमुच यही अटूट रिश्ता तो है बच्चों का पिता से। कभी मां शिकायत करती ये गुड़िया भी तुम्हारी तरह जिद्दी हो रही है। कभी परिवार का कोई सदस्य कहता ‘लड़का पूरी तरह अपने बाप पर गया है।’ कभी गुस्सा, कभी मनुहार, कभी नाराजगी और कभी प्यार। सचमुच ऐसे ही भाव तो होते हैं जब पिता और बच्चे आपस में घुल-मिल जाते हैं। पिता को भले ही उलाहनाएं मिलती हों, लेकिन असल में वह बच्चों में अपना ही बचपन देखता है। उक्त गीत की अगली पंक्तियों की मानिंद, जिसके बोल हैं-‘तू ही खिलौना, तू ही साथी तू ही यार मेरा, एक ये चेहरा, ये दो बाहें ये संसार मेरा। खुद को भी देखा है तुझमें तू मेरा दर्पण।’ अनेक लोग हैं जो इस बात को जाहिर करते हैं कि मैं अपने बच्चे में अपना बचपन देख रहा हूं। कुछ मन ही मन उन हरकतों को देखकर खुश होते हैं। कभी-कभी तो पिता जब सख्त बनकर बच्चों को डांटते हैं तो दादा-दादी की डांट उस पिता को ही पड़ने लगती है जिसमें बुजुर्ग कहते हैं, ‘भूल गया अपने दिनों को, कितना तंग करता था।’ पिता भले कुछ कहे नहीं, लेकिन वह बच्चों में खुद का बचपन देखकर गदगद तो हो ही जाता है।

पिता पर सवालों की झड़ी

‘फादर्स डे’ के दिन बेशक संदेशों का आदान-प्रदान होता हो, लेकिन सच तो यही है कि बदले वक्त में बच्चे पिता से सवाल दर सवाल दागते हैं। अनेक पिता होते हैं जो हंसते हुए कहते हैं, ‘हमारे जमाने में मजाल जो हम बाबूजी से कुछ पूछ लें। वह बहुत डांटते थे।’ डांटना-फटकारना तो पैरेंटिंग का हिस्सा है, लेकिन अब रूप थोड़ा बदल गया है। बच्चे शायद ज्यादा ‘स्मार्ट’ हो गये हैं। पिता शायद थोड़ा बदल गये हैं। लेकिन सच तो यही है कि पिता पर सवालों की झड़ी हमेशा से लगती आई है। सवाल उनके बचपन के दौर को लेकर, सवाल उनके जीवन संघर्ष के संबंध में, सवाल उनके स्वास्थ्य को लेकर, सवाल उनके खान-पान को लेकर, सवाल उनकी रुटीन लाइफ को लेकर और कई बार सवालों का भावुक ‘द एंड’ होता है जब बेटा कहता है, ‘पापा बहुत कर लिया संघर्ष, अब एंजॉय करो।’ बच्चे के ऐसे बोल सुनकर पिता को लगता है उसे सारे जहां की खुशियां मिल गयी हैं। बेटी हो या बेटा, अपने पिता के लिए हर कोई चिंतित रहता है। एक दौर में उन्हें पिता की गंभीरता का कारण समझ में आ जाता है। इसी समझ के दौर में वह अपने पिता को बच्चे की तरह ‘ट्रीट’ करने लगते हैं। पिता और संतान का यह रिश्ता होता अनूठा है। इसीलिए तो मां को धरती तो पिता को आकाश यानी छत्रछाया करने वाला बताया गया है।



इंटरनेट पर तैरते भावुक संदेश

जब मौका जश्न मनाने का है तो जाहिर है एक से बढ़कर एक सोशल मीडिया संदेश बनेंगे। आज तो इंटरनेट का संसार पिता के दिल जैसा ही व्यापक है। विस्तार लिए हुए। बेटा अगर सात समुंदर पार भी है तो पलभर में संदेश आ जाता है। हर दिन आते हैं प्यारभरे संदेश, लेकिन ‘फादर्स डे’ के लिए बने संदेशों की बात ही कुछ और है। ऐसे ही कुछ संदेश इंटरनेट की दुनिया में तैर रहे हैं। जैसे-‘मुझे रख दिया छांव में खुद जलते रहे धूप में, मैंने देखा है ऐसा एक फरिश्ता अपने पिता के रूप में।’- हैप्पी फादर्स डे। ऐसा ही एक अन्य संदेश है-‘अपने पापा को आज मैं क्या उपहार दूं, तोहफे दूं फूलों के या गुलाबों का हार दूं, मेरी जिंदगी में हैं वो सबसे प्यारे, उन पर तो मैं अपनी जान निसार दूं।’- हैप्पी फादर्स डे। एक अन्य भावुक संदेश है-‘संसार के सबसे भारी शब्द जिम्मेदारी को साक्षात देखें तो वह कैसा दिखेगा... पिता जैसा। पापा आप महान हो।’ – फादर्स डे की बधाई। एक अन्य संदेश है-‘मेरे खुदा तेरा शुक्रिया, मेरे खुदा तेरा करम, मेरे पापा की मोहब्बत सबसे बड़ी... यही दुआ कि रहे उस पर सदा तेरी रहम।’ एक और संदेश है- ‘दुनिया में केवल पिता ही एक ऐसा इंसान है जो चाहता है कि मेरे बच्चे मुझसे भी ज्यादा कामयाब हों। पापा तुस्सी ग्रेट हो।’ – हैप्पी फादर्स डे। एक संदेश के अल्फाज इस तरह से हैं- ‘पिता के बिना जिंदगी वीरान होती है, तन्हा सफर में हर राह सुनसान होती है। जिंदगी में पिता का होना बेहद जरूरी है, पिता गर साथ हो तो हर राह आसान होती है।’ – फादर्स डे मुबारक। एक और सुंदर संदेश है- मेरा साहस, मेरी इज्जत, मेरा सम्मान है पिता। मेरी ताकत, मेरी पूंजी, मेरी पहचान है पिता।’ – पापा लव यू।

कितनों ने खो दिया अपने पिता को

संसार चक्र में व्यक्ति अपना जीवन जीकर चला भी जाता है, लेकिन कोरोना महामारी ने अनेक लोगों को असमय ही छीन लिया। यूं तो अनेक लोग हैं जो अपने स्वर्गीय पिता को याद करते हैं। बच्चों के साथ उनकी यादों को साझा करते हैं। पिता का साया उठना तो निश्चित रूप से बेहद दुखदायी है, लेकिन भरपूर जीवन जीकर जाने पर मन को समझाया जा सकता है, पर महामारी के कारण आज अनेक बच्चों के सिर से पिता का साया उठ गया है। आइये इस मौके पर उनके भविष्य के लिए दुआ करें। उनकी यादों को भी साझा करें। जितना संभव हो मदद के लिए हाथ बढ़ायें। साथ ही कोशिश करें कि जब तक महामारी पूरी तरह खत्म नहीं होती, तब तक स्वास्थ्य संबंधी सुरक्षात्मक नियमों का पालन करें।


एक बिटिया की परिकल्पना थी फादर्स डे

यूं तो ‘फादर्स डे’ मनाने की शुरुआत को लेकर अब भी मतभेद हैं। खास तिथि पर ऐतराज करने वाले कहते हैं कि ‘पितृ दिवस’ उतना ही पुराना है जितना मानव इतिहास। बेशक बच्चों के प्रति पिता का प्यार और पिता के प्रति बच्चों के प्यार का कोई इतिहास या भूगोल नहीं हो सकता, लेकिन एक निश्चित तिथि के संबंध में अलग-अलग मत हैं। वैसे आज जिस रूप में हम ‘फादर्स डे’ मनाते हैं वह एक बिटिया की परिकल्पना थी। पिता ने जिस तरह उस बच्ची की परवरिश की, उसने मदर्स डे की तरह फादर्स डे मनाने के लिए अभियान छेड़ा। उसका अभियान रंग लाया और आज फादर्स डे दुनियाभर में मनाया जाता है। उस कहानी पर बात करने से पहले बात करते हैं निश्चित तिथि पर मतभेद के संबंध में। असल में कुछ इतिहासकारों का कहना है कि ‘फादर्स डे’ पहली बार 1908 में वर्जीनिया में मनाया गया था। वैसे इसका कोई प्रामाणिक आधार नहीं है, लेकिन प्रचलित कहानी के मुताबिक अमेरिका के वर्जीनिया राज्य में पहली बार 5 जुलाई, 1908 को उन 361 पुरुषों की याद में फादर्स डे मनाया गया था जिनकी मृत्यु एक कोयला खदान विस्फोट में दिसंबर 1907 में हुई थी। वैसे फादर्स डे मनाने की आधिकारिक मान्यता एक बिटिया के अभियान को मिली। इस संबंध में इतिहासकार कहते हैं कि सबसे पहले 19 जून, 1910 को ‘फादर्स डे’ मनाया गया। इससे पहले मदर्स डे की शुरुआत हो चुकी थी, इसलिए फादर्स डे को भी शुरू करने की परिकल्पना हुई। अब बात करते हैं उस बिटिया की जिसकी परिकल्पना थी फादर्स डे मनाने की। वह बच्ची अमेरिका की थी। निवास था वाशिंगटन के स्पोकेन शहर में। बच्ची का नाम था सोनोरा डॉड। असल में जब सोनोरा छोटी थी तो उसकी मां का निधन हो गया। उस समय सोनोरा डॉड के पिता विलियम स्मार्ट, जिन्होंने गृहयुद्ध के दौरान अपने देश के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया था, ने बच्चों की परवरिश की। उन्होंने सोनोरा और उसके अन्य भाई-बहनों की परवरिश दिलोजान से की। यानी विलियम स्मार्ट ने सोनोरा और अपने अन्य बच्चों को मां की कमी कभी खलने नहीं दी। बाद में विलियम का निधन हो गया। जब सोनोरा बड़ी हुई, तो उसने ‘मदर्स डे’ की तरह ‘फादर्स डे’ मनाने पर बल दिया। सोनोरा चाहती थीं कि उनकी पिता की पुण्यतिथि को फादर्स डे के तौर पर मनाया जाये। उन्हीं दिनों सोनोरा ने पिता के सम्मान में ‘फादर्स डे’ पहली बार मनाया। कहा जाता है कि सबसे पहला फादर्स डे 19 जून 1910 को मनाया गया। मां की तरह ही पिता के लिए खास दिवस मनाने के प्रस्ताव को वर्ष 1916 में अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन ने स्वीकृति दी। बाद में 1924 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति कैल्विन ने फादर्स डे को आधिकारिक मंजूरी दे दी। उसके बाद वर्ष 1966 में राष्ट्रपति लिंडन जानसन ने इसे जून महीने के तीसरे रविवार को मनाने की सहमति दी। वर्ष 1972 में राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने पहली बार इस दिन को नियमित अवकाश के रूप में घोषित किया। उस समय से हर साल यह जून महीने के तीसरे रविवार को मनाया जाता है। अन्य खास दिनों की तरह ही यह उत्सव भी धीरे-धीरे पूरे संसार में मनाया जाने लगा। भारत में तो अनेक स्कूल छोटे बच्चों की प्रतियोगिताएं भी कराते हैं। चूंकि यह समय स्कूलों में छुट्टियों का होता है, इसलिए होलीडे होमवर्क में फादर्स डे पर कविता लिखने या ग्रीटिंग कार्ड बनाने का काम दिया जाता है। आज के दौर में चल रहे ऑनलाइन कक्षाओं के दौरान यह पर्व बच्चों और उनके अभिभावकों के साथ लाइव मनाया जा रहा है। इंटरनेट के जरिये अलग-अलग प्लेटफॉर्म से जुड़कर बच्चे इसकी तैयारी करते हैं। पिता के लिए कुछ खास करने के इस काम में माताएं पूरा सहयोग करती हैं।

पापा तो पापा हैं... https://m.dainiktribuneonline.com/news/features/papa-is-papa-50149



Wednesday, June 2, 2021

कहानी : उसे कहां आना था

केवल तिवारी

मिथिलेश अपनी बेटी श्यामली को बार-बार पुकार रही थी। उठ जा, देख पापा आ गये हैं। श्यामली बड़ी खुश। सचमुच आश्चर्य हो गया। वह दौड़कर छोटी बहन लक्ष्मी के कमरे में गयी फिर अपने दोनों भाइयों को पुकारने लगी। परिवार के सभी लोग खुशी के मारे नाचने से लगे। उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था कि उनके पापा रोहन कुमार वापस आ गये, वह भी दूसरे लोक से। कोरोना महामारी ने सचमुच ऐसा खौफ बना दिया था कि न जाने कितनों के अपने चले गये। कितनों की दुनिया उजड़ गयी। कुछ ठीक होकर लौटे भी तो बेहद कमजोर और किसी को दूसरी बीमारी ने आ घेरा।

रोहन कुमार के साथ भी तो ऐसा ही हुआ। परिवार के अन्य लोगों के साथ ही उसे कोरोना हुआ। कोरोना किसके कारण आया, किसी को पता नहीं, लेकिन हुआ सबको। एक परिवार, एक घर। क्या करें। किसी तरह सुरक्षा उपायों के साथ घर के जरूरी काम कर रहे थे। बड़ी बिल्डिंग थी, उसमें कई फ्लैटों में लोगों को कोरोना हुआ था। इस महामारी की सबसे त्रासद स्थिति यह थी कि कोई हालचाल पूछने भी नहीं आता था। रोहन का परिवार अच्छी तरह से जानता है कि कुछ साल पहले जब वे लोग सरकारी मकान में रहते थे तो कैसे जरा सी बीमारी में भी आसपास के अनेक लोग हालचाल पूछने चले आते थे। कभी-कभी तो लगता था कि इतने लोग क्यों आ रहे हैं? फिर अपनापन देखकर अच्छा भी तो लगता। बीमारी ही नहीं, घर में और भी कोई काम होता था तो पता ही नहीं चलता था कि काम कैसे निभ गया। और आज देखो, इस बीमारी में कोई आ भी नहीं सकता। कितनी पीड़ादायक स्थिति है यह। कोई आ नहीं सकता। किसी का कोई परिजन मर जाये तो उसे कांधा देने कोई नहीं आ रहा। शहरों की कई कालोनियों में तो पार्थिव शरीर, जिसे आजकल बस डेड बॉडी कहा जा रहा है, को भी लाने की मनाही थी। कुछ दिन पहले मोहित के पिता की मौत हुई थी, मौत उम्र जनित थी। प्राकृतिक थी, लेकिन कालोनी की गाइडलाइन के मुताबिक डेड बॉडी को गेट के अंदर नहीं लाने दिया गया। आखिरकार दो-चार परिजन जाकर अंतिम संस्कार करके लौटे। वहां तो यह था कि मोहित के पिता पूरी उम्र गुजारकर और सब अच्छा देखकर गये हैं, इसलिए गम जैसी वैसी स्थिति नहीं थी, जैसी रोहन कुमार के मामले में। मोहित को पिता के जाने का दुख तो था, जाहिर है पिता का साया उठता है तो दुखों का पहाड़ टूटता है, लेकिन 90 की उम्र में जाना कोई बुरी बात भी नहीं। मोहित को बस दुख था तो इस बात का कि ऐसे समय पिता की मौत हुई जब लोग भी इकट्ठा नहीं हो पाये। चार साल पहले उसकी माताजी का जब निधन हुआ था तो सारे नाते-रिश्तेदार आ गये थे। करीब दो सौ लोग माता जी की अंतिम यात्रा में शामिल हुए थे। खैर, क्या कर सकते हैं। मौत ही तो इंसान के हाथ में नहीं है। लेकिन आज जो मौतें हो रही हैं उसमें सिस्टम का नाकरापन तो साफ झलक ही रहा है। किसी को ऑक्सीजन नहीं मिली तो दम घुटकर मर गया। किसी को ब्लैक में दवा खरीदनी पड़ रही है। कहीं अस्पताल में बेड नहीं तो बंदा एंबुलेंस में ही मर गया। कैसी-कैसी सूचनाएं आ रही हैं। रोहन कुमार का भी ऑक्सीजन लेवल कम हुआ तो फैसला हुआ कि अस्पताल ले जाना पड़ेगा। हालांकि कुछ अपने ही लोगों से फोन पर बात की गयी तो, कुछ ने कहा कि नहीं घर पर ही इलाज करो। अस्पताल तो इन दिनों यमलोक बने हुए हैं। लेकिन जब ऑक्सीजन लेवल कम होगा, कोई तड़पने लगेगा तो क्या होगा, हर कोई अस्पताल की ओर ही भागेगा। ऐसा ही हुआ रोहन के मामले में। हर कोई सोच यही रहा था कि बंदा हिम्मती है। दो-चार दिन अस्पताल में डॉक्टरों की निगरानी में रहेगा तो कोरोना को मात देकर लौट आएगा। लेकिन कौन जानता था कि कोरोना को मात तो नहीं, मौत को जरूर गले लगा लेगा। यही हुआ। वही दुखद खबर आई। पूरे परिवार पर वज्रपात। दूर-दराज बैठे जो लोग दुआ कर रहे थे, सब सन्न। जो डॉक्टरी मदद में जुटे थे वे भी अवाक। ये क्या हुआ? बाप रे कोराना इतना खौफनाक। रोहन भी मर सकता है। चारें ओर रोना-धोना, लेकिन सामने कोई नहीं। गनीमत है आसपास कुछ परिजन थे। मामला वही, पार्थिव शरीर यानी डेड बॉडी तो घर ले ही नहीं जा सकते। सबको अस्पताल ले जाया गया। अंतिम दर्शन कराया गया। और हो गया अंतिम संस्कार।

आज इतने दिनों बाद रोहन को सामने देखकर मिथिलेश का खुश होना तो लाजिमी था। परिवारवालों को बताया तो सब खुश। पापा आ गये। मिथिलेश ने रोहन को गले लगा लिया। बेहद कमजोर। थका-हारा। उसने सोफे पर बिठाया। पानी लाऊं क्या? रोहन कुछ बोलते क्यों नहीं। अच्छा बीमारी के कारण कमजोरी आ गयी। वह एकटक उसकी तरफ देख रही है। बच्चों की खुशी का तो ठिकाना ही नहीं था। क्या फोन करके सबको बता दें। नहीं, अभी थोड़ा रुक जाते हैं। मिथिलेश फिर बात करने को हुई। तुम सचमुच आ गये हो। जानते हो मुझपर कैसा पहाड़ टूट पड़ा था। रोहन अब बोला, हां जानता हूं, लेकिन मौत ही तो सत्य है, यह बात तुमको भी समझनी चाहिए। हां सत्य है मौत, जिंदगी झूठी है, लेकिन मौत का भी तो कोई समय होता है। कोई समय नहीं होता, मौत का। चलो छोड़ो ये मौत-वौत की बात। अब पानी पी लो, मैं भी पीऊंगी, अभी तक तो जैसे आसूं ही पी रही थी। .... मम्मी-मम्मी...। तीन-चार बार मम्मी-मम्मी सुनकर मिथिलेश चौंकी। आंखें उठाईं। सामने पंडित जी तेरहवीं की रस्म पूरी कर रहे थे। बच्चों के चेहरे पर वही मायूसी थी। रोहन कुमार को तिलांजलि देने के लिए अब पत्नी यानी मिथिलेश कुमारी का नंबर था, पंडित जी बुला रहे थे। मिथिलेश की रोते-रोते आंख लग गयी। अब सबने पुकारा तो उसने आंखें खोली, उठी और अंजुली में पानी भर लिया। पंडित जी ने मंत्र पढ़ा और पानी को विसर्जित करने के लिए कहा। मिथिलेश रस्म भी पूरी कर रही थी और चारों ओर देख भी रही थी। रोहन कुमार तो अब ऐसे ही सपने में आएगा। ऐसे उसे कहां आना था। तेरहवीं भी हो गयी। क्रूर कोरोना के दौर में परिजन भी दूर से ही शोक मना रहे थे। आपस में नेक नीयत वाले रोहन की चर्चाएं हो रही थीं।


Friday, May 14, 2021

बिपिन ने कहा तो मन से आवाज आई...चलो अब वक्त संग चलते हैं...

 केवल तिवारी

एक पखवाड़ा बीत गया बिपिन को इस संसार से विदा लिए हुए। दो-तीन दिन पहले उसका पीपल पानी हो जाता, लेकिन गांव में हमारी एक भाभी भी इस बीच गुजर गयीं, कुछ परंपरा का निर्वहन करते हुए बिपिन संबंधी रस्म 12 दिन के लिए टल गयी। शनिवार 8 मई को बिपिन का दसवां था। ऑनलाइन जुड़कर हम सबने उसे तिलांजलि दी। इस बीच, अनेक लोगों के फोन भी आये। धीरे-धीरे लोग अन्य बातें भी करने लगे। मैं सोचता था अभी लोग अन्य बातें क्यों कर रहे हैं? कैसे कर ले रहे हैं, लेकिन अन्य बातें तो होंगी ही। अब तो यूं ही वक्त गुजरेगा। दिनों के बाद महीने और साल निकल जाएगा। लेकिन मैं जैसे ही बिपिन के नाम से पहले स्वर्गीय शब्द जोड़ रहा हूं, पूरे शरीर में एक कंपन सी हो रही है। क्या बिपिन स्वर्गीय हो गया? ऐसा क्यों हुआ? तमाम सवालों के बाद फिर वही उत्तर कि उसका समय आ गया। आज सुबह डायरी लिखने बैठा तो जैसे लगा कि बिपिन कह रहा है, ‘चाचाजी आप सामान्य जीवन शुरू करो। यूं ही चलता है जीवन। कोई जल्दी चला जाता है कोई पूरा वक्त बिताने के बाद। मेरा वक्त हो गया था, मैं चला गया।’ मन में बिपिन की ऐसी बातें सुनकर भी मुझे अजीब लगा। ये क्या, बिपिन थोड़े बोल रहा है, ये तो मेरा स्वार्थ है, मुझे अब सामान्य हो चलना है इसलिए बिपिन का नाम ले रहा हूं। जब ईजा का निधन हुआ था, तब भी यही हाल था। शुरुआती दिनों में मैं बिल्कुल नहीं रोया। जब वसुंधरा लौट आया तो फिर रोना शुरू हुआ। फिर कई दिनों तक यह दौर चला। उसकी निशानियां जहां-जहां थीं, वहां-वहां देखकर, बैठकर रोया। उस दौर में बिपिन ने कितना साथ दिया था। पहले तो वह और हरीश कार लेकर वसुंधरा आये, फिर मुझे लखनऊ लेकर गये। बाद में जब मैं वापस वसुंधरा आया तो बिपिन से एक दिन मुलाकात हुई। मुझे थोड़ा रोना आ गया। उसने एक कहानी सुनायी। कहानी इस तरह थी कि एक बुजुर्ग महिला का निधन हो जाता है। लंबे समय बात उस महिला का बेटा भी स्वर्गवासी हो जाता है। वह स्वर्ग में देखता है कि कई जानकार ईश्वर भक्ति में लीन हैं। कुछ पुनर्जन्म पा चुके हैं लेकिन उसकी मां कंधे पर घड़ा ले जा रही है, एक जगह उसका पानी गिराती है फिर घड़ा भरता है वह फिर लेकर जाती है। महिला का बेटा व्याकुल। वह भगवान से प्रार्थना करता है और पूछता है प्रभु यह क्या है? मेरी माताजी को कैसा दंड दिया जा रहा है। भगवान कहते हैं जा तुझे एक वरदान दे सकता हूं, तू खुद ही सीधे बात कर सकता है। बेटा इस बात से तो खुश होता है कि उसकी मां से सीधे-सीधे बात हो जाएगी, लेकिन माता जी को घड़ेभर पानी बार-बार ढोते देख वह दुखी भी था। वह मां के पास गया और पूछा मां, सब तर गये, लेकिन आपको यह सजा क्यों? मां बोली बेटा मैं भरापूरा परिवार देखकर आई थी, सबका अच्छा देखकर आई थी। जब मेरा स्वर्गवास हुआ तो कुछ दिन तक तो सभी रोते हैं, लेकिन तू उम्रभर मेरे लिए रोता रहा। तेरे जैसे और भी परिजन रोते रहे। इतने आसूं निकले सब लोगों के लिए मुझे उन्हीं आसुंओं का घड़ा भर-भरकर ढोना पड़ रहा है। बेटे ने प्रभु से प्रार्थना की, भगवान अब तो मैं भी स्वर्गवासी हो चुका हूं, मेरी मां को मुक्ति दो। भगवान ने तथास्तु कहकर उसकी इच्छा पूर्ति कर दी।

इस कहानी के बाद बिपिन ने कहा कि अम्मा की यादें हम सबके साथ हैं, लेकिन बात-बात पर रोना अच्छा नहीं। उसके बाद मैंने मां को समर्पित कितनी चीजें लिखीं। अब बिपिन तेरे लिए मैं बहुत कम रोऊंगा। हां कुछ चीजों से मन उचाट सा हो गया है, धीरे-धीरे रमाने की कोशिश कर रहा हूं। ईजा को गुजरने के बाद धीरे-धीरे वक्त बीता और मां को भगवान मान लिया। मां तो यूं भी भगवान होती है, लेकिन अब वह अदृश्य भगवान बन चुकी थी। यह अलग बात है कि बार-बार बच्चे कहते हैं अम्मा क्या बनाती थी, कैसे चलती थी। ज्यादातर सवाल छोटे बेटे के होते हैं। बड़े बेटे को तो उसकी कई बातें याद हैं। लेकिन जब मैंने आज बिपिन के रूप में मेरे दिल से आयी आवाज में अपना स्वार्थ देखा तो फिर जैसे आवाज आई, ‘चाचाजी आपने नहाने के बाद के मंत्र पाठ बंद से क्यों किए हैं, ऑफिस में कुछ देर की प्रार्थना को बंद क्यों कर रखा है, सब जारी कर दो।’ असल में मैं सुबह वॉक करते वक्त कुछ जाप करता रहता हूं, ताकि मन का भटकाव न हो और वॉक होती रहे। इसी तरह ऑफिस में भी 15-20 मिनट का समय निकालकर चलते-चलते कुछ जाप कर लेता हूं। जब से बिपिन की बीमारी की खबर आई थी मैंने जाप को बढ़ा दिया था, लेकिन बिपिन जब चला गया तो हर चीज से मन उचट सा गया। आज दोपहर तो वह मेरे ऑफिस के सामने कुर्सी पर बैठा दिखाई दिया। बोला, ‘चाचाजी रुटीन शुरू करो।’ पता नहीं मेरा स्वार्थ है, बिपिन से अति लगाव का नतीजा है या कुछ और लेकिन मैं अब धीरे-धीरे सामान्य हो रहा हूं। व्हाट्सएप पर लोगों को जवाब दे रहा हूं। कुछ पढ़ने-लिखने लगा हूं। कोशिश शुरू हो गयी है कि सामान्य जीवन जीने की ओर बढ़ूं। बिपिन को याद करता चलूं। बातों-बातों और सोचने की प्रक्रिया में दो कविताएं मन से फूट पड़ीं-

एक-

एक खबर का आना

बिपिन का यूं चले जाना

रोना, धोना और शांत हो जाना

इस खामोशी में कुछ सिसक रहा है

मेरा दिल शायद रो रहा है

आसूं को तो पूरे जोर से मैंने दबाया है

पर दिल है कि सुबक रहा है

बार-बार तू याद आ रहा है

वक्त भरेगा घावों को, ऐसा सब कहते हैं

मजबूत कर मन को चलो अब वक्त संग चलते हैं।

 

दो-

इस हरियाली में आज उदासी सी है

इन राहों में आज वीरानी सी है

बोलते लबों पर खामोशी सी है

बदरी छाने पर जो होती थी गुदगुदी

अब तो सारा मंजर यूं मानो बेखुदी

कदम बढ़ाएं तो मनों बोझ सा लगे

ना बढ़ाएं तो अफसोस सा होने लगे

समय तो पूरा करता ओ अनंत यात्रा पर जाने वाले

या हमें खूब तंग कर जाता लौट के न आने वाले

कम से कम तुझे बुरा कहकर मन को मना लेते

तू तो हाथ भी जोड़ गया यूं जाते-जाते

वो ढेर सारी बातें, वो पहले से तय मुलाकातें

वो सुगम जीवन के लिए सीखी हुई आदतें

सफर पर चलने के वे दिन वे रातें

अब सब बस रह गयी हैं यादें

हम उन यादों को सहेजेंगे

तुम्हारे संग बीते पलों को कुरेदेंगे

बाहर सन सन हवा चल रही है

भीतर-भीतर कुछ दुवा सी उठ रही है

तू इस ब्रह्मांड में जहां भी है

हम सबको देखते रहना

ईश्वर का अंग बने ओ फरिश्ते

तेरी यादों के सहारे ही अब है जीना

.........................

धूनी मंदिर में मेरे साथ बिपिन : यादें शेष
 

 


Monday, May 3, 2021

मोह करो, मोह में उलझो नहीं... बिपिन तेरा संदेश सुनाई पड़ रहा है

 

केवल तिवारी

सोचता था शायद अब लिखना-पढ़ना बंद सा हो जाएगा। जिस डायरी के पन्नों में इन दिनों कुछ दिल की लिखता हूं, या यूं कहें कि ईश्वर से संवाद करता हूं, उस डायरी को भी फरवरी में बिपिन ने ही मुझे दिया था। डायरी हालांकि 2019 की थी, बिपिन का कहना था कि चाचा आप तो रोज डायरी लिखते हो, ये रख लो। पूरी खाली है। मैंने बैग में डाल ली थी डायरी। अभी कुछ दिन पूर्व से ही उसमें लिखना शुरू किया था, क्या पता था कि अब उसमें बिपिन का जिक्र आएगा तो वह सिर्फ यादों में ही होगा। आज 03 मई, 2021 को बिपिन को गुजरे हुए चार दिन हो गये हैं। कैसा अजीब लग रहा है, उसके लिए यह लिखना कि बिपिन को गुजरे हुए या स्वर्गवासी हुए। ज्यादा नहीं तो 15 साल और रह जाता, लेकिन ये तो सब मन की इच्छाएं हैं कि काश ऐसा होता, होता तो वही है जो होना होता है। वही हुआ। बिपिन चला गया। बिपिन के जाने की खबर से स्तब्ध हो गया। सोचा कि अब क्या डायरी लिखूंगा, अब क्या ब्लॉग लिखूंगा। शायद सबकुछ बंद हो जाएगा। पर सबकुछ बंद कहां होता है? सब तो चलता रहता है। सब चल ही रहा है। इस चलने के बीच लग रहा है कि जैसे बिपिन कहीं से गाइड कर रहा है। आगामी शनिवार को यानी 9 मई को बिपिन का दसवां है। मैंने योजना बनाई थी कि सुबह 4 बजे निकलूंगा और 10-11 बजे तक वसुंधरा पहुंच जाऊंगा। तिलांजलि देकर लौट आऊंगा। लेकिन अभी कल ही नितिन से बात हुई। बोला, बड़बाज्यू आप प्लीज मत आना। पापा तो चले गये। परिवार का एक अहम सदस्य चला गया, अब कोई बीमार हो गया तो पूरा परिवार हिल जाएगा। आप वहीं से श्रद्धांजलि देना। नितिन की बातों से ऐसा लगा जैसे उसे बिपिन गाइड कर रहा है। उसके साथ करीब 10 मिनट बातें हुईं। उसने दिल्ली के हालात भी बताए। अपनी व्यथा भी बताई। उसके साथ बातचीत में लगा कि बिपिन कहीं से कुछ कह रहा है। बिपिन अब तुम पूजनीय हो गये हो। ईश्वरीय शक्ति हो गये हो। परिवार पर आशीर्वाद बनाये रखना। आज तुम्हारे नाम पर मैं एक गीत सुनता रहा, जिंदगी के सफर में गुजर जाते हैं जो मुकाम वो फिर नहीं आते। वाकई तुम्हारी पल-पल की यादें आती रहेंगी। आ रही हैं। साथ ही याद आ रहा है तुम्हारी वह बात जो तुम मुझसे कई मौकों पर कहते थे। तुक कहते थे चाचाजी मोह तो करो, प्रेम भी करो, लेकिन मोह में उलझो मत। उसे जीवन पथ का अनिवार्य हिस्सा मानते हुए उसे उस मंत्र के सही अर्थ की तरह समझो जो ऊं त्रयंबकम यजामहे, सुगंधिम पुष्टि वर्धनम, उर्वारुकमिव बंधनामृत्योमुक्षी मामृतात में कहा गया है। अर्थात जिस तरह खरबूज कब जड़ से अलग हो गया पता नहीं चलता है, लेकिन उसकी खुशबू, उसके गुण बरकरार रहते हैं, उसी तरह जीवन-मरण के इस चक्र में अपने कर्त्तव्यपथ पर बढ़ते रहो और ऐसे बढ़ो कि आपकी अच्छाइयों को याद किया जाये। आज तुम्हें सब याद ही तो कर रहे हैं। नहीं तो क्या मतलब था कि मेरे ससुराल वाले रो रहे हैं। मेरे कई मित्र तुम्हारी खबर सुनकर स्तब्ध हैं। मुझे सांत्वना दे रहे हैं। यही सब तो तुम्हारी अच्छाइयां हैं। खैर कोई बात नहीं बिपिन डायरी लेखन मेरा ईश्वर से सीधा संवाद है, अब तुम भी उस संवाद का हिस्सा हो। ब्लॉग में भी तुम मेरे साथ बात करते रहोगे। चलते रहेंगे दोस्त। दुनिया भी चलती रहेगी। लगता है तुम कहीं शिखर पर बैठे हो। उस शिखर की याद कर तुम्हारी बनाई हुई एक और वीडिया यहां साझा कर रहा हूं। ऊं शांति।




Friday, April 30, 2021

ये क्या किया बिपिन... वादे तोड़ गया... खुश रहना मेरे दोस्त, सारे गमों से दूर रहना



केवल तिवारी

ये क्या किया बिपिन। क्या होगा उन सपनों का जो मैंने तुम्हारे साथ भविष्य के लिए देखे थे। पता है सुबह से इस वीडियो के दसियों बार देख चुका हूं। तू पूछ रहा है, चाचा कहां हो, ऊपर पहुंच गये। मैं कहां पहुंचा ऊपर, तू पहुंच गया। वहां पहुंच गया जहां मैं तुझे देख नहीं सकता, तुझे छू नहीं सकता। अभी तो बस रो रहा हूं। मैं रो रहा हूं, भावना रो रही है और बच्चे रो रहे हैं। कुक्कू ज्यादा भावुक होकर रो रहा है। बिपिन तू हर बात पे कहता था, अरे चाचाजी आपके भतीजे काहे के लिए हैं। क्या तू जवाब दे सकता है इस बात का कि इसीलिए है ये भतीजा कि चाचा बनकर चला गया। माना कि मुझसे बड़ा था, लेकिन इतना बड़ा थोड़े था कि ऐसे ही चला जाएगा। तीन दिन पहले वीडियो कॉल में तूने थम्स अप किया था और कहा था कि जल्दी मिलेंगे। अब कब मिलेंगे। इतने भले लोगों के साथ ऐसा क्यों होता है। सुबह-सुबह दीपू बिटिया का फोन आया। बड़बाज्यू पापा चले गये। मैं जोर से चिल्लाया, क्या कह रही हो। फिर पता नहीं कैसे मुंह से निकला, खुद को संभालो। बोली क्या संभालें बड़बाज्यू पापा चले गये। मैं अवाक। बोली कार्डियेक अटैक आ गया था। बात खत्म। फोन पटका और सिर धुनने लग गया। रह-रह कर तुम याद आ रहे थे। कभी तुम्हारी फोटो देखी, कभी तुम्हारी वीडियो। कभी तुम्हारे साथ हुई व्हाट्सएप चैट पर नजर डाली। सब रो रहे हैं। इतना अभागा हूं कि मैं तुम्हारे अंतिम संस्कार में भी नहीं जा पा रहा हूं। बाद में प्रकाश का भी फोन आया। उसने कहा बिपिन भाई चला गया। मैं रो रहा था, उसे लगा शायद मैं समझा नहीं, बोला, बिपिन भाई चला गया। मैं रोता ही रहा। बोला बाद में फोन करूंगा। फिर तो कई लोगों के फोन आये। कुछ मैंने उठाये, कुछ भावना को पकड़ा दिये। सोचने लगा क्या अब कभी गांव जा पाऊंगा। वो गांव अब तुम्हारे बिना कैसा लगेगा? क्या कभी वसुंधरा जा पाऊंगा। वो वसुंधरा अब तुम्हारे बिना कैसा लगेगा?

बार-बार सोच रहा हूं, क्या मेरी प्रार्थना में कोई कमी रह गयी थी। घर ग्वेल देवता के नाम उच्याण रखा था। सुबह-शाम तुम्हारे नाम की पूजा कर रहा था। कल साईं मंदिर और बाबा बालकनाथ मंदिर गया था। भगवान ने कई मुश्किल दौर से मुझे निकाला है। सब याद है बिपिन कैसे कहते थे, चाचा जी चिंता मत करो हम हैं ना। कभी जब बताता था कि नौकरी पर संकट है तो कैसे तुमने कहा था, परेशान मत होओ, रोज देवी कवच पढ़ा करो। मैं रोज देवी कवच पढ़ता था। जब मुश्किल हालात में पिछले साल मेरा कांट्रेक्ट रिन्यू हुआ तो तुमने कितनी खुशी व्यक्त की थी। कार लेकर तुम्हारे पास आया तो तुमने खुश होकर मेरे मित्रों को पार्टी दी थी। क्या-क्या याद करूं। जब बीना और बच्चों के बारे में सोच रहा हूं तो मन कांप उठ रहा है। घर के किसी कोने में तुम्हारे कपड़े टंगे होंगे। कहीं तुम्हारी चप्पलें होंगी। कहीं डायरी होगी और वह पूजाघर जिसमें ना जाने बच्चों ने कितनी बार प्रार्थनाएं की होंगी। काल का ऐसा कुचक्र चल रहा है कि असमय ही लोगों को उठा ले रहा है।

लेकिन बिपिन तू मरा नहीं है। इसलिए तुझे श्रद्धांजलि भी दूं तो कैसे। कैसे कहूं कि भगवान तुम्हारी आत्मा को शांति दे। तू तो पुण्यात्मा था। पूरे परिवार को एक करने वाला। तुझे मिलना होगा जल्दी बिपिन। हमारे ही बीच कहीं आकर या फिर मुझे बुलाकर। पूरे परिवार, समाज के लिए इतना नेक काम करने वाला कहीं न कहीं ईश्वर के किसी नेक काम में इस वक्त लग गया होगा। बिपिन तू हमारे दिलों में जिंदा है और जिंदा रहेगा। वहीं से तेरी आवाज आती रहेगी तब तक जब तक हम भी परमात्मा में विलीन नहीं हो जाते। एक-एक बातें याद आ रही हैं। आसूं आ रहे हैं। लिखते-लिखते लग रहा था तुझसे बात कर रहा हूं। बात ही तो कर रहा हूं। अब क्या? कभी सपने में आना, कभी क्या अक्सर ही आ जाना। थोड़ी बातें कर लिया करेंगे। ठीक है मेरे भतीजे... तू तो दोस्त था यार, फिर कह रहा हूं जल्दी चला गया। खुश रहना मेरे दोस्त, सारे गमों से दूर रहना।


Wednesday, April 28, 2021

अविचल पंथी के पथ में खट्टे-मीठे अहसास

 पुस्तक समीक्षा

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केवल तिवारी

आज के समय में ज्यादातर लोगों के लिए वह दिनचर्या कल्पना से भी परे है जब कोई वार्षिक परीक्षा के लिए हर सोमवार को राशन-पानी, सूखी लकड़ियां लेकर घर से दूर जाता हो, कुछ मित्रों के साथ हफ्तेभर रहकर पढ़ाई के साथ-साथ भोजन-पानी की व्यवस्था करता हो और शनिवार को फिर घर आता हो। एडवेंचर के लिए तो कोई ऐसा कर सकता है, लेकिन रुटीन में यह कितना दुष्कर है, इसे वही समझ सकता है, जिसने ऐसा झेला है।

राजनीति में पंचायत सदस्य से लेकर मुख्यमंत्री, फिर केंद्रीय मंत्री तक का सफर तय करने वाले शांता कुमार ने पूरे जीवन में कई दुश्वारियां झेलीं। कभी आर्थिक तंगी की, तो कभी राजनीतिक पैंतरेबाजी की। तमाम मुसीबतों के साथ शांत स्वभाव से जीवन पथ पर आगे चलती रहने वाली हिमाचल प्रदेश की जानी-मानी हस्ती शांता कुमार ने लेखन और अध्ययन को अपना मित्र बनाकर रखा। खुद को या आसपास किसी को दुखों से घिरा देखा तो कभी कवि हृदय से स्वर फूट पड़े, सत्ता मिली तो हर वह प्रयास किया, जिससे लोगों की तकलीफें कम हों। यह अलग बात है कि अपने दुखों को सीधे-सीधे कहीं बयां नहीं किया। सक्रिय राजनीति से दूर होने के बाद जीवन संध्या की वेला पर उन्होंने ‘निज पथ का अविचल पंथी’ नाम से आत्मकथा लिखी। बेहद सरल और सहज अंदाज में उन्होंने बचपन से लेकर अब तक (86 वर्ष की आयु) अपने जीवन के तमाम पड़ावों को सामने रखा है।

बेहद भावुक अंदाज में चित्रों के साथ आत्मकथा की शुरुआत की गयी है। पत्नी के बगैर घर को ईंट-पत्थरों की दीवार बताते हुए शांता कुमार लिखते हैं, ‘5:30 बजे अलार्म बजा। ...मैं उठा। चाय वाले कमरे में गया। चाय बनाई। सामने देखा, दो कप पड़े थे। एक मेरा और एक वह तुम्हारा प्यारा... फिर दो कप चाय बनाई। दोनों कपों में डाली... आंसू निकले... फिर ख्याल आया, वायदा किया है तुमसे कि हिम्मत से जीऊंगा।’ हर कदम शांता कुमार के साथ रहने वाली उनकी जीवनसंगिनी संतोष इस किताब को जल्दी पूरा करने के लिए कहती थीं और कुछ समय पहले दोनों का 60 बरस का साथ छूट गया।

शांता कुमार का शुरुआती जीवन ठीकठाक रहा, लेकिन पिताजी के निधन के बाद स्थिति खराब हो गयी। मां ने कैसे घर को संभाला, उसका भावपूर्ण वर्णन किताब में किया गया है। किशोरावस्था से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क में आने वाले शांता कुमार ने देशसेवा को ही अपनी जिंदगी का उद्देश्य बना लिया। इसके लिए घरवालों से झूठ तक बोला। देश और समाज के लिए समर्पित शांता कुमार मास्टरी की नौकरी महज 17 दिन में ही छोड़कर चले गये और कश्मीर के मुद्दे पर जेल भेज दिये गये। पहले फिल्म ‘मेला’ देखने जाना, फिर देशभक्ति के नारे लगाना और गिरफ्तार हो जाना। पूरे प्रकरण का उन्होंने इस तरह वर्णन किया है कि पढ़ते-पढ़ते पाठक के मन-मस्तिष्क में चलचित्र सा चलने लगता है। हिमाचल प्रदेश से दिल्ली आना, फिर यमुनापार इलाके में संघ के प्रमुख के तौर पर जिम्मेदारी संभालने का दौर बहुत रोचक और कड़े परिश्रम वाला रहा। दिल्ली प्रवास के दौरान ही एक स्वयंसेवक सोमनाथ के विवाह के बाद चाय पार्टी में अटल बिहारी वाजपेयी जी को बुलाने की जिम्मेदारी का लेखक ने रोचक चित्रण किया है। उस वक्त कार्यालय प्रमुख जगदीश चंद माथुर जी के समक्ष अटलजी ने कहा, ‘माथुर जी मुझे और आपको न तो विवाह का कोई अनुभव है और न ही होने की संभावना है। ऐसी विवाह पार्टी में हमारा क्या काम?’ बाद में अटलजी उस पार्टी में गये। संघ के लिए कामकाज के दौरान ही शांताकुमार की भेंट संतोष से हुई। लेखक लिखते हैं, ‘...हम दोनों को लगा कि हमारा यह संबंध कुछ समय का नहीं, जीवन भर का है। हमने जीवनसाथी बनने का निर्णय कर लिया।’ संघ के वरिष्ठ नेताओं से किए वादे के मुताबिक दो साल बाद शादी करना, परिवार में शुरुआती संकट और फिर धीरे-धीरे जनसंघ में सक्रिय होना और इसी दौरान राजनीति का दूसरा रूप देखना भी लेखक के लिए कभी रोचक तो कभी व्यथित करने वाला रहा। इमरजेंसी लगने के दौरान लेखक की जेल यातना दर्दभरी दास्तान है। पठनीय है। भारतीय राजनीति में जय प्रकाश नारायण का उदय फिर मृत्यु के समय उनकी व्याकुलता और लेखक का उनसे मिलना भी बहुत ही मार्मिक है।

हिमाचल प्रदेश के जनमानस तक शांता कुमार के संघर्षों और उसूलों की बात चर्चा का विषय बनना और बाद में मुख्यमंत्री पद तक पहुंचना वास्तव में अकल्पनीय-सा लगता है। सत्ता मिलने के बाद पद लोलुपों का चारों ओर से दबाव बढ़ना और इसी बीच जनहित के कड़े फैसले लेने का जिक्र लेखक ने प्रवाहमयी अंदाज में किया है। जोड़-तोड़ और गठजोड़ के आगे सिद्धांत न छोड़ने का ही परिणाम था कि शांता कुमार की कुर्सी चली गयी। वह लिखते हैं, ‘मुख्यमंत्री बनने पर हम सबने अपने आपको भुलाया नहीं था। हवा में नहीं उड़े थे। इसलिए फिर से पुराना जीवन शुरू करने में कोई भी कठिनाई नहीं हुई।’ एक राजनीतिक सहयोगी से उन्होंने कहा, ‘मैं नहीं बदला, इसमें मुझे इतना सुख मिला है जो बदलने वालों को सब कुछ प्राप्त करके भी नहीं मिलेगा। यही मेरी संपत्ति है।’ प्रदेश की बागडोर दोबारा संभालने पर शांता कुमार ने भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़े कदम उठाये और अपने कई अफसरों पर निशाना साधा। उनकी कार्यशैली पर उत्तर भारत के जाने-माने समाचारपत्र ‘ट्रिब्यून’ ने 20 दिसंबर, 1990 को अपने संपादकीय में लिखा, ‘यदि देश में राजनीतिक साहस के कार्य के लिए कोई वीरता पुरस्कार हो तो वह इस बार हि.प्र. के मुख्यमंत्री शांता कुमार को मिलना चाहिए...।’

प्रदेश से राष्ट्रीय राजनीति और उसमें अटल जी से अनेक बार प्रशंसा और बाद में कुछ दबावों के चलते अटलजी द्वारा इस्तीफा लिए जाने जैसे कुछ प्रसंग हैं, जिनसे शांता कुमार काफी व्यथित हुए। स्वामी विवेकानंद को अपना आदर्श मानने वाले शांता कुमार ने केंद्रीय मंत्रिमंडल में रहते हुए भी अनेक कड़े फैसले लिए। आंध्र प्रदेश के लिए योजनाओं के मद में 90 की जगह 190 करोड़ अनुदान पर सख्त हुए शांता कुमार तत्कालीन अध्यक्ष वेंकैया नायडू को अखर रहे थे। वह लिखते हैं, ‘राष्ट्रीय अध्यक्ष मुझसे वैसे ही नाराज थे। मैंने प्रदेश को मिलने वाला 100 करोड़ वार्षिक रोक दिया था।’ इसी संदर्भ में वह आगे लिखते हैं, ‘एक दिन सुबह अटल जी का फोन आया। कहा-मुझे दुख है परंतु तुम अब वह कागज दे ही दो। मैं समझ गया मुझसे त्यागपत्र मांगा जा रहा है।’

राजनीति के अपने अनुभवों को लिखते-लिखते भावुक शांता कुमार लिखते हैं, ‘देश की पूरी राजनीति का अवमूल्यन हो चुका है। राजनीति केवल सत्ता के लिए है, सत्य के लिए नहीं। इस अवमूल्यन में हमारी पार्टी आशा की अंतिम किरण है। यदि वह भी गलत से समझौता कर लेगी तो देश के भविष्य का क्या होगा?’ इसी संदर्भ में वह लिखते हैं, ‘मुझे सबसे बड़ा अफसोस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेताओं से है। ...वर्षों का विश्वास हिल गया। आज की बदल रही भाजपा तो बहुत आगे पहुंच गई है। मूल्य आधारित राजनीति के आदर्श के कारण जिस पार्टी को जनता ने विश्व की सबसे बड़ी पार्टी बनाया, आज वह पूरी तरह से नैतिक मूल्य नहीं, केवल और केवल सत्ता आधारित पार्टी बन गयी है। विधायकों के क्रय-विक्रय में भी उसे शामिल होते देख मेरे जैसों को तो शर्म आती है। सोचता हूं-जहां भी होंगे दीनदयाल उपाध्याय जैसे नेता आंसू ही बहाते होंगे।’ जीवन में कई उतार-चढ़ाव देख चुके शांता कुमार अपनी किताब में बॉलीवुड के दिग्गज शत्रुघ्न सिन्हा समेत अनेक लोगों से मित्रता की रोचक बातों का वर्णन करते हैं। विदेश यात्राओं का वर्णन करते हैं। और हमेशा ईश्वर को धन्यवाद देते हैं। कश्मीर से धारा 370 के हटने को साहसिक कदम बताते हुए किताब पूरी करते-करते शांता कुमार भावुक अपील करते हैं, ‘मेरे जीवन की एक ही अंतिम इच्छा है कि मेरी पार्टी भारतीय जनता पार्टी राजनीति के प्रदूषण से बचे।’

हमेशा अपने सिद्धांतों पर अडिग रहने वाले शांता कुमार सरीखे लोगों से राजनीति दल ऊंचाइयों को छूते हैं। शांता कुमार की यह आत्मकथा बहुत रोचक है। उन्होंने बेबाकी से जितना निजी पन्नों को खोला है, उतनी ही सूझबूझ से अपनी पार्टी की कमियों और अच्छाइयों को उजागर किया है। अपने जीवन में अब तक कई पुस्तकें लिख चुके शांता कुमार की यह किताब भी हर वर्ग के व्यक्ति के लिए पठनीय है।

पुस्तक : निज पथ का अविचल पंथी लेखक : शांता कुमार प्रकाशक : किताब घर प्रकाशन, नयी दिल्ली पृष्ठ : 464 मूल्य : रु.


साभार - दैनिक ट्रिब्यून



Tuesday, April 20, 2021

धीरेश ने की बात और बुजुर्गों की आई याद

आज सुबह मित्र धीरेश का फोन आया। संदर्भ था, फेसबुक पर मेरे साथ एक फोटो साझा होने की। मैंने हंसते हुए कहा कि मैं तो फेसबुक करीब दो साल से देख ही नहीं रहा हूं। वैसे इसमें थोड़ा सा झूठ शामिल था। फेसबुक पर कमेंट, लाइक या कोई पोस्ट डालना मैंने बंद कर रखा है, लेकिन ऑफिस का ऑनलाइन काम काफी देखता हूं। जैसे दैनिक ट्रिब्यून का ट्विटर हैंडल, ऑनलाइन समाचार आदि। इसी संदर्भ में कभी कबार दैनिक ट्रिब्यून के फेसबुक पेज को देखने के लिए अपने अकाउंट को पहले लॉगइन करना पड़ता है। उस दौरान कभी-कभी किसी पोस्ट पर नजर पड़ जाती है। साथ ही कुछ फ्रेंड रिक्वेस्ट भी। अगर प्रोफाइल लॉक न की हो और जानकार लग रहा/रही हो तो मैं रिक्वेस्ट को एक्सेप्ट कर लेता हूं। लेकिन कमेंट न करने, पोस्ट न डालने जैसे मसलों पर डटा हुआ हूं। खैर... बात का ट्रैक बदल गया। बेशक धीरेश ने फेसबुक पर मेरी फोटो से बात की शुरुआत की थी, लेकिन फिर उन्होंने मेरी माताजी को याद किया। मुझे बहुत अच्छा लगा। कुछ मित्र हैं जो बातों बातों में मेरी माताजी को याद कर लेते हैं। धीरेश ने कहा, ‘उनमें बहुत अपनापन था, गोरी-चिट्ठी। उनकी याद अक्सर आती है।’ मैंने जवाब दिया, ‘हां कुछ बच्चे मेरी मां को मलाई अम्मा कहते थे, लेकिन जहां तक अपनेपन की बात है यह तो उस दौर के सभी बुजुर्गों में होती थी।’ थोड़ी सहमति, असहमति के बीच मैंने मित्र धीरज ढिल्लों के पिताजी के एक किस्से को साझा किया। उन दिनों हम लोग कौशांबी के हिमगिरि अपार्टमेंट में रहते थे। मित्र सुरेंद्र पंडित हम सब लोगों को एक करने वाले थे। एक दिन धीरज के पिताजी अपने कुछ संगी-साथियों या जानकारों के साथ कौशांबी आये। नीचे गाड़ी में बाकी लोग बैठे रहे, अंकल जी नौवीं मंजिल 911 में हम लोगों से मिलने आये। मैंने कहा, ‘अंकल बैठो चाय बनाता हूं।’ उन्होंने कहा नहीं चाय नहीं पीनी है, अभी जल्दी में हूं। वह बाकी साथियों से बात करने लगे। मैंने एक बार फिर जोर देकर कहा, ‘अंकल चाय फटाफट बन जाएगी।’ अंकल जी तुरंत बोले, ‘फिर ऐसा कर 6 कप चाय बनाके फटाफट नीचे ले आ।’ मुझे उस वक्त थोड़ा अटपटा लगा। मैं चाय बनाकर ले गया। धीरज और अन्य मित्र भी मेरे साथ नीचे तक गये। बाद में मैंने इस वाकये पर विचार किया। फिर सोचा कितना अपनापन था उनका यह कहने में कि फटाफट नीचे ले आ। उन्होंने मुझे भी धीरज ही माना। इस वाकये को मैंने धीरेश के साथ जब आज मंगलवार 20 अप्रैल, 2021 को साझा किया तो हम दोनों हंस पड़े। फिर कहा कि हां वैसा अपनत्व कुछ कम हो गया। परिस्थितियां ऐसी हो गयी हैं, हम बदल गये हैं या फिर समय, कुछ पता नहीं। खैर ऐसे कई वाकये हैं। मित्र धीरज ढिल्लों की माताजी के स्नेह की झप्पी में कभी नहीं भूल पाऊंगा। बात 2008 की है। लखनऊ में मेरी माताजी का निधन हो गया था। तेरहवीं के बाद हम लोग लौटे। सुबह-सुबह ट्रेन आ गयी थी। हमारे फ्लैट की चाबी धीरज जी के यहां रखी थी। मैं, भावना और बेटा रिक्शे से उतरकर कुछ बोलते हुए आये। माताजी को अहसास हो गया कि हम आ गये हैं। उन्होंने दरवाजा खोला और सबसे पहले मुझे गले लगाया और उसी वक्त मेरी रुलाई छूट गयी। आंटी ने आसूं पोछते हुए कहा, ‘मैं हूं तेरी मां जैसी। रोना नहीं है। पहले कुछ देर यहां सुस्ताओ फिर ऊपर अपने फ्लैट पर जाना।’ आंटी के हाथ के पराठों का जिक्र तो हम घर पर अक्सर करते हैं। ऐसे ही सुरेंद्र पंडित जी के पिताजी के साथ हमारी अक्सर चर्चा होती थी। जैनेंद्र सोलंकी जी के पिताजी हों या वैभव शर्मा के पिताजी, राजेश डोबरियाल के माता-पिता हों या कोई अन्य मित्र के माता-पिता अनेक लोगों के साथ अनेक किस्से याद हैं। उनके अनुभव सुनने का लुत्फ ही कुछ और था। यहां तो उनका जिक्र है जो मित्र कौशांबी में रहते थे। इनके अलावा भी अनेक मित्रों के माता-पिता के साथ हुई बातें मेरी डायरी में दर्ज है। मसलन, बहादुरगढ़ राहुल के माता-पिताजी के साथ कई बार कई मुद्दों पर बात हुई है, दिल्ली के मनोज भल्ला, लखनऊ के भजनलाल, दिल्ली के ही अवनीश चौधरी, लोहाघाट केे श्रीनिवास ओली।नामों की सूची लंबी बनेगी। मित्र धीरेश का धन्यवाद कि पुरानी बातें फिर याद करा दीं। हर मित्र के साथ की कई बातें मेरी डायरी में दर्ज हैं। कुछ किस्सों पर हम लोग खूब हंसे भी हैं। कुछ मैंने छिपाई, कुछ बताईं। आज भी फिर कुछ पुरानी डायरियों को खंगालने लगा। बातोंबातों में धीरेश के साथ कथित बड़े साहित्यकारों, पत्रकारों और उनकी चेलागिरी पर भी चर्चा हुई। मन कर रहा था, आमने-सामने बैठकर बतियाया जाये। कुछ धीरेश पर नाराजगी जताई जाये और कुछ वह हंसहंसकर हमें चिढ़ाये। दुआ है कि जल्दी यह खौफनाक समय निकले और हम मित्रगण मिल बैठें। हम सब कुछ सुनाएं और कुछ सुनें। अंत में बता दूं कि जिस फेसबुक फोटो से चर्चा की शुरुआत हुई, वह लेखिका दीप्ति अंगरीश के साथ मेरी फोटो थी। कुछ दिन पूर्व वह चंडीगढ़ आई थीं, जाते-जाते एक फोटो खींच ली। बात खत्म करते-करते मुनव्वर राणा साहब का शेर याद आ रहे हैं जो मैं अक्सर दोहराता रहता हूं-

इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है, मां जब गुस्सा होती है तो रो देती है।