केवल तिवारी
'Thursday, January 20, 2022
हाय रे आइसोलेशन... नाम बड़ा और घर छोटा
Wednesday, January 19, 2022
यास्मीन का सफर, चलता रहे अनवरत
केवल तिवारी
पिछले दिनों यास्मीन का फोन ही आ गया। टैगोर थियेटर में एक नाटक 'जब शहर हमारा सोता है' के सिलसिले में। इसके मंचन में यास्मीन का किरदार अहम था। यास्मीन के आग्रह पर मैंने कहा, 'यास्मीन मैं आ नहीं सकता, लेकिन इसकी कवरेज करवा दूंगा। कोई इनविटेशन या मैटर तैयार करवाना तो मुझे भेज देना।' यास्मीन ने मेरी बात का बहुत ही समझदारी से जवाब दिया। वह बोलीं, 'नहीं, एक्चुअली मैं तो चाहती थी कि आप इसे देखें। अगर कोई और आना चाहे तो आप बता देना।' मुझे यास्मीन का जवाब बहुत अच्छा लगा। एक मैच्योर कलाकार की तरह। असल में शाम का समय हमारे लिए बहुत काम वाला होता है। अगर साप्ताहिक छुट्टी वाला दिन होता तो मैं अवश्य जाता। मैंने दो-चार थियेटर प्रेमियों को मैसेज फॉरवर्ड किया। मेरी दुआ है कि यास्मीन इतनी सफलता पाए कि एक दिन उसका इंटरव्यू लेने के लिए मुझे समय लेना पड़े।
... और वह मंचन
रविवार 16 जनवरी को 'जब शहर हमारा सोता है' का मंचन टैगोर थियेटर में हुआ तो वहां पहुंचे लोगों ने बताया कि बहुत ही बेहतरीन था नाटक। उन्होंने बताया कि यूं तो सभी ने लाजवाब अभिनय किया और निर्देशन में हर बारीकी और प्रकाश का ध्यान दिया गया था, तराना का अभिनय बहुत ही जीवंत था। खुशी हुई कि तराना की ही भूमिका यास्मीन निभा रही थी। यही नहीं, कोविड महामारी के दौरान उदासी के आलम में दर्शकों ने इस मंचन को ताजगी का बूस्टर डोज बताया। जीरो परफॉर्मिंग आर्ट्स और अवलोकन थिएटर मंच ने पीयूष मिश्रा द्वारा लिखित नाटक प्रस्तुत किया। इसमें तराना की भूमिका अदा की यास्मीन ने। करीब पौने दो घंटे चले इस मंचन के दौरान एक भी दर्शक ऐसा नहीं था जो अपनी जगह से हिला हो। मंचन था ही इतना लाजवाब। नाटक का निर्देशन थिएटर बिरादरी के एक प्रमुख व्यक्तित्व साहिल मंजू खन्ना ने किया था।
चक्रेश कुमार, डॉ मनीष जांगड़ा की उपस्थिति में प्रस्तुत इस नाटक को देखने अनेक लोग पहुंचे थे। कोविड मानकों को मानते हुए इस मंचन को देखने के बाद लोगों ने बताया कि कोविड महामारी जैसी उदासीनता के बीच इस मंचन ने एक अलग ताजगी और अनूभूति दी। यास्मीन के अलावा इसमें आभास (विकास ठाकुर), विलास (साहिल मंजू खन्ना), असलम (यदुनंदन), तब्बसुम (हिना बत्रा), निशि (तरन्नुम खान), त्यागी (दिव्यांश कुमार) जैसे किरदारों ने बेहतरीन अदाकारी की। इनके अलावा खोपकर (अक्षय रावत), चाचा और मधमस्त (अंकज कुमार), चीना (कुणाल बत्रा), अंता (नमन धीमान), बबुआ (चिराग शर्मा), आवेन (खुशी पंडोत्रा), अकील (यक्ष पांडे), रफीक (साहिल पांडे), अख्तर (चेतन शर्मा), मोइन अली (रोहन ठाकुर), मुनीरा (साधिया)। ने भी इसमें भूमिका निभाई। यास्मीन के अभिनय का अलग ही लेवल था।
इच्छा है प्रेरक अभिनय की
यास्मीन ने बताया कि उसकी इच्छा प्रेरक अभिनय यानी जो दूसरों को प्रेरणा दे सके, वैसा अभिनय करने की है। अभिनय के क्षेत्र में कैसे आना हुआ और आपका ड्रीम रोल क्या है, पूछने पर यास्मीन ने कहा, 'स्कूली पढ़ाई के दौरान वार्षिक समारोह में परफॉर्म का मौका मिला जो मंच पर अभिनय का मेरा पहला अनुभव था। यूनवर्सिटी में कुछ सीनियर्स से गीत पेश करने के लिए कहा, तब मैंने पहली बार कैमरा फेस किया। फिर मुझे अभिनय में आनंद आने लगा। मुझे अहसास हुआ कि मैं अपनी कला को निखार सकती हूं और अभिनय में आगे बढ़ सकती हूं। साथ ही अभिनय से मुझे काफी खुशी और सुकून मिलता है। जहां तक बात है मेरे ड्रीम करैक्टर अभिनय की तो मैं दिल से चाहती हूं कि कोई प्रेरक अभिनय करूं।' सचमुच अपने बलबूते पर यास्मीन अभिनय की कुछ सीढ़ियों पर चढ़ चुकी हैं। निश्चित रूप से उन्हें सफलता मिलेगी क्योंकि ऐसे ही लोगों के लिए बशीर बद्र साहब ने कहा है-
हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है
जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा
Tuesday, January 18, 2022
डॉक्टर वर्तिका... तिनका-तिनका और वे, जिन्हें नज़्म सी लगने लगी अपनी जिंदगी
केवल तिवारी
मेरी कांव-कांव भी यदा-कदा चलती रहती है। इसे कभी साहित्यिक जुगाली कह देता हूं और कभी मन को भायी चीजों को 'स्वान्त: सुखाय' के तौर पर कलमबद्ध (कलमबद्ध का आधुनिक मतलब डिजीटली कहीं कुछ लिख देना ही हो रहा है, वैसे ऐसे हर एक लम्हा मेरी डायरी का भी हिस्सा हो जाता है) कर लेना। लिखने के इस क्रम में ताजा नाम हैं डॉक्टर वर्तिका नंदा। उनकी संस्था तिनका-तिनका लंबे समय से एक ऐसे काम में जुटी है जो वाकई अनूठा है। कैदियों के जीवन को संवारने में। संवारने का मतलब यहां कुछ ऐसे गैर सरकारी संस्थाओं की तरह का काम नहीं है कि कुछ मदद कर दी, वगैरह-वगैरह। संवारने से यहां मतलब है उन्हीं के अंदर छिपे हुनर को मंच देने का। क्योंकि जेल की ऊंची-ऊंची दीवारों के अंदर पहुंचे इन लोगों के लिए अगर ऐसी पहल की जाये तो उन्हें भी मौका मिलेगा 'कुछ अच्छा' करने का। क्योंकि इनमें से ज्यादातर की हालत वैसी ही है जैसा किसी शायर ने लिखा है-वो रेजा-रेजा बिखरने की लज्जतें अपनी
अब ये हाल है कि तिनके समेटना चाहूं।
तिनका-तिनका की ओर से हरियाणा की जेलों में रेडियो जॉकी बनाने की योजना की वर्षगांठ पर डॉक्टर वर्तिका नंदा और उनके काम के बारे में कुछ लिखने के लिए हमारे संपादक जी ने मुझसे कहा। इसके बाद वर्तिका जी से बात हुई। उनके बारे में पहले से जितना जानता था, उससे कहीं ज्यादा बातें बाद में पता चलीं। लेख छपने के बाद अनेक लोगों के फोन आये। लोगों ने बताया कि दैनिक ट्रिब्यून में करीब तीन दशक पहले एक कहानी प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। यह इस अखबार में पहली ऐसी प्रतियोगिता थी। इसमें वर्तिका जी प्रथम स्थान पर आयीं और उन्हें सम्मानित किया गया। ऐसी ही कई अन्य बातें भी। खैर... डॉक्टर वर्तिका नन्दा अब किसी पहचान की मोहताज नहीं हैं।
वह अपराध पत्रकारिता को लेकर लीक से हटकर काम करती हैं और जेल के अनूठे प्रयोगों के लिए जानी जाती हैं। वह एक सशक्त महिला हैं। तभी तो खौफ देती जेलों के अंदर जाकर बंदियों में बदलाव लाने का काम किया है और साबित किया है कि मीडिया का सकारात्मक इस्तेमाल भी हो सकता है। बता दें कि तिनका-तिनका भारतीय जेलों पर वर्तिका की एक अनूठी शृंखला है। वर्ष 2013 से वह इस क्षेत्र में काम कर रही हैं। भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से उन्हें स्त्री शक्ति पुरस्कार से सम्मानित। वर्तिका जी को यह पुरस्कार मीडिया और साहित्य के जरिए महिला अपराधों के प्रति जागरूकता लाने के लिए दिया गया। यही नहीं, 2018 में सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस एमबी लोकूर और जस्टिस दीपक गुप्ता की बेंच ने जेलों में महिलाओं और बच्चों की स्थिति की आकलन प्रक्रिया में शामिल किया। हरियाणा और उत्तराखंड की जेलों में रेडियो लाने का श्रेय उन्हीं को जाता है। देश की तीन जेलों के लिए परिचय गान लिखे जिन्हें जेल के ही बंदियों ने गाया। इसके अलावा जेलों पर लिखी उनकी तीन किताबें- तिनका तिनका तिहाड़, तिनका तिनका डासना और तिनका तिनका मध्य प्रदेश-जेल-जीवन पर प्रामाणिक दस्तावेज मानी जाती हैं। मैं जल्दी ही उनकी किताब को पढ़ पाने का सौभाग्य प्राप्त करूंगा। उन्होंने देश की जेलों में रेडियो लाने में महत्वपूर्ण काम किया है। वर्ष 2019 में देश की सबसे पुरानी जेल इमारत आगरा की जिला जेल में रेडियो स्थापित किया। वर्ष 2021 में हरियाणा और उत्तराखंड की जेलों में रेडियो लाने का श्रेय उन्हीं को जाता है। हरियाणा एवं उत्तराखंड के वरिष्ठ संबधित अधिकारियों के अलावा अन्य लोग भी मानते हैं कि उनके इन सभी प्रयासों से जेलों की जिंदगी में महत्वपूर्ण बदलाव आए हैं। बदलाव आने ही हैं क्योंकि कहा गया है-
इरादे नेक हों तो सपने भी साकार होते हैं
गर सच्ची लगन हो तो रास्ते आसां होते हैं।
डॉ वर्तिका जी के रास्ते बेशक आसां नहीं हैं, लेकिन नेक काम के लिए उन्हें सहयोग मिलता रहता है। उनका परिचय और भी बहुत कुछ है। तिनका-तिनका यूट्यूब में वह बहुत अच्छे से कार्यक्रम पेश करती हैं। इसके अलावा हुनर को मंच देने का काम तो अनवरत चल ही रहा है। मैं दुआ करता हूं कि तिनका तिनका फाउंडेशन की संस्थापक और दिल्ली विश्वविद्यालय के लेडी श्रीराम कॉलेज के पत्रकारिता विभाग की प्रमुख वर्तिका नन्दा की तरह ही नेक काम करने वाले लोगों को समाज में सम्मान के साथ-साथ खूब सहयोग मिले। दैनिक ट्रिब्यून में जो मैंने लिखा उसकी क्लीपिंग और मैटर नीचे साझा कर रहा हूं साथ ही धन्यवाद करता हूं हमारे कार्टूनिस्ट संदीप जोशी जी का जिन्होंने बेहतरीन कैरिकेचर इस लेख के लिए बनाया।
Sunday, January 16, 2022
जानिए सतगुरु राम सिंह जी के बारे में जो संस्थापक रहे नामधारी पंथ के
कभी-कभी आपको ऐसे लोगों की जानकारी मिल जाती है जो रोचक होने के साथ-साथ ऐतिहासिक होती है। ऐसा ही हुआ 16 जनवरी को। मेरे पास यह मैटर आया। इसे में हू ब हू यहां प्रस्तुत कर रहा हूं। पढ़िये। कोई जानकारी पर भ्रम हो तो कृपया बताइये-
जीवन परिचय
सतगुरु राम सिंह जी का जन्म बसंत पंचमी को वर्ष 1816 में गांव भैणी राईयां पंजाब मेंहुआ था। आपका जन्म रामगढिया बढई परिवार में हुआ था। आपने परिवार के साथ बढईका काम किया, गांव में खेती भी की और बाद में आप महाराजा रणजीत सिंह जी कीसेना में आ गये।
सेना में रहते हुये भी आपने श्री गुरु ग्रन्थ साहिब का पाठ व सिमरणकरते रहे और आपकी रेजिमैन्ट भी आपका अनुसरण कर अन्य सैनिक भी पाठ व सिमरणकरने लग गये। सेना से वापिस आकर कुछ समय के लिये दुकानदारी भी की इस प्रकारआप बढई, किसान, व्यवसायी, सैनिक एवं सन्त के रुप में भी दिखते हैं।
ब्रिटिश शासन का विरोध
वर्ष 1849 तक अंग्रेज शासन ने पूर्ण रुप से पंजाब को अपने कब्जे में लेलिया था। जिससे आम जनमानस में ब्रिटिश शासन के खिलाफ विरोध होना शुरु हो गयाथा। इसका मुख्य कारण था ब्रिटिश हुकुमत ने अपने प्रयोग का सारा साजो सामान ब्रिटेनसे मंगवाना शुरु कर दिया और भारत में निर्मित उत्पादों का प्रयोग बंद कर दिया थाजिससे भारत के कामगारों को नुकसान होना शुरु हो गया था और छोटे बडे कामगार केमन में ब्रिटिश शासन के प्रति विरोध बढने लगा।
नामधारीसंत खालसा पंथ की स्थापना
सतगुरु राम सिंह जी ने 12 अप्रैल 1857 को भैणी साहब (पंजाब) में नामधारीसंत खालसा पंथ की रहत मर्यादा स्थापना की। सिख रहत मर्यादा को भी सिख भुलनेलग गये थे, श्री गुरु ग्रन्थ साहिब की मर्यादा को पुनः स्थापित किया.
अपने पंथ केलोगों को गुरु नानक देव जी व श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी की मर्यादाओं के साथ नैतिकतौर पर मजबुत होकर अंग्रेज शासन के खिलाफ लडने का आहवान किया। सतगुरु रामसिंह जी ने गउ-गरीब की रक्षा का ध्येय वाक्य अपने नामधारी सिखों को दिया औरइसका अनुसरण करने का आहवान किया।
स्वदेशी का बिगुल बजाया
सतगुरु राम सिंह जी ने पंथ की स्थापना उपरांत अंग्रेजी उत्पादों और अंग्रेजीसंस्थानों के खिलाफ असहयोग का बिगुल बजा दिया। उन्होंने नामधारीयों को घर में बने गुड व शक्कर का प्रयोग व ब्रिटिश मिलों में बनी चीनी केबहिष्कार व नामघारियों को हाथ से बने सफेद खदर को पहननेका आहवान किया और आज भी नामधारी सिर्फ सफेद वस्त्र ही पहनते हैं, नामघारी पंथमें काले व नीले रंग को किसी प्रकार से शरीर पर धारण करना वर्जित है.
उन की बनीहुई माला का जप के लिये प्रयोग करना, ब्रिटिश डाक व्यवस्था के विरुध सतगुरु रामसिंह जी ने नामघारी डाक व्यवस्था शुरु की, सतगुरु जी के आहवान पर नामधारी सिखोंने ब्रिटिश सरकार की नौकरीयां छोड दी।
इस प्रकार आप स्वदेशी का आहवान करनेवाले प्रथम स्वतंत्रता सेनानी थे। इन सब से ब्रिटिश साम्राज्य में सतगुरु राम सिंह जी केप्रति बौखलाहट आनी शुरु हो गई।
गौरक्षा मलेरकोटला साका : अतुलनीय बलिदान
पंजाब में अंग्रेजो द्वारा फिर से बुचडखाने खोलने शुरु कर दिये और उनमेंगौ-कशी करवानी शुरु कर दी। मई 1871 तक पंजाब में गौ-हत्या के विरोध में काफीफसाद हुये और इसके चलते अमृतसर नगरपालिका ने प्रस्ताव पास कर गौ हत्या पर रोकलगा दी।
तत्कालीन कमीश्नर ने नगरपालिका का प्रस्ताव रद्ध कर फिर सेबुचडखानों में गौकशी शुरु करवा दी जिससे नामधारी सिखों में आवेश आ गया और14-15 जुन 1871 को 10 नामधारी कुकों ने अमृतसर बुचडखाने पर हमला कर दिया औरकसाईयों का वध करके फरार हो गये। इस पर कार्यवाही करते हुये अंग्रेज पुलिस ने कुछनिर्दोष लोगों को कसाईयों के वध के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया।
जब सतगुरु राम सिंहजी को इस बारे पता लगा तो उन्होने हुकम दिया कि जिन भी नामधारी सिखों नेकसाईयों का वध किया है वे पुलिस के पास जाकर समर्पण करें और उनकी जगह पकड़ेगये निर्दोष लोगों को छुडवायें। इस पर नामधारी सिखों ने खुन से सने वस्त्र औरकिरपाण अंग्रेज पुलिस को सौंप कर उनकी जगह गिरफ्तार किये लोगों को छोडने काआग्रह किया और 15 सितम्बर 1871 को अमृतसर में चार नामधारी सिखों को कसाईयों केवध के आरोप में फांसी पर लटका दिया गया।
तीन नामधारी सिखों को रायकोट में 26नवम्बर 1871 को फांसी पर लटका दिया गया। लेकिन इसके बावजुद ब्रिटिश राज मेंबुचडखानों में गौहत्या निरंतर जारी रही जिससे नामधारी सिखों में काफी आवेश था।
15 जनवरी1872को 150 नामधारी कुके सिखों ने मलेरकोटला बुचडखाने परहमला बोल दिया जिसमें से कुछ नामधारी सिख फरार हो गये और कुछ गिरफ्तार होगये।
17 जनवरी 1872को 50 नामधारी सिखों को शहीद किया गया जिनमें से 49नामधारी सिखों को तोप आगे खडा करके उडा दिया गया।
बालक बिशन सिंहका अद्भुत साहस
पचासवांनामधारीसिख बालक बिशन सिंह था जो काफी छोटी उम्र का था। लुधियाना का तत्कालीन डिप्टीकमीशनर एल0 कावन अपनी पत्नी सहित वहां मौजुद था। कावन की पत्नी ने कहा किये काफी छोटा बच्चा है इसकी जान बख्श दो तो इस पर कावन ने कहा कि अगर येबालक कह दे कि वो सतगुरु राम सिंह का सिख नहीं है तो इसकी जान बख्श दुंगा।
यह बात बालक बिशन सिंह को बताई गई तो उसने कहा कि वो यह बात कावन केकान में कहना चाहेगा। कावन ने बालक बिशन सिंह की बात मानकर जैसे ही झुककरअपना चेहरा बालक बिशन सिंह के नजदीक किया तो बिशन सिंह ने कावन की दाढीदोनो हाथों से पकड ली, इस पर रियासती सैनिकों के छुडवाने पर भी बालक बिशन सिंहने कावन की दाढी नहीं छोडी तो सिपाहियों ने बालक बिशन सिंह के दोनो हाथ काटदिये और बाद में बालक बिशन सिंह का सिर कलम कर शहीद कर दिया।
वरयाम सिंह का बलिदान
18जनवरी1872 को मलेरकोटला में ही 16 और नामधारी सिखों को तोपों से उडाकर शहीद करदिया गया। इन शहीदों में एक वरयाम सिंह गांव महराज निवासी भी थे जिनका कद बहुतछोटा था और तौप की उंचाई के बराबर नहीं आ रहे थे, इस पर अंग्रेज सिपाहियों ने उसेभागने को कहा तो वरयाम सिंह ने वहां पत्थरों का ढेर लगाया और उस पर खडे होकर बोले अब तुम्हारी तोप मुझे उडा सकती है और उन्हे भी तोप से उडाकर शहीद करदिया गया।
गौरक्षा के लिये ऐसे बलिदान शायद ही इतिहास में पढने को मिलें लेकिनतत्कालीन राजनीतिक सत्ताओं ने ऐसे बलिदानों को इतिहास में उचित स्थान नहीं दिया।
सतगुरु जी को देश से निर्वासन
इन सब घटनाओं से अंग्रेज शासन भौखला गया और उन्होने 18 जनवरी 1872 कोसतगुरु राम सिंह जी को निर्वासिंत कर रंगुन म्योमार भेज दिया। सतगुरु राम सिंह जी नेवहां से पत्राचार के माध्यम से अपने नामधारी सिखों को आजादी की लडाई में लगे रहनेऔर समाजहित में काम करते रहने के हुकमनामे जारी किये।ब्रिटिश हुकुमतके अनुसार सतगुरु राम सिंह जी कावर्ष 1885 में रंगुन में ही देहावसान बताया गया परन्तु उनकी मृत्यु का कोई भीप्रमाण अंग्रेज हुकुमत ने नहीदिया। जिसके कारण उनके अनुयायी आज भी उनको जीवितही मानते हैं।
सतगुरु राम सिंह जी : आध्यात्मिक, सामाजिक व्यक्तित्व
सतगुरु राम सिंह जी ने ना केवल आजादी के समर में भागीदारी की थी बल्किनामधारी पंथ की स्थापना कर समाज में व्याप्त कुरीतियों को खत्म करने के लिये भीविशेष कार्य किया।
उस समय लडकियों को पैदा होते ही मार दिया जाता था, सतगुरुजी ने इसका विरोध करते हुये ऐसे परिवारों का सामाजिक बहिष्कार करने का आहवानकिया। उन्होने बाल विवाह और बटे में (बदले में विवाह) का भी बहिष्कार कर इसे बंदकरने का काम किया और नामधारी पंथ में विधवा महिलाओं के पुनः विवाह को भी मान्यताप्रदान की।
आपने बालिकाओं की शिक्षा के लिये भी उस समय व्यवस्थायें की। सतगुरुराम सिंह जी ने आनंद मर्यादा लागु करके बिना दान दहेज के नामधारी पंथ में विवाह कीमर्यादा शुरु की। आपने नामधारी पंथ में अन्तरजातीय विवाह को स्वीकार्यता प्रदान कीऔर खुद अपनी हजुरी में अनेकों ऐसे अन्तरजातीय विवाह करवाये।
सतगुरु राम सिंह जीने शादीयों में फिजुल खर्ची को बंद करने के लिये सामुहिक विवाह की प्रथा शुरु की,आज भी नामधारी पंथ के मुख्यालय श्री भैणी साहिब पंजाब में सामुहिक विवाह किये जातेहैं।सतगुरु राम सिंह जी ने ना केवल आजादी के समर में अपना योगदान दिया बल्किनामधारी पंथ की स्थापना कर विभिन्न सामाजिक कुरीतियों को दुर करने का काम किया।
भारत की आजादी के सर्वप्रथम प्रणेता (कुका आंदोलन) असहयोग आंदोलन के मुखिया,नामधारी पंथ के संस्थापक तथा महान समाज सुधारक ऐसे महापुरुष को भारत के इतिहासमें उचित स्थान दिया जाना आवश्यक है।उनके अनुयायी आज भी भाव-व्यवहार- खान-पान में स्वदेशी को प्राथमिकता देतें है ऐसे सतगुरु को शत-शत ‘नमन।
साभार- स्वर्ण सिंह विर्क
Wednesday, January 12, 2022
खुद की तलाश
उनकी आंखों में झांकूं
यादेखूं आईना
आईना तो हर बार हैरानी ही जताता है
उनकी आंखों में जरूर कुछ उम्मीद है
लेकिन कहां?
उन आंखों में भी तो थकान दिखती है
घर-गृहस्थी की
खुद को खोकर नया संसार बसाने की
पर मैं नाउम्मीद नहीं
बेशक शिकायत है उन्हें
मुझमें आये बदलाव की
लेकिन यह बदलाव
उनकी आंखों की मानिंद
ही तो है
उम्मीदें आंखों में चमक की
शरीर के ठसक की
जीवन के लचक की
अपनेपन के परख की
हां
तलाश रहा हूं मैं खुद को
शरीर कमजोर हुआ तो क्या
अभी तो आएगी मन की तरुणाई
जीवन फिर लेगा एक अंगड़ाई
नवीनता के इस पथ पर
अपने भी तो होंगे संग हमारे
भूलेंगे गम सारे
फलक पर होंगे कितने सितारे
हां
नाउम्मीद नहीं हूं मैं
इसीलिए तो चलता रहना
उठना बैठना और गाना
सबकुछ देखना-सुनना
हां
तलाश रहा हूं मैं खुद को
Wednesday, January 5, 2022
मन में बनाये रखिये नयापन
साभार: दैनिक ट्रिब्यून
21वीं सदी को 22वां साल लग गया है। एक और नया वर्ष शुरू। नयापन। प्रकृति का नियम नव्यता। बिना नव्यता के सुख कहां। नव्यता के ही तो द्योतक हैं ऋतुएं। नया साल। त्योहार। विवाह। गृह प्रवेश। अस्वस्थता के बाद स्वास्थ्यलाभ। ये सब परिवर्तन चक्र हैं नव्यता के लिए। इस नव्यता यानी नयेपन को मन में पैदा करना होगा। इसीलिए तो कुछ-कुछ दिनों के अंतराल में हमारे यहां कुछ नयापन होता है। कहीं नव संवत्सर, कहीं हिजरी सन। कहीं लोहड़ी और कहीं पोंगल। कहीं बीहू, कहीं कोई अन्य नाम। सभी त्योहार, पर्व नव्यता के लिए। नव्यता रहे और इस नवीनता में बारंबारता रहे। खौफनाक रहे पिछले दो साल। सब जानते हैं। हर कोई प्रभावित रहा। अब नये साल की शुरुआत भी खौफ के साये में। लेकिन खौफ पर विजय भी हमें ही पानी है। और यह विजय हमें तभी मिलेगी जब हम मन से तैयार होंगे। नव संकल्प हम-आप में से अनेक लोग लेते होंगे, लेकिन उन संकल्पों की नवीनता को बहुत जल्दी पुरातन बना देते हैं यानी खत्म कर देते हैं। असल में जानकार कहते हैं कि सबसे पहले तो यह जानना होगा कि हमने संकल्प क्यों लिया और क्या लिया। संकल्प या तो कुछ छोड़ने के लिए या फिर कुछ पकड़ने के लिए। ऐसा करेंगे और वैसा नहीं करेंगे। जो हम नहीं करेंगे, वह क्या है? कहां से आया यह ज्ञान कि हम ऐसा नहीं करेंगे। हमारे भीतर से आया। यानी हमारे भीतर ही तो सबकुछ छिपा है। हम ऐसा करेंगे, यह ज्ञान भी हमारे भीतर से ही आया। अपने भीतर की आवाज को सप्रयास क्यों दबाया जाये। सप्रयास क्यों उठाया जाये। उसे आने दीजिए और उसी पर चल पड़िये। जानकार कहते हैं कि नवीनता का मतलब है प्रसन्नता से और प्रसन्नता आएगी अहंकार की समाप्ति से। तभी तो कबीरदास जी कह गये-
जीवन में मरना भला, जो मरि जानै कोय। मरना पहिले जो मरै, अजय अमर सो होय।
मरने से पहले मरने का भाव क्या है। यह भाव है अहंकार को समाप्त करना। मरना तो सबने है, लेकिन इस मरणत्व से पहले जो मर लेता है यानी अपने अहंकार, बुरी आदतों से मुक्त हो जाता है वह अमर है। वह अमरत्व को प्राप्त हो जाता है और यही अमरत्व सुख का आंगन है।
अहंकार का यह त्याग होगा मन की पवित्रता से। आपका मन साफ है तो आपका कोई दुश्मन नहीं होगा। इसका मतलब यह नहीं कि आपसे कोई बैर भाव ही नहीं पालेगा। करने दीजिए बैर। फिर बैर को स्थायी क्यों रहने दिया जाये। आप मन से सही हैं। आप के मन में द्वेष नहीं तो बैर भाव पालने वाले भी एक दिन उसे भूल जाएंगे। असल जरूरत है मन से शीतल बने रहने की।
जग में बैरी कोई नहीं, जो मन शीतल होय। यह आपा तो डाल दे, दया करे सब कोय।
तात्पर्य है कि यदि आपका मन साफ और शीतल है तो इस संसार में कोई भी मनुष्य आपका दुश्मन नहीं हो सकता। लेकिन यह भी ध्यान रहे कि अगर आपने अहंकार को नहीं छोड़ा तो आपके बहुत से लोग दुश्मन बन जाएंगे। ऐसे में यदि आप समाज में खुश रहना चाहते हैं तो किसी को भी अपना दुश्मन न बनाएं। सभी से प्रेमपूर्वक व्यवहार करें। सभी आपके दोस्त बनकर रहेंगे। अब सवाल इस पर भी उठाया जा सकता है कि सबसे दोस्ती एकतरफा कैसे हो सकती है। फिर समाज में हैं तो ऊंच-नीच भी होती है। तभी तो एक गीत के भी बोल हैं कि 'उसके दुश्मन हैं बहुत आदमी अच्छा होगा।' अगर ऐसी बात है तो मन के भ्रम को अपनी ओर से दूर करने की कोशिश करनी चाहिए। तभी तो एक शायर ने कहा है-
दुश्मनी जम कर करो, लेकिन ये गुंजाइश रहे। जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों।
संयम सर्वथा उचित
असल में जानकार कहते हैं कि आप सम बने रहिये। सम बने रहने का मतलब है शांत स्वभाव वाला। बेशक क्रोध, हंसी, निराशा, उदासी मानवीय गुण-अवगुण हैं, लेकिन सारी कवायद इन पर विजय पाने की है। जो चीज परेशान करे, उसे कुछ पल के लिए दूरी बनाइये, ठीक उसी तरह जैसे कहा जाता है कि जब मन में कोई अवगुण वाले विचार आएं तो कुछ देर उसकी तरफ ध्यान ही मत दीजिए। 'अति का भला न बोलना, अति की भली न चुप' की मानिंद चलते रहिए अपने पथ पर। रहीम दास जी ने शायद तभी कहा है-
रहिमन अति न कीजिए, गहि रहिए निज कानि। सैंजन अति फूलै तऊ, डार पात की हानि।
अर्थात कभी भी किसी कार्य और व्यवहार में अति न कीजिये। अपनी मर्यादा और सीमा में रहें। अति करने से हानि की आशंका ज्यादा रहती है। और सबसे जरूरी है अपनेपन को बनाये रखने की क्योंकि
बिगड़ी बात बने नहीं, लाख करो किन कोय। रहिमन फाटे दूध को, मथे न माखन होय।
प्रस्तुति : फीचर डेस्क
Sunday, December 26, 2021
भोजन माता की बात के बहाने पुरानी बातें
केवल तिवारी
मित्र राजेश डोबरियाल की बीबीसी हिंदी पर खबर छपी थी जिसमें उत्तराखंड के चंपावत में एक स्कूल में भोजन माता के हाथ का बना खाना बच्चों ने छोड़ दिया। दरअसल वह महिला अनुसूचित जाति से थी। इस खबर को पढ़ने के बाद और उससे पहले भी इस तरह के मुद्दों पर मेरी चर्चा होती रहती थी। प्रसंगवश बता दूं कि मैंने एक बार एक ब्लॉग नवरात्रों पर लिखा था जिसमें गाजियाबाद के वसुंधरा में हम बच्चियों को भोजन कराते थे और उन्हें बुलाने का अंदाज मुझे भा गया था। मेरे घर में या शायद औरों के घर में भी बात यही होती थी कि एक बच्ची 2190 से आएगी एक 3110 से एक बच्ची 1111 में भी है वगैरह... वगैरह। यानी वहां यह बात नहीं होती थी कि शर्मा जी की बेटी, पांडेय जी की बेटी या फलां जी की बेटी... फ्लैट नंबर से कन्याएं आती थीं और पूजन होता था। खैर... यह तो प्रसंग था।कक्षा पांच पास करके जब मैं लखनऊ गया था तो शुरू-शुरू में मुझे कुछ खबरें अंदर तक परेशान करती थी। जातिवाद के नाम पर कत्ल की खबरें अक्सर सुनाई देती थीं। कुछ बड़ा हुआ तो इस विषय पर उत्तराखंड के मसले पर बात होने लगी। मैं बड़े गर्व से कहता, जात-पात का ऐसा विकराल रूप हमारे यहां नहीं है। हमारे यहां एक ही झरने से सभी जातियों के लोग पानी भरते हैं। यही नहीं अपनी-अपनी बारी से भरते हैं। हमारे नीचे ठाकुरों का गांव है, वहां भी हम लोग रिश्तों से बात करते हैं यानी कोई हमारा चाचा है तो कोई भैया। जैसे बिशन दा, मोहन का। का मतलब चाचा। उन्हीं दिनों हर वर्ष गर्मियों की छुट्टियों में मैं घर जाता था। एक बार हमारे खेतों को जोतने के लिए हलिया (बता दूं कि हल जोतने वाले को हलिया कहते हैं और ज्यादातर वह अनुसूचित जाति से होता है) आया हुआ था। मां ने मुझे बाद में चाय देकर खेत में भेज दिया और बोलीं कि एक घंटे में दोपहर का भोजन लेकर वह आएंगी। मैं वहां पहुंचा तो हलिया खेत की जुताई के बाद पट्टा (हमारे यहां इसे मय कहते हैं, इसमें बैलों के सींग में हल की जगह एक लंबा जोत रखकर उसके सहारे पटरा चलाया जाता है जो जमीन को समतल सा कर देता है) चला रहा था। मुझे बड़ा लालच आया। मैंने कहा मैं भी पटरे पर खड़ा होऊंगा। हलिया ने पहले मना किया, फिर मुझे ऐसा करने दिया। थोड़ी देर में गांव के कुछ लोग उधर से गुजरे तो मुझे देखकर हंसने लगे। हलिया के एक-दो दोस्त भी आये और मेरी ओर देखकर 'नंग बामण' कहकर चल दिए। मांता जी को भी बहुत आश्चर्य हुआ और उन्होंने डराया कि कहीं पलटकर गिर जाऊंगा तो। उन्होंने गिरने का डर दिखाकर मुझे वह करने से रोक दिया।
इसके अगले दिन मैं अपने घर से कुछ ही दूरी पर रहने वाले अपने मित्र दिनेश (अनुसूचित जाति) के घर गया। वे लोग लोहे के औजार बनाते हैं जैसे कि कुल्हाड़ी, हंसिया, कुदाल वगैरह-वगैरह। जिस भट्टी में वे लोहा गरम करते थे उसमें लगातार धौंकनी चलाने के लिए साइकिल के एक रिम को लगातार घुमाना होता था। मुझे वह नजारा देखकर अच्छा लगा और मैं वहीं बैठकर उस रिम को चलाने लगा। मुझे ऐसा करते देख मेरे गांव वालों ने आपत्ति जताई। हालांकि मेरे विरोध में कोई पंचायत-वंचायत नहीं हुई। बाद में मैंने देखा कि अनुसूचित जाति के कई लोग अच्छी नौकरी पाने के बाद समृद्ध हो गए तो शहरों में हमारे ही गांव के कई लोगों का उनके साथ उठना-बैठना चालू हो गया। यही नहीं यह भी सुनने में आया कि कई लोगों ने प्रधानी का चुनाव जीतने के लिए उनके साथ जाम टकरा लिए तो सारे वोट संबंधित नेता को मिल गए। असल में बात है आर्थिक स्थिति की। आर्थिक तौर पर मजबूत हैं तो जाति-पाति बहुत कुछ आपका बिगाड़ नहीं सकती। आर्थिक रूप से कमजोर हैं तो सब गड्डमड्ड। आर्थिक रूप से कमजोर होने का दंश मैंने कदम-कदम पर झेला है।
दिल्ली के अफसर टमटा जी का किस्सा
जात-पात की जड़ें गहरे होने का कारण कहें या सदियों से चली आ रही परंपरा का नतीजा। मैंने सुना है कि दिल्ली में कोई बड़े अफसर रहे हैं टमटा। शायद कमिश्नर या हो सकता है कोई बड़े राजनीतिज्ञ। मैंने यह सुना है कि उन्होंने अपनी कोठी पर एक ब्राह्मण रसोइया अलग से रखा हुआ था। जब उनके गांव के ब्राह्मण लोग उनसे मिलने आते तो उनके लिए चाय या फिर खाने-पीने की चीजें वह विशेष रसोइया ही बनाता। उन्होंने ऐसा क्यों किया यह तो नहीं मालूम, लेकिन कई खांटी पंडित आज भी उनकी इस बात को याद कर उनकी बड़ी प्रशंसा करते हैं।
आरक्षण और नयी पीढ़ी
जिम्मेदारी तो नयी पीढ़ी की ही बनती है कि इस जात-पात की दुर्गंध को दूर करें। हालांकि आरक्षण की व्यवस्था के चलते भेदभाव मिट नहीं पाता। पिछले दिनों कई बच्चों से बात हुई। कोई कहता मेरी जितनी रैंकिंग आई है, उससे मुझे कोई अच्छा कॉलेज नहीं मिल पा रहा है और रैंकिंग में मुझसे बहुत ज्यादा पीछे रहने वाले को आरक्षण के चलते अच्छा कॉलेज मिल गया। जब मैंने कहा कि इससे परेशान होने की जरूरत नहीं तो एक दूसरा बच्चा बोला, 'अंकल मेरा एक दोस्त है जो रोज पांच-सौ रुपये खाने-पीने पर उड़ा देता है, अब हम लोग एक ही कैंपस में गए हैं। हमने सवा लाख रुपये जमा करना है और उसने महज 600 रुपये।' मैंने समझाया कि ईडब्ल्यूएस कोटे का फायदा उठाना चाहिए। खैर तर्कों-कुतर्कों का अंतहीन सिलसिला कहां खत्म होने वाला। इसी दौरान खबर आई कि पिछले पांच-सात सालों में आईआईटी, आईआईएम जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में करीब 150 बच्चों ने आत्महत्याएं की हैं। इनमें से ज्यादातर अनुसूचित जाति के थे। शायद उन्हें बात-बात पर कोसा जाता होगा। नयी पीढ़ी को जात-पात के बंधन तोड़ने होंगे। आरक्षण का मुद्दा आर्थिक हो या जाति आधारित यह दूसरी तरह के बहस का विषय है।
Monday, December 20, 2021
इस निर्ममता से कौन से भगवान प्रसन्न होते होंगे
केवल तिवारी
पंजाब में पिछले दिनों कथित तौर बेअदबी के दो मामले सामने आए जिनमें दो लोगों की हत्या कर दी गयी। ऐसा ही एक वाकया कुछ समय पहले गाजियाबाद में हुआ था जब एक बच्चे ने मंदिर में पानी पीया तो उसे एक व्यक्ति ने बहुत निर्ममता से पीटा। किसान आंदोलन के दौरान एक शख्स के हाथ-पांव काटकर लटकाने का मामला कौन भूल सकता है। गैर मुस्लिमों पर कश्मीर में अत्याचार की बात तो कितना बड़ा मुद्दा बना है, सभी जानते हैं। आखिर ये कौन लोग हैं जो धर्म के नाम पर दावा करते हैं कि उन्होंने अधर्मी को मार दिया। कौन से भगवान हैं जो हिंसा से खुश होते हैं। क्या भगवान, अल्लाह, यीशू, वाहेगुरु आदि-आदि, हम जिस भी धर्म को मानते हों, कभी कोई ऐसा संदेश देता है। क्या हिंदुओं के किसी भी धर्म ग्रंथ में हिंसा को उचित ठहराया गया है। बल्कि वहां तो सार-संक्षेप में कहा गया है-अष्टादश पुराणेसु व्यासस्य वचनद्वयम
परोपकाराय पुण्याय, पापाय परपीडनम।
अर्थात अठारह पुराणों में व्यास जी के दो ही वचन हैं-परोपकार के समान के कोई पुण्य नहीं और दूसरों को कष्ट देने के समान कोई पाप नहीं।
ऐसे ही इस्लाम में क्या हिंसा को जायज ठहराया गया है। इस्लाम का तो अर्थ ही है शांति की स्थापना। पता नहीं धीरे-धीरे कैसे धर्म के ठेकेदार बनते गये और हत्या को जायज ठहराते चले गये। इसी तरह सिख धर्म में तो सभी महापुरुषों की वाणियों को संजोया गया है। चाहे गुरु नानकदेव हों, रैदास हों, कबीरदास हों, दादू हों या कोई और उसमें तो मानव से प्रेम की सीख दी गयी है। फिर सिख धर्म के अनुयायी तो परोपकार के कितने की काम करते हैं। इस धर्म के अनुयायी जो चैरिटी करते हैं वह कभी भी जाति-पाति या पंथ, संप्रदाय नहीं देखते। जैन धर्म और बौद्ध धर्म में तो अहिंसा परमोधर्म: सिखाया ही जाता है।
जब सभी धर्मों का मूल मंत्र अहिंसा है, प्रेम है तो फिर यह हत्या, पिटाई जैसी बातें कैसे आ जाती हैं। धर्म के नाम पर सियासती लोग भी चुप्पी साध लेते हैं। आखिर ऐसा क्यों होता है। अहिंसा, प्रेम का बिल्कुल यह अर्थ नहीं है कि कोई किसी दूसरे की भावनाओं को ठेस पहुंचाए। ऐसा कदापि नहीं किया जाना चाहिए और यह अधर्म है, लेकिन अगर कोई ऐसा व्यक्ति सामने आता है तो क्या उसे कानून के हवाले नहीं किया जाना चाहिए। कानून अपने हाथ में लेने का मतलब है आप सबकुछ हो गये। आप न्याय के देवता हो गये। आप अनुयायी हैं। अनुयायी धर्म की बातों को प्रचारित या प्रसारित करते हैं, अधर्म का काम नहीं करते। हिंसक होते समाज के कुछ लोगों को सोचना होगा कि जो भी लोग पर्दे के पीछे हिंसा को जायज ठहराते हैं, वे असल में अधर्मी हैं। इसलिए जागिए। धार्मिक बनिये। हिंसक या पशुवत नहीं।
Tuesday, December 14, 2021
वह चार एक्सीडेंट और करता, फिर भी कुछ नहीं होता
केवल तिवारी
कभी-कभी फिल्मों या सीरियल्स में दिखाते हैं कि कोई व्यक्ति एक्सीडेंट के बाद भाग जाता है तो थोड़ी देर में ही 'अलर्ट पुलिसिंग व्यवस्था' उसे पकड़ लेती है और फिर कानून के दायरे में जो होता है, सही होता है। लेकिन फिल्मी सीन तो फिल्मी ही होते हैं, असल जिंदगी में ऐसा कहां होता है? आपकी शिकायत ही पुलिस सुन ले, यही बहुत है। वह भी तब जब आपने तमाम प्रयास किए हों। बात रविवार 12 दिसंबर, 2021 के शाम की है। मैं दिल्ली गया था। बेटा कार्तिक अपने मामा भास्कर जोशी के पास था। मेट्रो से लौट रहा था तो भास्कर का फोन आया कि जब मोहन एस्टेट स्टेशन पर पहुंच जाएंगे तो फोन कर देना और सराय स्टेशन पर उतरना, मैं लेने आ जाऊंगा। एक बारगी मैंने कहा कि परेशान मत होओ मैं ऑटो से आ जाऊंगा, लेकिन वह नहीं माने। मानना भी कैसा? कोई भी होता तो ऐसा ही करता अगर समय है तो। हमारे यहां कोई आए और मैं बहुत व्यस्त नहीं हूं तो शायद ऐसा ही करूं। शाम करीब सवा सात बजे भास्कर फरीदाबाद में ग्रीन फील्ड कालोनी से अपनी वैगनआर कार (नंबर HR51AU10312) से मुझे लेने सराय स्टेशन पर आ गए। गाड़ी की पार्किंग लाइट ऑन कर उन्होंने हैंड ब्रेक उठाया ही था कि पीछे से एक मारुति स्विफ्ट डिजायर गाड़ी (नंबर DL3CAU4759 - यह नंबर वहां आसपास लोगों ने बताया क्योंकि भास्कर कुछ पल के लिए तो समझ ही नहीं पाए कि हुआ क्या?) तेज रफ्तार में आई और भास्कर की कार पर इतनी जोरदार टक्कर मारी कि पीछे का बंपर, लाइट सभी फूट गए और हैंड ब्रेक में खड़ी गाड़ी तेजी से आगे बढ़ी और वहीं किसी रिश्तेदार को लेने आए एक अन्य सज्जन की गाड़ी से टकराई। इस क्रम में भास्कर की गाड़ी का बोनट आदि भी क्षतिग्रस्त हो गया। जिस गाड़ी ने टक्कर मारी उसने तुरंत गाड़ी बैक की और वह भाग गया। लोगों ने बताया कि वह नशे में धुत लग रहा था। उसी वक्त मैं वहां पहुंच गया। सारा माजरा समझने के बाद हमने कोशिश की कि पहले पुलिस को सूचना दे दें ताकि वह आगे कोई एक्सीडेंट न कर पाए। चूंकि भास्कर ठीक से चल भी नहीं पा रहे थे, जोर का झटका लगने से पैर और पीठ में चंक पड़ गया था। 100 नंबर पर बहुत देर तक ट्राई करते रहे, फोन नहीं लगा। तभी मैंने अपने अखबार के रिपोर्टर राजेश शर्मा जी को फोन लगाया। उन्होंने बताया कि उन्होंने सराय थाने के एसएचओ साहब से कह दिया है। इस बीच किसी तरह पुलिस से संपर्क हुआ। एक पीसीआर वैन आई और उसमें मौजूद पुलिसवाले बोले-गाड़ी लेकर थाने आ जाओ। मैंने कहा कि भाई ये नंबर लोगों ने बताया है कोई ऐसी प्रणाली नहीं है कि आप दिल्ली पुलिस को सूचित कर दो ताकि वह कहीं ट्रेश हो जाए। पुलिसवाले ने कहा आप बच गए, भगवान का शुक्र है। आप थाने आ जाओ। पुलिसवाले तो चले गए, लेकिन हमारी गाड़ी चल ही नहीं पा रही थी। किसी तरह दस किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से हम ढूंढ़ते-ढूंढ़ते थाने पहुंचे। वहां हमसे इंतजार करने को कहा गया। मैंने एसएचओ साहब के बारे में पूछा तो पता लगा कि वह छुट्टी पर हैं। आधे घंटे के इंतजार के बाद भी जब कुछ नही हुआ तो मैंने दिल्ली स्थित अपने छोटे भाई सरीखे और वरिष्ठ पत्रकार अवनीश चौधरी को फोन किया। अवनीश ने कहा कि यह तो हिट एंड रन का मामला बनता है। पुलिसवालों से इस संबंध में बात की तो वह हमेशा की तरह समझाने लग गए। बहुत देर हो गई तो मैंने पुलिस वाले को थोड़ा गुस्से में नमस्ते किया और हम आने लगे तभी पुलिसवाला अपना रोना रोने लगा। उनकी बात सुनकर लगा कि वास्तव में काम का बहुत प्रेशर है इनके पास। उन्होंने एक शिकायती पत्र लिखवाया और घर जाने को कहा। अगले दिन मैं तो चंडीगढ़ आ गया, लेकिन भास्कर की समस्या अभी बरकरार थी। संबंधित पुलिसवाले को फोन किया तो वह नहीं उठा पाए। फिर वह सीआईएसएफ अधिकारियों के पास पहुंचे कि शायद सीसीटीवी फुटेज मिल जाएं, लेकिन वहां भी निराशा ही हाथ लगी। बताया गया कि मेट्रो स्टेशन के बाहर का एरिया सीसीटीवी की रेंज में नहीं है। फाइनली भास्कर कार को लेकर वर्कशॉप लेकर गए। वहां बताया कि करीब 50 हजार खर्च आएगा और 10 दिन लगेंगे। कुछ पैसा शायर इंश्योरेंस कंपनी का मिल जाएगा। दुर्घटना के बाद हम सब लोगों ने पहले तो भगवान का यही शुक्रिया अदा किया कि भास्कर सुरक्षित है। फिर भास्कर के मन में भी वह बात आई कि अक्सर वह किसी को लेने जाते हैं तो बच्चे को साथ ले लेते हैं। अगर मेरा बेटा या उनका बेटा गाड़ी में पीछे बैठे होते तो क्या होता? भगवान का बहुत-बहुत आशीर्वाद रहा कि ऐसा भी नहीं हुआ। भगवान का आशीर्वाद इस रूप में भी कि हमारी गलती से यह सब नहीं हुआ। भगवान की कृपा आगे भी बनी रहे, यही प्रार्थना है।
इसी दौरान मुझे वह हादसा याद आया जो हमारे साथ की पत्रकार कविता ने हमें बताया था। उनके कुछ रिश्तेदार चंडीगढ़ आए थे। चंडीगढ़ से वापसी के दौरान परवाणु नामक जगह पर उनकी कार खराब हो गयी। वे लोग बाहर उतरकर फोन करने लग गए, तभी पीछे से तेज रफ्तार कार ने टक्कर मार दी। पांच लोग घायल हो गए। उनमें से अब तो एक की जान ही चली गयी। वह कार वाला भी उपरोक्त केस की तरह भाग गया था, लेकिन हादसे के दौरान उसकी कार की तेल की टंकी फट गयी थी, जिससे वह पकड़ा गया, लेकिन क्या होगा? अब वह जमानत पर है। एक व्यक्ति की मौत हो चुकी है, कुछ लोग गंभीर रूप से घायल हैं। उस व्यक्ति की कार की फ्यूल टंकी अगर नहीं फटती तो वह भी सराय मेट्रो स्टेशन वाले वाकये की तरह भाग जाता, शायद एक-दो एक्सीडेंट और करता। खैर... क्या कहूं, लिखने का ही रोग है मुझे। इसलिए भगवान को धन्यवाद देते हुए परोक्त के अलावा कुछ पंक्तियां लिख रहा हूं-
अपनी लड़ाई खुद लड़िए, बहुत भरोसा मत रखिए
राह चलते रईसजादों से खुद बचकर चल दीजिए
इस शहर में मददगार भी मिलेंगे, पर अधूरे-अधूरे से
दो शब्द सांत्वना के बोल दिए उसी से सुकून लीजिए।
असल में, मैं यह नहीं कह रहा हूं कि एक्सीडेंट क्यों हुआ। यूं तो वह ओवरस्पीड में ही रहा होगा, हो सकता है ड्रिंक भी की हो। ये सब तो गंभीर अपराध हैं। लेकिन साथ ही यह भी कि सड़क पर चल रहे हैं तो कभी-कभी कुछ गलतियां भी हो जाती हैं। मेरा सवाल है उसके भागने पर। मेरे कितने जानकार हैं, जिनसे कुछ एक्सीडेंट हो गए हैं, लेकिन पीड़ित की पूरी मदद की गयी। यहां तो पीड़ित ही दोषी की तरह इधर-उधर घूमता रहा और....
Tuesday, December 7, 2021
... जरा फासला बरकरार रखिए
केवल तिवारी
कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नए मिजाज का शहर है, जरा फ़ासले से मिला करो।
शहर तो वही है, मिजाज नया है। कोरोना के बाद का मिजाज। अभी बाद भी कहां आया। तरस गए हैं पोस्ट कोविड पीरियड सुनने के लिए। लग रहा था कि भारी तबाही मचाने के बाद अब तो सब यही कहेंगे चलो मुक्ति मिली कोरोना चला गया। लेकिन कोरोना गया नहीं, नित नये रूप धरकर मानव सभ्यता या असभ्यता को डरा रहा है।
थोड़ी सी उम्मीद जगी है
कोरोना महामारी के रौद्र रूप के बाद अब कुछ नया और ऊर्जावान होता दिख रहा है। बॉलीवुड उत्साहित है। टीवी शोज में क्रिएटिविटी दिख रही है। स्कूल लगभग खुल गए हैं। सरकारी और निजी दफ्तरों में आवाजाही सामान्य हो गयी है। ट्रेनें भी फुल चलने लगी हैं। बेशक अच्छा-अच्छा सा दिख रहा है, लेकिन यह नये दौर का जमाना है, इसलिए फासला जरूरी है। विशेषज्ञों कहते हैं कि भीड़ से अब भी बचना है। इसी बचना है की ताकीद का ही परिणाम था कि पिछले दिनों एक जरूरी कार्यक्रम में दिल्ली जाना था, लेकिन तमाम किंतु-परंतु के बीच आखिरकार नहीं जाना ही तय किया। ओमिक्रोन के रूप में नए वेरिएंट से डर लग रही है। अब अगर वही रौद्र रूप रहा तो स्थिति से पहले से ज्यादा बिगड़ेगी क्योंकि भूकंप का एक झटका तो सह लिया जाता है, लेकिन वैसे ही या उससे भी भयावह झटके लगने लग जाएं तो संभलना मुश्किल हो जाता है।
| चित्र साभार कार्तिक |
पिछले दिनों छोटे बेटे के स्कूल से नोटिस आया कि बच्चे को स्कूल भेजें। बसवाले से बात की तो वह भी राजी हुआ। राजी होना ही था क्योंकि दो साल से उसकी बसें बंद थीं। शुरू के कुछ दिनों में तो बच्चे को ले जाना और लाना खुद ही करना पड़ा, लेकिन 29 नवंबर से बस नियमित रूप से आने लगी। जब बच्चे को खुद ले जाना हो रहा था तो लगभग दो साल बाद ऐसा खुशनुमा माहौल देखकर मन प्रसन्न हो रहा था। बच्चे आपस में मिल रहे थे। हंसबोल रहे थे। किसी ने मास्क लगाया था किसी ने कान में टांग तो रखा था, लेकिन बस औपचारिकता निभाने की तरह। जो भी ऐसी ही तस्वीर बनी रहे। नए साल से हालात सामान्य हो जाएं, यही दुआ है।
सब पूछते हैं कि बच्चों में आखिर इतनी मजबूती का क्या सबूत है। बड़ों को तो टीक लग गए फिर भी कई कॉलेज अब भी नहीं खुले। आईआईटी, आईआईएम एवं नीट जैसी पढ़ाई अभी बच्चे घर से ही कर रहे हैं। बच्चों को न तो वक्सीन लगी और न ही बच्चे कोविड प्रोटोकाल का वैसा पालन कर सकते हैं जैसा बड़े, ऐसे में उन्हें स्कूल बुला लेना क्या समझदारी भरा कदम है। सुप्रीम कोर्ट ने भी पिछले दिनों दिल्ली में प्रदूषण मसले पर सुनवाई करते हुए टिप्पणी की थी जब बड़ों के लिए वर्क फ्रॉम होम है तो बच्चों को स्कूल क्यों बुलाया जा रहा है।
सारी बातों का निचोड़ यही है कि फिलहाल फासले से मिलने की व्यवस्था को बरकरार रखिए। हाथ मिलाने की जरूरत नहीं। नमस्ते या सलाम ही कर लीजिए। मास्क पहनना बहुत जरूरी है। और अगर वैक्सीन नहीं लगवाई है तो इसमें देरी न करें। एक-एक व्यक्ति जब सुरक्षा कवच से घिरेगा तभी कोराना भागेगा।
Thursday, December 2, 2021
और मुच्चू लौट आया...
गुफ़्तगू अब जानवरों से किया करते हैं,
क्योंकि ये कभी दिल नहीं दुखाया करते हैं।
जानवर तो बेवजह ही बदनाम है,
इंसान से ज्यादा कोई खूंखार नहीं होता है।
चंडीगढ़ आने के बाद से मैं एक ही मकान में रह रहा हूं। इस कालोनी में भी कुछ कुत्ते हैं। कुछ लोगों के घरों में पले हैं और कुछ स्ट्रीट डॉग हैं, लेकिन उनका हमारे घर से भी वास्ता हो गया। कभी-कभी आते और एक कटोरी दूध पीकर चल देते। इस बीच कुछ लोग भावुक होकर कहते कि इनमें से कुछ कुत्ते दुबले हो गए हैं। इनकी एज ही क्या होती है। देखना अब ये मरने लगेंगे। सच में कुछ दिन पहले एक कुत्ता कहीं चला गया और पता चला कि वह मर गया। इसी बीच, एक कुत्ता जिसे मोहल्ले वालों ने 'साफ्टी' नाम दे रखा था मर गया। उसे वहीं एक खाली प्लॉट में दफना दिया गया। उसके बाद का भावुक सीन मुझे दिल से रुला गया। शाम को टलहलते वक्त देखा कि साफ्टी के साथ का एक भूरे रंग का कुत्ता थोड़ी-थोड़ी देर में भौंक रहा है, फिर गोल गोल घूमकर बैठ जाता है। फिर भावना ने बताया कि आज तो इसे देखकर हर कोई भावुक हो गया। यह अपने मुंह में रोटी लेकर जाता और जहां साफ्टी को दफना रखा है, वहीं पर मिट्टी खोदकर डाल देता। उसे लगा कि उसका दोस्त कहीं अंदर जाकर छिप गया है। सचमुच यह सीन भावुक था। मुझे याद है एक बार किसी शो में अमिताभ बच्चन ने कहा था, 'मुझे कुत्ते पालना बहुत अच्छा लगता है, लेकिन कुछ सालों बाद उनकी मौत हो जाने पर बहुत दुख भी होता है, इसलिए अब कुत्ते नहीं पालता।'
जब मैं कक्षा 7 में पढ़ता था, लखनऊ में हमारा एक पालतू कुत्ता था। नाम था टॉमी। वह मेरे भाई साहब की साइकिल की आवाज पहचान लेता था। दूर से ही आवाज सुनकर उछलने लगता था। भाई साहब की जेब में उसके लिए कुछ न कुछ होता था। जब सुबह वह ऑफिस जाते तो वह एक किलोमीटर तक छोड़ने जाता फिर लौट आता। ऐसे ही दीदी-जीजाजी के साथ उसका व्यवहार था। एक दिन वह अचानक गायब हो गया और फिर कभी नहीं लौटा।
जानवरों की वफादारी का यह आलम है कि उन पर हिंदी और अंग्रेजी में कई फिल्में बनीं हैं। लिटिल स्टुअर्ट, नीमो, लैस्सी कम होम, लेडी एंड द ट्रैंप, ओल्ड येलेर, द फॉक्स एंड द हाउंड, डॉक्टर डू लिटिल जैसी तमाम हॉलीवुड फिल्मों के अलावा हिंदी में तेरी मेहरबानियां, मर्द, हाथी मेरे साथी जैसी कई फिल्मों में जानवरों की वफादारी की कहानियां हैं।
जानवरों खासतौर पर कुत्तों ने कई बार नुकसान भी पहुंचाया है। कई बार बच्चे को नोचने और बुजुर्ग को काटने की खबरों से हम-आप दो-चार होते रहते हैं। एक बार तो एक कुत्ते ने घर के दामाद को जान से मार डाला था। हालांकि इन सबमें गलती इंसानों की भी होती है। वैसे स्ट्रीट डॉग से सावधान रहना चाहिए और जो लोग कुत्ता पालते हैं उन्हें चाहिए कि जानवरों की वैक्सीन समय पर लगवाकर उसे नियंत्रण में रखें। जैसे मुच्चू को रखा जाता है।
