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Friday, May 14, 2021

बिपिन ने कहा तो मन से आवाज आई...चलो अब वक्त संग चलते हैं...

 केवल तिवारी

एक पखवाड़ा बीत गया बिपिन को इस संसार से विदा लिए हुए। दो-तीन दिन पहले उसका पीपल पानी हो जाता, लेकिन गांव में हमारी एक भाभी भी इस बीच गुजर गयीं, कुछ परंपरा का निर्वहन करते हुए बिपिन संबंधी रस्म 12 दिन के लिए टल गयी। शनिवार 8 मई को बिपिन का दसवां था। ऑनलाइन जुड़कर हम सबने उसे तिलांजलि दी। इस बीच, अनेक लोगों के फोन भी आये। धीरे-धीरे लोग अन्य बातें भी करने लगे। मैं सोचता था अभी लोग अन्य बातें क्यों कर रहे हैं? कैसे कर ले रहे हैं, लेकिन अन्य बातें तो होंगी ही। अब तो यूं ही वक्त गुजरेगा। दिनों के बाद महीने और साल निकल जाएगा। लेकिन मैं जैसे ही बिपिन के नाम से पहले स्वर्गीय शब्द जोड़ रहा हूं, पूरे शरीर में एक कंपन सी हो रही है। क्या बिपिन स्वर्गीय हो गया? ऐसा क्यों हुआ? तमाम सवालों के बाद फिर वही उत्तर कि उसका समय आ गया। आज सुबह डायरी लिखने बैठा तो जैसे लगा कि बिपिन कह रहा है, ‘चाचाजी आप सामान्य जीवन शुरू करो। यूं ही चलता है जीवन। कोई जल्दी चला जाता है कोई पूरा वक्त बिताने के बाद। मेरा वक्त हो गया था, मैं चला गया।’ मन में बिपिन की ऐसी बातें सुनकर भी मुझे अजीब लगा। ये क्या, बिपिन थोड़े बोल रहा है, ये तो मेरा स्वार्थ है, मुझे अब सामान्य हो चलना है इसलिए बिपिन का नाम ले रहा हूं। जब ईजा का निधन हुआ था, तब भी यही हाल था। शुरुआती दिनों में मैं बिल्कुल नहीं रोया। जब वसुंधरा लौट आया तो फिर रोना शुरू हुआ। फिर कई दिनों तक यह दौर चला। उसकी निशानियां जहां-जहां थीं, वहां-वहां देखकर, बैठकर रोया। उस दौर में बिपिन ने कितना साथ दिया था। पहले तो वह और हरीश कार लेकर वसुंधरा आये, फिर मुझे लखनऊ लेकर गये। बाद में जब मैं वापस वसुंधरा आया तो बिपिन से एक दिन मुलाकात हुई। मुझे थोड़ा रोना आ गया। उसने एक कहानी सुनायी। कहानी इस तरह थी कि एक बुजुर्ग महिला का निधन हो जाता है। लंबे समय बात उस महिला का बेटा भी स्वर्गवासी हो जाता है। वह स्वर्ग में देखता है कि कई जानकार ईश्वर भक्ति में लीन हैं। कुछ पुनर्जन्म पा चुके हैं लेकिन उसकी मां कंधे पर घड़ा ले जा रही है, एक जगह उसका पानी गिराती है फिर घड़ा भरता है वह फिर लेकर जाती है। महिला का बेटा व्याकुल। वह भगवान से प्रार्थना करता है और पूछता है प्रभु यह क्या है? मेरी माताजी को कैसा दंड दिया जा रहा है। भगवान कहते हैं जा तुझे एक वरदान दे सकता हूं, तू खुद ही सीधे बात कर सकता है। बेटा इस बात से तो खुश होता है कि उसकी मां से सीधे-सीधे बात हो जाएगी, लेकिन माता जी को घड़ेभर पानी बार-बार ढोते देख वह दुखी भी था। वह मां के पास गया और पूछा मां, सब तर गये, लेकिन आपको यह सजा क्यों? मां बोली बेटा मैं भरापूरा परिवार देखकर आई थी, सबका अच्छा देखकर आई थी। जब मेरा स्वर्गवास हुआ तो कुछ दिन तक तो सभी रोते हैं, लेकिन तू उम्रभर मेरे लिए रोता रहा। तेरे जैसे और भी परिजन रोते रहे। इतने आसूं निकले सब लोगों के लिए मुझे उन्हीं आसुंओं का घड़ा भर-भरकर ढोना पड़ रहा है। बेटे ने प्रभु से प्रार्थना की, भगवान अब तो मैं भी स्वर्गवासी हो चुका हूं, मेरी मां को मुक्ति दो। भगवान ने तथास्तु कहकर उसकी इच्छा पूर्ति कर दी।

इस कहानी के बाद बिपिन ने कहा कि अम्मा की यादें हम सबके साथ हैं, लेकिन बात-बात पर रोना अच्छा नहीं। उसके बाद मैंने मां को समर्पित कितनी चीजें लिखीं। अब बिपिन तेरे लिए मैं बहुत कम रोऊंगा। हां कुछ चीजों से मन उचाट सा हो गया है, धीरे-धीरे रमाने की कोशिश कर रहा हूं। ईजा को गुजरने के बाद धीरे-धीरे वक्त बीता और मां को भगवान मान लिया। मां तो यूं भी भगवान होती है, लेकिन अब वह अदृश्य भगवान बन चुकी थी। यह अलग बात है कि बार-बार बच्चे कहते हैं अम्मा क्या बनाती थी, कैसे चलती थी। ज्यादातर सवाल छोटे बेटे के होते हैं। बड़े बेटे को तो उसकी कई बातें याद हैं। लेकिन जब मैंने आज बिपिन के रूप में मेरे दिल से आयी आवाज में अपना स्वार्थ देखा तो फिर जैसे आवाज आई, ‘चाचाजी आपने नहाने के बाद के मंत्र पाठ बंद से क्यों किए हैं, ऑफिस में कुछ देर की प्रार्थना को बंद क्यों कर रखा है, सब जारी कर दो।’ असल में मैं सुबह वॉक करते वक्त कुछ जाप करता रहता हूं, ताकि मन का भटकाव न हो और वॉक होती रहे। इसी तरह ऑफिस में भी 15-20 मिनट का समय निकालकर चलते-चलते कुछ जाप कर लेता हूं। जब से बिपिन की बीमारी की खबर आई थी मैंने जाप को बढ़ा दिया था, लेकिन बिपिन जब चला गया तो हर चीज से मन उचट सा गया। आज दोपहर तो वह मेरे ऑफिस के सामने कुर्सी पर बैठा दिखाई दिया। बोला, ‘चाचाजी रुटीन शुरू करो।’ पता नहीं मेरा स्वार्थ है, बिपिन से अति लगाव का नतीजा है या कुछ और लेकिन मैं अब धीरे-धीरे सामान्य हो रहा हूं। व्हाट्सएप पर लोगों को जवाब दे रहा हूं। कुछ पढ़ने-लिखने लगा हूं। कोशिश शुरू हो गयी है कि सामान्य जीवन जीने की ओर बढ़ूं। बिपिन को याद करता चलूं। बातों-बातों और सोचने की प्रक्रिया में दो कविताएं मन से फूट पड़ीं-

एक-

एक खबर का आना

बिपिन का यूं चले जाना

रोना, धोना और शांत हो जाना

इस खामोशी में कुछ सिसक रहा है

मेरा दिल शायद रो रहा है

आसूं को तो पूरे जोर से मैंने दबाया है

पर दिल है कि सुबक रहा है

बार-बार तू याद आ रहा है

वक्त भरेगा घावों को, ऐसा सब कहते हैं

मजबूत कर मन को चलो अब वक्त संग चलते हैं।

 

दो-

इस हरियाली में आज उदासी सी है

इन राहों में आज वीरानी सी है

बोलते लबों पर खामोशी सी है

बदरी छाने पर जो होती थी गुदगुदी

अब तो सारा मंजर यूं मानो बेखुदी

कदम बढ़ाएं तो मनों बोझ सा लगे

ना बढ़ाएं तो अफसोस सा होने लगे

समय तो पूरा करता ओ अनंत यात्रा पर जाने वाले

या हमें खूब तंग कर जाता लौट के न आने वाले

कम से कम तुझे बुरा कहकर मन को मना लेते

तू तो हाथ भी जोड़ गया यूं जाते-जाते

वो ढेर सारी बातें, वो पहले से तय मुलाकातें

वो सुगम जीवन के लिए सीखी हुई आदतें

सफर पर चलने के वे दिन वे रातें

अब सब बस रह गयी हैं यादें

हम उन यादों को सहेजेंगे

तुम्हारे संग बीते पलों को कुरेदेंगे

बाहर सन सन हवा चल रही है

भीतर-भीतर कुछ दुवा सी उठ रही है

तू इस ब्रह्मांड में जहां भी है

हम सबको देखते रहना

ईश्वर का अंग बने ओ फरिश्ते

तेरी यादों के सहारे ही अब है जीना

.........................

धूनी मंदिर में मेरे साथ बिपिन : यादें शेष
 

 


Monday, May 3, 2021

मोह करो, मोह में उलझो नहीं... बिपिन तेरा संदेश सुनाई पड़ रहा है

 

केवल तिवारी

सोचता था शायद अब लिखना-पढ़ना बंद सा हो जाएगा। जिस डायरी के पन्नों में इन दिनों कुछ दिल की लिखता हूं, या यूं कहें कि ईश्वर से संवाद करता हूं, उस डायरी को भी फरवरी में बिपिन ने ही मुझे दिया था। डायरी हालांकि 2019 की थी, बिपिन का कहना था कि चाचा आप तो रोज डायरी लिखते हो, ये रख लो। पूरी खाली है। मैंने बैग में डाल ली थी डायरी। अभी कुछ दिन पूर्व से ही उसमें लिखना शुरू किया था, क्या पता था कि अब उसमें बिपिन का जिक्र आएगा तो वह सिर्फ यादों में ही होगा। आज 03 मई, 2021 को बिपिन को गुजरे हुए चार दिन हो गये हैं। कैसा अजीब लग रहा है, उसके लिए यह लिखना कि बिपिन को गुजरे हुए या स्वर्गवासी हुए। ज्यादा नहीं तो 15 साल और रह जाता, लेकिन ये तो सब मन की इच्छाएं हैं कि काश ऐसा होता, होता तो वही है जो होना होता है। वही हुआ। बिपिन चला गया। बिपिन के जाने की खबर से स्तब्ध हो गया। सोचा कि अब क्या डायरी लिखूंगा, अब क्या ब्लॉग लिखूंगा। शायद सबकुछ बंद हो जाएगा। पर सबकुछ बंद कहां होता है? सब तो चलता रहता है। सब चल ही रहा है। इस चलने के बीच लग रहा है कि जैसे बिपिन कहीं से गाइड कर रहा है। आगामी शनिवार को यानी 9 मई को बिपिन का दसवां है। मैंने योजना बनाई थी कि सुबह 4 बजे निकलूंगा और 10-11 बजे तक वसुंधरा पहुंच जाऊंगा। तिलांजलि देकर लौट आऊंगा। लेकिन अभी कल ही नितिन से बात हुई। बोला, बड़बाज्यू आप प्लीज मत आना। पापा तो चले गये। परिवार का एक अहम सदस्य चला गया, अब कोई बीमार हो गया तो पूरा परिवार हिल जाएगा। आप वहीं से श्रद्धांजलि देना। नितिन की बातों से ऐसा लगा जैसे उसे बिपिन गाइड कर रहा है। उसके साथ करीब 10 मिनट बातें हुईं। उसने दिल्ली के हालात भी बताए। अपनी व्यथा भी बताई। उसके साथ बातचीत में लगा कि बिपिन कहीं से कुछ कह रहा है। बिपिन अब तुम पूजनीय हो गये हो। ईश्वरीय शक्ति हो गये हो। परिवार पर आशीर्वाद बनाये रखना। आज तुम्हारे नाम पर मैं एक गीत सुनता रहा, जिंदगी के सफर में गुजर जाते हैं जो मुकाम वो फिर नहीं आते। वाकई तुम्हारी पल-पल की यादें आती रहेंगी। आ रही हैं। साथ ही याद आ रहा है तुम्हारी वह बात जो तुम मुझसे कई मौकों पर कहते थे। तुक कहते थे चाचाजी मोह तो करो, प्रेम भी करो, लेकिन मोह में उलझो मत। उसे जीवन पथ का अनिवार्य हिस्सा मानते हुए उसे उस मंत्र के सही अर्थ की तरह समझो जो ऊं त्रयंबकम यजामहे, सुगंधिम पुष्टि वर्धनम, उर्वारुकमिव बंधनामृत्योमुक्षी मामृतात में कहा गया है। अर्थात जिस तरह खरबूज कब जड़ से अलग हो गया पता नहीं चलता है, लेकिन उसकी खुशबू, उसके गुण बरकरार रहते हैं, उसी तरह जीवन-मरण के इस चक्र में अपने कर्त्तव्यपथ पर बढ़ते रहो और ऐसे बढ़ो कि आपकी अच्छाइयों को याद किया जाये। आज तुम्हें सब याद ही तो कर रहे हैं। नहीं तो क्या मतलब था कि मेरे ससुराल वाले रो रहे हैं। मेरे कई मित्र तुम्हारी खबर सुनकर स्तब्ध हैं। मुझे सांत्वना दे रहे हैं। यही सब तो तुम्हारी अच्छाइयां हैं। खैर कोई बात नहीं बिपिन डायरी लेखन मेरा ईश्वर से सीधा संवाद है, अब तुम भी उस संवाद का हिस्सा हो। ब्लॉग में भी तुम मेरे साथ बात करते रहोगे। चलते रहेंगे दोस्त। दुनिया भी चलती रहेगी। लगता है तुम कहीं शिखर पर बैठे हो। उस शिखर की याद कर तुम्हारी बनाई हुई एक और वीडिया यहां साझा कर रहा हूं। ऊं शांति।




Friday, April 30, 2021

ये क्या किया बिपिन... वादे तोड़ गया... खुश रहना मेरे दोस्त, सारे गमों से दूर रहना



केवल तिवारी

ये क्या किया बिपिन। क्या होगा उन सपनों का जो मैंने तुम्हारे साथ भविष्य के लिए देखे थे। पता है सुबह से इस वीडियो के दसियों बार देख चुका हूं। तू पूछ रहा है, चाचा कहां हो, ऊपर पहुंच गये। मैं कहां पहुंचा ऊपर, तू पहुंच गया। वहां पहुंच गया जहां मैं तुझे देख नहीं सकता, तुझे छू नहीं सकता। अभी तो बस रो रहा हूं। मैं रो रहा हूं, भावना रो रही है और बच्चे रो रहे हैं। कुक्कू ज्यादा भावुक होकर रो रहा है। बिपिन तू हर बात पे कहता था, अरे चाचाजी आपके भतीजे काहे के लिए हैं। क्या तू जवाब दे सकता है इस बात का कि इसीलिए है ये भतीजा कि चाचा बनकर चला गया। माना कि मुझसे बड़ा था, लेकिन इतना बड़ा थोड़े था कि ऐसे ही चला जाएगा। तीन दिन पहले वीडियो कॉल में तूने थम्स अप किया था और कहा था कि जल्दी मिलेंगे। अब कब मिलेंगे। इतने भले लोगों के साथ ऐसा क्यों होता है। सुबह-सुबह दीपू बिटिया का फोन आया। बड़बाज्यू पापा चले गये। मैं जोर से चिल्लाया, क्या कह रही हो। फिर पता नहीं कैसे मुंह से निकला, खुद को संभालो। बोली क्या संभालें बड़बाज्यू पापा चले गये। मैं अवाक। बोली कार्डियेक अटैक आ गया था। बात खत्म। फोन पटका और सिर धुनने लग गया। रह-रह कर तुम याद आ रहे थे। कभी तुम्हारी फोटो देखी, कभी तुम्हारी वीडियो। कभी तुम्हारे साथ हुई व्हाट्सएप चैट पर नजर डाली। सब रो रहे हैं। इतना अभागा हूं कि मैं तुम्हारे अंतिम संस्कार में भी नहीं जा पा रहा हूं। बाद में प्रकाश का भी फोन आया। उसने कहा बिपिन भाई चला गया। मैं रो रहा था, उसे लगा शायद मैं समझा नहीं, बोला, बिपिन भाई चला गया। मैं रोता ही रहा। बोला बाद में फोन करूंगा। फिर तो कई लोगों के फोन आये। कुछ मैंने उठाये, कुछ भावना को पकड़ा दिये। सोचने लगा क्या अब कभी गांव जा पाऊंगा। वो गांव अब तुम्हारे बिना कैसा लगेगा? क्या कभी वसुंधरा जा पाऊंगा। वो वसुंधरा अब तुम्हारे बिना कैसा लगेगा?

बार-बार सोच रहा हूं, क्या मेरी प्रार्थना में कोई कमी रह गयी थी। घर ग्वेल देवता के नाम उच्याण रखा था। सुबह-शाम तुम्हारे नाम की पूजा कर रहा था। कल साईं मंदिर और बाबा बालकनाथ मंदिर गया था। भगवान ने कई मुश्किल दौर से मुझे निकाला है। सब याद है बिपिन कैसे कहते थे, चाचा जी चिंता मत करो हम हैं ना। कभी जब बताता था कि नौकरी पर संकट है तो कैसे तुमने कहा था, परेशान मत होओ, रोज देवी कवच पढ़ा करो। मैं रोज देवी कवच पढ़ता था। जब मुश्किल हालात में पिछले साल मेरा कांट्रेक्ट रिन्यू हुआ तो तुमने कितनी खुशी व्यक्त की थी। कार लेकर तुम्हारे पास आया तो तुमने खुश होकर मेरे मित्रों को पार्टी दी थी। क्या-क्या याद करूं। जब बीना और बच्चों के बारे में सोच रहा हूं तो मन कांप उठ रहा है। घर के किसी कोने में तुम्हारे कपड़े टंगे होंगे। कहीं तुम्हारी चप्पलें होंगी। कहीं डायरी होगी और वह पूजाघर जिसमें ना जाने बच्चों ने कितनी बार प्रार्थनाएं की होंगी। काल का ऐसा कुचक्र चल रहा है कि असमय ही लोगों को उठा ले रहा है।

लेकिन बिपिन तू मरा नहीं है। इसलिए तुझे श्रद्धांजलि भी दूं तो कैसे। कैसे कहूं कि भगवान तुम्हारी आत्मा को शांति दे। तू तो पुण्यात्मा था। पूरे परिवार को एक करने वाला। तुझे मिलना होगा जल्दी बिपिन। हमारे ही बीच कहीं आकर या फिर मुझे बुलाकर। पूरे परिवार, समाज के लिए इतना नेक काम करने वाला कहीं न कहीं ईश्वर के किसी नेक काम में इस वक्त लग गया होगा। बिपिन तू हमारे दिलों में जिंदा है और जिंदा रहेगा। वहीं से तेरी आवाज आती रहेगी तब तक जब तक हम भी परमात्मा में विलीन नहीं हो जाते। एक-एक बातें याद आ रही हैं। आसूं आ रहे हैं। लिखते-लिखते लग रहा था तुझसे बात कर रहा हूं। बात ही तो कर रहा हूं। अब क्या? कभी सपने में आना, कभी क्या अक्सर ही आ जाना। थोड़ी बातें कर लिया करेंगे। ठीक है मेरे भतीजे... तू तो दोस्त था यार, फिर कह रहा हूं जल्दी चला गया। खुश रहना मेरे दोस्त, सारे गमों से दूर रहना।


Wednesday, April 28, 2021

अविचल पंथी के पथ में खट्टे-मीठे अहसास

 पुस्तक समीक्षा

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केवल तिवारी

आज के समय में ज्यादातर लोगों के लिए वह दिनचर्या कल्पना से भी परे है जब कोई वार्षिक परीक्षा के लिए हर सोमवार को राशन-पानी, सूखी लकड़ियां लेकर घर से दूर जाता हो, कुछ मित्रों के साथ हफ्तेभर रहकर पढ़ाई के साथ-साथ भोजन-पानी की व्यवस्था करता हो और शनिवार को फिर घर आता हो। एडवेंचर के लिए तो कोई ऐसा कर सकता है, लेकिन रुटीन में यह कितना दुष्कर है, इसे वही समझ सकता है, जिसने ऐसा झेला है।

राजनीति में पंचायत सदस्य से लेकर मुख्यमंत्री, फिर केंद्रीय मंत्री तक का सफर तय करने वाले शांता कुमार ने पूरे जीवन में कई दुश्वारियां झेलीं। कभी आर्थिक तंगी की, तो कभी राजनीतिक पैंतरेबाजी की। तमाम मुसीबतों के साथ शांत स्वभाव से जीवन पथ पर आगे चलती रहने वाली हिमाचल प्रदेश की जानी-मानी हस्ती शांता कुमार ने लेखन और अध्ययन को अपना मित्र बनाकर रखा। खुद को या आसपास किसी को दुखों से घिरा देखा तो कभी कवि हृदय से स्वर फूट पड़े, सत्ता मिली तो हर वह प्रयास किया, जिससे लोगों की तकलीफें कम हों। यह अलग बात है कि अपने दुखों को सीधे-सीधे कहीं बयां नहीं किया। सक्रिय राजनीति से दूर होने के बाद जीवन संध्या की वेला पर उन्होंने ‘निज पथ का अविचल पंथी’ नाम से आत्मकथा लिखी। बेहद सरल और सहज अंदाज में उन्होंने बचपन से लेकर अब तक (86 वर्ष की आयु) अपने जीवन के तमाम पड़ावों को सामने रखा है।

बेहद भावुक अंदाज में चित्रों के साथ आत्मकथा की शुरुआत की गयी है। पत्नी के बगैर घर को ईंट-पत्थरों की दीवार बताते हुए शांता कुमार लिखते हैं, ‘5:30 बजे अलार्म बजा। ...मैं उठा। चाय वाले कमरे में गया। चाय बनाई। सामने देखा, दो कप पड़े थे। एक मेरा और एक वह तुम्हारा प्यारा... फिर दो कप चाय बनाई। दोनों कपों में डाली... आंसू निकले... फिर ख्याल आया, वायदा किया है तुमसे कि हिम्मत से जीऊंगा।’ हर कदम शांता कुमार के साथ रहने वाली उनकी जीवनसंगिनी संतोष इस किताब को जल्दी पूरा करने के लिए कहती थीं और कुछ समय पहले दोनों का 60 बरस का साथ छूट गया।

शांता कुमार का शुरुआती जीवन ठीकठाक रहा, लेकिन पिताजी के निधन के बाद स्थिति खराब हो गयी। मां ने कैसे घर को संभाला, उसका भावपूर्ण वर्णन किताब में किया गया है। किशोरावस्था से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क में आने वाले शांता कुमार ने देशसेवा को ही अपनी जिंदगी का उद्देश्य बना लिया। इसके लिए घरवालों से झूठ तक बोला। देश और समाज के लिए समर्पित शांता कुमार मास्टरी की नौकरी महज 17 दिन में ही छोड़कर चले गये और कश्मीर के मुद्दे पर जेल भेज दिये गये। पहले फिल्म ‘मेला’ देखने जाना, फिर देशभक्ति के नारे लगाना और गिरफ्तार हो जाना। पूरे प्रकरण का उन्होंने इस तरह वर्णन किया है कि पढ़ते-पढ़ते पाठक के मन-मस्तिष्क में चलचित्र सा चलने लगता है। हिमाचल प्रदेश से दिल्ली आना, फिर यमुनापार इलाके में संघ के प्रमुख के तौर पर जिम्मेदारी संभालने का दौर बहुत रोचक और कड़े परिश्रम वाला रहा। दिल्ली प्रवास के दौरान ही एक स्वयंसेवक सोमनाथ के विवाह के बाद चाय पार्टी में अटल बिहारी वाजपेयी जी को बुलाने की जिम्मेदारी का लेखक ने रोचक चित्रण किया है। उस वक्त कार्यालय प्रमुख जगदीश चंद माथुर जी के समक्ष अटलजी ने कहा, ‘माथुर जी मुझे और आपको न तो विवाह का कोई अनुभव है और न ही होने की संभावना है। ऐसी विवाह पार्टी में हमारा क्या काम?’ बाद में अटलजी उस पार्टी में गये। संघ के लिए कामकाज के दौरान ही शांताकुमार की भेंट संतोष से हुई। लेखक लिखते हैं, ‘...हम दोनों को लगा कि हमारा यह संबंध कुछ समय का नहीं, जीवन भर का है। हमने जीवनसाथी बनने का निर्णय कर लिया।’ संघ के वरिष्ठ नेताओं से किए वादे के मुताबिक दो साल बाद शादी करना, परिवार में शुरुआती संकट और फिर धीरे-धीरे जनसंघ में सक्रिय होना और इसी दौरान राजनीति का दूसरा रूप देखना भी लेखक के लिए कभी रोचक तो कभी व्यथित करने वाला रहा। इमरजेंसी लगने के दौरान लेखक की जेल यातना दर्दभरी दास्तान है। पठनीय है। भारतीय राजनीति में जय प्रकाश नारायण का उदय फिर मृत्यु के समय उनकी व्याकुलता और लेखक का उनसे मिलना भी बहुत ही मार्मिक है।

हिमाचल प्रदेश के जनमानस तक शांता कुमार के संघर्षों और उसूलों की बात चर्चा का विषय बनना और बाद में मुख्यमंत्री पद तक पहुंचना वास्तव में अकल्पनीय-सा लगता है। सत्ता मिलने के बाद पद लोलुपों का चारों ओर से दबाव बढ़ना और इसी बीच जनहित के कड़े फैसले लेने का जिक्र लेखक ने प्रवाहमयी अंदाज में किया है। जोड़-तोड़ और गठजोड़ के आगे सिद्धांत न छोड़ने का ही परिणाम था कि शांता कुमार की कुर्सी चली गयी। वह लिखते हैं, ‘मुख्यमंत्री बनने पर हम सबने अपने आपको भुलाया नहीं था। हवा में नहीं उड़े थे। इसलिए फिर से पुराना जीवन शुरू करने में कोई भी कठिनाई नहीं हुई।’ एक राजनीतिक सहयोगी से उन्होंने कहा, ‘मैं नहीं बदला, इसमें मुझे इतना सुख मिला है जो बदलने वालों को सब कुछ प्राप्त करके भी नहीं मिलेगा। यही मेरी संपत्ति है।’ प्रदेश की बागडोर दोबारा संभालने पर शांता कुमार ने भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़े कदम उठाये और अपने कई अफसरों पर निशाना साधा। उनकी कार्यशैली पर उत्तर भारत के जाने-माने समाचारपत्र ‘ट्रिब्यून’ ने 20 दिसंबर, 1990 को अपने संपादकीय में लिखा, ‘यदि देश में राजनीतिक साहस के कार्य के लिए कोई वीरता पुरस्कार हो तो वह इस बार हि.प्र. के मुख्यमंत्री शांता कुमार को मिलना चाहिए...।’

प्रदेश से राष्ट्रीय राजनीति और उसमें अटल जी से अनेक बार प्रशंसा और बाद में कुछ दबावों के चलते अटलजी द्वारा इस्तीफा लिए जाने जैसे कुछ प्रसंग हैं, जिनसे शांता कुमार काफी व्यथित हुए। स्वामी विवेकानंद को अपना आदर्श मानने वाले शांता कुमार ने केंद्रीय मंत्रिमंडल में रहते हुए भी अनेक कड़े फैसले लिए। आंध्र प्रदेश के लिए योजनाओं के मद में 90 की जगह 190 करोड़ अनुदान पर सख्त हुए शांता कुमार तत्कालीन अध्यक्ष वेंकैया नायडू को अखर रहे थे। वह लिखते हैं, ‘राष्ट्रीय अध्यक्ष मुझसे वैसे ही नाराज थे। मैंने प्रदेश को मिलने वाला 100 करोड़ वार्षिक रोक दिया था।’ इसी संदर्भ में वह आगे लिखते हैं, ‘एक दिन सुबह अटल जी का फोन आया। कहा-मुझे दुख है परंतु तुम अब वह कागज दे ही दो। मैं समझ गया मुझसे त्यागपत्र मांगा जा रहा है।’

राजनीति के अपने अनुभवों को लिखते-लिखते भावुक शांता कुमार लिखते हैं, ‘देश की पूरी राजनीति का अवमूल्यन हो चुका है। राजनीति केवल सत्ता के लिए है, सत्य के लिए नहीं। इस अवमूल्यन में हमारी पार्टी आशा की अंतिम किरण है। यदि वह भी गलत से समझौता कर लेगी तो देश के भविष्य का क्या होगा?’ इसी संदर्भ में वह लिखते हैं, ‘मुझे सबसे बड़ा अफसोस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेताओं से है। ...वर्षों का विश्वास हिल गया। आज की बदल रही भाजपा तो बहुत आगे पहुंच गई है। मूल्य आधारित राजनीति के आदर्श के कारण जिस पार्टी को जनता ने विश्व की सबसे बड़ी पार्टी बनाया, आज वह पूरी तरह से नैतिक मूल्य नहीं, केवल और केवल सत्ता आधारित पार्टी बन गयी है। विधायकों के क्रय-विक्रय में भी उसे शामिल होते देख मेरे जैसों को तो शर्म आती है। सोचता हूं-जहां भी होंगे दीनदयाल उपाध्याय जैसे नेता आंसू ही बहाते होंगे।’ जीवन में कई उतार-चढ़ाव देख चुके शांता कुमार अपनी किताब में बॉलीवुड के दिग्गज शत्रुघ्न सिन्हा समेत अनेक लोगों से मित्रता की रोचक बातों का वर्णन करते हैं। विदेश यात्राओं का वर्णन करते हैं। और हमेशा ईश्वर को धन्यवाद देते हैं। कश्मीर से धारा 370 के हटने को साहसिक कदम बताते हुए किताब पूरी करते-करते शांता कुमार भावुक अपील करते हैं, ‘मेरे जीवन की एक ही अंतिम इच्छा है कि मेरी पार्टी भारतीय जनता पार्टी राजनीति के प्रदूषण से बचे।’

हमेशा अपने सिद्धांतों पर अडिग रहने वाले शांता कुमार सरीखे लोगों से राजनीति दल ऊंचाइयों को छूते हैं। शांता कुमार की यह आत्मकथा बहुत रोचक है। उन्होंने बेबाकी से जितना निजी पन्नों को खोला है, उतनी ही सूझबूझ से अपनी पार्टी की कमियों और अच्छाइयों को उजागर किया है। अपने जीवन में अब तक कई पुस्तकें लिख चुके शांता कुमार की यह किताब भी हर वर्ग के व्यक्ति के लिए पठनीय है।

पुस्तक : निज पथ का अविचल पंथी लेखक : शांता कुमार प्रकाशक : किताब घर प्रकाशन, नयी दिल्ली पृष्ठ : 464 मूल्य : रु.


साभार - दैनिक ट्रिब्यून



Tuesday, April 20, 2021

धीरेश ने की बात और बुजुर्गों की आई याद

आज सुबह मित्र धीरेश का फोन आया। संदर्भ था, फेसबुक पर मेरे साथ एक फोटो साझा होने की। मैंने हंसते हुए कहा कि मैं तो फेसबुक करीब दो साल से देख ही नहीं रहा हूं। वैसे इसमें थोड़ा सा झूठ शामिल था। फेसबुक पर कमेंट, लाइक या कोई पोस्ट डालना मैंने बंद कर रखा है, लेकिन ऑफिस का ऑनलाइन काम काफी देखता हूं। जैसे दैनिक ट्रिब्यून का ट्विटर हैंडल, ऑनलाइन समाचार आदि। इसी संदर्भ में कभी कबार दैनिक ट्रिब्यून के फेसबुक पेज को देखने के लिए अपने अकाउंट को पहले लॉगइन करना पड़ता है। उस दौरान कभी-कभी किसी पोस्ट पर नजर पड़ जाती है। साथ ही कुछ फ्रेंड रिक्वेस्ट भी। अगर प्रोफाइल लॉक न की हो और जानकार लग रहा/रही हो तो मैं रिक्वेस्ट को एक्सेप्ट कर लेता हूं। लेकिन कमेंट न करने, पोस्ट न डालने जैसे मसलों पर डटा हुआ हूं। खैर... बात का ट्रैक बदल गया। बेशक धीरेश ने फेसबुक पर मेरी फोटो से बात की शुरुआत की थी, लेकिन फिर उन्होंने मेरी माताजी को याद किया। मुझे बहुत अच्छा लगा। कुछ मित्र हैं जो बातों बातों में मेरी माताजी को याद कर लेते हैं। धीरेश ने कहा, ‘उनमें बहुत अपनापन था, गोरी-चिट्ठी। उनकी याद अक्सर आती है।’ मैंने जवाब दिया, ‘हां कुछ बच्चे मेरी मां को मलाई अम्मा कहते थे, लेकिन जहां तक अपनेपन की बात है यह तो उस दौर के सभी बुजुर्गों में होती थी।’ थोड़ी सहमति, असहमति के बीच मैंने मित्र धीरज ढिल्लों के पिताजी के एक किस्से को साझा किया। उन दिनों हम लोग कौशांबी के हिमगिरि अपार्टमेंट में रहते थे। मित्र सुरेंद्र पंडित हम सब लोगों को एक करने वाले थे। एक दिन धीरज के पिताजी अपने कुछ संगी-साथियों या जानकारों के साथ कौशांबी आये। नीचे गाड़ी में बाकी लोग बैठे रहे, अंकल जी नौवीं मंजिल 911 में हम लोगों से मिलने आये। मैंने कहा, ‘अंकल बैठो चाय बनाता हूं।’ उन्होंने कहा नहीं चाय नहीं पीनी है, अभी जल्दी में हूं। वह बाकी साथियों से बात करने लगे। मैंने एक बार फिर जोर देकर कहा, ‘अंकल चाय फटाफट बन जाएगी।’ अंकल जी तुरंत बोले, ‘फिर ऐसा कर 6 कप चाय बनाके फटाफट नीचे ले आ।’ मुझे उस वक्त थोड़ा अटपटा लगा। मैं चाय बनाकर ले गया। धीरज और अन्य मित्र भी मेरे साथ नीचे तक गये। बाद में मैंने इस वाकये पर विचार किया। फिर सोचा कितना अपनापन था उनका यह कहने में कि फटाफट नीचे ले आ। उन्होंने मुझे भी धीरज ही माना। इस वाकये को मैंने धीरेश के साथ जब आज मंगलवार 20 अप्रैल, 2021 को साझा किया तो हम दोनों हंस पड़े। फिर कहा कि हां वैसा अपनत्व कुछ कम हो गया। परिस्थितियां ऐसी हो गयी हैं, हम बदल गये हैं या फिर समय, कुछ पता नहीं। खैर ऐसे कई वाकये हैं। मित्र धीरज ढिल्लों की माताजी के स्नेह की झप्पी में कभी नहीं भूल पाऊंगा। बात 2008 की है। लखनऊ में मेरी माताजी का निधन हो गया था। तेरहवीं के बाद हम लोग लौटे। सुबह-सुबह ट्रेन आ गयी थी। हमारे फ्लैट की चाबी धीरज जी के यहां रखी थी। मैं, भावना और बेटा रिक्शे से उतरकर कुछ बोलते हुए आये। माताजी को अहसास हो गया कि हम आ गये हैं। उन्होंने दरवाजा खोला और सबसे पहले मुझे गले लगाया और उसी वक्त मेरी रुलाई छूट गयी। आंटी ने आसूं पोछते हुए कहा, ‘मैं हूं तेरी मां जैसी। रोना नहीं है। पहले कुछ देर यहां सुस्ताओ फिर ऊपर अपने फ्लैट पर जाना।’ आंटी के हाथ के पराठों का जिक्र तो हम घर पर अक्सर करते हैं। ऐसे ही सुरेंद्र पंडित जी के पिताजी के साथ हमारी अक्सर चर्चा होती थी। जैनेंद्र सोलंकी जी के पिताजी हों या वैभव शर्मा के पिताजी, राजेश डोबरियाल के माता-पिता हों या कोई अन्य मित्र के माता-पिता अनेक लोगों के साथ अनेक किस्से याद हैं। उनके अनुभव सुनने का लुत्फ ही कुछ और था। यहां तो उनका जिक्र है जो मित्र कौशांबी में रहते थे। इनके अलावा भी अनेक मित्रों के माता-पिता के साथ हुई बातें मेरी डायरी में दर्ज है। मसलन, बहादुरगढ़ राहुल के माता-पिताजी के साथ कई बार कई मुद्दों पर बात हुई है, दिल्ली के मनोज भल्ला, लखनऊ के भजनलाल, दिल्ली के ही अवनीश चौधरी, लोहाघाट केे श्रीनिवास ओली।नामों की सूची लंबी बनेगी। मित्र धीरेश का धन्यवाद कि पुरानी बातें फिर याद करा दीं। हर मित्र के साथ की कई बातें मेरी डायरी में दर्ज हैं। कुछ किस्सों पर हम लोग खूब हंसे भी हैं। कुछ मैंने छिपाई, कुछ बताईं। आज भी फिर कुछ पुरानी डायरियों को खंगालने लगा। बातोंबातों में धीरेश के साथ कथित बड़े साहित्यकारों, पत्रकारों और उनकी चेलागिरी पर भी चर्चा हुई। मन कर रहा था, आमने-सामने बैठकर बतियाया जाये। कुछ धीरेश पर नाराजगी जताई जाये और कुछ वह हंसहंसकर हमें चिढ़ाये। दुआ है कि जल्दी यह खौफनाक समय निकले और हम मित्रगण मिल बैठें। हम सब कुछ सुनाएं और कुछ सुनें। अंत में बता दूं कि जिस फेसबुक फोटो से चर्चा की शुरुआत हुई, वह लेखिका दीप्ति अंगरीश के साथ मेरी फोटो थी। कुछ दिन पूर्व वह चंडीगढ़ आई थीं, जाते-जाते एक फोटो खींच ली। बात खत्म करते-करते मुनव्वर राणा साहब का शेर याद आ रहे हैं जो मैं अक्सर दोहराता रहता हूं-

इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है, मां जब गुस्सा होती है तो रो देती है।

Tuesday, March 16, 2021

वसुंधरा की वह यात्रा और जीवन पथ गुलाबी बाग से नोएडा-गाजियाबाद के सफर का जिक्र

केवल तिवारी

मुझे मोहब्बत है अपने हाथों की सब उंगलियों से, ना जाने कौन से उंगली पकड़ के मां ने मुझे चलना सिखाया होगा…

यह शायरी याद आ गयी आज जब कुछ लिखने को जी चाहा। हर दिन हर पल कुछ लिखने को मन में कुलबुलाता रहता है, लेकिन दिल की ज्यादातर बातें डायरी में दर्ज कर लेता हूं, जो बात ज्यादा हिलोरें मारती हैं या जिस बात पर लगता है कि इसे तो सबके साथ साझा किया जाना चाहिए, उसे अपने ब्लॉग पर चस्पां कर देता हूं। डायरी लिखने की बात आई तो हमारे भतीजे साहब बिपिन ध्यान में आये। उन्होंने एक डायरी हाल ही में मुझे दी है। इत्तेफाक देखिये मेरी पुरानी डायरी अभी-अभी भरी है, अब नयी शुरुआत इसी में करूंगा। खैर... बिपिन तिवारी द्वारा दी गयी डायरी का किस्सा बहुत पुराना नहीं है, हाल ही में मैं दिल्ली गया था। गाजियाबाद भी जाना हुआ। बिपिन से बात हो गयी थी। बिपिन ने कहा कि पहले ग्रेटर नोएडा आ जाओ, हम सब लोग नितिन के साथ हैं, फिर चलेंगे वसुंधरा। मैंने वसुंधरा स्थित अपने फ्लैट में कुछ काम करवाया था, उसे देखना था और ठेकेदार को कुछ पैसा भी देना था। इस बीच, भतीजी भावना तिवारी यानी कन्नू से भी मिलने का कार्यक्रम था, लेकिन इत्तेफाक से उस दिन उसकी व्यस्तता थी। मैं समझ सकता हूं कि इलेक्ट्रानिक मीडिया की व्यस्तता। फिर जिम्मेदारी और तरक्की के पथ पर बढ़ते रहने के लिए थोड़ी भागदौड़। खैर मैंने परिवार के अन्य सदस्यों से बात नहीं की क्योंकि मैं जानता था कहीं भी मिलने नहीं जा पाऊंगा। हेम, हरीश, दीप, प्रकाश सभी तो दूर-दूर हैं। भतीजियों को घर भी अलग-अलग दिशाओं में है, फिर और लोग भी हैं। खैर अपने सफर के दूसरे पक्ष की ओर जाऊंगा तो मुद्दा भटक सा जाएगा। सीधे मुद्दे पर आता हूं। मैं अपने साले साहब भास्कर जोशी (राजू) के यहां फरीदाबाद पहुंचा, वहां से ग्रेटर नोएडा गया। पहले वरिष्ठ पत्रकार और मुझसे खास स्नेह रखने वाले नरेंद्र निर्मल जी के यहां गये। करीब एक घंटा वहां बैठने के बाद आ गया नितिन के फ्लैट (स्लीओ कंट्री, सेक्टर 121-नोएडा) 12वीं फ्लोर पर घर। वहां नितिन की नानी जी और मामाजी भी मिले। नितिन की मम्मी बीना, बहन मिन्नी और एक साल से तिवारी परिवार से जुड़ी नयी नवेली बहू मानसी मिलीं। बेहद सरल और सहज अंदाज में हुई बातें। मैं तो वाचाल किस्म का हूं, काफी कुछ बोल गया। नितिन ने कहा, बड़बाज्यू खाना बनने तक आइये नीचे घूम के आते हैं। हम लोग सोसायटी देखने चले गये। सचमुच एक नयी दुनिया सी। गगनचुंबी इमारत के ग्राउंड फ्लोर पर उतनी ही सुविधाएं। कुछ दिन पहले इसी इलाके में नितिन-मानसी की शादी की साल गिरह का जश्न मना था। उस समारोह में मैं नहीं था, खैर वह कमी आज पूरी हुई। मानसी के हाथ का खाना पहली बार खाया। बेहतरीन लगा। भले गगनचुंबी इमारत हो, भले आलीशान सुविधाएं हों, भले एक नया संसार सा हो, लेकिन सहजता वही पुरानी थी, सरलता वही पुरानी थी। मेरी भी और बाकी अन्य की भी। बातों-बातों में मानो हम कह रहे हों-

पता अब तक नहीं बदला हमारा, वही घर है वही क़िस्सा हमारा।

दोपहर के भोजन के बाद मैं और बिपिन चले आये वसुंधरा, नितिन के मामा ने हमें वहां छोड़ दिया। इस बीच काफी बातें होती रहीं। पहले बिपिन के घर गये वहां कुछ देर आराम किया फिर चाय पी। उसके बाद मैं और बिपिन पैदल चल दिए मेरे फ्लैट की ओर। अनेक बातें हुईं और उन बातों का सार यही निकला कि-

रिश्तों को मजबूत बनाने के लिए, एक छोटा सा उसूल बनाते हैं। रोज कुछ अच्छा याद रखते हैं, और कुछ बुरा भूल जाते हैं

याद करने के इस क्रम में हम लोगों ने बात की गुलाबी बाग की। हमारे परिवार के एक हिस्से की बात हो और गुलाबी बाग का जिक्र न हो, कैसे हो सकता है। जिस तरह परिवार के दूसरे हिस्से की बात हो और लखनऊ तेलीबाग का जिक्र न हो, हो नहीं सकता, उसी तरह गुलाबी बाग का जिक्र तो स्वाभाविक था। गुलाबी बाग में भी 754 का। 754 वह नंबर है, जिसे हम तब से सुनते थे जब से हम शायद दिल्ली के बारे में भी सही से नहीं सुन पाए होंगे। मुझे याद है गांव से जब चिट्ठी लिखाई जाती थी तो कहा जाता था, बुद्धिबल्लभ तिवारी को मिले, 754 गुलाबी बाग-दिल्ली। बाद में मेरा भी उस घर में जाना हुआ। पुष्पा दीदी वहां कई महीने रही। मेरी माताजी वहां बहुत रहीं। हमारे परिवार का शायद ही कोई सदस्य होगा जो उस छोटे से घर 754 की विशालता और दीर्घता को न जानता हो। यह दीगर है कि नयी पीढ़ी के बच्चों ने सिर्फ सुना ही होगा। चूंकि जब से दिल्ली आया, बिपिन से नया रिश्ता भी बना, मित्रता का। बिपिन रिश्ते में भतीजा है, पूरा परिवार सम्मान देता है, लेकिन उम्र में तो बड़ा है ही। यहां मैं बिपिन के लिए इस तरह की शब्दावली लिख रहा हूं, लेकिन कभी बिपिन दंपती के लिए मुंह से तू-तड़ाक नहीं निकलता। आखिर मेरी लघुता में इतनी दीर्घता तो होना जरूरी है। खैर आते हैं चर्चा पर वापस। हम लोग अक्सर मिलते हैं। नहीं भी मिलते हैं तो परिवार के अन्य सदस्य किसी न किसी रूप में आपस में जुड़े हैं। सभी संस्कारी। हमारा परिवार है, इसलिए नहीं कह रहा हूं, बल्कि इस परिवार का उदाहरण दिया जाता है, इसलिए कह रहा हूं। क्योंकि-

अगर ज़िन्दगी एक सफर है तो परिवार उस सफर का सबसे सुन्दर हमसफ़र है।  

और इसलिए भी-

ऐ इंसानियत मेरी, मुझमें तुम बाकी रहना, परिवार को मुझमें, और मुझे परिवार में शामिल रखना।

चलिए बात जारी रखी जाये। नितिन के घर में जब हम सब बातें कर रहे थे तो सभी प्रसन्नचित्त दिख रहे थे। और इस बात को हम सब जानते हैं कि-

जिस परिवार में मां-बाप हंसते हैं, उसी घर में भगवान बसते हैं।

खैर 754 के बाद बिपिन ने गुलाबी बाग में दो मकान बदले। मुझे उनके नंबर ठीक से याद नहीं, लेकिन ग्राउंड फ्लोर के मकान में कई मौकों पर हम परिवार सहित मिले। एक शायद नितिन की जनेऊ के मौके पर और एक बार प्रेमा की शादी के मौके पर। वहीं दीप का भी घर है। अब प्रकाश भी उसी इलाके में अपने घर में रह रहा है। बड़ी प्रसन्नता होती है, यह सब सुनकर। खैर, चलना ही जिंदगी है। चलते-चलते और बातों बातों में पहुंच गया हूं वसुंधरा। यहां जब से बिपिन आया तो लगा अरे वाह अब तो पड़ोसी हो गये। उस दिन फिर बातचीत जारी रही। एक विचार आया कि-

इंसान आजकल इसलिए भी परेशान है, क्योंकि जो गर्मी रिश्तों में होनी चाहिए वो हमारे दिमाग़ में है।

हम लोग तो उस राह के राही हैं जिसके बारे में किसी शायर ने लिखा है-

अपनी गृहस्थी को कुछ इस तरह बचा लिया करो, कभी आंखें दिखा दी कभी सर झुका लिया करो।

रविवार के उस दिनभर की भागादौड़ी के बाद शाम को कुछ देर बैठकी हुई। बिपिन का बेहतरीन सौजन्य रहा। मेरे चार मित्र भी थे। विस्तार से उसकी क्या बात लिखनी। अपने इस यात्रा वृतांत को विराम देते हुए अंत में कहूंगा-

परिवार में कहना–सुनना आम है, बस लड़ाई के बाद सब भूल जाना आपका काम है।


भंवरे की गुंजन और बचपन की यादें...

केवल तिवारी

भंवरे की गुंजन है मेरा दिल, कब से संभाले रखा है दिल, तेरे लिए, तेरे लिए... इस धरती पर मेरे अवतरण से पहले बनी फिल्म कल आज और कल का यह गीत बहुत पहले से सुनता आया हूं। हसरत जयपुरी साहब के बोल और शंकर-जयकिशन का संगीत। आज अनायास ही फिर मुंह से फूट पड़ा। असल में घर के अंदर कहीं से एक भौंरा आ गया। छोटा सा। श्रीमती जी ने कहा, इसे बाहर कर दो। फिर आजकल ततैया भी खूब आ रही हैं। शायद यह मौसम उनकी ब्रीडिंग के लिए बहुत मुफीद होता है। भंवरे को बाहर करने उसके पास गया तो भ्रामरी योग में निकलने वाली आवाज सी आयी। धीरे-धीरे लगा अरे यह आवाज तो सुनी-सुनाई सी है। आज की नहीं, बहुत पहले की। शायद मैं तीसरी या चौथी में पढ़ता होऊंगा। या हो सकता है मैं चार-पांच साल का रहा होऊंगा। कालखंड सटीक याद नहीं है, हां गांव का नजारा था, यह अच्छी तरह याद है। गौर से सोचा तो याद आ ही गया वह दौर। गांव का। माता जी खेत में गयी होती थीं। दीदी या तो स्कूल या उन्हीं के साथ खेत में। मैं घर में अकेला होता था। बाहर के कमरे यानी चाख में ऐसा ही भौंरा या बड़ी मक्खी घूमती थी और उसकी भ्रमरगान मुझे उदासी से भर देता था। कभी खिड़की पर आकर बाहर को देखने लगता या फिर बाहर आ जाता। बाहर भी सन्नाटा सा पसरा दिखता। दिन में आराम करने का रिवाज होता था। कुछ लोग या तो घर में होते ही नहीं, होते तो आराम कर रहे होते। फिर हमारे जैसे बच्चों को कौन तवज्जो दे। खैर आज यह भौंरा आया, पत्नी ने बाहर करने को कहा तो मैं बचपन की बातें बताने लग गया। फिर मुझे लगा, पहले मुझे गीत गा लेना चाहिए था, 'भंवरे की गुंजन है मेरा दिल, कब से संभाले रखा है दिल तेरे लिए, तेरे लिए...' लेकिन क्या करें, यादों के पिटारे को सिर पर लादे फिरता हूं। याद आ गया वह मंजर। चलो इसी बहाने कुछ लिखने का मन हो गया और एक छोटा सा पीस यहां लिख डाला। 
और अंकल जी का कहना, खुश रहो तो वजन बढ़ेगा
बातों-बातों में एक रात पहले की बात याद आ गयी। अपने मित्रों के साथ कहीं गया था। वहां एक अंकल जी मिले। सरदार जी। बुजुर्ग, लेकिन सेहतमंद। वहीं हॉल के बाहर रखी वजन तोलने की मशीन थी। मैंने मित्र से कहा, 'यार मेरा वजन लगातार कम हो रहा है। हालांकि डॉक्टर ने ऐसे संकेत दिए हैं, लेकिन जब से जाड़ों के कपड़े उतर गये हैं कुछ ज्यादा ही दुबला दिखने लगा हूं।' मित्र ने कहा, वजन कुछ मेरा भी कम हुआ है। हम लोग बात ही कर ही रहे थे सरदार अंकल आ गये। मैंने और मित्र ने पूछा, 'अंकल वजन बढ़ाने के लिए क्या करें?' वे तुरंत बोले, 'खुश रहा करो, अच्छी गल किया करो, ऐहते दूजा कोई गल नहीं, वजन आपे बढ़ जावेगा।' मैं बोला, 'अंकल तुसी सच्ची गल कित्ता।' फिर हम सभी हंस पड़े, थोड़ा मेरी पंजाबी बोलने पर हंसना और थोड़ा अंकल की सही बात पर सहमति जताना। फिर मैंने और मित्रों ने कहा कि वास्तव में बात छोटी सी है, लेकिन असरदार। खुश रहना चाहिए। अच्छी बातें करनी चाहिए। शेष सब चलता रहता है। चलिए बातों बातों में कुछ बातें हो गयीं, बाकी फिर कभी---

Wednesday, January 13, 2021

जमाना स्मार्ट है, पर नोट भी कर लेना चाहिए

 मन में विचार मंथन चलते रहते हैं। कभी कुछ, कभी कुछ। विचार मंथनों से इतर, कई बार बच्चे बड़ी-बड़ी बातें कर जाते हैं। उनकी बातों से निकली बातों पर तो कभी लेख बन गये और कभी ब्लॉग पर लिख डाला। जैसे बच्चे का सवाल कि अगर आपके जमाने में online class की स्थिति आती तो क्या चिट्ठियां भेजकर पढ़ाई होती। ऐसी ही कई बातें। मैं बच्चों से कहता हूं कि डायरी लिखा करो, रोज नहीं तो कुछ खास मौकों पर। जैसे अगर कभी कोई मेहमान आया हो, उनके बच्चों से आपकी कोई बात हुई हो या घर में कोई नयी चीज आई हो या फिर किसी का जन्मदिन हो वगैरह-वगैरह। बच्चे कभी इसे फॉलो करते हैं और कभी बच्चे तो बच्चे ठहरे। जब बात लिखने की आती है तो कई बार मैं चीजों को नोट करने के लिए कहता हूं। खुद भी सोचता हूं कि यह बात नोट कर लूं, लेकिन जब-जब चूका हूं तब-तब भूला हूं। पिछले दिनों कई आइडिया आये। सोचा कि इन्हें नोट कर लूंगा, लेकिन भूल गया। कभी भूलने या न लिख पाने या कहीं जाने के समय को लेकर बात करता हूं तो छोटा बेटा धवल कहता है, पापा स्मार्ट बनो। smart कैसे बनो, वह इसे भी दिखाता है। इन दिनों उसकी ऑनलाइन क्लास चलती हैं। उसने हर क्लास के समय से पांच मिनट पहले का अलार्म लगा रखा है। कभी अगर हम उसे टोकते हैं कि चलो तैयार हो जाओ। पेन, नोटबुक, किताब निकालकर बैठो, क्लास आने वाली है, तो सीधे जवाब देता है कि smart हूं मैं, अलार्म लगा रखा है। उसके अलार्म की बात तो यह भी है कि एक दिन उसने पूछा, पापा आप सैर (morning walk) करने कितने बजे जाते हैं, मैंने कहा, आजकल (winter season) करीब साढ़े सात बजे। उसका अगला सवाल उठते कितने बजे हो, मैंने कहा कम से कम एक घंटा पहले। मैंने उससे पूछा कि तुम्हें चलना है, बोला नहीं। मैंने कहा, चला करो आपके भैया को तो मैं कभी-कभी ले जाता हूं। उसने फिर इनकार कर दिया। अगली सुबह ठीक साढ़े 6 बजे आवाज आई, 'पापा और भैया उठ जाइये' मैं हैरान, कि यह आवाज कहां से आ रही है, छोटे बेटे को देखा तो वह सो रहा है, फिर सिरहाने के पास रखे मोबाइल की ओर नजर पड़ी, देखा मोबाइल में अलार्म बज रहा है। यह अलार्म बच्चे ने अपनी आवाज रिकॉर्ड कर लगा दिया था। खैर उस वक्त उठने का बहुत मन नहीं कर रहा था, ठंड भी बहुत थी। पांच-10 मिटन बाद पत्नी गरम पानी लेकर आ गयी। पानी पीया। फिर थोड़ी देर बाद चाय आ गयी। उसके बाद फ्रेश होते-होते और सर्दियों में खूब सारे कपड़े पहनते-पहनते साढ़े सात बज गया। तभी आवाज आई, 'राउंड करने जाइये' यही वाक्य रिपीट हो रहा था। यह आवाज भी मोबाइल से ही आ रही थी। मैंने अलार्म off नहीं किया, उसे बजने दिया। बेटा अलसाया सा उठा, बोला पापा राउंड करने जाओ। मैं हंस दिया, वाह मेरे स्मार्ट बेटे। उसके बाद कई मौके आए जब लगा कि इस अलार्म को discontinue कर दूं, लेकिन खुद ही रुक गया। सुबह-सुबह अब तो इसे सुनना अच्छा लगने लगा है। इस तरह की smartness देखकर तकनीक और तकनीक पर बच्चों की निर्भरता को लेकर चिंता भी होती है। इस निर्भरता के कारण आज शायद कुछ ही लोग होंगे जिन्हें 10-12 फोन नंबर याद हों। एक जमाना होता था लोगों को कई चीजें याद होती थीं। यहां तक कि हफ्तेभर पहले किसी को मिलने का दिया गया समय और जगह भी। अब तो सबकुछ मोबाइल में होने लगा। स्मार्ट बनना अच्छी बात है, लेकिन नोट करने जैसी विधा की कोई सानी नहीं। नोट करने का मन नहीं होता तो इतना लिख भी कहां पाते। इसलिए मैंने तो सोच लिया है कि नोट करने की अपनी बात पर अमल करूंगा। तत्काल नहीं तो कुछ देर बाद ही सही। आप क्या कहते हैं।


Thursday, December 31, 2020

21वां साल शुभ हो...

 केवल तिवारी

21वीं सदी का 21वां साल शुरू हो गया है। या यूं कहें कि यह सदी भी अब उस दौर में पहुंच गयी है जब उमंगें होती हैं, उत्साह होता है। जज्बा होता है। घबराहट कम होती है। पीछे ज्यादा देखते नहीं, आगे की चिंता कम रहती है। अगर आप प्रौढ़ या वृद्ध हैं तो याद कीजिए अपने जीवन का 21वां साल। मैं यह नहीं कहता तब सबकुछ मस्त रहा होगा। हो सकता है हम-आप में अनेक ऐसे होंगे जिनके लिए 21वां साल खराब ही रहा हो, लेकिन फिर भी वैसी परिस्थितियां आज आ जायें तो क्या आप-हम में इतनी हिम्मत है कि हम उतनी ही आसानी से जीवन पथ पर बढ़ चलें। खैर...

21वां साल असल में कई मायने में अनूठा होता है। कहा जाता है कि मनुष्य बनने से पहले 84 हजार योनियों में कोई भी जीव विचरण करके आता है। अगर यह सच है कि 84 हजार योनियां होती हैं तो इसका चौथाई भाग है 21, यानी 21वां साल कुल योनियों की संख्या का चौथाई भाग। या हमारे जीवन का एक चौथाई भाग। अगर सौ वर्षों के जीवन की गणना सोचें तो चार साल बाद मनुष्य का गृहस्थ आश्रम शुरू हो जाता है। यानी यहां भी चार का अंक। इसी तरह कुंडली में 12 ग्रह होते हैं। इस 12 की संख्या को उलट दें तो 21 बनता है।

हम तो अपनी युवावस्था से ही सुनते आ रहे हैं कि भारत 21वीं सदी के लिए तैयार हो रहा है। लो जी देखते ही देखते 21वीं सदी के 20 साल निकल भी गये। जो जिंदगी 20-20 क्रिकेट की मानिंद रफ्तार से भाग रही थी, उसी जिंदगी में 2020 में ब्रेक लग गया। यह ब्रेक था कुछ सोचने के लिए वक्त लेने का। कुदरत ने कुछ समझाया, दुनियादारी ने कुछ समझाया और कुछ समझ पाये कुछ नहीं। कुछ की उम्र भी ऐसी हो गयी कि उन्हें संभवत: सोचने की बहुत जरूरत भी नहीं। जो भी हो, समय तो अपनी रफ्तार से चलता ही है। सो चल रहा है। अब 21वां साल शुरू हो गया है। यह साल सबके लिए शुभ हो, यही कामना है और इसी कामना के साथ एक कविता आपके लिए पेश है-


कुछ भूलेंगे, कुछ याद रह जाएगा


वो वक्त गुजर गया, ये वक्त भी चला जाएगा।

कुछ चीजें भूल जाएंगे, कुछ याद रह जाएगा।

क्यों उलझें इक-दूजे से

न मैं रहूंगा, न तू रह पाएगा।

संपूर्ण न मैं हूं, न तुम हो

किसी का कुछ भी न रह पाएगा।

भगवान न मैं हूं, न तुम हो

यह बात इंसान कब समझ पाएगा

भ्रम ने पैदा कर दीं इंसानी दूरियां

समझ ही से भ्रम को उतार पाएगा।

हम दोष देते हैं, इक दूजे को

न मैं झुकता हूं, न तू आगे आएगा।

इस सदी के दो दशक देखो गए

यूं ही हमारा यह जीवन भी चला जाएगा।

आओ नयी इबारत लिखें

बाद में न मैं रहूंगा, न तू रह पाएगा।

Monday, December 7, 2020

मैं तो ऐसा/ऐसी ही हूं... बदलना होगा यह भाव

 केवल तिवारी

‘कोई भला माने या बुरा, मेरी तो यही आदत है।’ ‘अपने को फर्क नहीं पड़ता।’ इस तरह के डायलॉग अक्सर अनेक लोगों से आप लोगों ने सुना होगा। अपने अनुभवों के आधार पर मैं कह सकता हूं कि असल में ऐसा कहने वाले एक तो अपनी आदत सुधारना चाहते हैं, लेकिन attitude change problem बीच में आ जाती है। ऐसे ही जो कहते हैं कि मुझे फर्क नहीं पड़ता, वाकई उन्हें फर्क पड़ता है। बस ऐसे लोग यह दिखाने के चक्कर में कि मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता, अंदर ही अंदर कुढ़ते रहते हैं परेशान रहते हैं। रिश्तों में खटास आती रहती है, स्वाभाविक प्रक्रिया है। क्योंकि मानव मशीन नहीं है। उसके अंदर गुस्सा, प्रेम, आदर, तिरष्कार, क्रोध आदि मनोभाव आते रहते हैं। जानकारों का कहना है कि अचानक आने वाले मनोभाव स्थायी नहीं रहने चाहिए। या यूं कहें कि स्थायी रखने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। इसका उदाहरण देते हुए पिछले दिनों एक सज्जन ने समझाया, ‘आप कभी उन बातों पर गौर कीजिए जिसकी शुरुआत में हम कहते हैं आज से कभी नहीं होगा या आज से उससे बातचीत बंद।’ असल में स्थायी घोषणा तो क्षणिक आवेग है। यानी हमेशा के लिए कोई चीज बंद करने या शुरू करने की बात कहना क्षणिक आवेग है। बाद में कुछ पल सोचना चाहिए। फिर मंथन करना चाहिए जब हमारा जीवन ही स्थायी नहीं है तो कोई चीज कैसे स्थायी हो सकती है। परिवर्तन तो सृष्टि का नियम है। फिर बिना नव्यता के सुख कहां मिलता है। नवीनता लाने के लिए मनोभावों के संबंध में स्थायी घोषणा भी कैसे हो सकती है।

आखिर शुरू कैसे करें

हो सकता है आपका मन कर रहा हो कि अब नयी शुरुआत करनी चाहिए। रिश्तों में गर्माहट लाने की कोशिश होनी चाहिए। दूसरा पक्ष इससे अनजान है तो आप एकाध कोशिशें कर सकते हैं। यदि उन कोशिशों का कोई प्रतिफल नहीं मिला तो निराश होने की जरूरत नहीं। कुछ दिन हालात को वक्त के हवाले कर दीजिए। असल में वक्त हर घाव को भर देता है। रिश्तों को बनाये रखने के लिए दोनों ओर से संवाद आवश्यक है। संवादहीनता की स्थिति तो अच्छी बात नहीं। यूं तो सब जानते हैं कि जीवन का अंतिम सत्य मृत्यु है। यानी मृत्यु निश्चित है। जीवन अनिश्चित। कोरोना काल ने इस संबंध में हमें और सचेत कर दिया है। अपने हिस्से के काम को अच्छे से निर्वहन करना बेहद जरूरी है।

सोशल मीडिया के संदेश और हम

आप अगर दो-चार व्हाट्सएप ग्रूप, फेसबुक या ऐसे ही अन्य सोशल साइट्स पर कुछ लोगों के मैसेज पर गौर करेंगे तो आपको पता चल जाएगा कि ज्ञान का भंडार भी वहां है और नफरत भी। कुछ लोग नकारात्मक (negative) बातों को ज्यादा प्रसारित करते हैं और कुछ हमेशा अच्छी बातों को। इन बातों से ही हमें खुद के लिए कुछ चीजों को चुनना है। जो ज्ञान गंगा बहती है, अगर उसमें से कुछ बूंदें भी हम सहेज लें और उन पर अमल कर लें तो हम अपने हिस्से में तो अच्छे हो ही जाएंगे। इसलिए न तो नकारात्मक बातों को तवज्जो दें और न ही उन्हें प्रसारित करें।

बच्चों को अपनों के बारे में बतायें

शहरी जीवनशैली में जहां एकल परिवार प्रथा (single family system) चल रहा है वहां बच्चों को कई बार रिश्तों की जानकारी नहीं होती। कोरोना काल में लंबे समय से परिवार के लोगों से मिलना नहीं हो रहा होगा। ऐसे में जरूरी है बच्चों को परिवार की अहमियत बताना। अपनों से बात कराते रहना। हो सके तो बच्चों को पुरानी कोई ऐसी बात न बताएं जिससे नफरत की जरा सी भी बू आती हो। कुछ समय के लिए तो यह अच्छा लग सकता है कि आपके बच्चे उन नफरतभरी बातों से आपको और ज्यादा अपनापन देने लग जाएं, लेकिन ये सब दीर्घकालिक गलत संदेश देने वाली शुरुआत होती है। तो चलिए कुछ अच्छा सोचें। अच्छा बोलें। रिश्तों को नये सिरे से जोड़ें। कौन जाने कल हो न हो। 

Thursday, November 26, 2020

अब कटारा जी की सूचना... बिछड़े सभी बारी-बारी

 केवल तिवारी

यह क्या हो रहा है? हर कुछ दिन बाद ऐसी सूचना। अभी दिनेश तिवारी जी के जाने की चर्चाएं ही चल रही थीं कि आज दोपहर पता चला राजीव कटारा जी नहीं रहे। हिंदुस्तान में जब मैं था वह स्पोर्ट्स एडिटर थे। मैंने जब 2008 में हिंदुस्तान छोड़ा और उनसे मिलने गया तो खुद सीट से उठकर उन्होंने मुझे गले लगा लिया। कुछ बातें हुईं और मुस्कुराते हुए वह मेरे साथ लोकल रिपोर्टिंग केबिन तक आये। उसके दो साल बाद उनसे फिर मिलने गया तो उन्होंने गर्मजोशीर से गले लगाया और मेरे साथ चलकर कई नये लोगों से मुलाकात कराई। उसके बाद उनसे फेसबुक पर ही बात होती। कभी-कबार व्हाट्सएप पर वह कुछ भेजते। 


उनके लेखन का कायल रहा हूं। फेसबुक पर वह त्योहारों पर छोटे-छोटे पीस लिखते जो कम शब्दों में बहुत कुछ सिखा जाते। कादंबिनी सरीखी पत्रिका के संपादक रहे कटारा जी से पिछले कुछ समय से बात करने का मन कर रहा था। खासतौर पर तब कादंबिनी के बंद होने की खबर आयी, लेकिन हिम्मत नहीं कर पाया। फिर सोचा कुछ दिन बाद बाद करूंगा। अभी पिछले दिनों अपने संपादक जी से उनके बारे में चर्चा हुई। तय हुआ कि कटारा जी से कुछ लिखवाया जाये। नये साल पर उनसे कुछ लिखने का आग्रह करेंगे। लेकिन वह मौका ही नहीं आया। कटारा जी चले गये। उनका वह मुस्कुराता चेहरा हमेशा याद रहेगा। हमेशा कुर्ते में ही रहने का उनका अंदाज भी निराला था। कटारा जी अभी समय तो नहीं हुआ था, लेकिन आप आखिर चले ही गये। हमेशा याद आएंगे।